त्याग और परोपकार का जन्मजात गुण
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उदारता और न्याय का यह गुण श्री चित्तरंजनदास (सन् १८७० से १९२५) में
आरंभिक जीवन से ही पाया जाता था। हम यह भी कह सकते हैं कि यह उनको पैतृक
रूप से प्राप्त हुआ था। उनके पिता श्री भुवन मोहन भी कलकत्ता हाईकोर्ट के
एक नामी वकील थे। पर वे स्वभाव के इतने उदार तथा स्वयं भी पर्याप्त खर्च
करने वाले थे कि अपनी समस्त आय खर्च कर डालने पर भी कमी पड़ती रहती थी। एक
बार उन्होंने अपने क्लर्क के कहने पर किसी व्यक्ति की जमानत दे दी। वह
व्यक्ति धोखेबाज निकला और इस कारण भुवन मोहन पर ३० हजार रूपये की देनदारी आ
गई। इसके अतिरिक्त पहले से भी उनके ऊपर कुछ ऋण था। जब उसको चुका सकना संभव
ना हो सका और कर्ज देने वाले अदालत में पहुँच गये तो उन्हें कानून के
अनुसार 'दिवालिया' घोषित कर दिया गया।
दास बाबू की माता श्रीमती निस्तारिणी देवी भी बडी़ विशाल हृदय वाली, दूसरों के दुःख दर्द में सहायक होने वाली और न्याय परायण थीं। अपने पति के अत्यधिक खर्चों के कारण उनको प्रायः गृहस्थी की व्यवस्था में कठिनाईयाँ पड़ती रहती थीं, पर वे उनसे कभी नहीं घबराई और बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ हर तरह की परिस्थिति का सामना करती रहीं। दास बाबू के परिचितों का मत है कि उन पर पिता से भी अधिक अपनी माता का प्रभाव पड़ा था और इसी से वे सदैव न्याय के लिए बड़ा त्याग करने को तैयार रहे।
दास बाबू की माता श्रीमती निस्तारिणी देवी भी बडी़ विशाल हृदय वाली, दूसरों के दुःख दर्द में सहायक होने वाली और न्याय परायण थीं। अपने पति के अत्यधिक खर्चों के कारण उनको प्रायः गृहस्थी की व्यवस्था में कठिनाईयाँ पड़ती रहती थीं, पर वे उनसे कभी नहीं घबराई और बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ हर तरह की परिस्थिति का सामना करती रहीं। दास बाबू के परिचितों का मत है कि उन पर पिता से भी अधिक अपनी माता का प्रभाव पड़ा था और इसी से वे सदैव न्याय के लिए बड़ा त्याग करने को तैयार रहे।

