वकालत का अपूर्व आदर्श
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मुकदमा बडी़ धूमधाम से चला। यद्यपि 'बम कांड' से अरविन्द का कोई
प्रत्यक्ष संबंध न था और वे देश के एक प्रसिद्ध सार्वजनिक नेता और चोटी के
विद्वान् थे, पर सरकार का सबसे बडा़ रोष उन्हीं पर था। वह जानती थी कि अपने
लेखों और भाषणों से उन्होंने नवयुवकों में वह भावना भरी है, जिससे वे इस
प्रकार देश के लिए प्राण देने को तैयार हो गये हैं। इसलिए सरकारी वकील मि०
नार्टन ने तरह-तरह के प्रमाणों की भरमार करके चार महीने तक सरकारी पक्ष
उपस्थित किया, जिसमें अदालत द्वारा दो सौ गवाह, चार हजार कागज-पत्र और पाँच
सौ दूसरे सबूत जैसे-बम, विस्फोटक पदार्थ आदि की जाँच की गई। अंग्रेज सरकार
द्वारा लाखों रुपया खर्च करके हर तरह से यह चेष्टा की गई कि श्री अरविन्द
को मृत्युदण्ड या कड़ी से कड़ी सजा दी जाय। पर उनकी तमाम कोशिश निरर्थक
सिद्ध हुई और अंग्रेज जज को बाध्य होकर श्री अरविन्द को छोड़ देना पडा़। इस
आश्चर्यजनक फैसले का समस्त श्रेय था श्री अरविन्द की वकालत करने वाले-श्री
चितरंजन दास को।
यद्यपि भारतवर्ष में प्रतिभाशाली वकीलों की कमी नहीं है। बीते समय में कानून के एक से एक दिग्गज पचासों विद्वान् ऐसे हो चुके हैं, जिनका नाम अदालती-इतिहास में स्थायी हो गया और जो अपार संपत्ति के साथ सार्वजनिक यश और कीर्ति के भी भागीदार बन सके, पर उन सब में श्री चितरंजन का-सा उदाहरण मिल सकना असंभव है। निस्संदेह इन प्रसिद्ध वकीलों ने महत्वपूर्ण अभियोगों में अपनी कानूनी योग्यता का अपूर्व परिचय दिया था, पर उसके लिए अपने मुवक्किल से फीस के रूप में बडी़-बडी़ रकमें भी प्राप्त की थीं। लेकिन श्री चितरंजनदास एक ऐसे वकील निकले जिन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में हद दर्जे की योग्यता प्रकट करके अपने मुवक्किल (श्री अरविन्द) को यमराज की दाढों में से सुरक्षित निकाल लिया और साथ ही इसके लिए जान बूझकर कई लाख रुपयों की हानि भी उठाई। इस प्रसंग पर टिप्पणी करते हुए उनके जीवन-चरित्र लेखक श्री हेमेंद्रनाथदास गुप्त डी० लिट० ने लिखा है-
"चितरंजन ने अपने मुवक्किल को बचाने के लिए बडी़ मेहनत की। उन्होंने इस मुकदमे में अपनी सारी बुद्धि और शक्ति लगा दी तथा अपना पक्ष सशक्त करने के लिए तत्संबंधी उपलब्ध सभी फैसलों और कानूनों का अध्ययन किया। दस महीने तक चितरंजन ने अरविन्द के मुकदमे में रात-दिन एक कर दिया। उन्होंने इस मुकदमे को न केवल बिना किसी प्रकार की फीस के स्वीकार किया, बल्कि इसके कारण उनको अपनी घोडा़गाडी़ बेच देनी पडी़ और व्यक्तिगत रूप से कर्ज भी लेना पडा़। उनकी आमदनी बिलकुल बंद हो गई थी, जबकि खर्चे ज्यों के त्यों बने थे। जिस समय मुकदमा खत्म हुआ उन पर लगभग पचास हजार का ऋण था।"
श्री अरविन्द ने भी अभियोग से रिहाई हो जाने के पश्चात उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा था- "अप्रत्याशित रूप से वह आगे आया मेरा वह मित्र"
आप सब ने उसका नाम सुना है, जिसने अपनी सब चिंताओं को एक तरफ रख दिया, अपने सारे मुकदमे छोड़ दिये, महीनों आधी-आधी रात तक बैठा परिश्रम करता रहा और मुझे बचाने के लिए जिसने अपना स्वास्थ्य नष्ट कर लिया उसका नाम है- श्री चितरंजनदास। जब मैंने उसे देखा तो मैं संतुष्ट हो गया।"
श्री चितरंजनदास के जीवन की एक यही घटना इतनी महत्त्वपूर्ण है, जिसके आधार पर उनको उच्चकोटि का 'महापुरुष' माना जा सकता है। वकील का पेशा हमारे देश में बहुत अच्छा नहीं माना जाता, क्योंकि उनमें से अधिकांश मुकदमों के ठीक या गलत होने का ख्याल छोड़कर अधिक से अधिक रूपया कमाने की कोशिश में ही लगे रहते हैं। यद्यपि देश के अधिकांश नेता आरंभ में वकील ही थे-महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक और मालवीय जी जैसे महान् नेता भी इसी क्षेत्र में से आये थे तो भी सामान्य जनता की दृष्टि में यह पेशा कभी प्रशंसनीय और श्रद्धास्पद नहीं समझा गया, पर दास बाबू ने श्री अरविन्द के अभियोग में स्वार्थ त्याग की हद करके यह दिखला दिया कि यदि मनुष्य के हृदय में सच्ची परोपकार-भावना हो तो यह प्रत्येक अवस्था में तदानुसार आचरण कर सकता है। जो परिस्थितियों का नाम लेकर समाज-सेवा के कार्यों से विमुख होकर रहते हैं, उनके लिए दास बाबू का उदाहरण शिक्षाप्रद हो सकता है।
यद्यपि भारतवर्ष में प्रतिभाशाली वकीलों की कमी नहीं है। बीते समय में कानून के एक से एक दिग्गज पचासों विद्वान् ऐसे हो चुके हैं, जिनका नाम अदालती-इतिहास में स्थायी हो गया और जो अपार संपत्ति के साथ सार्वजनिक यश और कीर्ति के भी भागीदार बन सके, पर उन सब में श्री चितरंजन का-सा उदाहरण मिल सकना असंभव है। निस्संदेह इन प्रसिद्ध वकीलों ने महत्वपूर्ण अभियोगों में अपनी कानूनी योग्यता का अपूर्व परिचय दिया था, पर उसके लिए अपने मुवक्किल से फीस के रूप में बडी़-बडी़ रकमें भी प्राप्त की थीं। लेकिन श्री चितरंजनदास एक ऐसे वकील निकले जिन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में हद दर्जे की योग्यता प्रकट करके अपने मुवक्किल (श्री अरविन्द) को यमराज की दाढों में से सुरक्षित निकाल लिया और साथ ही इसके लिए जान बूझकर कई लाख रुपयों की हानि भी उठाई। इस प्रसंग पर टिप्पणी करते हुए उनके जीवन-चरित्र लेखक श्री हेमेंद्रनाथदास गुप्त डी० लिट० ने लिखा है-
"चितरंजन ने अपने मुवक्किल को बचाने के लिए बडी़ मेहनत की। उन्होंने इस मुकदमे में अपनी सारी बुद्धि और शक्ति लगा दी तथा अपना पक्ष सशक्त करने के लिए तत्संबंधी उपलब्ध सभी फैसलों और कानूनों का अध्ययन किया। दस महीने तक चितरंजन ने अरविन्द के मुकदमे में रात-दिन एक कर दिया। उन्होंने इस मुकदमे को न केवल बिना किसी प्रकार की फीस के स्वीकार किया, बल्कि इसके कारण उनको अपनी घोडा़गाडी़ बेच देनी पडी़ और व्यक्तिगत रूप से कर्ज भी लेना पडा़। उनकी आमदनी बिलकुल बंद हो गई थी, जबकि खर्चे ज्यों के त्यों बने थे। जिस समय मुकदमा खत्म हुआ उन पर लगभग पचास हजार का ऋण था।"
श्री अरविन्द ने भी अभियोग से रिहाई हो जाने के पश्चात उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा था- "अप्रत्याशित रूप से वह आगे आया मेरा वह मित्र"
आप सब ने उसका नाम सुना है, जिसने अपनी सब चिंताओं को एक तरफ रख दिया, अपने सारे मुकदमे छोड़ दिये, महीनों आधी-आधी रात तक बैठा परिश्रम करता रहा और मुझे बचाने के लिए जिसने अपना स्वास्थ्य नष्ट कर लिया उसका नाम है- श्री चितरंजनदास। जब मैंने उसे देखा तो मैं संतुष्ट हो गया।"
श्री चितरंजनदास के जीवन की एक यही घटना इतनी महत्त्वपूर्ण है, जिसके आधार पर उनको उच्चकोटि का 'महापुरुष' माना जा सकता है। वकील का पेशा हमारे देश में बहुत अच्छा नहीं माना जाता, क्योंकि उनमें से अधिकांश मुकदमों के ठीक या गलत होने का ख्याल छोड़कर अधिक से अधिक रूपया कमाने की कोशिश में ही लगे रहते हैं। यद्यपि देश के अधिकांश नेता आरंभ में वकील ही थे-महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक और मालवीय जी जैसे महान् नेता भी इसी क्षेत्र में से आये थे तो भी सामान्य जनता की दृष्टि में यह पेशा कभी प्रशंसनीय और श्रद्धास्पद नहीं समझा गया, पर दास बाबू ने श्री अरविन्द के अभियोग में स्वार्थ त्याग की हद करके यह दिखला दिया कि यदि मनुष्य के हृदय में सच्ची परोपकार-भावना हो तो यह प्रत्येक अवस्था में तदानुसार आचरण कर सकता है। जो परिस्थितियों का नाम लेकर समाज-सेवा के कार्यों से विमुख होकर रहते हैं, उनके लिए दास बाबू का उदाहरण शिक्षाप्रद हो सकता है।

