अभूतपूर्व त्याग और देशसेवक का व्रत
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महात्मा गांधी के द्वारा असहयोग आंदोलन किये जाने पर उसमें भी दास
बाबू ने बहुत शीघ्र भाग लिया और कुछ ही दिनों में वे काँग्रेस के प्रमुख
संचालक बन गये। बंगाल में कितने ही वर्षों से आतंकवादी आंदोलन चल रहा था और
वहाँ के नवयुवक देशोद्धार के लिए बम और पिस्तौल पर ही ज्यादा भरोसा रखते
थे। यह दास बाबू के ही अतुलनीय प्रभाव और महान् त्याग का परिणाम था कि
बंगाल गांधी जी का दृढ़ अनुयायी बन गया और वहाँ के कार्यकर्ताओं ने सरकारी
दमन नीति का डटकर मुकाबला किया।
असहयोग के कार्यक्रम में गांधी जी ने दो बातें मुख्य रूप से रखी थीं। एक अदालतों का बॉयकाट और दूसरा शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार। इनमें से पहली बात का संबंध दास बाबू से था। वे कलकत्ता के ही नहीं, वरन् भारत के एक बडे़ नामी वकील माने जाते थे। सन १९२० में उनकी आमदनी ५० हजार रुपया मासिक तक पहुँच चुकी थी और वे महात्मा गांधी के शब्दों में 'शाही-ठाठ-बाट' के साथ रहते थे। जब काँग्रेस के आदेशानुसार वे श्री मोतीलाल नेहरू के साथ जलियाँवाला बाग और पंजाब में होने वाले अत्याचारों की जाँच कमेटी के सदस्य होकर गये तो तीन महीने में उन्होंने अपना ५० हजार रुपया खर्च किया था।
कांग्रेस ने अदालतों और स्कूलों के बॉयकाट का प्रस्ताव पास तो कर दिया, पर उस वर्ष न तो किसी गणमान्य वकील ने अदालतों में जाना छोडा़ और न सरकार के स्कूल-कॉलेज खाली हो गये। तब १९२० के अंत में नागपुर की काँग्रेस में इस कार्यक्रम पर पुनः विचार किया गया और महात्मा गांधी तथा दास बाबू के विचार-विनिमय के उपरांत असहयोग का प्रस्ताव नये रूप में प्रस्तुत किया गया। दास बाबू आरंभ से ही विधान परिषदों (लेजिस्लेटिव कॉउंसिलों) के बहिष्कार के पक्ष में न थे। उनका कहना था कि हमको चुनाव में भाग लेकर अधिक से अधिक संख्या में कॉउंसिलों में जाना चाहिए और वहाँ सरकार के हर एक प्रस्ताव को अस्वीकृत करके शासन- संचालन असंभव बना देना चाहिए, पर गांधी जी, नेहरू जी तथा पटेल आदि चुनाव में भाग लेने के विरोधी थे। अंत में गांधी जी ने कॉउंसिलों के बहिष्कार की बात को प्रस्ताव में से निकाल दिया और उसके स्थान पर यह जोड़ दिया गया कि नर्मदल के जो नेता निर्विरोध चुनकर कीउंसिलों में चले गये हैं, वे त्यागपत्र दे दें।
समझौता हो जाने पर असहयोग का प्रस्ताव स्वयं दास बाबू ने ही उपस्थित किया, जो पहले अधिवेशन के प्रस्ताव से अधिक जोरदार और व्यवहारिक था। उसमें कहा गया था कि अदालतों और स्कूल-कॉलेजों का बॉयकाट धीरे-धीरे नहीं तुरंत किया जाना चाहिए। लोगों को यह सलाह दी गई थी कि वे सरकार को सहयोग देना बंद कर दें।
यह दास बाबू की परीक्षा का अवसर था। जब देश की अदालतों के बॉयकाट के लिए वकीलों का आह्वान कर रहे थे तो स्वयं वकालत कैसे कर सकते थे? उन्होंने उसी समय यह घोषणा कर दी कि वे अब वकालत करना छोड़ देंगे। इससे काँग्रेस का वातावरण एक नवीन उत्साह से भर उठा और एक के पश्चात् एक अनेक व्यक्ति त्याग करने को प्रस्तुत हुए। अनेक लोगों ने सरकारी नौकरियाँ छोडी़ और अनेकों ने बडी़-बडी़ उपाधियों को ठुकरा दिया।
असहयोग के कार्यक्रम में गांधी जी ने दो बातें मुख्य रूप से रखी थीं। एक अदालतों का बॉयकाट और दूसरा शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार। इनमें से पहली बात का संबंध दास बाबू से था। वे कलकत्ता के ही नहीं, वरन् भारत के एक बडे़ नामी वकील माने जाते थे। सन १९२० में उनकी आमदनी ५० हजार रुपया मासिक तक पहुँच चुकी थी और वे महात्मा गांधी के शब्दों में 'शाही-ठाठ-बाट' के साथ रहते थे। जब काँग्रेस के आदेशानुसार वे श्री मोतीलाल नेहरू के साथ जलियाँवाला बाग और पंजाब में होने वाले अत्याचारों की जाँच कमेटी के सदस्य होकर गये तो तीन महीने में उन्होंने अपना ५० हजार रुपया खर्च किया था।
कांग्रेस ने अदालतों और स्कूलों के बॉयकाट का प्रस्ताव पास तो कर दिया, पर उस वर्ष न तो किसी गणमान्य वकील ने अदालतों में जाना छोडा़ और न सरकार के स्कूल-कॉलेज खाली हो गये। तब १९२० के अंत में नागपुर की काँग्रेस में इस कार्यक्रम पर पुनः विचार किया गया और महात्मा गांधी तथा दास बाबू के विचार-विनिमय के उपरांत असहयोग का प्रस्ताव नये रूप में प्रस्तुत किया गया। दास बाबू आरंभ से ही विधान परिषदों (लेजिस्लेटिव कॉउंसिलों) के बहिष्कार के पक्ष में न थे। उनका कहना था कि हमको चुनाव में भाग लेकर अधिक से अधिक संख्या में कॉउंसिलों में जाना चाहिए और वहाँ सरकार के हर एक प्रस्ताव को अस्वीकृत करके शासन- संचालन असंभव बना देना चाहिए, पर गांधी जी, नेहरू जी तथा पटेल आदि चुनाव में भाग लेने के विरोधी थे। अंत में गांधी जी ने कॉउंसिलों के बहिष्कार की बात को प्रस्ताव में से निकाल दिया और उसके स्थान पर यह जोड़ दिया गया कि नर्मदल के जो नेता निर्विरोध चुनकर कीउंसिलों में चले गये हैं, वे त्यागपत्र दे दें।
समझौता हो जाने पर असहयोग का प्रस्ताव स्वयं दास बाबू ने ही उपस्थित किया, जो पहले अधिवेशन के प्रस्ताव से अधिक जोरदार और व्यवहारिक था। उसमें कहा गया था कि अदालतों और स्कूल-कॉलेजों का बॉयकाट धीरे-धीरे नहीं तुरंत किया जाना चाहिए। लोगों को यह सलाह दी गई थी कि वे सरकार को सहयोग देना बंद कर दें।
यह दास बाबू की परीक्षा का अवसर था। जब देश की अदालतों के बॉयकाट के लिए वकीलों का आह्वान कर रहे थे तो स्वयं वकालत कैसे कर सकते थे? उन्होंने उसी समय यह घोषणा कर दी कि वे अब वकालत करना छोड़ देंगे। इससे काँग्रेस का वातावरण एक नवीन उत्साह से भर उठा और एक के पश्चात् एक अनेक व्यक्ति त्याग करने को प्रस्तुत हुए। अनेक लोगों ने सरकारी नौकरियाँ छोडी़ और अनेकों ने बडी़-बडी़ उपाधियों को ठुकरा दिया।

