परिस्थितियों के साथ संघर्ष
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यद्यपि दास बाबू की योग्यता में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं थी और वे
परिश्रम भी काफी करते थे तो भी उनकी उन्नति बहुत धीरे-धीरे हुई। इसका एक
कारण यह भी था कि परीक्षा पास करने के बाद सांसारिक जीवन में प्रवेश करते
ही उन पर बहुत अधिक भार पड़ गया। उनके पिता ने वकालत का कार्य एक प्रकार से
छोड़ ही दिया था, साथ ही उन्होंने कर्ज की एक बडी़ रकम भी परिवार के ऊपर
लाद दी थी। परिवार भी काफी बडा़ था। इन सब कारणों से चितरंजन को आरंभिक
चार-पांच वर्ष तक जीवन-निर्वाह के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ा। उस समय विवश
होकर उनको अपनी हैसियत के अन्य बैरिस्टरों के मुकाबले कम फीस पर मुकदमे
लेने पड़ते थे। फिर भी वे धैर्य से क्रमशः आगे बढ़ते गये। कम फीस लेने पर
भी वे अपने मुवक्किल को जिताने की पूरी कोशिश करते थे और इसके लिए अधिक से
अधिक जोरदार सबूत इकट्ठे करने में बडा़ परिश्रम करते थे।
इसका परिणाम यह हुआ कि सर्वसाधारण में उनकी ख्याति बढ़ने लगी और बिना अधिक कोशिश के ही उनके पास अच्छे मुकदमे आने लगे। सन् १९०७ तक उनकी आर्थिक दशा काफी संतोषजनक हो गई।
इसका परिणाम यह हुआ कि सर्वसाधारण में उनकी ख्याति बढ़ने लगी और बिना अधिक कोशिश के ही उनके पास अच्छे मुकदमे आने लगे। सन् १९०७ तक उनकी आर्थिक दशा काफी संतोषजनक हो गई।

