प्रभावशाली भाषण शक्ति
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श्री अरविन्द घोष को मुक्त कराने में भी श्री दास ने यद्यपि कानून की
धाराओं को उपस्थित करने और उनकी व्याख्या करने में अत्यंत परिश्रम किया था
तो भी यह संदेहजनक था कि जज उनको बिलकुल छोड़ देंगे। पर मुकदमे के अंत में
सरकारी वकील की बहस का जवाब देते हुए उन्होंने नौ दिन तक जो भाषण किया और
उसके अंत में जज को न्याय करने के लिए जैसे भावपूर्ण ढ़ग से प्रेरित किया
उसी से अधिकांश में श्री अरविन्द की रक्षा हो सकी। उन्होंने श्री अरविन्द
के उच्च आदर्शों और मनःस्थिति का विश्लेषण करते हुए अंत में कहा- '
"आपसे मेरा अनुरोध है कि जिस व्यक्ति पर ये आरोप लगाये गये हैं, वह केवल आज इस न्यायालय के सम्मुख नहीं, वरन् इतिहास के उच्च न्यायालय के सम्मुख खडा़ है। आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि जब यह मतभेद समाप्त हो जायेंगे, यह हलचल और विद्रोह शांत हो जायेगा, जब यह व्यक्ति परलोक चला जायेगा, उसके बहुत समय बाद तक संसार उसे देशभक्ति के गायक, राष्ट्रीयता के देवदूत और मानवता के प्रेमी के रूप में देखता रहेगा। इस संसार से विदा ले लेने के बहुत समय बाद तक इसके शब्द भारत में ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक गूँजते रहेंगे। इसलिए मैं कहता हूँ कि यह व्यक्ति आज केवल इस न्यायालय के समक्ष ही नहीं बल्कि इतिहास के उच्च न्यायालय के समक्ष खडा़ है।"
"महोदय (न्यायाधीश से) अब समय आ गया है, जब आपको अपने निर्णय पर और सज्जनों (न्यायाधीश को परामर्श देने वाले 'असेसरों' से) आपको अपनी राय पर विचार करना चाहिए। महोदय, मैं आपसे उस अंग्रेजी न्याय परंपरा के नाम पर अनुरोध करता हूँ, जो अंग्रेजी इतिहास का सबसे शानदार अध्याय है-कानून के उन हजारों श्रेष्ठ सिद्धांतों के नाम पर अनुरोध करता हूँ, जो अंग्रेजी न्यायालयों ने बनाये हैं और उन लब्ध प्रतिष्ठित न्यायाधीशों के नाम पर जिन्होंने कानून को इस तरह निभाया है कि फैसलों से लोगों में कानून के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत हुई। मैं आपसे अंग्रेजी इतिहास के उसी शानदार अध्याय के नाम पर अनुरोध करता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि संसार को यह कहने का अवसर मिल जाये कि एक अंग्रेज न्यायाधीश न्याय की रक्षा करने में गफलत कर गया।"
श्री दास के इन उच्च भावनाओं को प्रेरणा देने वाले शब्दों का इतना अधिक प्रभाव पडा़ कि सेशन जज मि० बीचक्राफ्ट ने यह जानते हुए कि सरकार श्री अरविन्द घोष को दंडित करने पर जोर दे रही है, उनको पूरी तरह से बरी कर दिया। इस तथ्य को अपने फैसले में प्रकट करते हुए उन्होंने कहा-
"अरविंद ही वह अभियुक्त थे जिन्हें दंड देने के लिए सरकार सबसे अधिक इच्छुक थी। अगर वह अभियुक्तों के कटघरे में न होते तो यह मुकदमा कभी का खत्म हो गया होता।"
अंग्रेजों के शासन काल में, जबकि भारतीय विद्रोह के कारण इंगलैंड तक का वातावरण गर्म हो रहा था। अपने कानूनी ज्ञान तथा भाषण-कौशल से एक अंग्रेज जज को झुका देना-दास बाबू का ही काम था। फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि वे किसी की खुशामद करके या दबकर अपना उद्देश्य पूरा करते थे। इस 'युगांतर-दल' के मामले में ही एक दिन जज ने उनकी किसी बात को 'बकवास' कह दिया। इस पर तुरंत उनकी त्यौरी चढ़ गई और उन्होंने कहा-"अफसोस यह है कि आप इस समय जज हैं और मैं वकील। अगर आपने यह बात कहीं अन्यत्र कही होती तो मैं इसका ठीक-ठीक जवाब देता।" देशबंधु की निर्भीक वाणी सुनकर जज ने अपनी भूल अनुभव की और तुरंत क्षमा माँग ली।
श्रेष्ठपुरुष सदैव सत्य और न्याय के अनुयायी होते हैं। वे अपने हानि-लाभ का ख्याल न करके विरोधी के भी उचित कथन को स्वीकार कर लेते हैं और अनुचित बात चाहे किसी घनिष्ठ परिचित की भी क्यों न हो तो भी उसे मानने को तैयार नहीं होते। देशबंधु के इस गुण के कारण न्यायालयों के समस्त छोटे-बडे़ न्यायाधीश उनका सम्मान करते थे। उनको अपना विरोधी जानते हुए भी कोई अंग्रेज उनके प्रति असम्मान का भाव प्रकट नहीं कर सकता था। सत्य और न्याय की ऐसी ही महिमा है।
"आपसे मेरा अनुरोध है कि जिस व्यक्ति पर ये आरोप लगाये गये हैं, वह केवल आज इस न्यायालय के सम्मुख नहीं, वरन् इतिहास के उच्च न्यायालय के सम्मुख खडा़ है। आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि जब यह मतभेद समाप्त हो जायेंगे, यह हलचल और विद्रोह शांत हो जायेगा, जब यह व्यक्ति परलोक चला जायेगा, उसके बहुत समय बाद तक संसार उसे देशभक्ति के गायक, राष्ट्रीयता के देवदूत और मानवता के प्रेमी के रूप में देखता रहेगा। इस संसार से विदा ले लेने के बहुत समय बाद तक इसके शब्द भारत में ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक गूँजते रहेंगे। इसलिए मैं कहता हूँ कि यह व्यक्ति आज केवल इस न्यायालय के समक्ष ही नहीं बल्कि इतिहास के उच्च न्यायालय के समक्ष खडा़ है।"
"महोदय (न्यायाधीश से) अब समय आ गया है, जब आपको अपने निर्णय पर और सज्जनों (न्यायाधीश को परामर्श देने वाले 'असेसरों' से) आपको अपनी राय पर विचार करना चाहिए। महोदय, मैं आपसे उस अंग्रेजी न्याय परंपरा के नाम पर अनुरोध करता हूँ, जो अंग्रेजी इतिहास का सबसे शानदार अध्याय है-कानून के उन हजारों श्रेष्ठ सिद्धांतों के नाम पर अनुरोध करता हूँ, जो अंग्रेजी न्यायालयों ने बनाये हैं और उन लब्ध प्रतिष्ठित न्यायाधीशों के नाम पर जिन्होंने कानून को इस तरह निभाया है कि फैसलों से लोगों में कानून के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत हुई। मैं आपसे अंग्रेजी इतिहास के उसी शानदार अध्याय के नाम पर अनुरोध करता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि संसार को यह कहने का अवसर मिल जाये कि एक अंग्रेज न्यायाधीश न्याय की रक्षा करने में गफलत कर गया।"
श्री दास के इन उच्च भावनाओं को प्रेरणा देने वाले शब्दों का इतना अधिक प्रभाव पडा़ कि सेशन जज मि० बीचक्राफ्ट ने यह जानते हुए कि सरकार श्री अरविन्द घोष को दंडित करने पर जोर दे रही है, उनको पूरी तरह से बरी कर दिया। इस तथ्य को अपने फैसले में प्रकट करते हुए उन्होंने कहा-
"अरविंद ही वह अभियुक्त थे जिन्हें दंड देने के लिए सरकार सबसे अधिक इच्छुक थी। अगर वह अभियुक्तों के कटघरे में न होते तो यह मुकदमा कभी का खत्म हो गया होता।"
अंग्रेजों के शासन काल में, जबकि भारतीय विद्रोह के कारण इंगलैंड तक का वातावरण गर्म हो रहा था। अपने कानूनी ज्ञान तथा भाषण-कौशल से एक अंग्रेज जज को झुका देना-दास बाबू का ही काम था। फिर भी कोई यह नहीं कह सकता कि वे किसी की खुशामद करके या दबकर अपना उद्देश्य पूरा करते थे। इस 'युगांतर-दल' के मामले में ही एक दिन जज ने उनकी किसी बात को 'बकवास' कह दिया। इस पर तुरंत उनकी त्यौरी चढ़ गई और उन्होंने कहा-"अफसोस यह है कि आप इस समय जज हैं और मैं वकील। अगर आपने यह बात कहीं अन्यत्र कही होती तो मैं इसका ठीक-ठीक जवाब देता।" देशबंधु की निर्भीक वाणी सुनकर जज ने अपनी भूल अनुभव की और तुरंत क्षमा माँग ली।
श्रेष्ठपुरुष सदैव सत्य और न्याय के अनुयायी होते हैं। वे अपने हानि-लाभ का ख्याल न करके विरोधी के भी उचित कथन को स्वीकार कर लेते हैं और अनुचित बात चाहे किसी घनिष्ठ परिचित की भी क्यों न हो तो भी उसे मानने को तैयार नहीं होते। देशबंधु के इस गुण के कारण न्यायालयों के समस्त छोटे-बडे़ न्यायाधीश उनका सम्मान करते थे। उनको अपना विरोधी जानते हुए भी कोई अंग्रेज उनके प्रति असम्मान का भाव प्रकट नहीं कर सकता था। सत्य और न्याय की ऐसी ही महिमा है।

