उग्र राजनीति में प्रवेश
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अब श्री दास राजनीतिक तथा सार्वजनिक आंदोलन के क्षेत्र में दिन पर
दिन आगे बढ़ने लगे। उन्होंने होमरूल आंदोलन में पूरा भाग लिया और श्रीमती
बेसेंट को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष बनवाने का प्रयत्न किया।
उस समय तक कांग्रेस संगठन अधिकांश में नर्म दल वालों के हाथ में था और
बंगाल के पुराने नेता श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी, श्रीमती बेसेंट के बजाय
राजा साहब महमूदाबाद को उस अधिवेशन का अध्यक्ष बनाना चाहते थे। श्री दास ने
इसका जोरों से विरोद्ध किया। काँग्रेस अधिवेशन के लिए जो स्वागत समिति
बनाई गई थी, उसके अध्यक्ष एक पुराने काँग्रेसी श्री बैकुंठनाथ सेन श्री दास
के पिता के मित्रों में से थे और इसलिए वे उनके प्रति बहुत आदर और श्रद्धा
का भाव रखते थे, पर देशहित का प्रश्न सामने आने पर वे उनका विरोध करने को
तैयार हो गये। उन्होंने प्रस्ताव किया कि स्वागत समिति का अध्यक्ष श्री
रविंद्रनाथ ठाकुर को चुना जाये। अब काँग्रेस संगठन के भीतर पारस्परिक
संघर्ष अनिवार्य हो गया। यह देखकर हाईकोर्ट के एक भूतपूर्व जज सर चंद्रमाधव
घोष, जो दोनों के शुभचिंतक थे, बीच में पडे़ और समझौता करा दिया कि
श्रीमति बसेंट को काँग्रेस का सभापति बनाया जाय और बैकुंठनाथ सेन भी अपने
पद पर बने रहे।
वास्तव में श्रीमती बेसेंट ने उन दिनों भारतवर्ष के राजनीतिक आंदोलन को आगे बढा़ने में प्रशंसनीय साहस दिखलाया था और घोर परिश्रम किया था। एक विदेशी होते हुए भी उन्होंने भारत को होमरूल (आत्म-शासन) का अधिकार देने के लिए समस्त देश में इतना जोरदार प्रचार किया कि भारत सरकार उससे भयभीत हो उठी और उनको गिरफ्तार करके नजरबंद कर दिया गया। उस अवसर पर देशबंधु चितरंजनदास ने एक सार्वजनिक सभा करके इस कार्य की आलोचना करते हुए कहा था-
"मैं नहीं समझता कि मानवता के देवता का गला केवल एक बार ही घोंटा गया था। अत्याचारियों और उपद्रवकारियों ने मानवता का गला बार-बार घोंटा है। मानवता पर होने वाला प्रत्येक आघात उसके तन में ठोंकी गई एक नई कील समान है।
दास बाबू केवल कानून के ही बहुत बडे़ विशेषज्ञ नहीं थे, वरन् वे एक उच्चकोटि के साहित्यिक और भक्त भी थे। उनकी प्रकृति सदैव बहुत कुछ आध्यात्मिक रही। इसलिए आरंभ में तो उन्होंने कितने ही वर्षों तक राजनीति में सक्रिय भाग ही नहीं लिया, पर जब उस क्षेत्र में पैर रखा तो तो वे बहुत शीघ्र आगे बढ़ने लगे। अनेक कार्यकर्ताओं की तरह उनका यह उद्देश्य तो हरगिज न था कि इस कार्य द्वारा धन-मान प्राप्त कर लें। ये दोनों बातें तो उनको पहले ही प्राप्त थीं। इसलिए वे अपनी आत्मा की पुकार पर ही देशसेवा के व्रती हुए थे और जब तक इस कार्य को किया, अपना पवित्र धार्मिक कर्तव्य समझकर ही किया। यही कारण है कि केवल सात-आठ वर्ष कार्य करने का अवसर मिलने पर भी उन्होंने वह कार्य कर दिखाया, जिससे उनका नाम अमर हो गया और उनकी गणना आधुनिक भारत के निर्माताओं में की जाने लगी।
देशबंधु चितरंजनदास के उदाहरण से हमारे सार्वजनिक जीवन में भाग लेने वाले सभी भाइयों को यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि वे जो कुछ करे उसमें सच्चाई का पूरा ध्यान रखें। जो कार्य आंतरिक भावना से और स्वार्थ को त्यागकर किया जायेगा, वह निश्चय ही श्रेष्ठता और वर्चस्व प्रदान करने वाला होगा। प्रत्यक्ष सफलता तो बहुत छोटी चीज है। महान् कार्यों का फल प्रायः देर से ही प्रकट हुआ करता है इसलिए किसी भी सेवा कार्य में हमको हानि-लाभ का विचार सर्वथा त्यागकर शुद्ध भाव से अपने कर्तव्य-पालन का ही ध्यान रखना उचित है।
वास्तव में श्रीमती बेसेंट ने उन दिनों भारतवर्ष के राजनीतिक आंदोलन को आगे बढा़ने में प्रशंसनीय साहस दिखलाया था और घोर परिश्रम किया था। एक विदेशी होते हुए भी उन्होंने भारत को होमरूल (आत्म-शासन) का अधिकार देने के लिए समस्त देश में इतना जोरदार प्रचार किया कि भारत सरकार उससे भयभीत हो उठी और उनको गिरफ्तार करके नजरबंद कर दिया गया। उस अवसर पर देशबंधु चितरंजनदास ने एक सार्वजनिक सभा करके इस कार्य की आलोचना करते हुए कहा था-
"मैं नहीं समझता कि मानवता के देवता का गला केवल एक बार ही घोंटा गया था। अत्याचारियों और उपद्रवकारियों ने मानवता का गला बार-बार घोंटा है। मानवता पर होने वाला प्रत्येक आघात उसके तन में ठोंकी गई एक नई कील समान है।
दास बाबू केवल कानून के ही बहुत बडे़ विशेषज्ञ नहीं थे, वरन् वे एक उच्चकोटि के साहित्यिक और भक्त भी थे। उनकी प्रकृति सदैव बहुत कुछ आध्यात्मिक रही। इसलिए आरंभ में तो उन्होंने कितने ही वर्षों तक राजनीति में सक्रिय भाग ही नहीं लिया, पर जब उस क्षेत्र में पैर रखा तो तो वे बहुत शीघ्र आगे बढ़ने लगे। अनेक कार्यकर्ताओं की तरह उनका यह उद्देश्य तो हरगिज न था कि इस कार्य द्वारा धन-मान प्राप्त कर लें। ये दोनों बातें तो उनको पहले ही प्राप्त थीं। इसलिए वे अपनी आत्मा की पुकार पर ही देशसेवा के व्रती हुए थे और जब तक इस कार्य को किया, अपना पवित्र धार्मिक कर्तव्य समझकर ही किया। यही कारण है कि केवल सात-आठ वर्ष कार्य करने का अवसर मिलने पर भी उन्होंने वह कार्य कर दिखाया, जिससे उनका नाम अमर हो गया और उनकी गणना आधुनिक भारत के निर्माताओं में की जाने लगी।
देशबंधु चितरंजनदास के उदाहरण से हमारे सार्वजनिक जीवन में भाग लेने वाले सभी भाइयों को यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि वे जो कुछ करे उसमें सच्चाई का पूरा ध्यान रखें। जो कार्य आंतरिक भावना से और स्वार्थ को त्यागकर किया जायेगा, वह निश्चय ही श्रेष्ठता और वर्चस्व प्रदान करने वाला होगा। प्रत्यक्ष सफलता तो बहुत छोटी चीज है। महान् कार्यों का फल प्रायः देर से ही प्रकट हुआ करता है इसलिए किसी भी सेवा कार्य में हमको हानि-लाभ का विचार सर्वथा त्यागकर शुद्ध भाव से अपने कर्तव्य-पालन का ही ध्यान रखना उचित है।

