राजनीति में प्रवेश
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यद्यपि श्री दास में देशभक्ति की भावना आरंभ से ही थी और वे अपने
ढंग से देश सेवा के कार्यों में भाग लेते रहते थे। उन्होंने सामाजिक,
राजनीतिक और साहित्यिक उच्च विचारों के प्रचारार्थ स्वयं 'नारायण' नाम का
एक मासिक पत्र निकाला था। इसके सिवाय वे 'न्यू इंडिया' पत्र के भी एक बडे
सहायक थे, जिसका संपादन श्री विपिनचंद्र पाल करते थे। इसकी चर्चा करते हुए
पाल बाबू ने एक बार लिखा था-
"जब प्रारंभिक मालिकों के लिए 'न्यू इंडिया' का भार संभालना कठिन हो गया तो चितरंजन उनकी सहायतार्थ आगे बढे़। कानूनी बंधन के कारण वे स्वयं तो उसके डायरेक्टर नहीं बन सकते थे, पर अपने मित्रों को उत्साहित करके एक "ज्वाइंट स्टॉक कंपनी" की स्थापना कराई, जिससे वह कार्य फिर चलने लग गया। लगभग बीस वर्ष तक चितरंजन और मैं सच्चे सहयोगी के रूप में देश की सेवा करते रहे। मैं काम करता था और वे मेरे जीवन निर्वाह की व्यवस्था करते थे, जिससे मुझे उनकी सहायता स्वीकार करने में भी कोई संकोच नहीं होता था।"
देशबंधु चितरंजन दास ने अपने इस कार्य द्वारा कर्तव्य पालन की एक नई दिशा का बोध कराया। बहुत से व्यक्ति अपने कारोबार, नौकरी अथवा अन्य सांसारिक बंधनों का कारण बतलाकर सेवा-कार्यों से पृथक रहते हैं। पर वे क्या किसी अन्य रूप में ऐसे कार्यों में सहयोग नहीं कर सकते? दास बाबू को अपने वकालत के धंधे में इतना अधिक काम करना पड़ता था और उस जमाने में उनके ऊपर अपने अभियुक्तों की हित-रक्षा की इतनी अधिक जिम्मेदारी रहती थी कि वे देश के कार्यों में न तो अधिक समय दे सकते थे और न अधिक खतरा उठा सकते थे, पर इसका आशय यह नहीं कि वे देश-सेवा और राजनैतिक आंदोलन के महत्व को न समझते हों। इसलिए आरंभ में वे परिस्थिति और सुविधानुसार आर्थिक सहायता और प्रेरणा देकर ही अन्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाते रहे।
सन् १९०८ में राजनैतिक वातावरण में बहुत अधिक तीव्रता आ जाने पर वे अपने अपूर्व कानूनी ज्ञान द्वारा राजनीतिक अभियोगों में सहायता देने लगे। फिर जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतवासियों ने योजना और निश्चयपूर्वक स्वाधीनता-संग्राम छेडा़ तो उसके महत्व और आवश्यकता को समझकर वे सब कुछ त्यागकर उसमें कूद पडे़। लोगों का कहना है कि जिस समय नागपुर काँग्रेस में उन्होंने गाँधीजी के आह्वान पर अपनी वकालत को छोड़ा, उस समय उनकी आमदनी ५० हजार रुपया मासिक तक पहुँच गई थी। वे भारत के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में से एक समझे जाते थे और बडे़ महत्वपूर्ण मुकदमों में उनको नियुक्त किया जाता था।
स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेने के पश्चात् उन्होंने बैरिस्टरी की मूल्यवान् पोशाक की जगह खद्दर के वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। एक सर्वस्व त्यागी-संन्यासी की तरह लोक-कल्याण का कार्य ऐसी संलग्नता के साथ किया कि एक वर्ष में ही वे भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ नेता और बंगाल के तो एकछत्र सम्राट बन गये। उनके महान् त्याग और सेवाभाव को देखकर अन्य सैकडों साधन-संपन्न व्यक्ति भी देशहित और बलिदान के मार्ग पर आगे बढे़। वास्तव में देशबंधु चितरंजनदास ने हमारे देश में त्याग की महान् परंपरा को अग्रसर करने में जो योगदान दिया वह सदैव स्मरणीय रहेगा। कुछ ही समय पश्चात् उन्होंने अपना निवास स्थान तक राष्ट्रीय कार्य के लिए अर्पण कर दिया। आज भी उसमें 'चितरंजन सेवासदन' स्थापित है, जो स्त्रियों और बच्चों का सबसे अच्छा अस्पताल माना जाता है।
सक्रिय राजनीति में भाग लेने पर भी श्री दास देशहित के बडे़-बडे़ कामों में पूरा सहयोग देते रहे, जिनसे भारतीय राजनीतिक आंदोलन पर बहुत अधिक प्रभाव पडा़। सन् १९०५ में राजनैतिक आंदोलन के उग्र रूप धारण कर लेने पर सरकार ने एक परिपत्र (सर्कुलर, जिसके अनुसार छात्रों पर राजनीतिक आंदोलन में किसी प्रकार का भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके अनुसार अनेक छात्रों पर जुर्माना किया गया और कहीं बेंत लगाने की सजा भी दी गई। इसका प्रतिकार करने के लिए राष्ट्रीय नेता एक स्वतंत्र कॉलेज खोलने का विचार करने लगे, पर इतने बडे़ कार्य के लिए साधन मिल सकना सहज न था। तब श्री दास अग्रसर हुए और अपने परिचित एक धनी सज्जन से एक रूपया चंदा लेकर राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (नेशनल कॉउंसिल आफ एजुकेशन) की स्थापना करा दी। जब राष्ट्रीय कॉलेज के अध्यक्ष (प्रिंसिपल) पद के लिए किसी उच्चकोटि के और राष्ट्रीय भावना वाले व्यक्ति की आवश्यकता हुई तो उन्होंने श्री अरविन्द घोष से, जो उस समय बड़ौदा के गायकवाड़ कॉलेज में ७५० रू० मासिक पर 'वाइस प्रिंसिपल' के पद पर कार्य कर रहे थे, कहा कि-"वे उस पद से त्यागपत्र दे दें और कलकत्ता आकर देशसेवा में भाग लें।" श्री अरविंद ने इसे स्वीकार किया और वे ही 'नेशनल कॉलेज' के सर्वप्रथम मुख्याध्यापक बने। इस पद के लिए उनको केवल डेढ़ सौ रूपया मासिक दिया गया ।
"जब प्रारंभिक मालिकों के लिए 'न्यू इंडिया' का भार संभालना कठिन हो गया तो चितरंजन उनकी सहायतार्थ आगे बढे़। कानूनी बंधन के कारण वे स्वयं तो उसके डायरेक्टर नहीं बन सकते थे, पर अपने मित्रों को उत्साहित करके एक "ज्वाइंट स्टॉक कंपनी" की स्थापना कराई, जिससे वह कार्य फिर चलने लग गया। लगभग बीस वर्ष तक चितरंजन और मैं सच्चे सहयोगी के रूप में देश की सेवा करते रहे। मैं काम करता था और वे मेरे जीवन निर्वाह की व्यवस्था करते थे, जिससे मुझे उनकी सहायता स्वीकार करने में भी कोई संकोच नहीं होता था।"
देशबंधु चितरंजन दास ने अपने इस कार्य द्वारा कर्तव्य पालन की एक नई दिशा का बोध कराया। बहुत से व्यक्ति अपने कारोबार, नौकरी अथवा अन्य सांसारिक बंधनों का कारण बतलाकर सेवा-कार्यों से पृथक रहते हैं। पर वे क्या किसी अन्य रूप में ऐसे कार्यों में सहयोग नहीं कर सकते? दास बाबू को अपने वकालत के धंधे में इतना अधिक काम करना पड़ता था और उस जमाने में उनके ऊपर अपने अभियुक्तों की हित-रक्षा की इतनी अधिक जिम्मेदारी रहती थी कि वे देश के कार्यों में न तो अधिक समय दे सकते थे और न अधिक खतरा उठा सकते थे, पर इसका आशय यह नहीं कि वे देश-सेवा और राजनैतिक आंदोलन के महत्व को न समझते हों। इसलिए आरंभ में वे परिस्थिति और सुविधानुसार आर्थिक सहायता और प्रेरणा देकर ही अन्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाते रहे।
सन् १९०८ में राजनैतिक वातावरण में बहुत अधिक तीव्रता आ जाने पर वे अपने अपूर्व कानूनी ज्ञान द्वारा राजनीतिक अभियोगों में सहायता देने लगे। फिर जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतवासियों ने योजना और निश्चयपूर्वक स्वाधीनता-संग्राम छेडा़ तो उसके महत्व और आवश्यकता को समझकर वे सब कुछ त्यागकर उसमें कूद पडे़। लोगों का कहना है कि जिस समय नागपुर काँग्रेस में उन्होंने गाँधीजी के आह्वान पर अपनी वकालत को छोड़ा, उस समय उनकी आमदनी ५० हजार रुपया मासिक तक पहुँच गई थी। वे भारत के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में से एक समझे जाते थे और बडे़ महत्वपूर्ण मुकदमों में उनको नियुक्त किया जाता था।
स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेने के पश्चात् उन्होंने बैरिस्टरी की मूल्यवान् पोशाक की जगह खद्दर के वस्त्र पहनना आरंभ कर दिया। एक सर्वस्व त्यागी-संन्यासी की तरह लोक-कल्याण का कार्य ऐसी संलग्नता के साथ किया कि एक वर्ष में ही वे भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ नेता और बंगाल के तो एकछत्र सम्राट बन गये। उनके महान् त्याग और सेवाभाव को देखकर अन्य सैकडों साधन-संपन्न व्यक्ति भी देशहित और बलिदान के मार्ग पर आगे बढे़। वास्तव में देशबंधु चितरंजनदास ने हमारे देश में त्याग की महान् परंपरा को अग्रसर करने में जो योगदान दिया वह सदैव स्मरणीय रहेगा। कुछ ही समय पश्चात् उन्होंने अपना निवास स्थान तक राष्ट्रीय कार्य के लिए अर्पण कर दिया। आज भी उसमें 'चितरंजन सेवासदन' स्थापित है, जो स्त्रियों और बच्चों का सबसे अच्छा अस्पताल माना जाता है।
सक्रिय राजनीति में भाग लेने पर भी श्री दास देशहित के बडे़-बडे़ कामों में पूरा सहयोग देते रहे, जिनसे भारतीय राजनीतिक आंदोलन पर बहुत अधिक प्रभाव पडा़। सन् १९०५ में राजनैतिक आंदोलन के उग्र रूप धारण कर लेने पर सरकार ने एक परिपत्र (सर्कुलर, जिसके अनुसार छात्रों पर राजनीतिक आंदोलन में किसी प्रकार का भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके अनुसार अनेक छात्रों पर जुर्माना किया गया और कहीं बेंत लगाने की सजा भी दी गई। इसका प्रतिकार करने के लिए राष्ट्रीय नेता एक स्वतंत्र कॉलेज खोलने का विचार करने लगे, पर इतने बडे़ कार्य के लिए साधन मिल सकना सहज न था। तब श्री दास अग्रसर हुए और अपने परिचित एक धनी सज्जन से एक रूपया चंदा लेकर राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (नेशनल कॉउंसिल आफ एजुकेशन) की स्थापना करा दी। जब राष्ट्रीय कॉलेज के अध्यक्ष (प्रिंसिपल) पद के लिए किसी उच्चकोटि के और राष्ट्रीय भावना वाले व्यक्ति की आवश्यकता हुई तो उन्होंने श्री अरविन्द घोष से, जो उस समय बड़ौदा के गायकवाड़ कॉलेज में ७५० रू० मासिक पर 'वाइस प्रिंसिपल' के पद पर कार्य कर रहे थे, कहा कि-"वे उस पद से त्यागपत्र दे दें और कलकत्ता आकर देशसेवा में भाग लें।" श्री अरविंद ने इसे स्वीकार किया और वे ही 'नेशनल कॉलेज' के सर्वप्रथम मुख्याध्यापक बने। इस पद के लिए उनको केवल डेढ़ सौ रूपया मासिक दिया गया ।

