स्वराज्य पार्टी की स्थापना
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सन् १९२१
का वर्ष असहयोग आंदोलन की दृष्टि से सबसे बड़ा महत्त्वपूर्ण
सिद्ध हुआ। लाखों बुद्धिजीवी और उत्साही नवयुवकों ने उसमें
सम्मिलित होकर देश के कोने- कोने में उसका संदेश पहुँचा दिया, पर
इतने बडे़ देश में सर्वत्र अहिंसा के सिद्धांत का पूर्णत: पालन करा सकना संभव न था। इसलिए जब सन् १९२२ के आरंभ में ही उत्तर प्रदेश में चौरीचौरा पुलिस थाने को एक आंदोलनकारी भीड़ ने जलाकर कई कर्मचारियों का प्राणांत कर दिया तो महत्मा गांधी ने अपना आंदोलन अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया। देश भर में स्वयंसेवकों की कार्यवाहियाँ, सभा और जुलूसों को बंद कर देने का आदेश दे दिया गया। उसी समय गुजरात के बारदोली तालुका में करबंदी
का आंदोलन शुरू किया जाने वाला था और उसके बाद समस्त देश में
इसी प्रकार सरकारी राजस्व और टैक्स) बंद करके शासन- कार्य ठप्प
कर देने की योजना थी, पर गांधी जी ने अहिंसा की रक्षा के लिए उस समस्त कार्यक्रम को रोक दिया।
देशबंधु चितरंजनदास इस घटनाक्रम से बडे़ क्षुब्ध हो गये। उन्होंने कहा- "बारदोली में सार्वजनिक अवज्ञा आंदोलन रोकने के लिए महात्मा जी के पास जो कुछ भी कारण रहा हो, पर बंगाल में स्वयंसेवकों का काम रोकने के लिए कोई कारण नहीं था। यहाँ स्वयंसेवकों ने अपने प्रयत्नों द्वारा सरकार को लगभग पंगु बना दिया था, पर अब उनके कुछ भी कार्य करने पर प्रितिबंध लग गया। यह दूसरी बार महात्मा जी ने परिस्थिति को सुलझाया है।"
वास्तविक तथ्य यह था कि देशबंधु तथा अन्य प्रमुख नेताओं ने अहिंसा और सत्याग्रह को एक नीति के रूप में ही स्वीकार किया था। महात्मा जी की तरह कोई उनको धर्म- सिद्धांत की तरह स्वीकार नहीं करता था। देशबंधु की तरह लाला लाजपतराय ने भी गांधी जी के निर्णय को असामयिक बतलाया और कहा कि- "इस आदेश द्वारा पूरे देश को दंड दिया गया है। क्या कन्याकुमारी अंतरीप के निवासियों के अपराधों के कारण हिमालय प्रदेश में रहने वालों को दंड देना उचित है ?? "मौलाना अबुलकलाम आजाद ने भी, जो देशबंधु के साथ कलकत्ता की जेल में बंद थे कहा कि- "पूरे देश से यह आशा करना कि वह अहिंसक रहेगा, एक दुराशा मात्र है। एक गाँव की गलती के लिए पूरे देश को दंड देना ज्यादती है।"
इस प्रकार जब महात्मा गांधी के आदेश से देशव्यापी आंदोलन रोक दिया गया तो चारों तरफ उदासीनता और अकर्मण्यता का वातावरण छा गया। सन् १९२२ का वर्ष इस दृष्टि से महत्वहीन रहा। देश के इस निराशापूर्ण रुख का लाभ उठाकर सरकार ने गांधी जी से लगाकर सैकड़ों प्रमुख नेताओं को जेल में बंद कर दिया। यह देखकर देशबंधु ने देश के सामने कोई ऐसा कार्यक्रम रखने का निश्चय किया, जिससे यह निष्क्रियता दूर होकर लोगों में उत्साह की भावना उत्पन्न हो। इसके लिए उनके विचार में कॉउंसिल- प्रवेश का कार्यक्रम सबसे अधिक उपयुक्त था, जिसके द्वारा सरकार को उसी के मैदान में हराया जा सकता था। वे आरंभ से ही इस प्रकार के कॉउंसिल प्रवेश के पक्ष में थे, पर केवल महात्मा गांधी के साथ मिलकर काम करने की भावना से उन्होंने अपनी बात छोड़ दी थी। सन् १९२० के नंवबर मास में नागपुर कांग्रेस से पहले भी एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने अपनी यह सम्मति स्पष्ट शब्दों में प्रकट की थी-
"मैं परोषदों के बहिष्कार के पक्ष में नहीं था, क्योंकि मैं असहयोग के सिद्धांत को सरकारी काउंसिलों के भीतर भी क्रियान्वित करना चाहता था। परंतु कांग्रेस के प्रस्ताव को मानने के कारण मैंने अपनी बात वापस ले ली।"
पर जब उन्होंने देखा कि देश के सामने कोई व्यावहारिक कार्यक्रम न होने से उसमें निर्बलता आती जा रही है तो उन्होंने गया कांग्रेस अध्यक्ष पद से काउंसिल- प्रवेश का प्रतिपादन किया, पर उस समय प्रतिनिधियों में काउंसिलों विरोधियों का बहुमत था, इसलिए श्री दास का प्रस्ताव ३१ दिसंबर को रद्द हो गया। इस पर उन्होंने तुरंत कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और १ जनवरी, १९२३ को गया में ही श्री मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वाराज्य पार्टी की स्थापना कर ली। इस कार्य में कांग्रेस के कट्टरपंथियों के कारण उनको बहुत बडा़ विरोध करना पडा़। जिस समय दास बाबू गया कांग्रेस से लौटकर कलकत्ता पहुँचे उस समय उनकी अवस्था कैसी कठिन हो गई थी, इसकी एक झलक सुप्रसिद्ध बंगाली लेखक श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने लेख में इस प्रकार दी थी-
"कोई साथ देने वाला नहीं है, पैसा नहीं है, प्रचार के लिए हाथ में एक भी समाचार पत्र नहीं है। जो अत्यंत छोटे लोग थे- वे भी बिना गाली दिये बात नहीं करते ! देशबंधु की यह कैसी अवस्था थी ! उस समय की बात आज तक भी मेरे मन में स्पष्ट अंकित है। जब हम गया कांग्रेस से लौटकर आये तो समस्त समाचार पत्र देशबंधु के विरुद्ध असत्य और अर्धसत्य बातों से भरे थे। हमारे पक्ष की बात कहने वाला कोई न था। इतना ही क्यों, कोई उनका वक्तव्य छापने को भी तैयार नहीं होता था। जिस घर में एक दिन लोगों को बैठने को जगह नहीं मिलती थी, उसमें मित्र या शत्रु किसी की पद- रज भी अब स्पर्श नहीं होती थी।"
पर इतना होने पर भी देशबंधु एक क्षण के लिए भी निराश या हताश नहीं हुए। उन्होंने गया कांग्रेस में ही यह कह दिया था कि आज जो मेरे विरोधी हैं, वे ही बहुत शीघ्र मेरे अनुकूल हो जायेंगे और ऐसा ही हुआ। गया के नौ महीने बाद दिल्ली में जो विशेष अधिवेशन मौलाना अबुलकलाम आजाद की अध्यक्षता में हुआ, उसमें यह स्वीकार कर लिया गया कि जिन लोगों का काउंसिल प्रवेश में विश्वास है, वे चुनावों में भाग ले सकते हैं। इस अवसर पर अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए देशबंधु ने कहा-
"ये काउंसिलें क्या हैं? ये विधान मंडल क्या हैं? ये सब भुलावे की चीजें हैं। क्या हम इनका अंत नहीं करेंगे? महात्मा गांधी इन सुधारों को निरर्थक सिद्ध करना चाहते हैं। मैं भी कॉउंसिलों में जाकर यही करना चाहता हूँ। इसे कार्यरूप में परिणत करने का एकमात्र उपाय यही है कि कॉउंसिलों में जाकर सरकार के लिए काम करना असंभव कर दिया जाये। मेरा उन लोगों से कोई सबंध नहीं है, जो पद- प्राप्ति के लिए अथवा छोटे- मोटे लाभों या स्वार्थपूर्ति के लिए वहाँ जाते हैं। मुझे इससे नफरत है, घृणा है। मेरा तो यह कहना है कि या तो मैं वहाँ उन सुधारों को नष्ट करने के लिए जाऊँ, जो कि हमारा खून चूस रहे हैं या बिल्कुल ही न जाऊँ"
और बंगाल प्रांत के चुनावों में अभूतपूर्व विजय प्राप्त करके उन्होंने जो कहा था उसे पूर्ण रूप से पालन करके दिखा दिया। उनके प्रभाव और परिश्रम से प्रजा की तरफ से चुने जाने वाले सदस्यों की लगभग सभी सीटें उनके दल वालों को मिलीं। नर्मदल तथा अन्य संस्थाओं के बडे़- बडे़ नेता देशबंधु के द्वारा खडे़ किये गये साधारण व्यक्तियों से हार गये, पर जब बंगाल के नये गवर्नर लार्ड लिंटन ने श्री दास को नया मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने उत्तर में लिखा-
"हमारी पार्टी के सदस्य सुधार अधिनियम के अंतर्गत सभी कानूनी अधिकारों का उपयोग द्वैधात्मक शासन प्रणाली का अंत करने के लिए करने का निश्चय कर चुके हैं। पार्टी जानती है कि इन पदों को स्वीकार करने के बाद भी अंदर से सरकारी कामों में बाधा डाली जा सकती है, परंतु ऐसा करना ईमानदारी की बात न होगी। हमारे देशवासियों की जाग्रत चेतना चाहती है कि जब तक वर्तमान सरकार की शासन प्रणाली में ऐसे परिवर्तन न हों, जो हृदय- परिवर्तन के सूचक हों, तब तक जनता को उसके साथ सहयोग नहीं करना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए, मुझे खेद है कि मैं यह उत्तरदायित्व ग्रहण नहीं कर सकता"
इसकी तुलना जब हम वर्तमान समय के कांग्रेसी नेताओं और सदस्यों से करते हैं, जिनका मुख्य लक्ष्य मंत्री- पद प्राप्त करना ही होता है और जो विधान सभाओं में जाने का उद्देश्य अधिक से अधिक आमदनी करना ही समझे बैठे हैं तो मालूम होता है कि उस समय की और आज की कांग्रेस के प्रति जनता की मनोभावना में इतना अंतर क्यों है? आज परिषदों में जाने वाले लोगों ने सेवा धर्म और लोकहित की भावना को पददलित करके स्वार्थपूर्ति और अपने संबंधियों के पोषण को ही मुख्य ध्येय बना रखा है और 'जन- सेवा' को एक व्यापार के रूप में बदल दिया है। इसी से दिन पर दिन देश की नैतिकता का स्तर गिर रहा है और भ्रष्टाचार की वृद्धि हो रही है। दास बाबू का मार्ग इससे सर्वथा भिन्न था। वे स्वयं बडे़ से बडा़ त्याग करके दूसरे लोगों से त्याग करने को कहते थे, जिससे इसका प्रभाव तुरंत पडता़ था। सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वालों को दास बाबू के चरित्र की यह बात गाँठ बाँध कर रखनी चाहिए।
देशबंधु चितरंजनदास इस घटनाक्रम से बडे़ क्षुब्ध हो गये। उन्होंने कहा- "बारदोली में सार्वजनिक अवज्ञा आंदोलन रोकने के लिए महात्मा जी के पास जो कुछ भी कारण रहा हो, पर बंगाल में स्वयंसेवकों का काम रोकने के लिए कोई कारण नहीं था। यहाँ स्वयंसेवकों ने अपने प्रयत्नों द्वारा सरकार को लगभग पंगु बना दिया था, पर अब उनके कुछ भी कार्य करने पर प्रितिबंध लग गया। यह दूसरी बार महात्मा जी ने परिस्थिति को सुलझाया है।"
वास्तविक तथ्य यह था कि देशबंधु तथा अन्य प्रमुख नेताओं ने अहिंसा और सत्याग्रह को एक नीति के रूप में ही स्वीकार किया था। महात्मा जी की तरह कोई उनको धर्म- सिद्धांत की तरह स्वीकार नहीं करता था। देशबंधु की तरह लाला लाजपतराय ने भी गांधी जी के निर्णय को असामयिक बतलाया और कहा कि- "इस आदेश द्वारा पूरे देश को दंड दिया गया है। क्या कन्याकुमारी अंतरीप के निवासियों के अपराधों के कारण हिमालय प्रदेश में रहने वालों को दंड देना उचित है ?? "मौलाना अबुलकलाम आजाद ने भी, जो देशबंधु के साथ कलकत्ता की जेल में बंद थे कहा कि- "पूरे देश से यह आशा करना कि वह अहिंसक रहेगा, एक दुराशा मात्र है। एक गाँव की गलती के लिए पूरे देश को दंड देना ज्यादती है।"
इस प्रकार जब महात्मा गांधी के आदेश से देशव्यापी आंदोलन रोक दिया गया तो चारों तरफ उदासीनता और अकर्मण्यता का वातावरण छा गया। सन् १९२२ का वर्ष इस दृष्टि से महत्वहीन रहा। देश के इस निराशापूर्ण रुख का लाभ उठाकर सरकार ने गांधी जी से लगाकर सैकड़ों प्रमुख नेताओं को जेल में बंद कर दिया। यह देखकर देशबंधु ने देश के सामने कोई ऐसा कार्यक्रम रखने का निश्चय किया, जिससे यह निष्क्रियता दूर होकर लोगों में उत्साह की भावना उत्पन्न हो। इसके लिए उनके विचार में कॉउंसिल- प्रवेश का कार्यक्रम सबसे अधिक उपयुक्त था, जिसके द्वारा सरकार को उसी के मैदान में हराया जा सकता था। वे आरंभ से ही इस प्रकार के कॉउंसिल प्रवेश के पक्ष में थे, पर केवल महात्मा गांधी के साथ मिलकर काम करने की भावना से उन्होंने अपनी बात छोड़ दी थी। सन् १९२० के नंवबर मास में नागपुर कांग्रेस से पहले भी एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने अपनी यह सम्मति स्पष्ट शब्दों में प्रकट की थी-
"मैं परोषदों के बहिष्कार के पक्ष में नहीं था, क्योंकि मैं असहयोग के सिद्धांत को सरकारी काउंसिलों के भीतर भी क्रियान्वित करना चाहता था। परंतु कांग्रेस के प्रस्ताव को मानने के कारण मैंने अपनी बात वापस ले ली।"
पर जब उन्होंने देखा कि देश के सामने कोई व्यावहारिक कार्यक्रम न होने से उसमें निर्बलता आती जा रही है तो उन्होंने गया कांग्रेस अध्यक्ष पद से काउंसिल- प्रवेश का प्रतिपादन किया, पर उस समय प्रतिनिधियों में काउंसिलों विरोधियों का बहुमत था, इसलिए श्री दास का प्रस्ताव ३१ दिसंबर को रद्द हो गया। इस पर उन्होंने तुरंत कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और १ जनवरी, १९२३ को गया में ही श्री मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वाराज्य पार्टी की स्थापना कर ली। इस कार्य में कांग्रेस के कट्टरपंथियों के कारण उनको बहुत बडा़ विरोध करना पडा़। जिस समय दास बाबू गया कांग्रेस से लौटकर कलकत्ता पहुँचे उस समय उनकी अवस्था कैसी कठिन हो गई थी, इसकी एक झलक सुप्रसिद्ध बंगाली लेखक श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने लेख में इस प्रकार दी थी-
"कोई साथ देने वाला नहीं है, पैसा नहीं है, प्रचार के लिए हाथ में एक भी समाचार पत्र नहीं है। जो अत्यंत छोटे लोग थे- वे भी बिना गाली दिये बात नहीं करते ! देशबंधु की यह कैसी अवस्था थी ! उस समय की बात आज तक भी मेरे मन में स्पष्ट अंकित है। जब हम गया कांग्रेस से लौटकर आये तो समस्त समाचार पत्र देशबंधु के विरुद्ध असत्य और अर्धसत्य बातों से भरे थे। हमारे पक्ष की बात कहने वाला कोई न था। इतना ही क्यों, कोई उनका वक्तव्य छापने को भी तैयार नहीं होता था। जिस घर में एक दिन लोगों को बैठने को जगह नहीं मिलती थी, उसमें मित्र या शत्रु किसी की पद- रज भी अब स्पर्श नहीं होती थी।"
पर इतना होने पर भी देशबंधु एक क्षण के लिए भी निराश या हताश नहीं हुए। उन्होंने गया कांग्रेस में ही यह कह दिया था कि आज जो मेरे विरोधी हैं, वे ही बहुत शीघ्र मेरे अनुकूल हो जायेंगे और ऐसा ही हुआ। गया के नौ महीने बाद दिल्ली में जो विशेष अधिवेशन मौलाना अबुलकलाम आजाद की अध्यक्षता में हुआ, उसमें यह स्वीकार कर लिया गया कि जिन लोगों का काउंसिल प्रवेश में विश्वास है, वे चुनावों में भाग ले सकते हैं। इस अवसर पर अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए देशबंधु ने कहा-
"ये काउंसिलें क्या हैं? ये विधान मंडल क्या हैं? ये सब भुलावे की चीजें हैं। क्या हम इनका अंत नहीं करेंगे? महात्मा गांधी इन सुधारों को निरर्थक सिद्ध करना चाहते हैं। मैं भी कॉउंसिलों में जाकर यही करना चाहता हूँ। इसे कार्यरूप में परिणत करने का एकमात्र उपाय यही है कि कॉउंसिलों में जाकर सरकार के लिए काम करना असंभव कर दिया जाये। मेरा उन लोगों से कोई सबंध नहीं है, जो पद- प्राप्ति के लिए अथवा छोटे- मोटे लाभों या स्वार्थपूर्ति के लिए वहाँ जाते हैं। मुझे इससे नफरत है, घृणा है। मेरा तो यह कहना है कि या तो मैं वहाँ उन सुधारों को नष्ट करने के लिए जाऊँ, जो कि हमारा खून चूस रहे हैं या बिल्कुल ही न जाऊँ"
और बंगाल प्रांत के चुनावों में अभूतपूर्व विजय प्राप्त करके उन्होंने जो कहा था उसे पूर्ण रूप से पालन करके दिखा दिया। उनके प्रभाव और परिश्रम से प्रजा की तरफ से चुने जाने वाले सदस्यों की लगभग सभी सीटें उनके दल वालों को मिलीं। नर्मदल तथा अन्य संस्थाओं के बडे़- बडे़ नेता देशबंधु के द्वारा खडे़ किये गये साधारण व्यक्तियों से हार गये, पर जब बंगाल के नये गवर्नर लार्ड लिंटन ने श्री दास को नया मंत्रिमंडल बनाने के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने उत्तर में लिखा-
"हमारी पार्टी के सदस्य सुधार अधिनियम के अंतर्गत सभी कानूनी अधिकारों का उपयोग द्वैधात्मक शासन प्रणाली का अंत करने के लिए करने का निश्चय कर चुके हैं। पार्टी जानती है कि इन पदों को स्वीकार करने के बाद भी अंदर से सरकारी कामों में बाधा डाली जा सकती है, परंतु ऐसा करना ईमानदारी की बात न होगी। हमारे देशवासियों की जाग्रत चेतना चाहती है कि जब तक वर्तमान सरकार की शासन प्रणाली में ऐसे परिवर्तन न हों, जो हृदय- परिवर्तन के सूचक हों, तब तक जनता को उसके साथ सहयोग नहीं करना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए, मुझे खेद है कि मैं यह उत्तरदायित्व ग्रहण नहीं कर सकता"
इसकी तुलना जब हम वर्तमान समय के कांग्रेसी नेताओं और सदस्यों से करते हैं, जिनका मुख्य लक्ष्य मंत्री- पद प्राप्त करना ही होता है और जो विधान सभाओं में जाने का उद्देश्य अधिक से अधिक आमदनी करना ही समझे बैठे हैं तो मालूम होता है कि उस समय की और आज की कांग्रेस के प्रति जनता की मनोभावना में इतना अंतर क्यों है? आज परिषदों में जाने वाले लोगों ने सेवा धर्म और लोकहित की भावना को पददलित करके स्वार्थपूर्ति और अपने संबंधियों के पोषण को ही मुख्य ध्येय बना रखा है और 'जन- सेवा' को एक व्यापार के रूप में बदल दिया है। इसी से दिन पर दिन देश की नैतिकता का स्तर गिर रहा है और भ्रष्टाचार की वृद्धि हो रही है। दास बाबू का मार्ग इससे सर्वथा भिन्न था। वे स्वयं बडे़ से बडा़ त्याग करके दूसरे लोगों से त्याग करने को कहते थे, जिससे इसका प्रभाव तुरंत पडता़ था। सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वालों को दास बाबू के चरित्र की यह बात गाँठ बाँध कर रखनी चाहिए।

