अमृत बाजार पत्रिका पर मानहानि का अभियोग
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ऐसी ही कानूनी निपुणता का परिचय उन्होंने "अमृत बाजार पत्रिका" के मानहानि वाले मुकदमे में दिया। हाईकोर्ट ने इंप्रूवमेंट ट्रस्ट द्वारा किसी की जमीन पर अधिकार करने के प्रश्न पर विचार करने को एक विशेष 'बैंच' बिठाई थी-जिसमें तीन अंग्रेज जज और चौथे भारतीय जज श्री चिट्टी थे। 'अमृत बाजार पत्रिका' ने इस पर टिप्पणी करते हुए लिख दिया कि "अगर जस्टिस चिट्टी की जगह किसी अन्य ऐसे जज को नियुक्त किया जाता है' जिसके पास कुछ जमीन होती तो अच्छा होता।" इस पर 'पत्रिका' के संचालकों को नोटिस दिया गया कि उन्होंने एक न्यायालय के विचाराधीन मामले पर टिप्पणी की है, इसके लिए उन पर मानहानि का मुकदमा क्यों ना चलाया जाये? 'पत्रिका' ने इसकी पैरवी करने के लिए कलकत्ता के चार सर्वोत्तम वकीलों को नियुक्त किया, जिनमें 'बम केस' वाले सुप्रसिद्ध मि० नार्टन भी थे। जब एक-एक कर तीनों वकीलों ने जजों का रुख प्रतिकूल देखा, तो श्री दास पैरवी करने को खड़े हुए और उन्होंने कहा कि- 'पत्रिका' का इरादा हाईकोर्ट की मानहानि करने का हरगिज नहीं था। उसके लेख में विवाद के विभिन्न पहलुओं को सामने रखकर अपने मतानुसार समाधान का ढंग सुझाया गया है। लेख की कुछ बातें असंगत अवश्य हैं, पर उनका वास्तविक उद्देश्य इतना ही था कि इस मामले का निर्णय फुल बैंच द्वारा ही किया जाय। इसलिए यह लेख अनुचित भले ही हो, पर इससे किसी प्रकार न्यायालय की मानहानि नहीं होती।" इसके बाद उन्होंने दीवानी और फौजदारी के विभिन्न दृष्टिकोण से इस मामले को ऐसी चतुरता से पेश किया कि फुल बैंच के जजों ने 'पत्रिका' के पक्ष में निर्णय दे दिया।
श्री दास की कानूनी निपुणता, संतुलित भाषण और निर्भीकता की सर्वत्र सराहना की जाती थी। उनकी मृत्यु के पश्चात् सभी प्रमुख जजों और वकीलों ने इन गुणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि-"श्री दास मुकदमे के समस्त पहलुओं पर पूरी तरह ध्यान देते थे। गवाहों के बयानों, लिखित प्रमाणों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों का वह बडी़ सावधानी और होशियारी से विवेचन करते थे। उनमें अदम्य इच्छाशक्ति थी, जिसके फलस्वरूप वे जजों अथवा अपने विरोधियों से कभी नहीं दबते थे। वे एक सच्चे व्यक्ति के समान खडे़ होते थे और ऐसी ईमानदारी तथा विश्वास के साथ बहस करते थे कि विरोधी भाव रखने वाले जज भी अंत में उनसे प्रभावित हो जाते थे।"
श्री दास की कानूनी निपुणता, संतुलित भाषण और निर्भीकता की सर्वत्र सराहना की जाती थी। उनकी मृत्यु के पश्चात् सभी प्रमुख जजों और वकीलों ने इन गुणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि-"श्री दास मुकदमे के समस्त पहलुओं पर पूरी तरह ध्यान देते थे। गवाहों के बयानों, लिखित प्रमाणों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों का वह बडी़ सावधानी और होशियारी से विवेचन करते थे। उनमें अदम्य इच्छाशक्ति थी, जिसके फलस्वरूप वे जजों अथवा अपने विरोधियों से कभी नहीं दबते थे। वे एक सच्चे व्यक्ति के समान खडे़ होते थे और ऐसी ईमानदारी तथा विश्वास के साथ बहस करते थे कि विरोधी भाव रखने वाले जज भी अंत में उनसे प्रभावित हो जाते थे।"

