स्वराज्य आंदोलन में सहयोग
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सन् १९१६ में 'होमरूल आंदोलन' आरंभ होने पर दास बाबू राजनीतिक आंदोलन में भाग लेने की आवश्यकता विशेष रूप से अनुभव करने लगे। अप्रैल १९१७ में उनको कलकत्ता में होने वाले 'बंगाल प्रादेशिक सम्मेलन' का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। उनके नाम का प्रस्ताव रखते हुए बंगाल के पुराने नेता श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने 'भविष्यवाणी' कर दी कि "श्री दास शीघ्र ही भारत के अत्यंत विश्वासपात्र और लोकप्रिय नेता बनने वाले हैं।"
इस सम्मेलन के अध्यक्ष पद से उन्होंने जो भाषण दिया उसमें सबसे मुख्य बात यह थी कि राष्ट्र की वास्तविक मनोवृत्ति को पहचानकर उन्होंने राजनैतिक आंदोलनकारियों को चेतावनी दी कि वे भारत की अंतरंग आत्मा को न समझकर योरोप की नकल कर रहे हैं। उन्होंने कहा-"अपने देश में विदेशी राज्य पनपने के साथ-साथ हमने योरोप की कुछ बुराइयों को अपना लिया और हम अपने सरल और उत्साहमय जीवन को त्यागकर सुख और विलासिता के जीवन में डूब गये। हमारे सभी राजनीतिक आंदोलन यथार्थता से दूर हैं, क्योंकि इनमें उन लोगों का कोई हाथ नहीं, जो इस देश की असली रीढ़ हैं" उनका आशय था भारत के किसान, मजदूर और सामान्य जनता से। वे जानते थे कि उनके जाग्रत हुए बिना न तो कोई आंदोलन शक्तिशाली बन सकता है और न देश का सच्चा कल्याण हो सकता है। उनकी यह भावना इतनी गहरी और सच्ची थी कि उन्होंने जब महात्मा गांधी को जनसमुदाय को साथ लेकर आंदोलन करते देखा तो तुरंत अपना सर्वस्व अर्पण करके उसमें सम्मिलित हो गये। श्री दास का उपयुक्त अभिभाषण इतना महत्त्वपूर्ण था कि बंगाल के तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर लार्ड रोनाल्डशे ने अपनी पुस्तक 'दि हार्ट ऑफ आर्यावर्त' में उसकी चर्चा करते हुए लिखा था-
"श्री दास ने जो कुछ कहा, वह वास्तव में एक मिशनरी के उत्साह से कहा। योरोपीय आदर्शों रूपी स्वर्ण पशु की उन्होंने धज्जियाँ उडा़कर रख दीं और एक ऋषि के समान देश को उन्नति का रास्ता दिखाया"

