राजनैतिक मुकदमों में
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
इसी समय बंगाल में राजनीतिक आंदोलन भड़क उठा। एक तरफ देशभक्तों ने
विदेशी शासन के पंजे से देश को आजाद करने के लिए संघर्ष आरंभ किया और दूसरी
ओर सरकारी अधिकारी अपनी सत्ता कायम करने के लिए दमन करने लगे। उस अवसर पर
दास बाबू की जन्मजात देशभक्ति की भावना विशेष रूप से प्रबल हो उठी और
उन्होंने अपनी आर्थिक कठिनाइयों की परवाह न करके सरकारी कोप का शिकार होने
वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मुकदमों में सहायता देना आरंभ किया।
'संध्या' के संपादक श्री ब्रह्मा बांधव उपाध्याय और 'न्यू इंडिया' के
संपादक श्री विपिन चन्द्र पाल, दोनों को राजद्रोह के अभियोग में जोरदार
पैरवी करके जेल जाने से बचाया और भी अनेक राष्ट्र-सेवकों के अभियोगों को
उन्होंने बिना फीस लिए लड़ा और अपनी कानूनी चतुरता से उनको बचा लिया।
जिस 'बम केस' की चर्चा ऊपर की जा चुकी है, उसमें दो अभियुक्तों वारींद्र कुमार घोष और उल्लासकर दत्त को फाँसी की सजा दी गई थी। वारींन्द्र बम फैक्टरी के मुख्य संचालक और उल्लासकर बम तैयार करने के विशेषज्ञ थे। पुलिस ने बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर और ढा़का के मजिस्ट्रेट की हत्या की चेष्टा का आरोप भी इसी 'गुप्त दल' पर लगाया था। खुदीराम और प्रफुल्ल को बम देकर मि० किंग्सफोर्ड को मारने के लिए भेजने का अभियोग तो उन पर सिद्ध हो ही चुका था। इसलिए जज ने ३५ अभियुक्तों में से उनको प्रमुख मानकर प्राणदंड देना उचित समझा।
जब इस मामले की अपील हाईकोर्ट में हुई तो उसका भार भी श्री दास को सहन करना पडा़। अभियुक्तों पर बम बनाने और हत्या का प्रयत्न करने का अपराध तो सिद्ध हो ही चुका था, इसलिए उन्होंने इस अवसर पर बारीकियों का आधार लेकर एक नई ही दलील जजों के सामने पेश की। यह मुकदमा भारतीय दंड संहिता (पीनल कोड) की १२१, १२१ ए, १२२ और १२३ धाराओं के अंतर्गत चलाया गया। इन धाराओं के अनुसार मुकदमा चलाने के लिए यह अनिवार्य है कि पुलिस अधिकारी पहले सरकार से अनुमति ले लें। इस मुकदमे में आरंभ में पुलिस ने दफा १२१ ए, १२२ और १२३ के अंतर्गत मुकदमा चलाने की स्वीकृति तो ले ली थी, पर दफा १२१, जो बाद मे लगाई गई और उसकी मंजूरी नहीं ली गई। श्री दास ने इसी कानूनी त्रुटि का सहारा लेकर सिद्ध किया कि वारींद्र और उल्लासकर को धारा १२१ के अंतगर्त ही मृत्युदंड दिया गया है और वह सरकारी मंजूरी न लिए जाने के कारण अवैध है, इसलिए अभियुक्तों को मृत्युदण्ड से मुक्त किया जाय। हाईकोर्ट के जजों ने इस तर्क की सार्थकता को स्वीकार किया और दोनों अभियुक्तों को फाँसी के बजाय आजन्म काला पानी का दंड दिया। अपने फैसले में चीफ जस्टिस ने श्री दास के तर्कों की चर्चा करते हुए लिखा-
"मैं विशेष रूप से इसका उल्लेख करना चाहता हूँ कि मुकदमे में अभियुक्तों के प्रमुख वकील श्री चितरंजनदास ने मुकदमे को जिस ढंग से न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया, वह अत्यन्त प्रशंसनीय था।"
जिस 'बम केस' की चर्चा ऊपर की जा चुकी है, उसमें दो अभियुक्तों वारींद्र कुमार घोष और उल्लासकर दत्त को फाँसी की सजा दी गई थी। वारींन्द्र बम फैक्टरी के मुख्य संचालक और उल्लासकर बम तैयार करने के विशेषज्ञ थे। पुलिस ने बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर और ढा़का के मजिस्ट्रेट की हत्या की चेष्टा का आरोप भी इसी 'गुप्त दल' पर लगाया था। खुदीराम और प्रफुल्ल को बम देकर मि० किंग्सफोर्ड को मारने के लिए भेजने का अभियोग तो उन पर सिद्ध हो ही चुका था। इसलिए जज ने ३५ अभियुक्तों में से उनको प्रमुख मानकर प्राणदंड देना उचित समझा।
जब इस मामले की अपील हाईकोर्ट में हुई तो उसका भार भी श्री दास को सहन करना पडा़। अभियुक्तों पर बम बनाने और हत्या का प्रयत्न करने का अपराध तो सिद्ध हो ही चुका था, इसलिए उन्होंने इस अवसर पर बारीकियों का आधार लेकर एक नई ही दलील जजों के सामने पेश की। यह मुकदमा भारतीय दंड संहिता (पीनल कोड) की १२१, १२१ ए, १२२ और १२३ धाराओं के अंतर्गत चलाया गया। इन धाराओं के अनुसार मुकदमा चलाने के लिए यह अनिवार्य है कि पुलिस अधिकारी पहले सरकार से अनुमति ले लें। इस मुकदमे में आरंभ में पुलिस ने दफा १२१ ए, १२२ और १२३ के अंतर्गत मुकदमा चलाने की स्वीकृति तो ले ली थी, पर दफा १२१, जो बाद मे लगाई गई और उसकी मंजूरी नहीं ली गई। श्री दास ने इसी कानूनी त्रुटि का सहारा लेकर सिद्ध किया कि वारींद्र और उल्लासकर को धारा १२१ के अंतगर्त ही मृत्युदंड दिया गया है और वह सरकारी मंजूरी न लिए जाने के कारण अवैध है, इसलिए अभियुक्तों को मृत्युदण्ड से मुक्त किया जाय। हाईकोर्ट के जजों ने इस तर्क की सार्थकता को स्वीकार किया और दोनों अभियुक्तों को फाँसी के बजाय आजन्म काला पानी का दंड दिया। अपने फैसले में चीफ जस्टिस ने श्री दास के तर्कों की चर्चा करते हुए लिखा-
"मैं विशेष रूप से इसका उल्लेख करना चाहता हूँ कि मुकदमे में अभियुक्तों के प्रमुख वकील श्री चितरंजनदास ने मुकदमे को जिस ढंग से न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया, वह अत्यन्त प्रशंसनीय था।"

