नवयुवकों का संगठन
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नागपुर कांग्रेस से लौटते ही दास बाबू ने असहयोग कार्यक्रम की सफलता के लिए
प्रयत्न आंरभ कर दिया। सबसे पहले उन्होंने उत्साही कार्यकर्ताओं की
आवश्यकता अनुभव की। १० और ११ जनवरी को उन्होंने विराट् सार्वजनिक सभाओं में
भाषण किए और बंगाल के छात्रों से अपील की कि वे मातृभूमि की पुकार सुनकर
कार्यक्षेत्र में आयें। इसके फलस्वरूप सबसे पहला दल बंगालवासी कॉलेज से
आया। इसके पश्चात् रिपन कॉलेज, सिटी कॉलेज और विद्यासागर कॉलेज के छात्र भी
बाहर आ गये। उन्होंने छात्रों से कहा कि उनकी पढा़ई एक या दो वर्ष के लिए
रुक जाये तो कोई बडी़ हानि न होगी, परंतु स्वराज्य-युद्ध में भाग लेना
प्रत्येक देशवासी का कर्तव्य है। शिक्षा-संस्थाओं के बहिष्कार का अर्थ इतना
ही नहीं कि पढ़ना-लिखना बंद करके घर में बैठे रहें अथवा आवारागर्दी करें।
वरन् छात्रों को शहरों और ग्रामों में असहयोग के कार्यक्रम और अन्य आवश्यक
कार्यों का प्रचार और संचालन करना चाहिए। कुछ छात्रों ने यह भी कहा कि ऐसा
राष्ट्रीय कॉलेज होना चाहिए, जहाँ सरकारी कॉलेजों को छोड़ने वाले छात्र अगर
चाहें तो अपनी पढा़ई जारी रख सकें। श्री दास ने इसको भी उचित समझा और
मौजूदा कॉलेजों से बातचीत की कि उनमें से कोई 'राष्ट्रीय कॉलेज' की
जिम्मेदारी लेने को तैयार है या नहीं? जब उन सबको टालमटोल करते देखा तो एक
नया ही कॉलेज स्थापित करने का निश्चय कर लिया। लगभग एक मास के भीतर ही सब
व्यवस्था करके 'बंगाल नेशनल कॉलेज' की स्थापना कर दी गई, जिसके
प्रधानाध्यापक श्री सुभाषचंद्र बोस बने। महात्मा गांधी ने कलकत्ता आकर
स्वयं इसका उदघाटन किया।
श्री सुभाषचंद्र बोस बाबू के संपर्क में इसी समय आये और यह घटना भी हमारे नवयुवकों के लिए बडी़ प्रेरणाप्रद है। वे सन् १९१९ में आई० सी० एस० की परीक्षा देने विलायत गये थे। वहाँ उन्होंने समस्त १९२० में परीक्षा पास कर ली, जिसमें समस्त परीक्षार्थियों में उनका नंबर चौथा रहा। इस पर उनको उसी समय भारतीय सिविल सर्विस में स्थान मिल गया, पर वे कैंब्रिज का बी० ए० भी पास करना चाहते थे, इसलिए कुछ महीने के लिए इंगलैंड में रुक गये। उसी समय नागपुर कांग्रेस ने असहयोग का प्रस्ताव पास किया और देशबंधु चितरंजनदास ने बंगाल के युवकों का देशसेवा के लिए आह्वान किया। जब यह समाचार इंगलैंड में अध्ययन करते हुए सुभाष ने पढा़ तो उनको भी यह अनुभव हुआ कि इस अवसर पर उनका स्थान कलेक्टर और कमिश्नर की कुर्सियों पर नहीं, वरन् उन देशभक्तों की टोली में है, जो अपने भविष्य का ख्याल छोड़कर मातृवेदी पर अपना सर्वस्व अर्पण कर रहे हैं। बस उन्होंने १६ फरवरी १९२१ को ही श्री दास को एक पत्र भेजा, जिसमें भारत के राजनैतिक आंदोलन में भाग लेने की हार्दिक अभिलाषा प्रकट की थी-
"संभवतः आप मुझे नहीं जानते, परंतु याद करने पर शायद आप मुझे पहचान लें। मैं आपको एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात लिख रहा हूँ, परंतु इससे पहले मुझे अपनी वफादारी का प्रमाण देना चाहिए। मेरे पिता बाबू जानकीनाथ बोस कटक में वकालत करते हैं। मेरे एक बडे़ भाई श्री शरतचंद्र बोस कलकत्ता हाईकोर्ट में बैरिस्टर हैं। हो सकता है, आप मेरे पिता को भी जानते हो, परंतु मेरे भाई को तो अवश्य ही जानते होंगे।"
"मुझे सरकारी नौकरी बिलकुल पसंद नहीं है। मैंने अपने पिता और भाई को लिख दिया है कि मैं सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना चाहता हूँ परंतु अभी तक मुझे उनका कोई उत्तर नहीं मिला है। उनकी अनुमति प्राप्त करने के लिए मुझे यह बतलाना पडे़गा कि सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद में क्या करूँगा? अगर मैं देशसेवा करना चाहता हूँ तो बहुत से काम कर सकता हूँ-जैसे नेशनल कॉलेज में पढा़ सकता हूँ, अखबारों का संपादन और प्रकाशन कर सकता हूँ, जनता में शिक्षा-प्रचार कर सकता हूँ |
"देश की स्थिति सबसे अधिक अपको मालूम है। मुझे पता चला है कि आपने ढा़का और कलकत्ता में नेशनल कॉलेज खोले हैं और अंग्रेजी तथा बंगला दोनों भाषाओं में 'स्वराज्य' नामक पत्र निकालना चाहते हैं। मैंने यह भी सुना है कि देश के कई स्थानों मे ग्राम संगठन आरंभ किए जा चुके हैं।
"मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप मातृभूमि की सेवा के क्षेत्र में मुझे क्या काम दे सकेंगे? मेरी शिक्षा अथवा अनुभव अधिक नहीं है, परंतु मुझमें एक नवयुवक की शक्ति है। मैं अविवाहित हूँ। जहाँ तक अध्ययन का संबंध है, मैंने कलकत्ता में और यहाँ इंगलैंड में भी दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया है।
"देश भक्ति की जो लहर आपने भारत में उठाई है, उसने ब्रिटेन को भी स्पर्श किया है। यहाँ भी मातृभूमि की पुकार सुनाई पड़ रही है। इस समय ऑक्सफोर्ड के एक मद्रासी छात्र ने अपनी पढा़ई बंद कर दी है, वह अपना काम आरंभ करने भारत वापस जा रहा है। कैंब्रिज में कभी कुछ नहीं किया गया है, हालाँकि असहयोग के बारे में यहाँ चर्चा काफी हो रही है। मेरा विश्वास है कि अगर कोई मार्ग प्रदर्शन करें तो दूसरे लोग उसका अनुगमन अवश्य करेंगे। मातृभूमि की बलिवेदी पर बलिदान करने वाले आप प्रमुख व्यक्ति हैं। मैं अपनी आत्मा ,शिक्षा, बुद्धि, शक्ति और उत्साह जो कुछ भी मेरे पास है, इसके साथ अपने को आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। मातृभूमि के चरणों में समर्पित करने के लिए मेरे पास अपने शरीर और अपनी बुद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।"
यह था श्री दास के आत्म-बलिदान का प्रभाव कि उसने छह हजार मील दूर बैठे हुए युवकों के हृदय में खलबली मचा दी। कहाँ तो ये लोग भारतीय सिविल सर्विस की ऊँची-ऊँची नौकरियाँ प्राप्त करके ठाठ-बाट का जीवन बिताने का स्वपन देख रहे थे और कहाँ दास बाबू की अपील की प्रतिध्वनि सुनकर जन-आंदोलन में कूदने और जेल जाने को उतावले होने लगे। वास्तव में एक सच्ची आत्मा जिस समय जाग्रत हो जाती है, वह अन्य अनेक आत्माओं की भी निद्रा भंग कर देती है। इसलिए संसार में आत्मत्यागी महापुरुषों का सम्मान किया जाता है, पूजा की जाती है, जिससे उनका उदाहरण देखकर अन्य व्यक्तियों को भी प्रेरणा मिले और सेवा तथा त्याग की महान् परंपरा अग्रसर होती चली जाय ।
श्री सुभाषचंद्र बोस बाबू के संपर्क में इसी समय आये और यह घटना भी हमारे नवयुवकों के लिए बडी़ प्रेरणाप्रद है। वे सन् १९१९ में आई० सी० एस० की परीक्षा देने विलायत गये थे। वहाँ उन्होंने समस्त १९२० में परीक्षा पास कर ली, जिसमें समस्त परीक्षार्थियों में उनका नंबर चौथा रहा। इस पर उनको उसी समय भारतीय सिविल सर्विस में स्थान मिल गया, पर वे कैंब्रिज का बी० ए० भी पास करना चाहते थे, इसलिए कुछ महीने के लिए इंगलैंड में रुक गये। उसी समय नागपुर कांग्रेस ने असहयोग का प्रस्ताव पास किया और देशबंधु चितरंजनदास ने बंगाल के युवकों का देशसेवा के लिए आह्वान किया। जब यह समाचार इंगलैंड में अध्ययन करते हुए सुभाष ने पढा़ तो उनको भी यह अनुभव हुआ कि इस अवसर पर उनका स्थान कलेक्टर और कमिश्नर की कुर्सियों पर नहीं, वरन् उन देशभक्तों की टोली में है, जो अपने भविष्य का ख्याल छोड़कर मातृवेदी पर अपना सर्वस्व अर्पण कर रहे हैं। बस उन्होंने १६ फरवरी १९२१ को ही श्री दास को एक पत्र भेजा, जिसमें भारत के राजनैतिक आंदोलन में भाग लेने की हार्दिक अभिलाषा प्रकट की थी-
"संभवतः आप मुझे नहीं जानते, परंतु याद करने पर शायद आप मुझे पहचान लें। मैं आपको एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात लिख रहा हूँ, परंतु इससे पहले मुझे अपनी वफादारी का प्रमाण देना चाहिए। मेरे पिता बाबू जानकीनाथ बोस कटक में वकालत करते हैं। मेरे एक बडे़ भाई श्री शरतचंद्र बोस कलकत्ता हाईकोर्ट में बैरिस्टर हैं। हो सकता है, आप मेरे पिता को भी जानते हो, परंतु मेरे भाई को तो अवश्य ही जानते होंगे।"
"मुझे सरकारी नौकरी बिलकुल पसंद नहीं है। मैंने अपने पिता और भाई को लिख दिया है कि मैं सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना चाहता हूँ परंतु अभी तक मुझे उनका कोई उत्तर नहीं मिला है। उनकी अनुमति प्राप्त करने के लिए मुझे यह बतलाना पडे़गा कि सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद में क्या करूँगा? अगर मैं देशसेवा करना चाहता हूँ तो बहुत से काम कर सकता हूँ-जैसे नेशनल कॉलेज में पढा़ सकता हूँ, अखबारों का संपादन और प्रकाशन कर सकता हूँ, जनता में शिक्षा-प्रचार कर सकता हूँ |
"देश की स्थिति सबसे अधिक अपको मालूम है। मुझे पता चला है कि आपने ढा़का और कलकत्ता में नेशनल कॉलेज खोले हैं और अंग्रेजी तथा बंगला दोनों भाषाओं में 'स्वराज्य' नामक पत्र निकालना चाहते हैं। मैंने यह भी सुना है कि देश के कई स्थानों मे ग्राम संगठन आरंभ किए जा चुके हैं।
"मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप मातृभूमि की सेवा के क्षेत्र में मुझे क्या काम दे सकेंगे? मेरी शिक्षा अथवा अनुभव अधिक नहीं है, परंतु मुझमें एक नवयुवक की शक्ति है। मैं अविवाहित हूँ। जहाँ तक अध्ययन का संबंध है, मैंने कलकत्ता में और यहाँ इंगलैंड में भी दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया है।
"देश भक्ति की जो लहर आपने भारत में उठाई है, उसने ब्रिटेन को भी स्पर्श किया है। यहाँ भी मातृभूमि की पुकार सुनाई पड़ रही है। इस समय ऑक्सफोर्ड के एक मद्रासी छात्र ने अपनी पढा़ई बंद कर दी है, वह अपना काम आरंभ करने भारत वापस जा रहा है। कैंब्रिज में कभी कुछ नहीं किया गया है, हालाँकि असहयोग के बारे में यहाँ चर्चा काफी हो रही है। मेरा विश्वास है कि अगर कोई मार्ग प्रदर्शन करें तो दूसरे लोग उसका अनुगमन अवश्य करेंगे। मातृभूमि की बलिवेदी पर बलिदान करने वाले आप प्रमुख व्यक्ति हैं। मैं अपनी आत्मा ,शिक्षा, बुद्धि, शक्ति और उत्साह जो कुछ भी मेरे पास है, इसके साथ अपने को आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। मातृभूमि के चरणों में समर्पित करने के लिए मेरे पास अपने शरीर और अपनी बुद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।"
यह था श्री दास के आत्म-बलिदान का प्रभाव कि उसने छह हजार मील दूर बैठे हुए युवकों के हृदय में खलबली मचा दी। कहाँ तो ये लोग भारतीय सिविल सर्विस की ऊँची-ऊँची नौकरियाँ प्राप्त करके ठाठ-बाट का जीवन बिताने का स्वपन देख रहे थे और कहाँ दास बाबू की अपील की प्रतिध्वनि सुनकर जन-आंदोलन में कूदने और जेल जाने को उतावले होने लगे। वास्तव में एक सच्ची आत्मा जिस समय जाग्रत हो जाती है, वह अन्य अनेक आत्माओं की भी निद्रा भंग कर देती है। इसलिए संसार में आत्मत्यागी महापुरुषों का सम्मान किया जाता है, पूजा की जाती है, जिससे उनका उदाहरण देखकर अन्य व्यक्तियों को भी प्रेरणा मिले और सेवा तथा त्याग की महान् परंपरा अग्रसर होती चली जाय ।

