बधाई संकल्प के लिए
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( 21 मई 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में प्रातःकाल दिया गया प्रवचन )
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
आज खुशी का दिन है। आज अपना शिविर प्रारम्भ हुआ है। खुशी के दिन जिन्दगी में अनेक बार आते हैं। एक दिन वो भी खुशी का दिन था, जिस दिन आपका जन्म हुआ, बाद में शादी का दिन भी खुशी का दिन था और आपके पुत्र जन्म का दिन भी खुशी का था। खुशी का दिन आता रहता है, जाता रहता है। मेरे पास भी आप लोगों के अनेकों पत्र आते रहते हैं, जिनमें अपनी खुशी में मुझे शरीक होने का निमन्त्रण होता है। मैं पहले बधाई दे दिया करता था लेकिन अब बधाई नहीं देता, किस खुशी में बधाई दूं। पुत्र जन्म के अवसर पर बधाई दूं आपको? उस पुत्र के ऊपर जो अपने बाप की कमाई पर पलता है, वह जवान होकर भी यह सोचता है कि तुम तो आवारागर्दी के लिए ही पैदा हुए हो, कमाने के लिए पिता। ऐसा पुत्र पर, जो बाप द्वारा पैसे न देने पर उसकी हत्या कर दे, ऐसे पुत्र पर जो अपने मां-बाप को एक दिन भी सुख न दे। उस पुत्र के जन्म पर जो अपने घर वालों को ही मारता रहे, उसके जन्म पर बधाई दूं आपको। मित्रो! मैं बधाई दे नहीं सकता और आप बधाई ले नहीं सकते।
दूसरे आप शादी के अवसर पर बधाई मांगते हैं, पहले मैं बधाई देता था, पर अब नहीं देता। मैं देखता हूं भारत के इस समाज का दयनीय दृश्य तो आंखें भर आती हैं। सास बहू से लड़ती है, बहू ननद से लड़ती है, ननद, सास और बहू आपस में महाभारत रचाए रहती हैं। बेचारे उस शादी करने वाले के लिए शान्ति कहां? ऐसी बात भी नहीं है कि केवल स्त्रियां ही इस कलह के लिए जिम्मेदार हों? पुरुष भी किसी से कम नहीं। वे भी पत्नी को अपनी रखैल समझते हैं। उसको अपनी किन्हीं गतिविधियों में शरीक नहीं रखते और उन पर डिटेक्टर बने रहते हैं। यह डिटेक्टर नारकीय गृहस्थ जीवन है। मित्रो! मैं ऐसे जीवन पर आशीर्वाद या शुभकामना नहीं दे सकता। पर मैं आज आपको शुभकामना दूंगा क्योंकि आपने अपने जीवन के संघर्षों को समाप्त करने की दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली है। आप अपने जीवन में अध्यात्मवाद के द्वारा शान्ति स्थापित करने के लिए दूर-दूर के प्रदेशों से अपने पैसे खर्च करके यहां इस कड़कड़ाती धूप में आये हैं। यह आपके जीवन की उन्नति का परिचायक है। अभी उड़ीसा वाले कार्यकर्त्ताओं से बात हो रही थी। वे कह रहे थे कि उनके आने में मात्र किराये ही किराये में 150 रुपये खर्च हो जायेंगे। यह सब आत्मिक उन्नति की आकांक्षा का परिचायक है। यहां कोई लाभ की तो बात है नहीं। आप यहां आये हैं, नौ दिन के शिविर में रहेंगे और आपने आज प्रातः गायत्री अनुष्ठान के साथ अपना कार्य प्रारम्भ किया। सर्व प्रथम आपने उपासना शुरू की। आप रूखे-सूखे भोजन से क्षुधा तृप्ति करेंगे और साथ ही हमारी मोटर का भी चकमा देखिये यह भी फैल हो गयी और आपको पैदल ही यमुना स्नान करने जाना पड़ा। मैं यहां आपकी आव-भगत की कोई व्यवस्था नहीं कर सका, आपको कुछ दे नहीं सका, केवल आपसे खर्च करवाया है, पर मित्रो! आज आपके समझ कुछ नहीं आयेगा। जिस दिन अपना शिविर समाप्त होगा, उस दिन आप कहेंगे कि बहुत कुछ पा लिया है, बहुत कुछ सीख लिया है। आप असन्तुष्ट होकर नहीं जायेंगे। ऐसा मेरा विश्वास है।
जीवन जीने की कला का आरम्भिक सूत्र अध्यात्मवाद है। इसी से मानव अपने जीवन में शान्ति प्राप्त कर सकता है और आपने इसे सीखने के लिए सच्ची शान्ति प्राप्ति हेतु यहां आने का कष्ट किया है। इसके लिए मैं हृदय से आपको धन्यवाद देता हूं।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

