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Books - गायत्री महामंत्र की व्यावहारिक साधना

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Language: HINDI
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नकली अध्यात्म असली अध्यात्म

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(31 मई 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में सायंकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
संसार में कई लोग मंत्र को सबसे बड़ा बताते हैं। कई आर्थिक सम्पदा को बड़ा बताते हैं। कई लोग बैंकों के सौदे को ही बड़ा बताते हैं, तो कई हीरों के सौदों को ही बड़ा बताते हैं। जंगली बेर बेचने वाले के बच्चे को अगर हीरा भी दे दिया जाय तो वह उसे पत्थर टुकड़ा मानता है और उसे दूसरे पत्थर से तोड़-तोड़ कर खेल खेलता है। इसी प्रकार अध्यात्म के हीरे को इन बेर बेचने वालों के बच्चों को दिया गया है और वे उसे गला-सड़ा कर बेकार कर रहे हैं। उन्हें रामलीला करना ही अध्यात्म दीखता है, पर वे रामायण को नहीं देखते। अध्यात्म मानव जीवन की सच्ची सम्पदा है। जिस पुरुष को यह सुख प्राप्त हो जाता है, वह भौतिक सुखों को तिलांजलि दे देता है। बहुत से पुरुषों को मैं जानता हूं जिनका धन चला गया, उनके पास व्यापार करने को धन नहीं रहा फिर भी वे घबराये नहीं। अपनी नेक नीयत और ईमानदारी से प्रसन्न चित्त रहे। पर आज चालाकी का युग है। जो सबसे ज्यादा चालाकी बेईमानी कर सकता है वह सर्वाधिक धनवान होता है। पर मैं ऐसा नहीं बता सकता कि नेक के धन और चालाकी के धन में कितना अन्तर होता है। धनी, गरीबी और मध्य वर्गीय सभी से मेरा सम्पर्क है, पर धनी और गरीब परस्पर आपसी जीवन में एक-दूसरे से दुःखी पाये जाते हैं क्योंकि उनके पास अधिक सम्पत्ति नहीं, धनी को जो सहयोग और सहायता देनी चाहिए और गरीब को जो भावनायें और सहयोग देना चाहिए वे नहीं देते वे केवल एक-दूसरे को देख कर कुढ़ते रहते हैं।
सामाजिक जीवन में हर कोई आगे बढ़ने की कल्पना करता है। जो निम्न स्तर के पिछलग्गू होते हैं वे भी मौका पड़ने पर धोखा देकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं लेकिन जब वे पिछड़ते हैं तो उनको अपने क्रिया-कलापों का ज्ञान होता है। कई ऐसे भी होते हैं जो माता-पिता के समय में गरीब थे किन्तु बड़े श्रम से उच्चपद पर अवस्थित हुए। जार्ज वाशिंगटन की मां लकड़हारा थी और वह लकड़बग्घे और भेड़िये के डर से उस नन्हें वाशिंगटन को कोठरी में बन्द करके जंगल में लकड़ी काटने जाती। सवेरे  जब वह जाती तो उसे पुचकार कर जाती और रात्रि में जब वह आती तो उसे छाती से दबोच लेती। यह जीवन था उस अमेरिका के स्वतन्त्रता सेनानी जार्ज वाशिंगटन का जो उस देश का पहला राष्ट्रपति था। वाशिंगटन अपने गुणों के बल पर आगे बढ़ता गया। जहां भी गया लोगों का ध्यान उसकी ओर खिंचता गया। वह ईमानदारी, परिश्रम और सज्जनता से आगे बढ़ता रहा। वह व्यक्तिगत गुणों से उन्नत होकर अमेरिका का राष्ट्रपति बना। वह वाशिंगटन जिसने अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन शहर को बसाया। मित्रो! जब तक अमेरिका जिन्दा है, तब तक जार्ज वाशिंगटन भी जिन्दा है। हमारा कहना है कि गुण मानव की सबसे बड़ी विभूति हैं। गुण वाला मानव जहां भी जायेगा वहीं अपना स्थान बना लेगा। गुण हीन जहां भी जायेगा वहीं दुत्कारा जायेगा। चालाकी से चांदी-तांबे के टुकड़े प्राप्त किये जा सकते हैं, गुण नहीं। पर इस अभागे समय को उन्नति का युग बताया जाता है, पर मैं इसे निकृष्ट युग कहता हूं। मैं इसे टूटने वाला, समाप्त होने वाला युग कहता हूं। अगर आप यह नहीं मानें तो मैं शर्त से कह सकता हूं कि तुम्हारी जिन्दगी में यह युग समाप्त हो जायेगा। जिसके पास जितने पैसे अधिक होंगे वह उतना ही दुत्कारा जायेगा। यह गरीब देश है। इसकी तीन आने रोज की आय है और इस देश में ज्यादा ऊंचे रहने की आदत भी चोरी नहीं हैं। अगला समय ऐसा आने वाला है जब इन पैसे वालों की गर्दन तोड़ी जायेगी, कमर तोड़ी जायेगी। क्या यह जमाना चलेगा जिसमें गरीब सड़ते रहें और ये मौज करते रहें, यह अन्याय नहीं तो और क्या है? गान्धी जी की आज्ञानुसार उनकी स्त्री कस्तूरबा एक स्थान पर सफाई पर प्रवचन करने गयीं, जब बा का प्रवचन समाप्त हुआ तो उन महिलाओं ने कहा—बा हम स्वच्छ तो रहेंगे पर हमारे पास एक ही धोती है, जिसे आधी को धो लेती हैं और आधी को बांधे रहती हैं और दूसरे दिन दूसरा आधे को धोती हैं, कैसे हम स्वच्छ रहें? बा निरुत्तर होकर गांधीजी के पास आ गयीं और उन्होंने कहा—मैं कैसे कहूं उन्हें स्वच्छ कपड़े पहनने को? उनके पास तो कपड़े ही नहीं हैं, पर गांधी जी के स्वाभिमान ने चोट खायी, उनका दिल दिमाग डोल उठा। उनने सोचा भारत की अधिकांश जनता को एक वस्त्र भी उपलब्ध नहीं और तुम अकेले दस वस्त्र पहने खड़े हो। उनने उन कपड़ों को वहीं निकाल दिया और अपने शरीर में आधी धोती लपेट ली और आधी का दुपट्टा बनाकर ऊपर शरीर पर डाल दिया। इन्सानियत इसे ही कहते हैं और यही इसका आदर्श नमूना है। एक आदमी तो मिठाई की जूठन छोड़े और दूसरे को सूखी रोटी भी नहीं मिले, यह मानवता नहीं है। जिस का पत्थर जैसा कठोर दिल है, वही अमीर माना जायेगा। क्या हमारे समाज में पीड़ित नहीं हैं। सम्पूर्ण जातियों और मजहबों का उद्देश्य तो सेवा है, पर हम करते ही नहीं। हम अपनी बात की क्यों करें, अन्य समाजों की भी तो यही हालत है। चलो सांई बाबा के पास चलो गरीबी दूर हो जायेगी। चलो लक्ष्मी के दर्शन कर लो अर्थवान् हो जायेंगे। पर क्या इससे सम्पत्ति आती है, कभी नहीं। अगर सम्पत्ति आ भी जाये तो वह भौतिकता की होती है। अतः मित्रो! आदमी का लक्ष्य बड़प्पन नहीं महानता होना चाहिए। बड़ा आदमी कल मर जायेगा पर महान आदमी नहीं मरता। आधी दुनियां साम्यवादी देशों में सारी असंख्य संख्या ने मालूम कहां-कहां रहती हैं, पर इनका एक दिन मालूम नहीं क्या होगा? इनमें से एक दिन कोई भी न रहेगा और नये-नये ही दिखायी देंगे। देश में बड़े-बड़े जमींदार थे, राजा थे जिनकी पालकी निकला करती थीं। अगर राजधानी से बाहर आते तो हजारों अभिवादन हुआ करते थे, पर उनकी बातें आज कहानियां बन कर रह गयी हैं। आज उनका पता नहीं वे कहां गये, वे दिखावे की बातें नहीं रहीं। यह सिद्धान्त की बात है कि राजा जहन्नुम में चले गये और यह सेठ मरने वाले हैं। अगर यह नहीं मरे तो सरकार मार डालेगी। ये चीजें जाने वाली हैं। यह धन के लोभी जाने वाले हैं। मित्रो! आप उस पंक्ति में क्यों खड़े हो, जिस पर चन्द दिनों बाद ही थूका जाने वाला है। उनका क्यों स्थान लेते हो। मैं इस टूटी हुई इमारत को देख रहा हूं। मैं नवीन मानव जाति की समुचित उन्नति का मकान देखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि लक्ष्मी की पूजा बन्द करके सरस्वती की पूजा आरम्भ कर दें। सोने के प्रति अपने विचार बदलें। जब जमींदारियां समाप्त होने वाली थीं तब हमने अपने तीन बड़े भाइयों को कहा था कि दो हजार बीघा जमीन को बेच दें। मैंने कानून और जनता के रुख से कहा कि थोड़े दिन में जमीन चली जायेंगी, पर एक भी भाई ने बात न सुनी, अजीब-अजीब बातें कहीं। मैंने बहुत समझाया, पर एक नहीं मानी,उल्टा मुझे ही मूर्ख बताया। पर थोड़े दिनों बाद जमींदारियां समाप्त हो गयीं और बौण्ड मिल गये। जो हमें सलाम झुकाते थे और बेगार देते थे उनके घर अब हमें जाना पड़ता है। मित्रो! यह आर्थिक युग भी जाने वाला है, पर आपकी समझ में नहीं आता। मैं चेतावनी देना चाहता हूं कि मनुष्य की सम्पदा पर घृणा होगी वह कहेगा इसे छीन लो, उसने शोषण किया है। लोग पूछेंगे तेरा देश कंगाल था तुमने क्यों नहीं दिया? तुम असभ्य नागरिक हो। यह भी हो सकता है कि मेरे कहने से आपका विचार बदले। मैं धन सम्पदा के बजाय दैवी सम्पदा की ओर मोड़ना चाहता हूं। आपकी सम्पदा, बदमाशी, गुण्डागर्दी सिखाती है और फिर भी वह बढ़ रही है। दैवी सम्पदा सुप्त हो रही है। हर वर्ष में पांच से पच्चीस तक लखपति हो जाते हैं, पर पांच से पन्द्रह तक भी विष्णु, ब्रह्मा नहीं बनते। देश अच्छे लोगों को नहीं उभार रहा है। हमारी खानों से हीरे निकलने बन्द हो रहे हैं, कोयले मिल रहे हैं। हीरे निकालने के लिए मानव को समझना पड़ेगा कि ओ मानव सम्पदाओं की ओर दौड़ो मत, नहीं तो भालू आयेगा और तुम्हारे घोंसले को तोड़ देगा। अगर यह बात समझ में आये तो बहुत अच्छी रहे। उन्नतिशील जीवन जीने के बारे में आपकी कीमत अलग है। मैं सद्गुणों से सधा हुआ व्यक्ति चाहता हूं। गायत्री मंत्र का इन सद्गुणों से बड़ा सम्पर्क रहता है।
मैंने प्रातः उपासना की विधि बतायी थी। अब दूसरी विधि बताता हूं। यह भी बड़ी महत्वपूर्ण है बहुत आवश्यक है। भगवान का साक्षात्कार मालाओं, मंत्रों, ध्यान, प्राणायाम से नहीं होता है यह केवल एक तिहाई साधना है। अच्छे गुणों के समावेश के बिना भगवान कभी नहीं प्राप्त हो सकता। गंगोत्री में जिन दिनों मैं था एक अजीब घटना देखी, जिससे मैं नास्तिक हो जाता। बात यह थी कि वहां दो साधु आमने-सामने रहते थे। बिल्कुल नंग-धड़ंग मौन रहते थे और जप एवं भजन किया करते थे। मेरे मन में उनके प्रति बड़ी श्रद्धा थी। मैंने एक दिन देखा कि जहां महात्मा रहते थे वहां इतनी जमीन थी कि उसमें साग सब्जियां उगाया करते थे और छह-छह माह सुरक्षित रखा करते थे। वे एक दिन एक हाथ जमीन के लिए आपस में लड़ने लगे। दोनों टसमटस हो गये और उनमें से एक ने दूसरे की दाढ़ी उखाड़ ली। मेरा मन घृणा से भर गया कि यह घरबार छोड़ करके भी इस झगड़े से मुक्त नहीं हो सके। मैंने ऑपरेशन देखे हैं, मैंने हत्यायें देखी हैं। मालवीय जी मेरे यज्ञोपवीत गुरु थे। मैंने उनके साथ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों का खून बहते देखा है, पर वे मन में कोई घर नहीं कर पाये। ये यहां हिमालय के निवास में गंगा का जल पीकर भी क्रोध और लोभ को समाप्त नहीं कर पाये। यह बात मन में बैठ गयी। मैं उन पर विश्वास करता था कि गंगा के किनारे पर किया गया भजन सिद्धि पूर्ण होता है, पर वह हट गया। मेरे दिमाग में यह बात बैठ गई कि जो गंगा का पानी अहंकार नहीं हटा सका, तो कैसे ईश्वर की प्राप्ति करा सकेगा। इसी विचार से मैं तीन दिन नहीं सो सका। मेरे मन में अन्त में ऋषियों की यह प्रेरणा आयी कि वह भजन पूर्ण नहीं है। तपश्चर्या के बिना भजन सार्थक नहीं हो सकता। पूजा भजन की एक तिहाई बात है और यह मैं बता चुका। आपको अपनी भावनाओं और जीवन का परिष्कार करना पड़ेगा। इसके बिना आत्मिक प्रवृत्तियां रुकी रहेंगी। गीता पढ़िये पर उसकी लकीर मत पीटिये। एक बार गीता पढ़ते-पढ़ते मुझे पसीना आ गया, कि यह कैसी पुस्तक कि अपने भाइयों को मार डाले और रामायण कहती है कि अपने भाइयों के लिए राज्य छोड़ और वनवास जा। गीता रामायण के सिद्धान्त देखकर विचलित हो गया। मैं बहुत सोचता रहा, बहुत सोचता रहा, पर मैंने इसकी खोज निकाली। धर्म क्षेत्र के लिए कुरुक्षेत्र की खोज भगवान कृष्ण ने करवायी थी। उन्होंने कहा ऐसी जगह खोज कर ला जहां भाई-भाई आपस में कट-कट कर मर सकते हों। दूत गया और वहां एक जगह देखा कि मां ने अपने बच्चे को इसलिए मार कर गाड़ दिया कि वह प्यास बुझाने के लिए पानी मांग रहा था। भगवान ने महाभारत करवाने के लिए यही स्थान उपयुक्त समझा। मैंने सोचा धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र तो अपना मानव शरीर है। महाभारत बारह दिन तक चला था वह टेक्नीक अलग थी, पर हमारे शरीर में तो रोजाना महाभारत होता है। हमें उन गदा और एटम बम की बात करने से क्या फायदा। गीता में हमारे भीतरी संघर्षों का वर्णन है। शैतान और भगवान की रोजाना लड़ाई होती है। शैतान हमें रोज संकीर्णता की ओर ले जाता रहता है। वह एक से एक दोस्त लाकर सुख के साधनों की बात बताता रहता है। इस प्रकार एक ओर सौ सुखी रूपी कौरव रहते हैं और दूसरी ओर दया, संयम, सेवा, सदाचार और करुणा रूपी पांचों पाण्डव बैठे रहते हैं। वह भी अपनी आकांक्षा रखते हैं। वह भी अपनी समाज सेवा की जमीन मांगते हैं। वे भगवान से कहते हैं कि हमें भी थोड़ी सी जमीन दिला दो, पर यह क्रोध रूपी दुशासन कहता है कि जा सुई की नोंक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा। हमारे पास समय कहां है। भजन किया भी तो केवल भौतिक सुखों के लिए, यह सभी बातें आधे घण्टे का भजन नहीं दे सकतीं। बद का नाम लेकर गायत्री का भजन करते हो और इसी प्रकार के चालाकी के भजन हमारे जीवन में असफल होते हैं। हमारी अन्तरात्मा के संघर्ष के प्रति हमें सावधान होना पड़ेगा। भगवान के पास बैठना चाहते हो तो अपनी पवित्र भावनाओं का समावेश भजन में करें। ये सभी बातें मैं भक्ति योग की बता रहा था।
अब मैं कर्मयोग की बात बताता हूं। तीन शरीर हैं, तीन योग हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनों योगों को पाने के लिए जंगल में जाना पड़ता है। कुण्डलिनी जगाई जाती है। चक्र भेदन प्रेक्टिकल सिखाया जाता है, पर आप तो दस पैसे की चिट्ठी लिखकर पूछना चाहते हो। अगर किसी अनाड़ी चिकित्सक को लिखकर विधि भेज दी जाय तो क्या वह आपरेशन कर सकता है? विधि वह सिखा और बता सकता है जो स्वयं वह कर चुका हो। यह परिचर्चाओं की उपासना है। एक दूसरे के सहयोग से ऐसा होता है। एक व्यक्ति दूसरों की मनोभूमि को ऊंचा उठाता है। हठयोग, प्राणयोग आदि सभी की एक ही प्रवृत्ति मात्र है। हठयोग सर्कस के खेल के समान है। सर्कस उसे कहते हैं जिसमें एक पहिये की साइकल चलाई जा सकती है, पर यह थोड़ी दूर ही चलाई जा सकती है। उस पर सवार होकर मथुरा से वृन्दावन नहीं पहुंचा जा सकता, ये सभी चमत्कारिक उपासना उनके लिए हैं, जो चमत्कारिक कार्य करना चाहते हैं। गृहस्थ जीवन के लिए तीनों योगों की साधना, व्यापार, बाल-बच्चों के बीच में कैसे की जा सकती हैं, इसीलिए मैंने प्रातः बताया था कि सुगमता से आप को जो साधना बताई थी उनके अनुसार कार्य कर सकते हैं, पर योग की साधना न आपके लिए लाभकर है और न ही भगवान के लिए।
अब मैं जीवन स्तर उन्नत करने की बात बताता हूं। जीवन में एक बार का किया संकल्प बहुत लाभप्रद नहीं हो सकता। मान लो हमने संकल्प कर लिया क्रोध नहीं करेंगे और दूसरे ही दिन एक अनायास बात से वह आ गया। मान लो हमने पर स्त्री को मां-बहिन समझने का सत्संकल्प कर लिया और चले गये सिनेमा देखने तो सब निष्फल हो जाते हैं। संकल्प ऐसे सिद्धि नहीं दिला सकता। इसकी सफलता के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसके लिए रोम-रोम में समाये दुर्गुणों का परिष्कार करना पड़ेगा। इनके हटाये बिना अध्यात्म और शान्ति नहीं प्राप्त हो सकते।
एक बार एक महात्मा एक सम्पन्न व्यक्ति के यहां भिक्षा मांगने गया। उस व्यक्ति के यहां किसमिस, बादाम, पिस्ता डाल कर खीर बनायी गयी थी। साधु को देखते ही गृहस्थ ने कहा—महाराज लाओ कमण्डलु, साधु ने कमण्डलु फैला दिया। महाराज! यह कैसा कमण्डलु इसमें तो गोबर भरा पड़ा है। साधु ने कहा—तो गृहस्थ ने गोबर निकाल, पानी से स्वच्छ कर, कमण्डलु को खीर से भर दिया। साधु ने कहा—बेटा! तुम होशियार हो, तो गृहस्थ बोला—कमण्डलु धोकर यह खीर न डाली होती तो आपको गोबर मिली खीर खाते ही उल्टी हो जाती। साधु भिक्षा लेकर चला गया, पर थोड़ी देर बाद ही पुनः उसी गृहस्थ के पास आया और बोला—गृहस्थ खाने का तरीका तो में जानता था कि तुम खीर के लिए गोबर निकाल सकते हो, पर भगवान के लिए अपने भीतर का गोबर नहीं निकाल सकते। इसी प्रकार गायत्री मात्रा का वरदान, प्यार, कृपा चारों ओर रहते हैं, पर आपका कमण्डलु ठीक नहीं है, अगर इसमें यह खीर डाल दी गयी तो चौपट हो जायेगी। आपने अपने कमण्डलु से गोबर निकाला है क्या? अरे कमण्डलु में गोबर भरने वालो! गायत्री मां क्या सोचेगी? गायत्री माता पछताती चली जायेगी कि चार दिन तक परेशान हुई थी, पर खीर कहां डाले। गोबर को कमण्डलु से निकालना भी एक विशुद्ध उपासना है। प्रातः के पाठ से भी महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाता हूं। भजन के बिना काम चल सकता है, पर जीवन शुद्ध किये बिना कुछ नहीं कर सकते। बारह घण्टे के भजन के बाद भी मन मलीन रहे तो भगवान की कृपा प्राप्त नहीं कर सकते।
अब मैं आपको एक ध्यान की बात बताता हूं। वह यह है कि अपन दूसरों की टीका-टिप्पणी करते रहते हैं, पर हमें अपने आप के दोषों की निन्दा करनी चाहिए। चोर जब घर में बैठे रहते हैं, तब तक उनकी जांच न की जाय। आप के शरीर में चोर बैठे रहते हैं। अगर आपने इनको निकालने के लिए बुढ़िया की सी खांसी भी खांसी होती तो ये अवगुण रूपी चोर भाग जाते। मैं उपासना से सत्प्रवृत्तियों का नया अध्याय जोड़ना चाहता हूं। मैंने बहुत पुरश्चरण और भजन किया है, पर इससे ज्यादा यह किया है कि मैंने व्यक्तिगत व्यावहारिक जीवन में कठोरता बरती है। मैं दूसरों के लिए मुलायम हूं, पर स्वयं के लिए बहुत सख्त। हम नारियल को पूर्णाहुति में फूंकते हैं क्योंकि यह सभ्यता का प्रतीक है। नारियल की तरह खुद के लिए सख्त और दूसरों के लिए मीठा व्यवहार होना चाहिए। दूसरों के साथ बच्चों जैसा व्यवहार होना चाहिए। बच्चों को जैसे साफ कर देते हैं। अगर बच्चा मूंछ भी उखाड़ ले तो भी कुछ नहीं कहते। क्या आपकी धर्मपत्नी गलती नहीं करती? सारा संसार गलतियों से भरा पड़ा है। हम हंसी के साथ बुरे से बुरे व्यक्ति को भी निभा सकते हैं। भगवान शंकर का चित्र जीवन के दर्शन का महत्व बताता है। गले में सर्प पड़ा है। शेर उनकी बगल में खड़ा है। स्वयं की बारात में भूत-पलीत हो गये थे। शंकर जी की बारात में दुबले-मोटे, देवता-राक्षस-मानव सभी गये थे। शंकर जी ने कहा मेरी बारात में सभी जायेंगे। जो अपनी बारात में राक्षस और देवताओं को साथ ले जा सकता है, वही शंकर होता है। आप कहेंगे कि ऐसा नहीं तो मैंने एक उक्ति बतायी थी कि ‘‘मुझे नरक में भेज दो, मैं वहीं स्वर्ग बना लूंगा।’’
जीवन के संघर्ष कैसी दिव्य बात पैदा करता है। यही बात मैं बताना चाहता हूं। प्रातः चारपाई से उठकर प्रार्थना करता हूं कि आज का दिन मेरे जीवन में एक नया दिन हो और नया जीवन दाता हो। समय का जो उपयोग कर लेता है वही श्रेष्ठ है। पर आप इधर गये, उधर गये पर आपने किया क्या? विदेशों में रात्रि कालेजों में पढ़-पढ़कर कोई भी पी.एच.डी. हो जाता है। पर आपने दो घण्टे तक ताश खेली, दो घण्टे चाय की दुकान पर बैठे रहे। आपने बैठने और खेलने के अतिरिक्त और किया ही क्या? मैं मित्रो इसलिए कहता हूं कि प्रातः भौतिक रूप से सम्पर्क का समय है, आदमी प्रगति के द्वार खोल सकता है, जिसके पास विद्या, बुद्धि, धन आदि सब कुछ है किन्तु समय का मूल्य नहीं समझता वह कुछ प्राप्त नहीं कर सकता। मैं जब तक जागता हूं कहीं कभी भी बेकार नहीं बैठता। प्रातः ही अन्दाज लगा लेता हूं आज के दिन का किस प्रकार उपयोग करूंगा?
दूसरा विचार में यह बताना चाहता हूं कि हमारे विचारों में फैली दुष्प्रवृत्तियां गन्दी परम्परायें स्थापित करती हैं। हमें विचारों में से उन गन्दी परम्पराओं का हटाकर चलना है और जब चलना शुरू हो जाये तो मजा आ जावे। आलोचना की जगह गुण देखें तो मजा आ जाये। गांधी जी ने हरिश्चन्द्र का ड्रामा देखा और बदल गये। उन्होंने अपनी तरह से नाटक नहीं देखा। नाटक में जाकर आप विश्वामित्र का रूप देखेंगे और मक्कारपने की बात करेंगे। यह ब्राह्मण बड़े मक्कार होते हैं, जो दुनियां भर के मानवों के केवल दोष देखते हैं। आपको निषेधात्मक जिन्दगी से हटकर विधेयात्मक जिन्दगी जीनी चाहिए। मैंने जीवन में विधेयात्मक जिन्दगी जियी है। मेरे साथ भी कटु व्यवहार हुए पर मैं उन्हें भुला देता हूं। अच्छी बातें सुनता हूं। समय के उपयोग के लिए विधेयात्मक तरीकों में लगा रहता हूं। प्रातः के कार्यक्रम के अनुसार दिन भर चैक करता हुआ कार्य करता रहता हूं। लोग आश्चर्य करते हैं कि आचार्य जी आप इतने काम कैसे करते हैं तो मैं उनको एक ही बात बताता हूं कि मेरा जीवन कार्यक्रम से ढला हुआ है और मेरा सिद्धान्त है कि हर दिन नया जन्म और हर रात नई मौत। जो आदमी यह सोचते हैं, समझते हैं उनकी मंजिल कोई नहीं रोक सकता। अन्धी-गूंगी-बहरी होते हुए भी बहिन टेलर ने उन्नीस विश्व विद्यालयों से विश्व के कोने-कोने से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त कीं। हिन्दुस्तान में जब आयीं तो वह हमारे लाड़ले प्रधानमन्त्री पं जवाहरलाल नेहरू की अतिथि बन कर रहीं। ध्येय निष्ठा और नियमितता से आंख, कान और जीभ के बिना भी पी.एच.डी. की उपाधि और जीवन का वर्चस्व प्राप्त किया जा सकता है। वह मानव धन्य है। पर आपके पास तो सब कुछ है, पर क्या किया जाये। मैं आपकी विचारधारा को अवांछनीय तरीकों में खर्च न करने की प्रेरणा देता रहता हूं। जल में खड़ा होकर जप करना, आग में तपना, भूखों मरना तप नहीं है। आप भी सीधे तरीके से तपस्वी बन सकते हैं। मैं प्रातः प्लान बनाता हूं, निरन्तर देखता रहता हूं। हमें संघर्ष के लिए कई औजार तैयार करने पड़ते हैं। जैसे कामवासना का विचार आये आप उसे ढीला छोड़कर आगे बढ़ते हैं। कामुक तस्वीरें, गन्दे उपन्यासों के द्वारा दुराचार प्रारम्भ करते हैं। हम उनकी विचारधारा या उनका विचार करके पाप करते हैं। हम पतन के गर्त में चले जाते हैं। अगर आपको सावधान रहना है तो उनको काटने वाली बात रखनी पड़ेगी। लाठी लाठी से टूटती है, यह बात माननी पड़ेगी। अगर आपके सामने सुन्दर लड़की जा रही है और मन में गन्दे विचार आयें तो आपके दूसरे विचार को सोचना चाहिए कि यह प्रेयसी है या बहिन। दोनों का मेल बदल कर लाइये। आपके विचार कहां हवा होते हैं। पोस्टमार्टम की मेज पर सुन्दर शरीर को देख लीजिये और किसी सुन्दर शरीर को देखते ही वही पोस्टमार्टम वाला शरीर देखिये। गाय-बैल की खाल उतारने वाले के पास जाइये। बेखाल-मांस सब उतारते हैं। वे सुन्दरता का कोई मूल्य नहीं समझते। वेदान्त की पुस्तकों में पोस्टमार्टम देखना ही दिशा में जाने में जाने वाली कल्पना है। अगर आप चांदी के बर्तन में भी पखाना उठायेंगे तो वह चांदी अच्छी नहीं लगती। आकर्षण ठीक साधारण रूप का होता है। मनुष्य के भीतर क्या है, वह केवल पाखाना, मांस, हड्डियों का गन्दा सड़ा लोथड़ा है। अगर यह कल्पना मन में आ जावे तो इसे छूने का मन नहीं करता। ऐसे गन्दे कलेवर वाला यह शरीर इसके प्रति विचार करना चाहिए। यह विचार तब आ सकते हैं, जब विरोधी सेनायें आपके विचारों में खड़ी हों। चोर डाकू रूपी गन्दे विचारों को रोकने के लिए यह सेनायें आवश्यक हैं। बुरे विचारों को रोकने के लिए अच्छे विचारों से और अच्छी भावनाओं से एक बांध बना लीजिये। जब स्वार्थ, लोभ और मोह के विचार आप पर हमला करें तो मेरे फैलाये ये हथियार मुकाबले के लिए छोड़ दीजिये, यह मुकाबला करेंगे। ये विचार रूपी हथियार में बेचता हूं। आपको यह नया अध्याय आरम्भ करना चाहिए। संघर्ष करना चाहिए कुविचारों से। चौबीस घण्टे में एक मिनट भी आराम से नहीं बैठना चाहिए। कभी भूल हो जाये तो शाम को तलपट मिलाइये, पर आपे शाम के विचार रात्रि में समाप्त हो जाते हैं।
आदमी को सवेरे जल्दी उठना चाहिए। अगर वह नहीं उठ सके तो दिन में खाना न खाने की सजा व्यक्तिगत रूप से जीवन में लागू करनी चाहिए। भूख लगे तो सोचिये अब तो कल जल्दी उठेंगे तब ही भोजन खायेंगे। शाम को एकाग्र होकर दिन भर के क्रिया-कलापों को सोचा कीजिये मन स्वतः काबू में आ जायेगा।
हमारे गांव में बड़ी-बड़ी घोड़ी रहा करती थीं। कभी-कभी वे सारे गांव को तमाशा दिखाती थीं। उन घोड़ी वालों में से एक सईस था—मोहम्मद। वह एक बाद सफेद घोड़ी लाया और उसने घोड़ी की कई चाल दिखायी। वह कई प्रकार की चालें निकलवा कर दिखाता था, पर उसका काम एक ही होता था लोहे का खड़खड़ा बजाना और चाबुक देना और लगाम खींचना। यह तरीके घोड़ी की चाल को बदल देते थे। आप भी कहीं जाइये मत यहीं रहिये। मैं जंगल में जाने की बात नहीं करता, पर अपने जीवन की भूलों को चाबुक लगाइये। आप सावधान रहिये कड़ाई से जीवन व्यतीत कीजिये। यही वीरता है। वीरता खून बहाने वाले को नहीं मिलती। मैंने आल्हा-ऊदल की कहानियां सुनी हैं, मुझे सब याद है और जब मैं याद करता हूं तो ‘‘खड़ खड़ तेगा चाले और क्षत्रिय की चाले कृपाण’’ की भावना जब आती है तो मेरे मन में घृणा आ जाती है। इन्सानों को मारने वालों से में घृणा करता हूं। आदमी को आदमी काट डाले यह बुरी बात है। कभी छोटा सा बच्चा बड़े मानव को मार सकता है। अरे मरना तो अपने हाथ है, पर आप किसी आदमी को बना भी सकते हैं क्या? मेरे इस विषय में एक नई परिभाषा है कि आप अपने कुविचारों को मार सकते हैं। हम जब पढ़ते थे तो हिन्दी और उर्दू साथ पढ़ाई जाती थीं। तब एक शायर का शेर था जो मुझे अब भी याद है—
न मारा आपका तो खासा अकसीर बन जाना।          न मारा गया अपने पाप को, मारा शेर तो क्या मारा?
इन गरीब बकरी, भैंसे को मारना और सिंह को मारना कोई बहादुरी है? शेर का शिकार करना भाइयो कोई बड़ी बात नहीं। अपने कुविचारों को मारना ही गौरव की बात है। प्रातः उठ कर अपने विचारों से संघर्ष करना चाहिए।
आप अठारह घण्टे तक इन पापों से लड़ते रहिये। महाभारत की तरह भगवान को साथ रखकर लड़ाई लड़नी चाहिए। आपको कल तक मैं भक्तियोग की बातें बता रहा था। आज कर्मयोग की बात कहता हूं। दुष्प्रवृत्तियां जब आपके जीवन से हट जायेंगी। तो यह तपश्चर्या पुरुषार्थ उत्पन्न कर देगी। मां, पत्नी, बहिन बच्चे की गलती को हंसकर टाल दीजिये, पर अपने आप पर सख्त रहिये। मन कभी-कभी गलती करता रहता है। मानव जीवन में रात की चिन्ताओं को हटाना चाहिए। कल की बात कल होगी वाली बात मन में रखनी चाहिए।
जीवन का बहाव पानी में बहते हुए लट्ठे के समान है, इससे सभी मिलते हैं और चले जाते हैं, पर यह चलता ही रहता है। हमें सोचना चाहिए कि सब भगवान का है। मैं अकेला था, अकेला हूं, अकेला रहूंगा। आ मेरी नींद आ सो जायें। हम नाटक करने वाले हैं, जैसा किसी ने कहा था कि हम कल क्या थे। आज क्या हो गये हैं। यह निस्पृह आत्मा है। सम्पूर्ण कलेवर केवल नाटक है। आ नाटक के पर्दे बन्द हो जा, अब हमें मत जगाना।
यह बाह्य जीवन का क्रिया-कलाप केवल नाटक है। इसीलिए भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि कर्म योगी बन, यह कर्म योग ही तुम्हारा कल्याण करेगा। तो अभी तो मित्रो समय समाप्त हो रहा है। अब तो मेरे साथ शान्ति पाठ बोलिए।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥


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