आरंभिक जीवन में देशभक्ति की भावना
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
उदार और त्यागी होने के साथ उनमें देशभक्ति का गुण भी छोटी अवस्था में
ही उत्पन्न हो गया था। नौ वर्ष की आयु में ही, जब स्कूल में दाखिल हुए, वे
देशभक्तिपूर्ण कविताओं के प्रेमी बन गये थे और उन्हें उत्साहपूर्वक गाया
करते थे। उन्हीं दिनों वे श्री विपिन चंद्र पाल से परिचित हो गये, जो
सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र के एक अग्रगामी कार्यकर्ता थे। इन बातों का
प्रभाव यह हुआ कि विद्यार्थी अवस्था में ही वे सार्वजनिक कार्यों से अनुराग
रखने लगे और जब आई० सी० एस० की परीक्षा पास करने इंगलैंड गये तो वहाँ भी
दादाभाई नौरोजी को पार्लियामेंट का सदस्य चुनवाने में उन्होंने जोर-शोर से
कार्य किया। उन दिनों अंग्रेज प्रायः यह कह देते थे कि हमने भारत को तलवार
के जोर से जीता है और तलवार के सहारे ही वश में रखेंगे। नवयुवक चितरंजन से
यह बात सहन नहीं हुई और प्रचार सभा में इसका उत्तर देते हुए उन्होंने
कहा-"अंग्रेजों ने तलवार, बंदूक के सहारे इतने लंबे-चौडे़ और शानदार
भारतवर्ष को कभी नहीं जीता। यह उनके सैनिक बल की नहीं वरन् कूटनीतिक चालों
की जीत थी। इसे तलवार की विजय कहना और तलवार की नीति बरतने की धमकी देना
सरासर ओछापन और शर्म की बात है।"
इन शब्दों से उनकी देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव की भावना स्पष्ट प्रकट होती है। पर अंग्रेजों के देश में उनके मुहँ पर ऐसा कहना सामान्य बात न थी। उसी दिन से वे अंग्रेज अधिकारियों की नजरों में खटकने लग गये और अंत में अधिकांश परीक्षार्थियों से प्रतिभाशाली होने पर भी आई सी० एस० की परीक्षा में उन्हें असफल घोषित कर दिया गया। सरकार की पक्षपात पूर्ण नीति को देखकर उन्होंने भी अपना लक्ष्य बदल दिया और सन् १८९३ में बैरिस्टरी की परीक्षा पास करके स्वदेश वापस आ गये।
इन शब्दों से उनकी देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव की भावना स्पष्ट प्रकट होती है। पर अंग्रेजों के देश में उनके मुहँ पर ऐसा कहना सामान्य बात न थी। उसी दिन से वे अंग्रेज अधिकारियों की नजरों में खटकने लग गये और अंत में अधिकांश परीक्षार्थियों से प्रतिभाशाली होने पर भी आई सी० एस० की परीक्षा में उन्हें असफल घोषित कर दिया गया। सरकार की पक्षपात पूर्ण नीति को देखकर उन्होंने भी अपना लक्ष्य बदल दिया और सन् १८९३ में बैरिस्टरी की परीक्षा पास करके स्वदेश वापस आ गये।

