भगवती गायत्री के पांच वरदान
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(2 जून 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में प्रातःकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
कल मैंने गायत्री का महात्म्य बताने की बात कही थी। मैं आपको बार-बार माहात्म्य बताता जाता हूं। गायत्री के लाभों का वर्णन क्या है यह उसके चित्र से जाना जा सकता है। आप चित्र देखते हैं। उसमें पंचमुखी गायत्री का स्वरूप है। अलंकारिक रूप से यह स्वरूप बनाये गये हैं। वैसे ये पांच गुण है। एक मुख वाली गायत्री को ब्रह्म गायत्री कहते हैं। वैसे ही पांच कोष, पांच लाभ और पांच खजाने हमारे भीतर हैं। इनमें से पौराणिक कथाओं के अनुसार एक होती है कामधेनु, जिसके दूध से समस्त प्रकार की तृप्ति हो जाती है। यह जीवात्मा और शरीर दोनों की प्यास बुझाने वाली है। इसे समुद्र मंथन से निकली बताते हैं।
मैंने वह कामधेनु नहीं देखी, पर गायत्री रूपी कामधेनु जरूर देखी है। यह आयु, शक्ति, सहयोगी, साधन, यश, धन आदि सात पदार्थ प्रदान करती है। अगर आप में दूध लेने का पात्र हो, तो इससे वह अमृत दूध लेते जाइये।
इसी प्रकार एक पेड़ होता है—कल्पवृक्ष। कल्पवृक्ष का पेड़ ऐसा होता है जिसके नीचे बैठ जाने से सभी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती हैं। मैंने कल्पवृक्ष नहीं देखा। अभी पिछले दिनों जब मैं अज्ञातवास में गया तब किसी ने गंगोत्री के पार बताया था कि यह कल्पवृक्ष का स्थान है। यहां पहले कल्प वृक्ष था। मैं वहां बैठ गया और कहा अरे कल्पवृक्ष पानी भेजना, पर पानी न आया। अगर इस कल्पवृक्ष में शक्ति होती तो पानी आ जाता। मैंने सोचा यह कैसा कल्पवृक्ष?
मैंने भी एक और कल्पवृक्ष देखा है, जिसके नीचे बैठने से कामनाओं का परिष्कार हो जाता है। कामनायें वे होती हैं, जो सुरसा की तरह बढ़ती जाती हैं। आपने हनुमान जी और सुरसा की तरह मुख वाली बात तो सुनी ही होगी। सुरसा के मुख के समान कामनायें बढ़ती जाती हैं। तृष्णा और कामनायें ऐसी होती हैं, जिनका अन्त नहीं होता। वैसे तीन कामनायें प्रमुख होती हैं। ‘‘वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा’’। अगर एक हजार भी कल्पवृक्ष इस हिन्दुस्तान में हो जायें तो भी कामनायें पूरी नहीं हो सकतीं। आशीर्वाद के साथ कामनायें बढ़ती जाती हैं। इच्छायें बढ़ती रहती हैं, इनकी पूर्ति कभी नहीं हो सकती। लोकेषणा भी पूरी नहीं होती। सरपंच से लेकर एम.पी. तक की इच्छा का अन्त नहीं। ये सभी पूरी नहीं हो सकतीं। अभी मैं विद्या पढ़ जाऊं या धनवान बन जाऊं तो भी अशान्ति दूर नहीं होती।
पुत्रेषणा सुसंस्कृत नाम है। गन्दे नाम कामुकता-कुदृष्टि आदि हैं। यह मनुष्य की कल्पना होती है। लोग सिनेमा, गन्दे उपन्यास देखते हैं और उसी नजर से बच्चियों को भी देखते हैं। बूढ़े बाबाजी माला हाथ में लेकर गंगा के ऐसे घाट पर जाकर उपासना के लिए बैठते हैं, जहां स्त्रियां स्नान करती हों। मनुष्य की पुत्रेषणा बूढ़े हो जाने के बाद भी नष्ट नहीं होती। जिनका सब कुछ समाप्त हो गया वह भी वासनाओं से आक्रान्त हैं। भौतिकवाद में डूबे इन्सान एक-एक करके इच्छा जिज्ञासा रखते हैं और कहते हैं इनके अलावा और कोई आकांक्षायें नहीं। क्या इच्छायें कभी पूरी हो सकती हैं। मित्रो! कभी नहीं। राजा गोपी चन्द के एक हजार रानियां थीं। आलिफ लैला आदि की अनेकों कहानियां आप सुनते रहते हैं। मित्रो! क्या कल्पवृक्ष यह सब करेगा? कल्पवृक्ष उसे नहीं कहते, जो कामनाओं की पूर्ति करता है, कल्पवृक्ष वह होता है जो कामनाओं को परिष्कृत करता है। अध्यात्म वही है जो कामनाओं की दिशायें बदल देता है। अच्छी कामनायें पूर्ण हो जाती हैं और गन्दी नहीं। मैंने स्वर्ग का कल्पवृक्ष तो नहीं देखा, मरूंगा तभी देखूंगा, पर गायत्री रूपी कल्पवृक्ष देखा है, जो कामनाओं का परिष्कार करता है।
गायत्री का तीसरा नाम अमृत है। अमृत न मरने वाले पदार्थ को कहते हैं। मैं सौराष्ट्र गया था और वहां वह स्थान देखा जहां भगवान कृष्ण की समाधि थी, मैंने वह स्थान भी देखा जहां एक भील ने भगवान के तीर चुभोया था। मैं उस स्थान पर जरूर रोने लगा। मेरी आत्मा मुझे रुलाने लगी और कहने लगी जो मरने वाले नहीं थे, अमृत जिनके पास था, उनकी समाधि क्यों है? भगवान मृत्यु और बीमारी से बचना चाहते तो अमृत पी लेते, पर वे बूढ़े भी हुए, बीमार भी हुए और मरे भी। हम बुद्ध को अवतार मानते हैं उनके भी जीवन में यह हुआ। अगर ऐसा अमृत होता, जो मरने से बचाता है, तो भगवान कृष्ण और बुद्ध को उसे अवश्य पीना चाहिए था।
मित्रो! इस लोक में वह अमृत नहीं है, किन्तु इस लोक में एक अमृत है उसका नाम है— अ....मृत। जो मरे नहीं। आप जानते हैं मृत्यु के नाम से घबराहट दौड़ जाती है। बुढ़िया से भी अगर मरने का नाम ले लें तो वह भी सिर फोड़ने में आ जाती है। मरने का डर मानव जीवन से निकल जाये तो मानव अजर-अमर हो जाता है। सभी सांसारिक बातों का आधार मानसिक चिन्तायें होती हैं। मृत्यु के भय को जो कुचल देता है, उसे अमृत कहते हैं। कल मैंने दूसरा चोला पहन रखा था, आज दूसरा पहन रखा है। कल वाला गन्दा था उसे हटाकर नया पहना है। इसको पहनने में तो खुशी होती है। जो तत्व ज्ञानी है वह शरीर के लिए भी यही सोचता है और यही तत्व अमृत होता है। हम बूढ़े हो गये, हम क्या करें? हाथ-पैर कांप रहे हैं तो भी मृत्यु का नाम नहीं सुहाता। एक वे स्वतन्त्रता आन्दोलन के क्रान्तिकारी पं. राम प्रसाद बिस्मिल थे, जो फांसी लगने के समय तक भी दण्ड–बैठक लगा रहे थे। जेलर ने कहा—मूर्ख यह क्या कर रहे हो? आज तो आराम कर लेते। तो वे बोले—‘‘मूर्ख मैं नहीं तुम हो, अरे बेवकूफ क्या में मर सकता हूं? मैं कभी नहीं मर सकता। आत्मा हूं, बदल डालूंगा फौरन चोला। क्या करेगी अगर जो मेरी कजा आयेगी। एक शरीर छोड़ कर दूसरा धारण कर लूंगा। क्या इसके लिए मैं अपनी नियमितता बदल लूं? मैं क्या संस्कार बदलने वाला हूं? मैं कभी नहीं बदल सकता।’’ मित्रो! मौत का डर बहुत बड़ा होता है, पर जो अमृत पी लेता है, उसका भय निकल जाता है। जो मौत का भय निकाल दे उसको अमृत कहते हैं और इसी अमृत का स्वरूप है—गायत्री।
गायत्री का चौथा नाम है—पारस। पारस उस पत्थर को कहते हैं जिसके छूने से लोहा भी सोना हो जाता है। मैंने कभी लोहे को सोना बनाने वाला पारस नहीं देखा। अगर ऐसा पत्थर होता तो लोहा दो सौ रुपये तोला बिकता और सोना रुपये का सवा सेर बिकता। इस प्रकार लोहे की बनी वस्तुयें अमूल्य होतीं और सोने की वस्तुयें सस्ती। मैंने सुना है कि पारस चन्दनगिरी पर्वत पर होता है। अगर पता लगेगा तो मैं बताऊंगा। अभी तो मैंने एक पारस को देखा है, जिसने घटिया किस्म के कपटी-लफंगे मानवों को भी सोना बना दिया।
आज से सौ वर्ष पहले एक सिपाही था जिसको बदमाशी करने पर नौकरी से हटा दिया गया और उसकी ड्रैस भी छीन ली गयी। वह नंगा होकर मथुरा आ गया। उसने एक गुफा बना ली। वह दिन में तो अन्दर रहता और रात में बाहर निकलता। कोई देता तो खा लेता, नहीं तो भूखा ही वापस चला जाता। वह कम पढ़ा आदमी गायत्री का मंत्र जपने लगा। अभी जो टीला गायत्री टीले के नाम से विख्यात है, यह उसका स्थान था। वह हरी पत्ती तोड़ लाता और दुःखी को वह पत्ती दे देता। सभी दुःखों के निवारण के लिए आशीर्वाद के रूप में वही पत्ती देता। देखते-देखते वह बूटी सिद्ध के रूप में प्रसिद्ध हो गया। कौन सिद्ध हो गया? वह पांच रुपये महीने वाला सिपाही।
एक बार मथुरा के चौबों ने कहा—लोगों को पत्तियां खिलाते हो, कभी तो हमें भी ब्रह्मभोज करवाओ, भगवान का प्रसाद दो। महाराज ने चौबों को दावत देना आरम्भ कर लिया और पूरे इलाके में यह प्रचार हो गया कि महात्मा जी चौबों को भगवान का प्रसाद देंगे। लोगों ने सोचा जिस महात्मा के पत्ती देने से दुःख दूर हो जाते हैं तो प्रसाद से न मालूम कितना लाभ होगा। दावत के दिन आस-पास के गांवों से भी लोग आने लगे। गांव के गांव आने लगे। एक माह तक निरन्तर भोजन होता रहा। लोग भोजन करते रहे। क्या वह दानियों के बलबूते पर भोजन करा सकता था। पर वह लोह जैसा मानव गायत्री के जप से सोने जैसा सिद्ध हो गया।
गायत्री का पांचवां नाम—ब्रह्मास्त्र है। ब्रह्मास्त्र वह होता है जिसकी चोट कोई भी बरदाश्त नहीं कर सकता। ब्रह्मास्त्र वाम मार्गी प्रयोग तन्त्र है। इस प्रयोग से दधीचि की हड्डियों से बने वज्र से वृत्रासुर मरा था। वज्र उस ऋषि की हड्डियों से बना हुआ था जिसकी नस-नस में गायत्री मंत्र समाया हुआ था। इसलिए मित्रो! गायत्री के पांच मुख हैं, पांच रूप हैं और पांच नाम हैं। ये सभी अलंकारिक रूप से गायत्री के गुणों का ही दिग्दर्शन करते हैं।
मैं यह सब गायत्री की महत्ता नहीं बता रहा हूं, प्रयोग बता रहा हूं। मैंने तीन प्रयोग बताये बताये हैं—पूजा, कर्मकाण्ड और भावना। ध्यान की बात भी बतायी। उपासना के विधान ही पर्याप्त नहीं हैं। बीज और जमीन का उदाहरण आप भूलिए मत। मैं आज रहस्योद्घाटन करता हूं कि मंत्र बड़े उपयोगी हैं। उनका लाभ देखने के लिए व्यक्तित्व परिष्कृत एवं उज्ज्वल बनाना पड़ता है। सत्य, दया और करुणा का समावेश करना पड़ता है। देवताओं को अन्न नहीं खिलाया जाता है, कर्म खिलाया जाता है। सन्त उदार हो जाता है। आपके घर में बूढ़ी मातायें जो अच्छी चीज घर में आती हैं, उसे स्वयं न खाकर बच्चों को खिलाती हैं। उदार पुरुष यही करता है, मैं क्या करूंगा, मैं तो खाने वाले को देखकर ही खुश हो जाऊंगा। उदारता का समावेश होते ही जीवन में भगवान की आधी किरणें तो आना शुरू हो जाती हैं। ये बताये गये प्रयोग बड़े मूल्यवान हैं। अगर इनका ध्यान नहीं रखा तो सब चौपट हो जायेगा। मंत्र के विधि-विधान के बिना भी अगर भावना और ध्यान मिला दिया जाता है तो उपासना वैसे ही सफल हो जाती है, जैसे महर्षि वाल्मीकि को मिली। आप उपासना, साधना में भावना का समावेश कीजिये और उसी साधना का जीवन में समावेश कीजिये, मेरा विश्वास है कि आपका जीवन भी उसी प्रकार परिष्कृत होता चला जायेगा जैसे मेरा हुआ है।
मेरे जीवन की अजीब एक घटना है, मेरे पिताजी महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी के घनिष्ठ मित्रों में से थे और उनके द्वारा ही मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। एक साल बाद में गायत्री जप करने लगा। सोलह वर्ष की अवस्था में एक ऐसी घटना देखी कि काया तृप्त हो गयी। पूजा की कोठरी में गायत्री जप कर रहा था। मेरे पास दीपक जल रहा था। उसका प्रकाश सम्पूर्ण कोठरी में विद्यमान था कि अचानक मुझे दीपक की ज्योति में एक नंग-धड़ंग साधु दिखाई दिया। मेरे पसीने छूट गये। मैं हड़बड़ा गया और घबराहट से आक्रान्त हो गया। मैंने अपनी पलकों को पलट-पलट कर देखा, पर वह मुझे भूत-पलीत जैसा लग रहा था।
मैं घबराने लगा। मैं भागना चाहता था, चिल्लाना चाहता था, पर भय ने उन सबको दबोच लिया। मेरी बोलने की हिम्मत नहीं थी। तभी उस मानव ने कहा—डरो मत! हम तुम्हारे गुरु हैं तुम्हें प्रकाश देंगे। मैंने मन ही मन सोचा यह कैसा गुरु है, जो बिना बुलाये आ गया और डराये जा रहा है। उसने फिर कहा—डरो मत, हम तुम्हें प्रकाश देंगे। बेटा! जरा तुम अपनी आंखें बन्द कर लो। मैंने आंखें बन्द कर लीं और बन्द करते ही मेरे जीवन की फिल्म शुरू हो गयी। मैंने पहला जन्म देखा, दूसरा जन्म देखा, तीसरा जन्म देखा, सभी जन्मों में वह मेरा गुरु मिला। मुझे आत्म शान्ति हुई। संतोष हो गया और आंखें खोलीं, साष्टांग प्रणाम किया। वे बोले—हम तुम्हें बढ़ाना चाहते हैं, तो मैंने कहा—यह बड़े सौभाग्य की बात है। वे बोले—जो ऊंचा उठना चाहता है, उसे तपाया जाता है। गर्म होने या तप करने का अर्थ यह है कि कष्टमय जीवन में सहिष्णुता का समावेश करना पड़ेगा। तप के बिना मानव पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। तो मैंने कहा—गुरुजी जैसी आपकी इच्छा मैं तपने के लिए तैयार हूं।
उनके बताये हुए आदेश से चौबीस लक्ष के चौबीस पुरश्चरण किये। चौबीस लक्ष का गायत्री पुरश्चरण छः घंटे प्रतिदिन के हिसाब से एक वर्ष में पूरा हो जाता है। गाय को जौ खिलाकर गोबर में जो जौ निकलते थे, उनको पीस कर रोटी बनाता था। वह रोटी और गाय का छाछ खाता रहा। चौबीस वर्ष बीत गये। मैं चालीस वर्ष का हो गया। यह है मेरा जीवनक्रम। मित्रो! आपको इसलिए सुनाता हूं कि वर्तमान में जो कुछ है, वह मेरा नहीं हैं, सभी कुछ गुरु का है। उनके अनुभव से हमें भी आनन्द आया है। धैर्यपूर्वक उपासना की बात सोचता रहा और इतनी बड़ी उपासना में केवल निष्ठा बनी रही इसके अतिरिक्त और कोई लाभ दिखाई नहीं दिया और न ही अनुभव हुआ। जब यह साधना पूरी हो गयी तो मेरे गुरु ने कहा—तुम कुछ चमत्कार चाहते हो? तो मैंने कहा—आपको दिखाना है तो दिखाइये। पर ऐसा नहीं कि जुआरी आकर मुझसे नंबर पूछने के लिए पीछे पड़ते रहें। तो वे बोले—हम तुम्हें ऐसा चमत्कार दिखाना चाहते हैं और यह बताना चाहते हैं कि तेरे को यह विश्वास हो जाय कि उपासना फलदायक है या नहीं। तेरा विश्वास ढीला न हो जाय इसलिए तुम्हें अपने जपों का शतांश हवन करना चाहिए और इसके लिए चौबीस करोड़ आहुतियों का हवन करना चाहिए। मैंने कहा—गुरुजी पचास लाख रुपया लगेगा और इतनी मेरी सामर्थ्य कहां? तो वे बोले—उपासना में सभी क्रिया-कलापों की सामर्थ्य रहती है, मैं यह सब कुछ कर दूंगा। तुम उसके लिए योजना बनाओ। मैंने कहा— गुरुदेव मैं सब कुछ कर दूंगा आपकी दया से, पर चन्दे के लिए किसी से नहीं कहूंगा। मैं ब्राह्मण हूं, पर मेरा स्वभाव पहाड़ से भी ऊंचा है। मैं सब करने के लिए तैयार हूं, पर किसी के सामने हाथ फैलाने के लिए नहीं। गुरुदेव मैं घमण्डी नहीं, पर अपने आपको भीख मांगने के लिए नहीं ले जा सकता। ये आपकी अच्छी-अच्छी बातें मुझे बहुत सुन्दर लगीं पर मैं चन्दा बही नहीं छपा सकता।
वे बोले—तुम्हें कुछ नहीं करना पड़ेगा। तुम्हें इस प्रकार यह तपोभूमि बनानी है और इस प्रकार यही करना है। मैं बोला—आपके प्लान से तीन माह में मंदिर बनाकर रखने के लिए ढाई लाख रुपया चाहिए और आपने बसन्त पंचमी का मुहूर्त बता दिया और मेरे पास इस समय ढाई सौ रुपये भी नहीं हैं, तो वे बोले—वत्स! भगवान के पल्ले में सब कुछ है, उसको कोई कठिनाई नहीं होती। माता जी एक छटांक घी में 50 व्यक्तियों को जिमा देती हैं। हम तीस रुपये के मकान में रहते हैं, हम गरीबों की तरह रहते हैं, पर कंगाल नहीं हैं। हमने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान में दे दी है। अभी गांव में अस्सी बीघा जमीन थी उसको भी अस्सी हजार में बेचकर मेरी माताजी के नाम से स्कूल बनवा दिया है। क्या मुझे धन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी?
हमारे मार्गदर्शक ने समझाया—कहा— ‘‘तुमने अपने साधन, सम्पत्ति, विद्या, बुद्धि को भावनापूर्वक भगवान के लिए लगाया है। यह खेत में बोने जैसा है। भगवान के खेत में बोया हुआ अनेक गुना होता है। तुम संकल्पपूर्वक आगे बढ़ो।’’
हमने कहा माना और दुनियां ने चमत्कार देखे। हमारे व्यक्तित्व में जो कुछ भी अनुपम-असाधारण दिखाई देता है—वह सब गायत्री महाशक्ति के अनुदानों का ही प्रमाण है। जो साधना हमारे लिए फलित हुई है, वह आप सब के लिए भी फलित होगी। जैसा सौभाग्य हमें मिला, वैसा ही आप सब को भी प्राप्त हो, ऐसी हमारी हार्दिक प्रार्थना मातेश्वरि से है।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

