• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • प्रभावशाली भाषण शक्ति
    • चित्तरंजन दास
    • वकालत का अपूर्व आदर्श
    • त्याग और परोपकार का जन्मजात गुण
    • आरंभिक जीवन में देशभक्ति की भावना
    • परिस्थितियों के साथ संघर्ष
    • राजनैतिक मुकदमों में
    • अमृत बाजार पत्रिका पर मानहानि का अभियोग
    • राजनीति में प्रवेश
    • स्वराज्य आंदोलन में सहयोग
    • उग्र राजनीति में प्रवेश
    • अभूतपूर्व त्याग और देशसेवक का व्रत
    • नवयुवकों का संगठन
    • मातृभूमि कि वेदी पर सर्वस्वर अर्पण
    • स्वराज्य पार्टी की स्थापना
    • अत्यधिक परिश्रम से स्वास्थ्य- भंग
    • पारस्परिक वैमनस्यता का अभिशाप
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login


Back to Books

Books - देशबंधु चितरंजन दास

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


पारस्परिक वैमनस्यता का अभिशाप

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 59 61 Last
    समाज में उच्च स्थान और यश प्राप्त करने वाले महान् पुरूषों को जिस एक ओर कठिनाई का सामना करना पड़ता है, वह है आपस के लोगों का गुप्त अथवा प्रकट विरोध। जब सामान्य मनःस्थिति के व्यक्ति अपने किसी संगी- साथी को विशेष सफलता लाभ करते देखते हैं अथवा किसी का अपने से अधिक सम्मान होता, महत्त्व बढ़ता जान पड़ता है तो उनके भीतर एक प्रकार का द्वेष- भाव उत्पन्न हो जाता है। उसके वशीभूत होकर वे प्रायः प्रतिपक्षी के विरुद्ध उलटी- सीधी बातें कहने लगते हैं और जिस प्रकार संभव हो उसे गिराने की चेष्टा करते हैं। यद्यपि यह दूषित मनोवृत्ति सर्वत्र पाई जाती है, पर भारतवर्ष जैसे देश में, जो बहुत लंबे समय तक विदेशियों के आधीन रहा हो, यह दोष बडी़ मात्रा में पाया जाता है। श्री दास को भी अपने ही आसपास के अन्य कार्यकर्ताओं और कांग्रेस में भाग लेने वालों के कारण ऐसी अवांछनीय परिस्थिति का सामना बहुत करना पड़ा। श्री शरतचंद्र ने दास बाबू के जीवन के इस पहलू पर प्रकाश डालते हुए ठीक लिखा है-

       "पराधीन देश का सबसे बढ़कर दुर्भाग्य यह होता है कि उसके स्वाधीनता- संग्राम में मनुष्य को विदेशियों की अपेक्षा अपने देश के लोगों के साथ ही अधिक लड़ाई लड़नी पड़ती है।"

        जिन लोगों ने गत पचास वर्षों के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया है, आँखे खोलकर उसका निरीक्षण किया है, वे इस कथन की सच्चाई को अच्छी तरह अनुभव कर सकते हैं। श्री दास को इस परिस्थिति का सामना अन्य नेताओं की अपेक्षा इसलिए अधिक करना पड़ा था, क्योंकि अपनी उच्च स्थिति, प्रभाव और त्याग के कारण उनको आंदोलन में बहुत शीघ्र प्रधान पद प्राप्त हो गया था। अपने ज्ञान और अनुभव के द्वारा वे जो निर्णय करते थे, वह भी अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ और कारगर होता था। इससे उन्होंने जनता में शीघ्र ही वह श्रद्धा और सम्मानयुक्त स्थान प्राप्त कर लिया, जो अनेक पेशेवर राजनीतिज्ञों को बहुत वर्षों में भी नहीं मिल सका था। इसी से बंगाल के और अन्य प्रांतों के भी अनेक छोटे- बडे़ नेता उनसे प्रतिस्पर्धा का भाव रखने लगे थे और समय- कुसमय उनका विरोध करने को तत्पर हो जाते थे। यद्यपि श्री दास ने कभी ऐसे लोगों के विरोध के कारण कोई अनुचित अथवा देशहित को हानि पहुँचाने वाला कार्य नहीं किया तो भी इसका प्रतिकार करने के लिए उनको जो अतिरिक्त श्रम करना पड़ता था और मानसिक अशांति उत्पन्न होती थी, वह उनके स्वास्थ्य के लिए घातक ही सिद्ध हुई। इसके संबंध में अपनी सम्मति व्यक्त करते हुए देशबंधु के निकटतम सहकारी श्री सुभाष बाबू ने लिखा है-

      "कभी- कभी मेरे मन में यही भाव आता है कि देशबंधु की अकाल मृत्यु और देहत्याग की बहुत कुछ जिम्मेदारी उनके सहकारी और अनुयायियों पर भी है। अगर वे उनके कार्य- भार को कुछ- कुछ हलका करते रहते तो संभवतः उनको इतना अधिक परिश्रम करके अपनी जीवन- लीला इतनी शीघ्र समाप्त न करनी पड़ती। पर हम लोगों की ऐसी आदत है कि जिसको एक बार नेता के पद पर बिठा देते हैं, उस पर इतना अधिक बोझा डालते हैं और उससे इतनी अधिक आशा रखते हैं कि जितना कार्य- भार उठाना किसी व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। राजनीति से संबंधित तमाम बातों की बागडोर हम नेता के हाथ में देकर स्वयं निश्चिंत होकर बैठे रहना चाहते हैं।
   
  यही देशबंधु के इतनी शीघ्र- केवल ५५ वर्ष की आयु में संसार से उठ जाने का मुख्य कारण था। हमारे यहाँ का सार्वजनिक जीवन अभी बहुत कम विकसित हुआ है। अधिकांश लोग तो 'सार्वजनिक' का आशय ही नहीं समझते। इसलिए जो थोडे़ से व्यक्ति इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, उन्हीं को समस्त राजनीति और लोक- कल्याण के कार्यों का उत्तरदायी समझ लिया जाता है। इधर सच्चे नेता भी जब देखते हैं कि जनता सार्वजनिक जीवन के संबंध में अनजान और अनभ्यस्त है तो लाचार होकर उनको अपनी शक्ति से बाहर श्रम करके कार्य- संचालन करना पड़ता है, जिसका परिणाम प्रायः अनिष्टकर ही सिद्ध होता है। एक देशबंधु चित्तरंजनदास ही नहीं, हमारे देश के अनेक महान् कर्णधार इसी प्रकार अतिरिक्त कार्य- भार के कारण समय से पूर्व परलोक के पथिक बन चुके हैं। जनता को इस संबंध में अपना दायित्व समझना और अपने भक्तिभाजन महापुरुषों के स्वास्थ्य और परिस्थितियों का ध्यान रखकर उनके कार्य- भार को हलका करते रहना ही अपना कर्तव्य समझना चाहिए।

      इसमें संदेह नहीं कि भारतीय जन- जीवन का यह पहलू बहुत अधिक चिंतनीय है। यही कारण है कि हमारे अधिकांश राष्ट्रीय आंदोलन आंशिक रूप से ही सफल हो पाते हैं और उनके लिए भी थोडे़ से सार्वजनिक कार्यकर्ताओं और सेवाभावी व्यक्तियों को आवश्यकता से अधिक श्रम और स्वार्थ त्याग करना पड़ता है। अन्य प्रगतिशील देशों में ऐसी बात नहीं है। योरोप, अमेरिका के प्रायः सभी छोटे- बडे़ राष्ट्रो के निवासी देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं और इसलिए कोई संकट का समय आने पर अपनी स्थिति के अनुकूल रक्षा कार्य में हिस्सा बँटाते हैं। गत द्वितीय महासमर में जब हिटलर ने इंगलैंड पर तूफानी आक्रमण किया था और जर्मनी की वायु- सेना के दल एक के बाद एक आकर चौबीसों घंटे ब्रिटेन के नगरों पर बम वर्षा करते थे तो वहाँ के नेताओं ने नहीं, जनता ने अपने मनोबल से उनका मुकाबला किया। उस समय अंग्रेजी सेना की युद्ध सामग्री भी फ्रांस की भूमि पर हुई पराजय के कारण नष्ट हो गई थी। पर इंगलैंड की सामान्य जनता इनमें से किसी कठिनाई से न घबराकर नियम से कारखानों में जाती रही और पहले से ड्योढा़ काम करती रही, जिसके परिणामस्वरूप एक भयंकर शत्रु से देश की रक्षा ही न हो सकी, वरन् ब्रिटिश सेना पुनः अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित होकर हिटलर का मुकाबला करने को तैयार हो गई।

      अगर हमारे देशवासियों में ऐसी मनोवृत्ति जाग्रत हो जाए, तो यहाँ के राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक कार्यक्रम इस प्रकार अधूरे न रहें। इस समय तो जो थोडे़ से सेवाभावी व्यक्ति समाज सुधार, धर्म प्रचार, आर्थिक व्यवस्था को उन्नत बनाने की कोई योजना बनाते हैं, उसके लिए उनको साधनों तथा सहायकों की कमी से स्वयं ही इतना परिश्रम और दौड़धूप करनी पड़ती है कि वे थोडे- बहुत समय में ही थककर हताश हो जाते हैं। यदि हमारी जनता उपयोगी सार्वजनिक कार्यों के महत्त्व को समझकर स्वेच्छा से आवश्यक सहयोग प्रदान करती रहे तो देश की परिस्थिति में बहुत कुछ सुधार हो सकता है। 

देशबंधु चित्तरंजन दास को बहुत अधिक श्रेय इस बात का है कि उन्होंने स्वाधीनता- संग्राम के आरंभिक दिनों में उसको उलझनों से निकालकर व्यावहारिक मार्ग दिखलाया। जैसे उन्होंने आरंभ में ही कह दिया था। 'स्वाराज्य पार्टी' द्वारा एक चुनाव जीत लिए जाने पर फिर सभी कांग्रेसी नेता कॉउंसिल प्रवेश के महत्त्व को समझ गये और दूसरे ही चुनाव में कांग्रेस के बडे़- बडे़ महारथियों ने भाग लिया और कॉउंसिलों के सदस्य बने। सन् १९३७ में गांधी जी की आज्ञानुसार कांग्रेस ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर चुनाव लडा़ और उसके नेताओं ने मंत्री- पद स्वीकार करके शासन- संचालन किया। इस प्रकार श्री दास की नीति ही, जिसके लिए एक बार उनको 'कांग्रेस का विद्रोही' कहकर बदनाम करने की चेष्टा की गई थी, अंत में उचित और देशहित के अनुकूल मानी गई। उन्होंने सन् १९२३ में ही उक्त लांछन का प्रतिवाद करते हुए मद्रास की एक सभा में कह दिया था-

      "क्या मैं विद्रोही हूँ? यदि मुझे ऐसा जान पड़े कि स्वराज्य प्राप्त करने के लिए कांग्रेस अथवा भारत की किसी भी दूसरी संस्था का विरोध करना आवश्यक है तो मै करूँगा। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि कांग्रेस से अधिक पवित्र एक और चीज है और वह है- भारतीय जनता की स्वतंत्रता।"

      देशबंधु का आशय था कि सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में हम सबको पूरी सच्चाई और निःस्वार्थता से काम लेना चाहिए। जो इस मार्ग पर चलेगा, वह कभी मार्गच्युत नहीं हो सकता और उसके विरुद्ध भूल से या द्वेष से यदि कोई दोषारोपण किया जायेगा तो वह अधिक देर तक न टिक सकेगा।

      दास बाबू भारतीय धर्म और अध्यात्म के मर्म को भी पूर्ण रूप से समझते थे। उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि- "कृत्रिम अंग्रेजियत हमारे मार्ग में बाधा बन गई है। उसके कलुषित पदचिह्न हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र एंव कार्य में दृष्टिगोचर होते हैं। हम देवालयों के स्थान पर सभा- भवन बनवाते हैं, दान जैसे शुभ कार्य के लिए नाटकों और अन्य मनोरंजनों के टिकटों का विक्रय कर रहे हैं। अनाथालयों की सहायता के लिए लाटरी डालते हैं। हम अपने पहनावे, विचार, भावनाओं तथा संस्कृति सभी दृष्टियों से मिश्रित किस्म के हो गये हैं। संभव है पाश्चात्य आदर्शों के अनुकरण के इस नये उन्माद में एक दिन हम यह भी भूल जायें कि धन केवल साधन है, साध्य नहीं।" इस प्रकार वे भारतीय संस्कृति के दृढ़ उपासक थे और उन्होंने गांधी जी से स्पष्ट कह दिया था कि "मैं राजनीतिक आंदोलन में इसीलिए शामिल हुआ हूँ, क्योंकि मैं उसे धर्म का अंग समझता हूँ।" अगर हम भी धर्म और अध्यात्म को अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की आधारशिला बना सकें तो निःसंदेह हमारी दुर्दशा का शीघ्र ही अंत हो सकता है।

First 59 61 Last


Other Version of this book



देशबंधु चितरंजन दास
Type: TEXT
Language: HINDI
...

देशबंधु चितरंजन दास
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books



The Pioneers Of Scientific Spirituality
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

वैज्ञानिक अध्यात्म के क्रान्ति दीप
Type: TEXT
Language: HINDI
...

वैज्ञानिक अध्यात्म के क्रान्ति दीप
Type: SCAN
Language: HINDI
...

लोक-मानस का परिष्कृत मार्गदर्शन
Type: TEXT
Language: HINDI
...

लोक-मानस का परिष्कृत मार्गदर्शन
Type: SCAN
Language: HINDI
...

सेवा साधना और उसके सिद्धांत
Type: SCAN
Language: HINDI
...

चेतना की शिखर यात्रा-२
Type: SCAN
Language: EN
...

चेतना की शिखर यात्रा-१
Type: SCAN
Language: EN
...

ચેતનાની શિખરયાત્રા ભાગ - ૧
Type: SCAN
Language: EN
...

चेतना की शिखर यात्रा-३
Type: SCAN
Language: EN
...

बिना शर्त अनुदान नहीं
Type: SCAN
Language: HINDI
...

बिना शर्त अनुदान नहीं
Type: TEXT
Language: HINDI
...

The Pioneers Of Scientific Spirituality
Type: SCAN
Language: ENGLISH
...

वैज्ञानिक अध्यात्म के क्रान्ति दीप
Type: TEXT
Language: HINDI
...

वैज्ञानिक अध्यात्म के क्रान्ति दीप
Type: SCAN
Language: HINDI
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2/4
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2/3
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2/2
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-1/5
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-1/4
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-1/3
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2/5
Type: SCAN
Language: EN
...

महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग-2/1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

స్వాతంత్ర్య సంగ్రామ సేనాని
Type: SCAN
Language: TELUGU
...

Articles of Books

  • प्रभावशाली भाषण शक्ति
  • चित्तरंजन दास
  • वकालत का अपूर्व आदर्श
  • त्याग और परोपकार का जन्मजात गुण
  • आरंभिक जीवन में देशभक्ति की भावना
  • परिस्थितियों के साथ संघर्ष
  • राजनैतिक मुकदमों में
  • अमृत बाजार पत्रिका पर मानहानि का अभियोग
  • राजनीति में प्रवेश
  • स्वराज्य आंदोलन में सहयोग
  • उग्र राजनीति में प्रवेश
  • अभूतपूर्व त्याग और देशसेवक का व्रत
  • नवयुवकों का संगठन
  • मातृभूमि कि वेदी पर सर्वस्वर अर्पण
  • स्वराज्य पार्टी की स्थापना
  • अत्यधिक परिश्रम से स्वास्थ्य- भंग
  • पारस्परिक वैमनस्यता का अभिशाप
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj