अपने जीवन में भगवान को पुकारें
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(1 जून 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में सायंकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
गायत्री महामंत्र के तीन चरण हैं। तीन चरणों की कई व्याख्यायें एवं प्रयोग हैं। मानव जीवन में यह तीनों चरण कैसे साधे जायें यह मैं पिछले दिनों में बता चुका। मैंने कहा कि जब यह चरण प्रवेश करते हैं तो ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग, स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर एवं आत्मा के आवरण को परिष्कृत करने के लिए तीनों योगों का संकलन करना पड़ता है। जैसे रोटी शरीर के लिए आवश्यक है उसी प्रकार जल भी जरूरी है, वायु भी जरूरी है। इन तीनों को खाकर हमारा शरीर जीवित रहता है। अगर इनमें से एक भी न मिले तो शरीर को मृत्यु का ग्रास बनते देर नहीं लगती। इसी प्रकार सभी की तीन नीतियां हैं। आत्मा की भी तीन नीतियां हैं और यही जीवन की सही नीति हैं। समाधि की अलग शैली है। वह विशिष्ट व्यक्तियों के लिए है। संरक्षण करने वाले के पास ही वह सीखी जा सकती है। पर मैंने जो तीन विधि बतलायी इन्हीं से भी लक्ष्य को पाया जा सकता है।
मैंने ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग के स्वरूप बतलाये। भक्तियोग का स्वरूप—भगवान को अपने पास रखकर भावनापूर्वक भजन करना चाहिए। बिना भावनाओं के भजन से कोई लाभ नहीं। केवल उपासना बिना भावना के कुछ नहीं कर सकती। कई ऐसे भी भक्त हुए हैं जिन्हें कर्मकाण्ड नहीं आता था। इनमें से एक मीरा भी थी, पर उसकी उपासना में भावना का समावेश था। सूरदास बेचारे अन्धे हो गये थे, उन्हें कौन से विधि-विधान आते थे। लेकिन उनके पास भावना से ही तो भगवान आये। भावना के बिना उपासना छूंछ बनकर रह जाती है। नाव के साथ डंडे की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार बिना भावना के कुछ नहीं हो सकता। भावना के बल से ही रामकृष्ण परमहंस की देवी उनसे बात करती थी, पर हमारी देवी तो हमारी तरफ देखती भी नहीं। इसका कारण यह है कि इस अध्यात्म के रूप में भावना का समावेश हमने किया ही नहीं। हमने उपासना उसी प्रकार से की जैसे बीज अच्छे से अच्छा लाये, अच्छे औजारों से बोया, पर जमीन तो अच्छी बनायी ही नहीं, अब कौन सी प्रणाली से फसल अच्छी होगी। माना कि बीज का महत्व बहुत बड़ा है, पर जमीन का महत्व उससे भी बड़ा है। बीज और जमीन में बहुत अन्तर है। व्यक्तित्व, उपासना और कर्मकाण्ड सभी अलग-अलग हैं। मनोभूमि का परिष्कार अध्यात्म की ओर बढ़ाता है। मैंने भावना के साथ गायत्री जपी है, तो गायत्री ने भी कुछ करामात दिखायी है, इसमें से कुछ सामने है और कुछ मरने के बाद सामने आयेगी। अपनी उपासना पर मुझे गर्व है। मैंने अपनी कलाइयों को मजबूत बनाया है। सभी कुछ भावना युक्त किया है।
गायत्री उपासना में तीन क्रम का जोर देते हैं। भगवान हमारे साथ रहता है, हमारा मार्गदर्शन करता है, और हमें पापों से विरक्त करता है। रास्ते बताता है, दोस्त के तरीके से सही राह बताता है। जो भगवान को अपने पास रखते हैं, तो उपरोक्त बातें पाते हैं, देखते हैं और जो भगवान को लाखों मील दूर रखता है वह दूर ही बना रहता है। मीरा कहती थी मेरा भगवान मेरे पास है। हम दोनों हर समय साथ-साथ चलते हैं। भगवान के साथ मैं चलती हूं और मेरा भगवान मेरे साथ चला करता है। मैं श्रद्धा अर्पण करता हूं और प्रकाश मांगता हूं। भगवान को श्रद्धा देना ही पर्याप्त है, इसको मिठाई देना कोई आवश्यक नहीं। तीन दिन तक मैंने यही बात तो आपको बतायी थी कि बिना भावनात्मक स्तर के उपासना फेल हो जाती है और भावना से सफल।
एक बार रैदास बैठे हुए अपने कमरे में जूते सीं रहे थे कि एक महात्मा आया और बोला—रैदास आज सोमवती अमावस्या है, चलो नदी में स्नान कर आयें। तो रैदास बोला—जिन लोगों को आज शाम तक जूते सीने की बात कह चुका, उनको आज शाम को ही दूंगा। उन्होंने कहा—यह माया नहीं, मोह नहीं, यही मेरी साधना है, यही मेरा कर्तव्य है। साधु अपनी बात न मानने पर खफा होकर चलने लगा तो रैदास भागकर पैर पड़ गये और कहा—महात्मन् मैं आज गंगा माता के स्थान पर नहीं जा सकता, पर मेरी कमाई के दो पैसे ले जाइये और गंगा माता में चढ़ा दीजिये। उन्होंने कहा—अच्छी बात है और गंगा पर चले गये। वहां जाकर उन्होंने स्नान किया, पाठ-पूजा की तो तुरन्त ही ध्यान आया कि रैदास ने दो पैसे दिये थे, उसने जेब से एक पैसा निकाला और गंगा में फेंक ही था कि गंगा में से हाथ निकला और पैसे को हाथ में ले लिया। कितनी विलक्षण घटना थी यह, केवल पौराणिक घटना मात्र नहीं। भगवान भक्त की आस्था के लिए पैसे लेते हैं। मेरे जीवन में ऐसे कई उदाहरण आये हैं। रैदास ने भी यही कहा था कि मैं कर्तव्य कैसे छोड़ दूं। महात्माजी आये और पैरों पड़ गये रैदास के। तो रैदास बोले—महात्मन्! मेरे लिए तो यह कठौता ही गंगा है और रैदास ने वह कठौता दिखाया। उसमें रैदास ने खुद ने और सभी शिष्यों ने उसमें स्नान किया। तभी से तो यह कहावत प्रचलित है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।
मैं पहले बताया करता था कि अर्थ के लिए श्रीं बीज युक्त जप करना चाहिए। बुद्धि के लिए ह्रीं बीज जपिये और समर जीतने के लिए क्लीं बीज जपिये, पर अब यह जपने को नहीं कहता, इनके जपने से कोई लाभ नहीं होता और क्लीं बीज से समर जीत लिया जावे तो युद्ध शास्त्र और सेनाओं के बिना ही हो जाता। यह केवल कर्मकाण्ड केवल कलेवर है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि मैं आज मर जाऊं तो आप कहेंगे आचार्य जी को जल्दी फूलमाला डाल कर विश्रामघाट पहुंचाओ, शरीर का क्या करेंगे? इसे तो जलाना ही होगा। कर्मकाण्ड अध्यात्म का शरीर और भावना प्राण है। आज से तीस वर्ष तक के प्राण के प्रयोग और शोध गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्डों में कह दिये हैं। मैंने चौबीस लक्ष के चौबीस पुरश्चरण भी किये हैं, जौ की रोटी खाई है, जीवन को स्वच्छ बनाया है। अगर आपको भी स्वच्छ बनना है, तो उदारता अपनाइये, अध्यात्मवादी को संकीर्ण नहीं होना चाहिए। आपको संकीर्णता हटानी पड़ेगी। सूर्य को जब भगवान ने उत्पन्न किया तो उसे प्रकाश भी दिया, जब तक उसका जीवन रहेगा वह सम्पूर्ण प्रकाश आपको देता रहेगा। वह यह नहीं सोचता कि दुनियां मेरे से कितनी दूर है, तुम्हारे वहां चक्कर लगाती रहती है, हमें कुछ दे नहीं सकती फिर भी वह प्रकाश देता गया। एक क्षण भी वह नहीं रुका और चलता रहा। तभी तो वह सूर्य देवता है। वायु, सूर्य, चन्द्र, वरुण देवता परसेवा में चल रहे हैं। वायु पंखा झल रहा है, वह गरीब को भी पंखा झलता है, तो अमीर की कोठी पर भी उतना ही, अमीर को ज्यादा नहीं देता, जल का देवता इन्द्र—वरुण निकल पड़ा, बादल बन कर स्वयं फैल कर जनता को जल देता रहा। घर-घर पानी देता, बहाता गया। वह ये सोचते हैं कि भगवान ने मुझे सामर्थ्य दी है तो मैं इसको स्टॉक में नहीं रख सकता, स्टॉक में तो आप लोग रखते हैं, जो वरुण देवता आपको पानी देता है उसे स्टॉक कर लेते हो और एक रुपये की एक बाल्टी बेचते हो, आपने संकीर्णता रखी देवता ने नहीं की। अध्यात्मवाद में उदारता ही क्रियाकलाप होता है। मनुष्य बगीचों के पानी का हिसाब रखता है पर भगवान नहीं। इसीलिए तो महापुरुष बनने के लिए उदारता आवश्यक है। महापुरुष केवल दे सकते हैं, दे सकते हैं, दे सकते हैं। देना महापुरुषों का स्वभाव बन जाता है। मानव समाज को उन्होंने असीम ज्ञान-धन दिये, मानव समाज के लिए महापुरुषों के सोचने का यही तरीका होता है, अध्यात्म एवं भगवान जब आपके भीतर आये तो सेवा व्रती और उदार तो होना ही चाहिए।
आप अध्यात्म की ओर अग्रसर होते जावें, झुकते चले जावें। पेड़ की तरह झुकिये, पेड़ खुद फल नहीं खाता, लोगों को देता है। आम का वृक्ष कच्चा आम, पक्का आम सभी दूसरों को दे देता है, अपने लिए कुछ नहीं रखता। यही उदारता की बात अपनाने हेतु मैं कहता हूं और आप उत्तर देते हैं कि हम गरीब हैं, हम दान कहां से देंगे? दान के लिए धन की आवश्यकता होती है। लेकिन मित्रो! दान के लिए धन आवश्यक नहीं, हमारे पूर्वज ऋषियों के पास क्या था? जंगल में छप्पर-छान बांध कर रहते थे, वृक्षों की छाल पीस-पीस कर पिया करते थे। घास के तृण-पत्रों पर सोया करते थे। क्या ऋषि हमारे से अमीर थे। उनके पास कुछ नहीं था, फिर भी मानव जाति के लिए जितना दान उन्होंने किया, उससे पृथ्वी कभी उऋण नहीं हो सकती। जिसके लिए आज रोटी कमाना भी मुश्किल है वह भी दान कर सकता है, उदारता का दान अपने घर से देना चाहिए।
सर्व प्रथम अपने आप को देना प्रारम्भ कर दीजिये। अपने विचार बदल दीजिये और सोचिये कि अरे मेरे पेट तूने मेरा कचूमर निकाल दिया, आ आज तेरे अत्याचारों का प्रतिरोध करूं। यह जीभ पिशाचिनी है, इसको भी सुधारो, घायल पड़े आमाशय से कहो—आ आमाशय तेरे पट्टी बांधकर तुझे स्वस्थ करूं। अपने घायल पेट की सेवा की जिये जिसने अभक्ष्य खा-खाकर नष्ट कर दिया है आपके शरीर को। जायके के लिए आपने सब कुछ बर्बाद कर लिया। रामकृष्ण मिशन के लोग समय-समय पर बड़ी सेवा किया करते हैं, तो मैं उनको कहा करता हूं कि अपने शरीर पर होने वाले अत्याचार भी रोकिये, जीभ के अत्याचार भी बन्द करिये। अपने आमाशय से आशीर्वाद लीजिये, आप बहुत दिन जी सकते हैं। पेट का आशीर्वाद ही जिन्दा रख सकता है, जीभ का आशीर्वाद नहीं। तभी तो हम कहते हैं कि आशीर्वाद सच्चे पेट से देना। जरा सोचिये अरे! मस्तिष्क तुम खाली हो गये, न मालूम तुम्हारे में कितने अमृत के घड़े थे, पर तुम शिक्षा प्राप्त न कर सके। बाजार में बैठकर गप्पे करता रहा, ताश खेलता रहा, चुनावों की पार्टीबाजी करता रहा। ओ मेरे मस्तिष्क आ तुझे गीता, रामायण पढ़ाना शुरू करूं। आपकी स्कूल खोलने की औकात नहीं होगी, पर कम से कम मस्तिष्क को तो एक-आध घण्टे सेवा करने दीजिये। लोग कहते हैं महाराज मैं आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था, तो मेरा बाप मर गया, पिताजी के पढ़ने से पढ़ाई रुक गयी, मैं आगे नहीं पढ़ सका, तो मैं उन्हें कहता हूं कि अरे तुम्हारे बाप के मरने के साथ ही पढ़ाई के सारे साधन बन्द हो गये क्या? अरे बाप नहीं तो क्या! तुम्हारे नाक-कान-आंखें सब कुछ तो हैं, फिर क्यों नहीं पढ़े, तो निरुत्तर हो जाते हैं।
आलस्य मानव शरीर का सबसे बड़ा शत्रु है। आलस्य के मुकाबले में शैतान भी कुछ नहीं है। पाश्चात्य देशों में शैतान शब्द की बड़ी चर्चा है, हमारे शास्त्रों में तो भगवान से लड़ने वाले को शैतान कहा जाता है। एक बार की बात है कि एक शैतान को भी विरक्ति जागी और संन्यासी बनने की ठानी। उसने अपनी सारी चीजें बांट दीं, अपना सम्पूर्ण धन खाली कर दिया और छोटी-सी एक डिब्बी उठाकर जेब में रखकर चलने लगा। लोगों ने पूछा—आप सर्वस्व दान कर चुके हैं, पर यह क्या ले जा रहे हैं तो शैतान बोला—मैंने सम्पूर्ण जिन्दगी शैतानी की है और जब संन्यासी बनने जा रहा हूं, अगर वहां मेरा मन न लगा तो मुझे फिर शैतानी करनी पड़ेगी और उसी का यह मूल अस्त्र है जिसके बलबूते मैं शैतानी करता हूं। लोगों ने पूछा—यह शास्त्र तो हम अवश्य देखेंगे और सुनेंगे, तो जानते हो शैतान ने क्या कहा—आलस्य। आलस्य न जाने क्या-क्या करता रहता है? खाली दिमाग शैतान का घर हुआ करता है। खाली दिमाग आलसियों का होता है। वे शेखचिल्लियों की तरह नये-नये सपने देखा करते हैं। जो आदमी बेकार बैठा रहता है उसके लिए इधर-उधर की बाजारू बातें करना ही भगवान का सबसे बड़ा शाप होता है। आदमी का आलस्य तो कम होता जा रहा है, पर यह पलंगों पर बैठने वाली देवियां उपन्यास, रेडियो सुन-सुनकर अपना समय बर्बाद करती हैं। उस आलस्य से उनको कई प्रकार की बीमारियां हो जाती हैं। बड़े-बड़े डॉक्टर—वैद्य आते रहते हैं और इन्जेक्शन लगाते रहते हैं। परिश्रमी मानव का जीवन स्वस्थ रहता है। आप दूसरों को छोड़िये पहले अपने जीवन से आलस्य को हटा दीजिये। यह आलस्य एक बहुत बड़ा शैतान है। थोड़ा-सा कड़ुवा विचार कितनी हत्यायें करवा सकता है। जितने भयानक अपराध होते हैं, वे क्रोध के कारण ही होते हैं।
मेरी छोटी बहिन ससुराल गयी थी। उसकी देवरानी के बच्चा हुआ था, उसकी सास ने उसको गुड़ डालकर दूध पिलाने की बात कही और उसने कहा मैं तो मिश्री मिलाकर दूध पिलाऊंगी। इसी बात पर कहा-सुनी हो गयी और वह रेल की पटरी पर खड़ी हो गयी। सामने से रेल आयी और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। ऐसा आवेश जरा-जरा सी बात पर आता है, मामूली सी कहा-सुनी पर आता है। आवेश जितनी पीड़ा देता है, उतनी सौ चोर-डाकू मिलकर भी नहीं दे सकते। पैसों के पीछे मरा नहीं जा सकता। आवेश में मरा जा सकता है। पैसे न कमायें जायें तो मक्का की रोटी खाकर भी दिन गुजार देने चाहिए, पर दूसरों के साथ धोखा, मक्कारी, बेईमानी आदि क्यों की जाय। इन अपराधों की सजा जेल होती है। अगर मेरे हाथ में सरकार आ जावे तो जो बात-बात पर गर्म हो जाते हैं उनको 20-20 वर्ष की सजा दे दूं। उत्तेजना और आवेश वह चीज है जो परिवार को नष्ट कर देती है। इसी आवेश के कारण भिंड में इतने डाकू हुए कि वह जिला ही डाकुओं के कारण माना जाने लगा। केवल क्रिया की प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया की क्रिया होते-होते लोग डाकू बन गये। एक परिवार के बच्चे को मारा तो मरने वाले परिवार ने उसके बच्चे को मारा और दोनों फरार होकर डाकू बन गये। इस प्रकार भिण्ड और मुरैना पूरे जिले खूंखार डाकू पैदा करने लगे। गुस्से का जवाब गुस्से से देना स्वयं के खून की बलि देना होता है। मैं प्रायः देखता हूं कि ये बहिनें गुस्से में झल्लाती रहती हैं और चूहा आटा खाता रहता है, उस चूहे को कुछ नहीं कहतीं। चूल्हे पर पड़ी-पड़ी रोटी जल जाती है, पर गुस्से में कुछ दिखाई नहीं देता। गुस्सा असंख्य पाप पैदा करता रहता है। मीठापन के अभ्यास से आपका क्या बिगड़ता है। अगर आप आंखों और मुख से मीठे और हंसने वाले होंगे तो लोग आपके पीछे-पीछे फिरेंगे। मनुष्य के हंसते रहने की मुखाकृति के मुकाबले में कोई आकृति नहीं है। हंसते हुए बात करने में सामने बात करने वाला आपका गुलाम हो जायेगा। मैं एक मैजिक (जादू) सिखा देना चाहता हूं कि आप मुस्कराते हुए मीठी बातें करते जाइये, कल तक के विरोधी आपके गुलाम हो जायेंगे। एकबार गुस्से से भरा मुख शीशे में देखिये और एकबार मुस्कुराते हुए देखिये कितना अन्तर होता है। मित्रो! क्या मैंने यह नहीं बताया कि सेवाभावी व्यक्ति का मुस्कुराना विशेष गुण होता है और सेवा सर्वप्रथम स्वयं पर शुरू करनी चाहिए। आप अपने सबसे बड़े सहायक हैं। आप अपने अनेकों मित्र बना लेते हैं तो उतना आनन्द नहीं मिलता जितना अपने आपको मित्र बनाने पर मिलता है। अपने आप में बड़े सहयोगी बन सकते हैं। अमरीका में एक पुस्तक निकली भी आत्महत्या से पूर्व। वह पुस्तक बाजार में बिक रही थी। एक नौजवान जिसको व्यापार में घाटा लग गया था, आत्महत्या करने जा रहा था। उसने उस पुस्तक का विज्ञापन पढ़ा और एक प्रति खरीद कर पढ़ने लगा। उसमें उत्साहवर्धक बातें थीं। पढ़ने के बाद आत्महत्या की बात छोड़ दी। उसको पढ़ते-पढ़ते ही वह लेखक के घर चला गया, परमार्थ की बातें करते हुए उसने कहा कि आपकी पुस्तक में बड़ी उपयोगी सामग्री है। मैं भी मुसीबत में फंसा हूं, मेरी सहायता कीजिये, मुसीबत से निकल जाऊं। थोड़ी देर तो लेखक चुपचाप विचार करता रहा और फिर बोला—मेरे वश की बात नहीं। यह सुनते ही उसके ख्वाब हवा हो गये और वह कुछ तो करिये कह कर चल पड़ा। वह थोड़ी ही दूर चला था कि लेखक ने आवाज देकर उसे पुनः बुलाया और कहा— बैठो! भाई मेरा एक चालाक मित्र अन्दर बैठा है शायद वह तेरी मदद कर सके। कमरे में जाकर लेखक आइने के सामने जाकर खड़ा हो गया और अपनी शकल देखता रहा और बोला—यह मेरा जिगरी दोस्त है, यह मेरी मंजिल को सरल बना सकता है। यह मेरा दोस्त यह कह ही रहा था कि उसने भी आइने में अपनी शक्ल देखी और उसे ज्ञान हो गया कि परमात्मा उनकी सेवा सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं।
मैं सेवा एवं धर्म की व्याख्या कर रहा था। सेवा के बिना जीवन सार्थक नहीं होता है। अपने स्वास्थ्य को संभालकर एक-एक नागरिक की सेवा करनी चाहिए। दुनियां को अपने में ही मानकर या दुनियां के समस्त हिस्सों में अपना हिस्सा मानकर स्वयं भी सेवा करने लग जाइये। दुनियां की सेवा स्वतः होती रहेगी। अपने जीवन को सुगन्धित बनाकर दुनियां को सुगन्धित बनाया जा सकता है। अपने दुर्गुणों को एक-एक करके हटाते जाइये। यही सेवा का लक्ष्य है। सेवा की बात अब आगे बताता हूं। पुण्य और दान की भी बताता हूं। दान के बारे में बहुत गम्भीर हूं। कभी-कभी इन्कार भी कर देता हूं। दान देने वालों ने दुनियां की सेवा की है यह मैं नहीं मानता। आप कहेंगे लोगों ने दान दे-देकर संस्कृत पाठशालायें खोली हैं, उनमें मुफ्त का खाना खा-खाकर भिखमंगे बन गये हैं और भावी जीवन का भी यही मोड़ रहेगा। आचार्य होकर भी भीख की बातें करते हैं। ये छोकरे आपस में निमन्त्रण की बातें करते हैं, ये आपस में जीमने जाने वाली बातें करते हैं और झगड़ा करते रहते हैं। इसी से तो नाश हो गया हमारे बच्चों का। उनका स्वाभिमान नष्ट हो गया। माना कि दान उपयोगी होता है, पर अनुपयोगी भी होता है। पर पंडे-पुजारी आदि लोगों ने जो स्वर्ग के ठेकेदार हैं, ने दान का रुपया लेकर भांग, रबड़ी खाकर कितनों को स्वर्ग पहुंचाया, यह मैं नहीं जानता। ये लोग स्वर्ग में जायेंगे या नरक में जायेंगे यह भी नहीं जानता, पर यह जानता हूं कि इस देश का अस्सी प्रतिशत दान इन पंडों-पुजारियों को मिलता है। अगर इस दान का वे स्वयं के लिए उपयोग करते तो अच्छा रहता। इसीलिए मित्रो मैं सेवा की बात बताता हूं। सेवा रूपी अध्यात्म का बहुत बड़ा फल है। श्रम गरीब है तो क्या है फिर भी बहुत बड़ा है। आमदनी नहीं है तो क्या है? फिर भी आप परोपकारी सेवा भावी हो सकते हैं। आपकी शादी के समय आपकी धर्मपत्नी चौथी तक पढ़ी-लिखी थी पर आप तो आगे बढ़कर पी.एच.डी. हो गये और वह चौथी की चौथी ही रही। आपने क्यों नहीं पढ़ाया उसे। अगर आप वह दोनों एक घंटे प्रतिदिन पढ़ते तो तीस वर्ष में सम्पूर्ण भाषाओं की जानकारी हो जाती। लेकिन आप चार घण्टे फिजूल की बातें करते हैं। आप पत्नी को एक घंटे पढ़ाते क्यों नहीं। आपने उसकी क्या सेवा की। वह गुलाब सा चेहरा और उल्लासपूर्ण जीवन लेकर आयी थी और आपने उसे स्वास्थ्य को चौपट कर डाला, पर आप होश में न आये और बच्चे पर बच्चा लादते चले गये। वह घायल होकर मर गयी। क्या यही सेवा है आपकी धर्मपत्नी की। माना कि आपने साड़ी लाकर दी होगी, मिठाई लाकर खिलाई होगी, पर आपने स्वयं संयम में रहकर उसे भी संयम की शिक्षा दी होती तो उसे भी गुलाब के फूल के समान रखा जा सकता था। आपका साड़ी लाकर देना तो ऐसी सेवा थी जैसे कसाई बकरे को काटने से पहले उसे अच्छा खिलाता है। एक बाप ने अपने शरीर और मन से पाल कर अपनी लाड़ली बेटी दी थी, तो आपको भी उसकी अच्छी सेहत बनानी चाहिए थी और आपने ससुर से यह कहने का अधिकारी होना चाहिए था कि देख तेरी बेटी पहले कितनी पढ़ी थी अब कितनी पढ़ी है। जिसने आपको अपना सब कुछ सौंप दिया उसका भविष्य उज्ज्वल करने के लिए आपने कुछ भी नहीं किया। क्या आप धर्मपत्नी की यह सेवा नहीं कर सकते थे। आप उसके टूटे दिल पर मलहम नहीं लगा सकते थे। आप उसके गुणों की प्रशंसा कर सकते थे। आदमी को बढ़ाने का एक ही तरीका है। उसकी अच्छाइयों का वर्णन किया जाय। यह प्रशंसा ही उसे बड़ा कराती है, उत्साह से ही टूटे दिल तोड़े जा सकते हैं।
माना कि अपने बच्चे के प्रति आपको शिकायत है, पर इसका जिम्मेदार कौन है? आप तो क्लब के मेंबर हैं और ताश चौपड़ खेलते रहते हैं, बच्चों की तरफ कभी देखा भी है क्या? बच्चे जब रोते हैं तो आप उन्हें हंसी-मजाक में शेर और हाथी की कहानी सुनाते हैं और उनमें गलत संस्कार भरते हैं। आपने लड़के को संस्कार दिये होते तो कैसा रहता? आपने बच्चे का कपड़ा दिया, सोना दिया, पर संस्कार कहां दिये? आपने बच्चे का राष्ट्र के लिए क्या दिया? आपने बच्चे को धमकाना सिखाया, उपेक्षा का भाव सिखाया। कोई घर में आया तो कहा—हमारे कुंवरसाहब को देखना कैसे हो रहे हैं। हर वक्त उपेक्षा वाली बात करते रहे, उसका उत्साह गिराते रहे। अगर आप चाहते तो राष्ट्र के लिए एक महान नागरिक छोड़ कर जा सकते थे। महर्षि कण्व ने पालन किया था शकुंतला का और शकुन्तला ने पालन किया था भारतवर्ष बनाने वाले भरत का। एक अस्त्र आपके पास है ‘‘प्यार भरे शब्द’’। जितना प्यास, दुःखी हृदय है, उसी इन्सान को एक-एक प्यार की बूंद देते जाइये। पर आप वह प्यार टपकाने वाले मानव कहां हैं। बूढ़े से लेकर बच्चे तक सभी प्यार के प्यासे हैं। बूढ़ी मां की दूध से प्यास नहीं बुझती, उसको अगर दिन में एक बार भी प्यार भरे शब्दों में पैर दबाने की बात कहें तो वह प्यार भरे शब्दों में कहती है कि जा-जा तुझे काम होगा। आज काम नहीं करना है क्या जा-जा? और भगवान से प्रार्थना करती है कि हे भगवान ऐसा बेटा सभी को दे। हम अच्छे, मीठे, प्यारे वचनों से सबको अपना बना सकते हैं। पर आप तो शराब पीकर आये थे सभी से कड़वी बातें करते रहे। किसी ने आपसे कहा तो तपाक से बोले—कड़वी बात ही सच्ची होती है। लेकिन आप सच्ची बात को भी मीठे तरीके से कह सकते थे। बच्चे को फुसलाकर मीठी-मीठी बातें कहकर प्रोत्साहन देते जाइये, वह भी बराबर के आदमी के समान सहयोग देता जायेगा। मीठे वचनों से ही एक दूसरे को सहयोग मिल सकता है। गलत ढंग से बातें करने से गलतियां स्वतः ही आ जाती हैं। ये हैं मेरे छोटे भाई साहब, अकल देखो कि भैंस। मानाकि यह बात सही होगी, पर इससे भाई-भाई में बैर हो सकता है। सत्य कहने के भी तरीके होते हैं। दूसरों की गुप्त बातों का भण्डाफोड़ करने से उनको पीड़ा स्वतः होगी। इसीलिए मैं कहता हूं कि मित्रो! पहले अपनी सेवा करो, तो देखिये चन्द दिनों में आपकी संस्कृति की सेवा होने लग जायेगी।
आज समाज के विचारों का स्तर इतना छोटा है कि प्रत्येक वस्तु के लिए समस्या पैदा कर देता है, बाधायें उत्पन्न होती रहती हैं। तो मित्रो इन मानसिक उलझनों को सुलझाना ही सच्ची सेवा है। क्या आप उन लोगों को युग निर्माण योजना की बात नहीं पढ़ा सकते, उनको आप प्रेरक विचार नहीं बता सकते। प्रेरक विचार आदमी को बदल सकते हैं। 50 वर्ष भी नहीं हुए कि साम्यवाद आधी दुनिया पर हुकूमत करता है, यह विचारों की ही शक्ति है। रूप में साम्यवाद की विचारधारा पचास वर्ष पहले आयी थी। लोग मजाक उड़ाया करते थे, पर वह विचार तेजी से देशों में फैल गया। कार्लमार्क्स के विचार आज दुनियां को साम्यवाद की ओर ले जाने में प्रयत्नशील हैं। अमेरिका में एक किताब निकली थी। एक साधारण-सा उपन्यास था, पर उसने देश में गृह युद्ध करवा दिया और अमेरिका के राष्ट्रपति ने भी कहा कि साहित्य दुनियां के दिमागों को बदल सकता है। हमारी समस्यायें आन्तरिक दुर्बलताओं की होती हैं। हमें प्रेरक उत्साह की आवश्यकता थी। आप प्रेरक विचारों से घरवालों को बदल सकते हैं। किसी बच्चे को पढ़ाने की बात कर सकते हैं, उनके विचारों को बदल सकते हैं। आज विश्व गोरे और कालों के भेद पर निर्लज्जता पर है। अमरीका जैसा मुल्क भी इस ऊंच-नीच से तंग हैं। ये इन्सान और इन्सान के बीच की खाई और दीवार अवांछनीय हैं, लेकिन आपने अवांछनीयता मिटाने का प्रयत्न कहां किया। बच्चों में अनुशासन की भावना भरिये। धर्मशालाओं की जगह पुस्तकालय बनाइये। बावड़ी की जगह हैण्ड पम्प लगाइये।
ब्रह्मभोज बन्द कर दीजिये, श्रम के कार्यालय खोल दीजिये। अन्न क्षेत्र में लग जाइये, पर भीख मांगने की शर्म मत निकालिए। दान देने वालों ने हमें पुरुषत्व हीन बना दिया। हमारा सम्पूर्ण ब्रह्मतेज चला गया। हमारी आत्मा की कमाई चली गयी। लेकिन आपके विचारों में इस सब के बावजूद भी भीख मांगना रह गया। दान देना हो तो ज्ञान के रूप में दीजिये। आपके अन्न और पानी के बिना कोई मरने वाला नहीं है। दहेज हिन्दुस्तान के लिए कितनी बड़ी समस्या है, जो उम्र भर कमाते हैं, दहेज में निकल जाता है। कर्जदार होते रहते हैं। बैल की तरह बह-बह कर कमाई करते रहते हैं। चिन्तायें अपनी लाड़ली बच्चियों को देख-देखकर बढ़ती जाती हैं। एक बच्ची के बीस हजार लगेंगे तो चार बच्चियों के लिए कहां से लायेंगे। आपको कन्या के विवाह के लिए बेईमान, तस्कर, रिश्वतखोरी मजबूरी में बनना पड़ता है। क्या आपको ज्ञान नहीं आता? आपको अपनी स्त्री के प्रति नैतिक कर्तव्यों का ज्ञान क्यों नहीं? और ऐसी चिन्ताओं से छुटकारा दिलाती है गायत्री माता। सम्पूर्ण विश्व का दर्शन कराती है गायत्री माता। आपको भगवान के दर्शन करवा सकता हूं, भगवान साक्षात्कार कर सकता है, पर मित्रो! भगवान शक्ल के रूप में नहीं आता, ध्यान और चिन्तन की शैली ही उसकी शक्ल होती है। आपका हनुमान तो पूंछ लेकर लपेटकर आ जाता है। यह मान्यतायें केवल स्वप्न हैं। भगवान ने दर्शन दो बार ही राम और कृष्ण के रूप में दिये थे। एक बार यशोदा से कृष्ण को पकड़कर फटकारा और कहा—माटी खाता है। मुंह खोला और मुंह को देखते ही यशोदा ने सम्पूर्ण सृष्टि को उनके मुंह में देखा, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अन्दर कार्यरत था। दूसरी बार कृष्ण ने अर्जुन के समझ विराट् रूप दिखाया था। वे उस रूप को सह नहीं सके, तभी तो भगवान कृष्ण आदमी के वेश में रहे। भगवान राम का रूप काकभुशुण्डि जी ने देखा था। उनके मन में आया कि दशरथ का बालक चावल खा रहा है और वह पास में बैठ गये। चावल खाने के लिए ज्यों ही राम ने मुंह खोला तो काकभुशुण्डि ने देख कर नमस्कार कर लिया। भगवान का स्वरूप मानव समाज के सिवा और क्या हो सकता है? आज तो मन्दिर में गये थे और रोटी ले गये थे और एक भिखारिन रोटी के लिए सड़क पर मर रही थी। आप भगवान को रोटी खिला रहे थे, पर वह बुढ़िया रूपी भगवान आपसे रोटी मांग रहा था, आप मन्दिर में मूर्ति को खिला रहे थे। कैसी विडम्बना है मानव तेरी। भगवान भक्त की वास्तविकता को देखता है।
उत्कृष्ट बनने के लिए व्रत आरम्भ कीजिये। आप गृहस्थी हैं, समाज के दूसरे गृहस्थियों के आप ऋणी हैं, कर्जदार जो हो जावेगा, बारात उसके पीछे लग जावेगी। आप कर्जदार हैं। रामू भेड़िया लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में था। वह कुछ नहीं बोल सका। वह जन्म से ही भेड़ियों के पास रहा। भेड़ियों जैसा ही हो गया। आपके समाज ने उसे कुछ नहीं दिया, तो वह कुछ नहीं सीख सका। आप इस समय जो बोल रहे हैं, वह इसलिए बोल रहे हैं कि आपके मां-बाप ने यह बोली सिखायी है। आपके समाज के महापुरुष वे ऋषि हैं जिनने समाज को उन्नत करने के लिए भाषा को उन्नत करने के लिए अपना सर्वस्व अर्पण किया और भाषा और लिपि का निर्माण किया। हमारी सारी धार्मिक मान्यतायें धर्मशास्त्रों की बनायी हुई हैं। हमारी बीबी पतिव्रत और हम पत्निव्रत की मान्यता रखते हैं, ये सभी ऋषि-महर्षियों की देन हैं। अगर यह नहीं होता तो हमारे और जानवरों के बीच अन्तर ही क्या रहता? क्या ऐसी सेवा के लिए ऋषियों के ऋण से छुटकारा पाया जा सकता है।
आदमी जानवरों से भिन्न है। वह अपने आप रोटी कमा सकता है, पर मानव नहीं कमा सकता। आदमी को मानव बनाने चाहिए। मनुष्य समाज का आवश्यक अंग है और उतनी ही उसकी जिम्मेदारियां हैं। अगर हम मान्यताओं के बन्धन से छुटकारा पा जायेंगे तो पतित हो जायेंगे। अतः सेवा हमारा उद्देश्य होना चाहिए। सेवा के बिना शान्ति नहीं, शान्ति के बिना सुख नहीं। शरीर की मांग सुख है और आत्मा की मांग शान्ति, और दोनों ही मिलती हैं सेवा से और यही सेवा ज्ञान योग है। अब आज की बात यहीं समाप्त। कल गायत्री के पंचमुखों का वर्णन बतायेंगे जो महत्वपूर्ण हैं। अभी तो मेरे साथ शान्ति पाठ बोलिए।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

