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Books - गायत्री महामंत्र की व्यावहारिक साधना

Media: TEXT
Language: HINDI
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बहुत बड़े हैं आप और आपके भगवान

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(30 मई 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में प्रातःकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
कल मैंने एक महत्वपूर्ण बात बतायी थी कि दुनियां चलकर हिमालय पर जाया करती थी, पर चाल रुक गयी, हमारे पांवों की गति उलटी हो गयी। सड़क ज्यों की त्यों है, रास्ता वही है, पर हमारे चलने का ढंग उल्टा हो गया।
भारत का इतिहास महान था। दुनियां भर की सभ्यताओं, संस्कृतियों ने यहां से प्रेरणा और शिक्षा ली। तक्षशिला विश्व विद्यालय में छह वर्ष तक ईसा मसीह अध्ययन करके यरुशलम चले गये और वहां उन्होंने ईसाई सभ्यता का उद्गम किया। सभी संस्कृतियों का उद्गम भारतवर्ष में रहा। जहां मनुष्य के पास विचार हैं वहां शान्ति और वैभव की कमी कहां? इस देश की एक ही समझने की शक्ति थी और वह थी मनुष्य की अन्तःस्थल की चेतना। जब इस चेतना का उद्गम हो जाता है तो मानव भगवान हो जाता है। एटम छोटा-सा होता है, जो देखा नहीं जा सकता, पर वह कितना शक्ति प्रद होता है। बड़े-बड़े पहाड़ों के वह एक सेकेंड में टुकड़े-टुकड़े कर डालता है। मानव जिसके अन्तरंग में भगवान की महत्ता चेतना के रूप में समाई होती है, वह जब जागृत हो जाती है तो वह भगवान हो जाता है। मनुष्य का निर्माता स्वयं होता है। भगवान कृष्ण और राम के स्वरूप को देखिये—वे मानव के रूप के अतिरिक्त जानवर के रूप तो नहीं। डार्विन की थ्योरी के अनुसार मानव जंगलीपन से इस स्वरूप में आया। अगर यह सिद्धान्त सही मान लिया जाय तो मत्स्य अवतार, वाराह अवतार, नृसिंह अवतार के स्वरूप के पश्चात मानव रूप में भगवान ने अवतार लिया। जैसा मानव का रूप होता गया, वैसा भगवान होता रहा। मनुष्य बहुत बड़ा है और उसका अध्यात्म भी बहुत बड़ा है। वैसे यह दोनों ऊपरी तौर पर कुछ नहीं। लेकिन पर्दा उठाने की देर है, पर्दा उठते ही सही स्वरूप सामने आ जायेगा। भगवान ने हमें यह मानव रूप दिया, सभी कार्य करने की प्रणालियों से हमें युक्त किया, पर हमने अपनी भावना से यह कभी नहीं समझा कि भगवान हमारा निर्माण कर्त्ता है।
आध्यात्मिक भावनायें अर्वाचीन काल में परम वांछनीय हैं। आज मैं भौतिकता का अध्यात्म समझना चाहता हूं। हमारा ध्येय केवल भौतिक शान्ति की उपलब्धि है। स्वर्ग की भावना भी केवल भौतिक सुख की कल्पना मात्र है। आज देश, समाज और मानव भ्रान्तियों में उलझा पड़ा है। आज का समाज भ्रान्तिपूर्ण जीवन से जकड़ा जा चुका है। ईश्वर की प्रार्थना से लेकर अध्यात्मिकता तक सब कुछ भ्रम में जकड़े पड़े हैं। यह पुराने अध्यात्म का मकान टूट चुका है। अब नया मकान बनाना पड़ेगा। मैं टूटे-फूटे पत्थरों को हटाकर आध्यात्मिक जीवन का नया किला बनाना चाहता हूं।
आज भजन करने का उद्देश्य यह है कि सांसारिक चीजें हमें बिना पुरुषार्थ के प्राप्त हो जायें। अगर हनुमान चालीसा पढ़ने से ही पास हो जायें तो फिर स्कूल आदि की आवश्यकता ही क्या है? चार पैसे का सिन्दूर हनुमान जी पर चुपड़कर पांच-दस परिक्रमा करके पास होने की कामना की जा सकती है। अगर ऐसा सम्भव हो तो कितने ही रुपयों के खर्च, किताबों और अन्य वस्तुओं की बचत होगी। आज के समाज के अध्यात्मवाद की यही परिभाषा है, जो पुरुषार्थ और योग्यता को समाप्त करती है। यह मान्यता गन्दी मान्यता है। अपनी छाती पर हाथ रखकर सोचिये कि क्या अध्यात्म की सच्ची परिभाषा यही है? कल मैंने एक छोटा-सा कटु सत्य सुनाया था, कि आपने भगवान को एक छोटा-सा बालक समझ रखा है। बालक जैसा हम कहते हैं वैसा करता है। ठीक उसी प्रकार भगवान से भी यही आकांक्षा करते हैं। दो आने के प्रसाद और थोड़े से खुशामदी शब्दों से उसे प्राप्त कर जीवन में अनेक रुके कार्यों में सफलता चाहते हैं। अरे भले मानुसो! भगवान इतना ना समझ नहीं है, जो उसे फुसलाकर अपना बना सकते हो और वह इतना मूर्ख भी नहीं है कि दो आने के बताशे से वह खुश हो जाये। आप उसे किशमिश खिलाते हैं, माला फेरते हैं और उम्मीद करते हैं मुकदमा जीत लेने की। ऐसा छोटा खयाल हर आदमी का भगवान के प्रति बन चुका है। भगवान के बारे में दीपक, नैवेद्य, दक्षिणा, खुशामद के दो शब्द कह कर मनोकामना पूर्ण करना ही जैसे सबका उद्देश्य रह गया है। सारे समाज में यह गन्दा फूहड़ आध्यात्मिक प्रचलन है। यह आध्यात्मिकता नहीं आध्यात्मिकता का फूहड़ मजाक है। अगर आपको आध्यात्मिकता का ज्ञान चाहिए तो इन्हें छोड़ना पड़ेगा।
एक जमाना था जब अध्यात्मिकता के लिए कीमत चुकानी पड़ती थी। आज हम बिना मन के काम करते हैं। बिना मन के स्नान, पूजा, गंगास्नान आदि करते हैं। सब में अविश्वास रहता है। अगर यह अविश्वास नहीं छोड़ा गया तो मेरी भविष्यवाणी है कि नास्तिकता आयेगी और उसका दोष किसी नास्तिक को नहीं होगा बल्कि इस गले-सड़े अध्यात्म को होगा। दुनियां सब वस्तुओं का प्रकाश मांगती है। भांग खाने पर नशा आता है तो आध्यात्मिकता का भी मजा आना चाहिए। पर आपको पूरी शिकायत है कि पांच साल के जप से हम सन्तुष्ट नहीं हैं, हमने जो महत्ता बताई थी कि राम का नाम उल्टा लेने से वाल्मीकि ने प्रकाश प्राप्त कर लिया था, पर हमारे यहां कुछ नहीं हुआ। इसका एक मात्र कारण मित्रो यह है कि आपके विचार करने का और चलने का तरीका उल्टा है।
मैंने कल अध्यात्मिकता का रूप बताया था कि सबसे पहले भगवान की कीमत समझें, हम आजकल मिनिस्टर, कलक्टर की कीमत समझते हैं, पर भगवान की नहीं। हम अफसरों की खुशामद करते हैं। अगर हमें यह अनुभव हो जाय कि भगवान इन सबसे बड़ा है तो हमारी जिन्दगी ही और हो जाती। आपका दृष्टिकोण यदि सही होता तो आप केवल यह नहीं कहते कि हमें ये हो रहा है, हम इस चीज से दुःखी हैं, हमें बहुत परेशानियां हैं। क्या कभी आपने सोचा कि हमें अमुक सुख है, हम सौभाग्यशाली हैं। आपको अपनी औकात मालूम नहीं कि हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी? आपने इस विषय में कभी विचार नहीं किया। अगर विचार करते तो आपको मालूम होता कि चौरासी लाख योनियों को जो नहीं मिलता वह आपको मिला हुआ है। अगर आपको कोई दुःख दर्द होता है तो लोग सहानुभूति प्रकट करते हैं। आपने इस सहानुभूति पूर्ण जीवन का कभी विचार नहीं किया, आपको मिली सुविधाओं का कभी ध्यान किया आपने? आप केवल निगेटिव व्यक्ति बने रहे, केवल असुविधाओं का विचार किया, खुशियों की ओर कभी नहीं सोचा। केवल दुःख की भावनायें करते रहे। आप अपनी आत्मीयता का विचार नहीं करते और यह नहीं सोचते कि मेरे में क्या खुशहाली है। आपने पाजेटिव बनने का कभी प्रयास नहीं किया। निगेटिव के विचार ने आपको कष्ट और दुःख के अन्दर घसीट दिया। अध्यात्म आपको अपनी महत्ता का स्वरूप दिखाने का तरीका बतलाता है और मैं इसी विषय को आगे समझाता हुआ चला जा रहा हूं, पर सर्वप्रथम आपकी मान्यतायें अध्यात्मिकता के मामले में सही होनी चाहिए। मेरे सिर्फ तीन वर्ष शेष रह गये हैं। न मालूम कहां जाना होगा? मेरा एक एक क्षण कीमती है। आपके क्षण भी कीमती हैं। मुझे भी मेरे शेष जीवन में जितनी कल्पनायें हैं वह आप कभी भी सोच नहीं सकते। आज साम्यवाद कितनी तेजी से बढ़ रहा है। केवल पचास वर्षों में यह दुनियां के आधे देशों में घूम चुका है। मुझे साम्यवाद से नफरत नहीं, यह आर्थिक दृष्टिकोण से ठीक है, पर इससे मानव मात्र की आशायें उखड़ जायेंगी। यह केवल नेचर (प्रकृति सही है) का सिद्धान्त मानता है और प्रत्येक को उसी पर चलने की प्रेरणा देता है। साम्यवाद फिलॉसफी के इस ज्ञान से मैं बहुत डरता हूं। इसकी जब कल्पनाएं आती हैं, तो मन थर्रा जाता है। अभी एक पारसी सज्जन थे, साम्यवाद को मानते हैं। इस विचारधारा के विद्वान हैं। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी से सादी की है। जब उनसे पूछा गया तो कहा—कि नेचर का यही तकाजा है। जब बन्दर अपनी लड़की से शादी कर सकता है, कुत्ता अपनी लड़की से शादी कर सकता है, तो इन्सान अपनी लड़की से शादी क्यों नहीं कर सकता? यह एक साम्यवादी विद्वान के विचार हैं, मान लीजिये कि यह विचार हमारे बुद्धिवादी जीवन में ढल जायें तो हमारे वे सिद्धान्त कहां चले जायेंगे, जिसमें हमने मां-बाप, भाई-बहन, पत्नी-पुत्र का सिद्धान्त बनाया है और एक सुन्दर व्यवस्था बनायी। हमारा समाज छिन्न-भिन्न हो जायेगा। बड़ा छोटे को खा जायेगा। साधन सम्पन्न गरीब को तबाह कर देंगे। साम्यवाद की यह (नेचर) प्रणाली दुनियां को खाये जा रही है, मुझे इससे बहुत भय है। मेरे जीवन के तीन वर्ष शेष हैं और मुझे इस नेचर विचारधारा के स्वरूप को पकड़कर इसे मरोड़ने का प्रस्तावित बुद्धिवाद और वैज्ञानिकता के आधार पर प्रयत्न करना चाहिए, पर मैं यहां शिविर लगा रहा हूं। मित्रो! मैं अपने हृदय में जल रही यह आग आपके हृदय में लगाना चाहता हूं। मैं आध्यात्मिकता के विचार आपके मन में भरना चाहता हूं। पर आप वर्तमान में जैसे चल रहे हैं वैसे ही चलते रहे तो यह आस्तिकता नास्तिकता से भी बुरी है।
आस्तिकता के विचार करने के तरीके अलग होते हैं लेकिन आज वर्ग समूह नास्तिकता के अवांछनीय तरीकों का समावेश करके आस्तिकता की खाल ओढ़ कर नास्तिकता की आवाज में बोलता है। क्या ऐसी आस्था मनुष्य को प्राचीन काल की परम्परा में पुनः स्थापित कर सकेगी? नहीं मित्रो नहीं! अतः मित्रो! मैं इस आध्यात्मिक शिविर में आस्तिकता सिखाना चाहता हूं। प्रेरणा देकर आपको बुलाता हूं, स्वीकृति की बातें बाहर से करता हूं। मैं बहुत गम्भीर हूं, संजीदा हूं, जो कुछ मैंने पाया है वह आपको सिखाना चाहता हूं। लोग कहेंगे आचार्य जी चले गये अब गायत्री का कोई फल नहीं। उन्होंने बड़ा काम किया था, अतः फल प्राप्त होता था, अब उनकी अनुपस्थिति में गायत्री के फल कहां? पर आपको कुछ मिलने वाला नहीं। आपने किराया भी खर्च किया, व्याख्यान भी सुन डाले, पर आपको कुछ नहीं मिला तो आप लोग कहेंगे कि महात्मा लोग बताते नहीं। उन्होंने वास्तविकता को तो छुपा ही लिया। मैं आपकी यह शिकायत सुनना नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि आपको यह अवसर प्राप्त हो। अध्यात्म नगद धर्म है, उधार नहीं है। जीवन और परलोक के बीच में केवल सूत जैसी दीवार है। केवल आधे घण्टे में मृत्यु हो जाती है। तो आप अभी-अभी तो परेशान थे, पर आधे घण्टे बाद ही स्वर्ग कैसे चले गये? अगर मान लो स्वर्ग चले भी गये तो उसे चापलूसी से नरक बना देंगे। वहां जाते ही इन्द्र से कहेंगे, इन्द्र! अमुक तुम्हारे लिए गलत बात कहता था और अमुक को इन्द्र के प्रति कहकर वहां भी झगड़ा-फसाद मचा देंगे। अगर हमारे जैसे निकृष्ट लोग स्वर्ग में भी चले जायेंगे तो वहां नरक के अतिरिक्त और कुछ भी बाकी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए मैं निरन्तर प्रयास कर रहा था कि आप अपने सोचने का तरीका बदलें। भगवान की कृपा का तरीका अवगत करने के लिए उज्ज्वल कामना करनी पड़ती है। उज्ज्वल केवल वही हो सकते हैं, जिनका मन उदार और चरित्र उज्ज्वल होता है। जिनमें ऐसे गुण नहीं होते वह भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते। अगर आप यह मान्यतायें स्वीकार नहीं करे तो केवल नाम जपने से कुछ नहीं होगा। मेरा मस्तिष्क कुछ और सोचता है और आपका कुछ और। आप बीज मंत्र पूछना चाहते हैं और मैं दुर्गुण छोड़ने की बात बतलाता हूं। तो महर्षि रहीम की इस उक्ति के अनुसार कैसे साथ निभेगा—
कह रहीम कैसे निभे, बेर-केर को संग।
इसलिए अगर आप मेरी बात सुनना चाहते हैं तो आपको मेरे विचारों के सामान अपने विचार करने पड़ेंगे।
मैं कल आपको बता रहा था कि भगवान की साधना से लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती। अगर आप कहेंगे कि होती हैं तो अमेरिका जो कि दुनियां का सबसे अमीर मुल्क है। क्या केवल श्रीसूक्त का पाठ करता है? क्या उसने सूक्तों के पाठन से भौतिकता को प्राप्त किया है? पुरुषार्थ के जागृत करने से ही सांसारिक जगत में सुख, सुविधा और सफलता प्राप्त होती है। आपकी वाणी में विश्वास, विद्या सभी गुण हो सकते हैं किन्तु तब जब आपने अपना विचार बदल लिया हो। भगवान आपको जो अमूल्य वस्तु देता है, वह सांसारिक नहीं होती, वह होती है—आत्म शान्ति। आत्म शान्ति बहुत बड़ी होती है। मान लो आपने पुत्र जन्म की लालसा की और पुत्र जन्म हो गया और सुख की कल्पना वहीं खत्म हो गई। बड़ा होकर पुत्र बदमाश निकल आये तो दुःख की कल्पना आ जाती है। छोटी भूलों का छोटा ही परिणाम होता है। जिसको आत्म शान्ति मिलती है वह महान होता है। महर्षि चाणक्य ने आत्म शान्ति और संतोष का पाठ पढ़ाया था दुनियां को। वह नालन्दा विश्वविद्यालय का डीन था और इस इतने बड़े हिन्दुस्तान का प्रधान मंत्री। प्रधानमन्त्री का मतलब कोई आजकल का प्रधानमन्त्री नहीं। ढाई हजार साल पहले हमारा भारत राष्ट्र आज से दो गुने बड़े क्षेत्र में फैला था। उस दो गुने बड़े और शक्तिशाली भारतवर्ष का प्रधानमंत्री था—चाणक्य। चाणक्य का ज्ञान पं. जवाहर लाल नेहरू से भी बड़ा था। वह बहुत बड़ा विद्वान था। उसने कहा—अगर मैं सुविधा पूर्वक जीवन यापन करूंगा तो लोग कहेंगे कि यह अनुचित लाभ उठाता है, पर आप सोचते हैं कि सुविधा पाये बिना आदमी बड़ा नहीं हो सकता, पर वह प्रधानमन्त्री चाणक्य तीन मील पैदल चला करता था और बाद में राज्य दरबार पहुंचा करता था। वह उसी झोंपड़ी में रहता था जिसमें पहले रहता था। वह गरीबी को ही सब कुछ मानता था। गरीबी की आत्मा में ही शान्ति प्रकट हो सकती है। ऐसा उसका विश्वास था। कई लोग अन्न, धन और वस्त्र के बिना भी कन्द मूल फल खाकर और मिट्टी का लेप करके सुखी रहते हैं। दूसरे लोग, कोट, पेन्ट, नेक टाई पहिन कर भी शान्ति प्रदान नहीं कर सकते। आन्तरिक सुख सुविधायें भौतिक साधनों में नहीं रखी हुई हैं। उन ऋषियों ने शान्ति का दर्शन बताया था। मित्रो! मैं भी शान्ति का दर्शन बताना चाहता हूं और मेरा नया दर्शन और अन्य ऋषियों का प्राचीन दर्शन एक ही है। बीच के युग का अध्यात्म भूले भटकों का अध्यात्म है। नया और पुराना अध्यात्म एक ही था। आपने मध्य युग में मांगना सीखा है। अरे मांगते क्यों नहीं, जाओ हनुमान जी के पास और कह डालों प्रशंसा के दो शब्द, आपका अभीष्ट पूरा हो जायेगा। चले जाओ किसी ज्योतिषी के पास और पूछ डालो अमुक चीज मेरे भाग्य मैं है या नहीं। सभी से मांगना सीखा है। सांई बाबा के पास गये तो मांगने के सिवाय और कुछ नहीं। आपने केवल यही अध्यात्म जाना है और यह अध्यात्म भिखारियों का अध्यात्म है। पंडित से लेकर साधारण व्यक्ति तक भिखारी बने हुए हैं। जो देता है वह देव होता है और जो लेता है वह लेव होता है। यही परम्परा चालू है। हम भगवान के पास जाते हैं और कहते हैं भगवान हमारे लिए क्या लाये? और भगवान कहते हैं कि तुम मेरे लिए क्या लाये हो? जो देकर आता है वह लेकर आता है पर न तो आप ही माने और न भगवान। आप कहते हैं गुरुजी कुछ तो दिला दो भगवान से, पर भगवान न माना और वह कहता है कि पहले भक्त से कुछ दिला, तो यह समझौता हो नहीं सकता। मैं आपसे कहता हूं कि जरा समाज सेवा किया कीजिये और आप कहते हैं यह समाज सेवा क्या होती है? और कहते हैं आधे घण्टे का समय हमारे पास कहां? बेटे पोते खिलाने के लिए समय है, पर समाज सेवा के लिए समय नहीं। आपने जीवन भर कमाया और बेटे-पोतों को दिया और मान लो आज आपने संन्यास धारण कर लिया और किसी ने पूछा कि अब क्या करोगे तो आपका उत्तर होगा भीख मांगूंगा। भीख से जो कुछ बचेगा उसको भी बेटे-पोतों के यहां भेजूंगा। आपने सब कुछ बेटे-पोतों को दिया, स्कूल, समाजिक संस्था, सामाजिक कार्य में अभी कुछ नहीं दिया। इस तरह का बेईमान, चालाक और दुष्ट अध्यात्म इस समय है। अब मैं क्या करूं, कोई समझौता भी नहीं हो सकता।
ऐसी विषम परिस्थितियों में दो टूक बातें करने को यह शिविर बुलाया था। मैंने आपको बता दूं कि भजन करने से सब कुछ हो सकता है। आप कहेंगे कि कुछ नहीं होता, तो मैं कहता हूं कि चले जाइये और सारी उम्र ताश खेलिए। अगर आप अपने ख्वाबों की पूर्ति करना चाहते हैं तो चरित्र एवं पुरुषार्थ को बढ़ाना होगा। जिस दिन आप केवल भगवान पर आश्रित हो जायेंगे उसी दिन आपकी प्रगति रुक जायेगी। आश्रय का फैसला होते ही आपकी गति उल्टी हो जायेगी। जिसको अपनी भुजाओं पर विश्वास नहीं होता, वह कुछ नहीं कर सकता। आपने ईश्वर को समझा कहां है? आपने उसे खिलौना समझा है। अगर समझते तो आपके सोचने का तरीका ही और होता। आपका व्यवहार प्रेममय होता, पर वर्तमान का तरीका अध्यात्मवाद का नहीं है। आप रोने वाले, शिकायत करने वाले इन्सान हैं और अपने इसी क्रम में अपना मानसिक सन्तुलन बिगाड़ते चले जा रहे हैं। अगर आपको आगे बढ़ना है तो आपको सही स्थितियों का दिग्दर्शन करना पड़ेगा।
मित्रो! मैं आपके उत्साह को मन्द नहीं करना चाहता बल्कि सौ गुना बढ़ाना चाहता हूं। मेरा उत्साह बहुत है। मैं जानता हूं कि हीरे की अंगूठी 500 रुपये में आती है, इसलिए मैं आस्थाओं से भाग जाने वाली बात नहीं करता, आपके पास आस्था थी कहां? अगर होती तो ईश्वर पर विश्वास रखने वाले क्या कभी विश्वासघाती, निष्ठुर हुआ करते हैं। अगर मध्य युग की आस्थाओं को मिटाने का दोष मेरे ऊपर लगाया गया तो मैं कहूंगा की यही अध्यात्म है। मैं पूछता हूं कि क्या भगवान कभी पेटी में बन्द करके रखा जा सकता है? अरे हींग होती है आपके पास और वह खुशबू देती है दूर-दूर तक कि अमुक व्यक्ति के पास हींग है। अफीम पकड़ने वाले केवल सुगन्ध से ही तो अफीम पकड़ लेते हैं। अध्यात्म की गन्ध होती है। जब समय आता है तो चारों ओर फैल जाती है। एक-एक कण घरों में प्रवेश कर वातावरण में शान्ति उत्पन्न कर देता है। एक-दूसरे के सभी व्यक्ति प्रशंसक बन जाते हैं। उनके विचार और शैली को देखकर अन्य भी धन्य हो जाते हैं। मनुष्य का सद्व्यवहार बहुत बड़ा होता है। अध्यात्म की व्यवस्था का स्वर्ग आपके घरों में मिलता रहता है, पर आपने इस शरीर को भगवान का मन्दिर समझा ही कहां है? आपने इसे चाय, कचौड़ी, पकौड़ी, भांग, गांजा, चरस, शराब न मालूम क्या-क्या खिलाकर होटल बना दिया है। जिस प्रकार मोटरों अव्वल होती है, उसी प्रकार चौरासी लाख योनियों की मोटर में से ड्यूक की मोटर-मानव शरीर को अंट-शंट चलाकर बरबाद कर दिया है। आपने इन्द्रियों को कहां रोका? उन पर नियन्त्रण करते तो शरीर का मजा आ जाता। अनियंत्रित खान-पान से आपने अपने पेट को घायल कर लिया। गर्दन दबोचा हुआ यह आमाशय कराह रहा है कि आप यह ऊलजलूल पदार्थ खिलाकर मेरी हत्या करते हैं। जो जीभ के स्वादु होते हैं वे अपना जीवन बरबाद कर लेते हैं। आपकी बॉडी का वर्ण गुलाब की पंखुड़ी की तरह चमक रहा था, पर आपने उसे गन्दी नाली में बहा दिया। जब बुढ़ापा आता है तो आपको नीन्द नहीं आती और कहते हैं कि क्या मुसीबत हमारी जान को आ गयी? काश कि आपने सोचा होता कि इस गन्दे इन्द्रिय भोग से मानव शरीर को बचाना अच्छा है। आपने अपने शरीर की हत्या की है। आपने सिद्धान्तों की बातें की हैं, पर कभी उन पर चले क्या? आज तक सिद्धान्तों पर न चलने वाला व्यक्ति बड़ा व्यक्ति बना है क्या? आदर्श विहीन मानव शैतान हो जाता है। हम सिद्धान्तों की शेखी बघारते हैं, पर करते कुछ नहीं। एक-दूसरे को दोषी बताते हैं और इस प्रकार यह संपूर्ण समाज दोषी है। केवल प्रत्यारोपण की बात करते हैं। कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। भाई-भाई का गला काट रहा है। रामायण का परायण करते हैं, गीता पूरी कण्ठस्थ है, पर इससे क्या लाभ। आपने एक दिन भी गीता एवं रामायण के उद्देश्य समझे। कैसे लाभ हो आपको? रटने से कुछ नहीं होता। जीवन में कर्म करना चाहिए और कर्म ही लाभ प्राप्त कराने में समर्थ होते हैं।
अतः मित्रो! डेढ़ दिन में शिविर का कीमती समय संजीदा बनाने में खर्च कर दिया। यह एक-एक शब्द सही है। मैंने अध्यात्म की पूरी मंजिल तय की है। मेरे से अधिक भजन लोग करते हैं। मैं तो चार घण्टे भजन करता हूं, लोग बारह-बारह घंटे भजन करते हैं, पर वे खाली हाथ हैं। गृहस्थ धर्म से पहले बहुत समय भजन के लिए मिला करता था, पर अब वह भी नहीं मिलता। मैं जीवन की सभी बातें कहता हूं। भजन बड़ा कीमती होता है। भगवान बड़े शक्ति प्रद हैं, पर ये तब तक सार्थक नहीं हो सकते, जब तक भावनापूर्वक न हों। अच्छी जमीन में ही अच्छी वस्तुयें उगायी जा सकती हैं। राम नाम रूपी बीज कितना ही अच्छा क्यों न हो, पर यह तब तक काम नहीं करता जब तक यह जमीन गन्दी रहती है। बीज अच्छा खरीद लायें और पानी देने की व्यवस्था कर दी जाये पर जमीन गन्दी हो तो कैसे फल देगा वह बीज इस गन्दी जमीन में।
मैं थोड़ी जिन्दगी से भजन करता चला आ रहा हूं। मैं अध्यात्म को जीवन में उतारता रहा हूं। जीवन के दृष्टिकोण और आकांक्षाओं से सामाजिक जीवन में जितना जागरूक और सावधान रहा हूं उतना ही व्यक्तिगत जीवन में भी। मैंने भी आम का पेड़ उगाया है। बढ़िया खाद और बढ़िया जमीन में उसे लगाया है। उसने फल भी दिये हैं। आपने भी खायें हैं वह मीठे आम और मैंने भी खाये हैं पर लगातार खाने से यह आम एक दिन तो फल देना बन्द करेगा। इसीलिए मित्रो! मैं आपके द्वारा भी आम उगाना चाहता हूं, जिससे लगाने वाला और खाने वाला दोनों ही गौरवान्वित हो सकें। इसके लिए आपको विचारों का परिष्कार करना पड़ेगा। आप हमेशा बाहरी विचार ही तो करते रहते हैं। यह सिद्धान्त की बात नहीं है और सिद्धान्त यह है कि गन्ना उगाने के लिए अच्छी जमीन बनानी पड़ेगी। आप रूपी जमीन में मैं अध्यात्म रूपी गन्ना उगाना चाहता हूं। शर्त यह है कि आपकी मान्यता यह हो कि गन्ना मेहनत से उगाया जा सकता है। आपको यह तरीका भी जानना पड़ेगा कि जमीन में उगे गन्ने कैसे तोड़े जाते हैं। पर आप यह सोचते कहां हैं। आप तो मुफ्तखोर हैं। मेरे आम जब तक खाली नहीं होते हैं तब तक तोड़-तोड़कर खाते रहें, पर आखिर में तो अपने आप पर आश्रित होना ही पड़ेगा। मित्रो! गुरु का आशीर्वाद सर्वस्व नहीं, गुरु का मंत्र आशीर्वाद नहीं और यह सिद्धान्त नहीं। अगर आपको अध्यात्म का सही पठन करना है तो सर्वप्रथम अपनी पृष्ठभूमि को सही करना पड़ेगा। मैं पृष्ठभूमि सही करना चाहता हूं। जब आप पृष्ठभूमि में परिपक्व हो जायेंगे तो मैं फिर अध्यात्म (साधना) की विधि बताऊंगा। मैं चाहता हूं कि आप गम्भीरता से इस पृष्ठभूमि को समझकर अपने विचारों में प्रवेश करें। अगर आपकी पृष्ठभूमि सही हो गयी तो आप महान बन सकते हैं, ऋषि बन सकते हैं और सर्वस्व प्राप्त कर सकते हैं छोटे-छोटे कार्य करते हुए भी महान हो सकते हैं। अब आज का समय समाप्त हो रहा है। सायंकाल के व्याख्यान में गायत्री उपासना की विधि बता दूंगा। अतः अभी तो मेरे साथ शान्ति पाठ का उच्चारण करें।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥



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भारतीय संस्कृति एक जीवन दर्शन
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Articles of Books

  • गायत्री साधना का व्यावहारिक स्वरूप
  • बधाई संकल्प के लिए
  • सार्वभौम उपासना का प्रारंभ
  • बहुत बड़े हैं आप और आपके भगवान
  • गायत्री साधना का ज्ञान विज्ञान
  • बड़प्पन नहीं महानता अपनाएं
  • नकली अध्यात्म असली अध्यात्म
  • थोड़ा भला पर भावभरा
  • अपने जीवन में भगवान को पुकारें
  • भगवती गायत्री के पांच वरदान
  • आप पढ़े-लिखे लोगों तक हमारी आवाज पहुंचा दीजिए — पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

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