बड़प्पन नहीं महानता अपनाएं
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(31 मई 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में प्रातःकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
कल मैंने गायत्री महामंत्र की उपासना का विधान बताने को कहा था। प्रारम्भ का जो रूप बताया गया था वह पर्याप्त नहीं था। जब बच्चा पहली कक्षा में पढ़ने जाता है तो उसे केवल यह कहा जाता है कि तुम बावन अक्षर सीख लोगे तो पढ़ाई आ जायेगी। जब वह बावन अक्षर सीख जाता है तो कहा जाता है कि गिनती और सीखनी पड़ेंगी। बच्चा पूछता है मास्टर जी यह गिनती क्या होती है? तो मास्टरजी कहते हैं बच्चे इससे हिसाब सीखे जाते हैं और बाद में रेखागणित, बीजगणित, बारहखड़ी से साहित्य तक का ज्ञान शनैः शनैः बच्चे को सीखना पड़ता है।
बहुत दिन पूर्व मैंने आपको उपासना की विधि बतायी थी। प्रातः पूर्व की ओर, सायं पश्चिम की ओर सूर्य के सम्मुख रहने की विधि उपासना में बतायी थी। पंच पात्र का जल और दीपक की अग्नि की बात बतायी थी और यह भी कहा था कि सूर्य की धूप और पंचपात्र का जल और दीपक की अग्नि साक्षी के लिए बतायी गयी हैं। वैज्ञानिक आधार पर भी सोचा जाय तो जल और अग्नि में रेलगाड़ी चलती है और उसी प्रकार हमारी उपासना की गाड़ी चलती है, उपासना में भी संतुलन की आवश्यकता रखनी पड़ती है। अग्नि जोश और उत्साह का प्रतीक होती है। जल शान्ति और सन्तुलन का प्रतीक होता है। कभी-कभी ज्यादा जो भी बड़ा खतरनाक होता है, तो कभी थोड़ा जोश भी असफलता दिला सकता है। अग्नि-जल की ये बातें मैंने बहुत पूर्व बता दी थीं। माला जपने का ढंग और जपने में तीन उंगलियों के काम आने की बात भी बतायी थी और यह भी कहा था कि आचमन का पानी सूर्य को नहीं चढ़ाना चाहिए, क्योंकि आचमन का जल झूठा हो जाता है और झूठी वस्तु सूर्य को अर्पित नहीं करनी चाहिए। ये सभी बातें वहीं हैं जो प्राथमिक कक्षा के विद्यार्थी को सिखायी जाती हैं। अब मैं आपको अगली कक्षा की बात बताऊंगा। शरीर तीन होते हैं। जिन्हें स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के रूप में जाना जा सकता है। स्थूल शरीर में अन्नमय कोष, सूक्ष्म शरीर में मनोमय कोष और कारण शरीर में प्राणमय कोष, ज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष का विवरण मिलता है।
इन तीनों शरीरों की उपासना ही फलदायक होती है। शरीर के द्वारा जो जप किये जाते हैं जैसे स्नान करके पालथी मारकर माला फेरना सभी स्थूल शरीर की उपासना है। पूजन भी स्थूल जीवन से होता है। पंच तत्वों से पूजा किस प्रकार होती है ये सभी बातें मैं बहुत पहले आपको बता चुका हूं। अगली बात स्थूल शरीर को शुद्ध रहना चाहिए। कपड़े आदि जो भी पहने जायें वे स्वच्छ रहने चाहिए। सत्यं, शिवं, सुन्दरं के आधार पर इस शरीर रूपी मन्दिर को शुद्ध रखना चाहिए, मैला-कुचैला नहीं। स्वच्छता अध्यात्मवाद का दृष्टिकोण है। एक बार महर्षि सुकरात के पास एक व्यक्ति आया और अध्यात्म की बात पूछी, तो सुकरात ने कल आने को कहा। सभी शिष्य बहुत बड़ी संख्या में वहां सुकरात का उपदेश सुनने एकत्रित हो गये, तब सुकरात बोले— भगवान की ओर चलने का पहला मन्त्र यह है कि सर्वप्रथम अपने बालों को ठीक ढंग से साफ करवाकर यहां आयें। शिष्यों ने कहा गुरुदेव आपने तो व्यवहार की बात बतायी, ज्ञान की बात नहीं बतायी। तो सुकरात बोले—अध्यात्म वहां से प्रारम्भ होता है, जहां से सफाई शुरू होती है। अध्यात्म और सौन्दर्य का प्रारम्भ का नाता है। हर वस्तु को स्वच्छ रखना चाहिए। अतः मित्रो! पूजा का जो आवरण बनाना चाहिए, वह भी पूर्ण आकर्षक होना चाहिए। सभी बातें ढंग की होनी चाहिए। जिससे हमेशा इन आंखों से सौन्दर्य की ओर खिंचते चले जायें। शरीर और वस्त्रों के साथ मन को भी सुन्दर बनाना चाहिए। मन्दिर के भगवान को भी सुन्दर बनाते हैं। उसकी केवल यही आकांक्षा मात्र तो होती है कि बरबस भक्त का ध्यान मूर्ति पर केन्द्रित हो जाये। इसी प्रकार अध्यात्म यह है कि सर्वप्रथम मन शुद्ध होना चाहिए, पर मन शुद्ध हो कैसे? क्योंकि ‘‘जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन।’’ मन को शुद्ध और शान्त रखने के लिए शुद्ध अन्न की आवश्यकता होती है। परन्तु यह मन अशान्त लाल मिर्च खाने से होता है। लाल मिर्चों का तेज मन को भी तेज कर देता है। जिन लोगों का आहार असंतुलित होता है, उसका मन भी असंतुलित और जिनका आहार संतुलित होता है उनका मन भी संतुलित पाया जाता है। अस्वाद व्रत की बात भी तो इसीलिए बतायी थी कि यह जीभ को काबू में लाता है और जीभ का काबू में आ जाना अध्यात्म का मूल उद्देश्य है। अगर आप उपासना को सफल करना चाहते हैं तो गम्भीर होकर आपको मन शान्त करने का उपाय सोचना पड़ेगा और मन शान्त करने के लिए अन्न को सुधारना पड़ेगा। परन्तु आप तो खाने को ही सर्वस्व समझते हो। आप जहां भी बैठते हो पकौड़े, कचौरी खाते रहते हो। आप जहां भी पहुंच जाते हो वहां मास अण्डे आदि तामसिक पदार्थ भी उसी चूल्हे पर पकाये जाते हैं और आपकी वानस्पतिक सब्जी भी वहीं। इसीलिए उनके संस्कार भी उनमें आते हैं। बुरे लोगों का अन्न खाने से भी उनके संस्कार उनमें आते हैं। बुरे लोगों का अन्न खाने से भी दुष्प्रवृत्तियां मन में आती रहती हैं। दुष्प्रवृत्तियां नशे से भी आती हैं। नशा उत्तेजना लाता है और नशा करने से भजन में मन नहीं लगता। इसलिए नशा भी छोड़ना चाहिए। भजन में मन लगाने के लिए पहला काम सात्विक आहार होना चाहिए। मसाले उत्तेजना पैदा करते हैं। हींग लहसुन आदि सभी उत्तेजना के मूल हैं और मन में चंचलता और कामवासना को उद्दीप्त करते हैं।
जब मुझे 24 लक्ष के पुरश्चरण की बात बतायी तो मुझे आहार का भी परिवर्तन बताया। मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहा—केवल जौ की रोटी खाया करो, साग-दाल कुछ नहीं। बिना नमक और मीठे के वह सूखी जौ की रोटी गाय की छाछ के साथ खाता रहा। लोग कहते हैं बिना मक्खन और पुष्ट पदार्थ खाये शरीर निर्बल हो जाता है, पर मुझे उस रोटी और छाछ से वह चमत्कार मिला जो कि पहिये में बॉल बैरिंग लग जाने से प्राप्त होता है। बॉल बैरिंग के पहिये के समान मेरी साधना आगे बढ़ती गयी। छः घण्टे की उपासना करता रहा। यह मामूली बात नहीं थी। आध घण्टे में मन भाग जाता है, माला प्रारम्भ करने से पहले ही मिनट में मन उचट जाता है। मन की वृत्तियां चंचल हो जाती हैं। लेकिन आहार पर नियन्त्रण होने से इस तरह की बातें नहीं होतीं। गांधी जी का भी यही सिद्धान्त था कि यदि आहार को शुद्ध कर लिया जाय तो ब्रह्मचर्यपूर्वक ध्यान किया जा सकता है। एक बार प्राकृतिक चिकित्सक बिट्ठलदास मोदी मेरे यहां आये और उन्होंने कहा— आचार्य जी आज तो रोटी खायेंगे। मैंने कहा—हम तो रोटी ही खाते हैं हलुआ कभी नहीं खाते हैं, तो मोदी जी ने कहा—केवल रोटी ही खायेंगे। जौ और चने की रोटी मात्र हम चबा-चबा कर खाते रहे। ज्यों-ज्यों रोटी का रस काया में मिलता रहा त्यों-त्यों उसका वह स्वाद आता रहा कि हमने कभी उतना अच्छा स्वाद प्राप्त नहीं किया। अगर आप भोजन के अवयवों में से मसालों को हटा दें तो आपको अन्न का असली और मजेदार जायका स्वयं आ जाता है। अन्न की शुद्धता से पेट की सफाई और ब्रह्मचर्य की समस्या ठीक हो जाती है, पर हम तो बिना भूख के भी खाते रहते हैं और खाते-खाते शरीर को बर्बाद कर देते हैं। अगर आप पेट को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो आपको नमक और शक्कर खाना बन्द करना पड़ेगा। धीरे-धीरे पेट की भूख बढ़ती जायेगी। इस प्रकार से आप कई बिमारियों से छुटकारा पा जायेंगे। पिछले दिनों मैं अज्ञात वास में गया था, तब मेरे गुरुदेव ने मुझे चार दिन अपने पास रखा और आज्ञा दी कि छह माह गंगोत्री और छह माह उत्तरकाशी में रहकर साधना करो। उत्तरकाशी में मार्चा सिंगरा साग खाने लगा उबाल कर। पहले दिन साग खाते ही दस्त होने लगे। कई दिन तक होते रहे। पर भगवान की माया ऐसी रही कि इन हरी-हरी टट्टियों से मेरा पेट साफ हो गया। भूख में पापड़ भी मीठे लगते हैं। मुझे वह साग भी बहुत मीठा लगा। इस प्रकार मैं एक-एक सेर साग दोनों समय खाता रहा। केवल उसी साग पर आश्रित रहा। उस साग की मात्रा बढ़ती गयी और मैं अब यहां आया तो मेरा वजन अठारह पौण्ड बढ़ चुका था। लोगों ने कहा— आचार्य जी कहां गये थे, क्या खाया था, बड़े तरोताजा हो गये हो, पर मैंने कहा—केवल मार्चा सिंगरा साग खाया है, तो लोगों को विश्वास नहीं हुआ। अतः आप साग के आधार पर निर्भर रहिये, देखिये आपका स्वास्थ्य कितना अच्छा होता है।
नमक खाना बन्द कर दीजिये, सब प्राकृतिक वस्तुओं में नमक है, फिर आपको अलग नमक खाने से क्या फायदा? यह नमक आप जितना खाते हो उतना ही पेशाब और पसीने से बाहर निकल आता है। अतः आपको उत्तेजना के पदार्थ भोजन से निकाल देने चाहिए। लालमिर्च और हींग को तो अवश्य हटा देवें। लौंग, गर्ममसाले सभी गर्म होते हैं। अगर तामसिक पदार्थों का त्याग कर सकते हैं, तो भजन में मन लग सकता है। अगर आपने ईमानदारी से अन्न कमाकर खाया है, तो वह अध्यात्म की पहली सीढ़ी है। न्याय की कमाई भगवान के प्रसाद के रूप में खानी चाहिए। भोजन हंस-हंस कर खाना चाहिए। अगर भोजन में किसी वस्तु की कमी है तो झगड़े नहीं और ले लीजिये। इससे कुछ बनता बिगड़ता तो है नहीं। ये केवल फिजूल की बातें हैं। एक बार हम झालरा पाटन यज्ञ में गये। वहां एक भावुक लड़की ने सोचा—अरे आचार्य जी आ गये तो वह दौड़ी कहीं से दूध मांगकर लाई और जल्दी-जल्दी में भूल से शक्कर की जगह नमक डाल दिया और दूध का गिलास मेरे पास लायी और मैं गट-गट पी गया। स्वामी प्रेमानन्द ने कहा— अरे! यह क्या कर रहे हो? दूध में नमक है उल्टी हो जायेगी। तो मैंने कहा—स्वामी जी प्रेम के अन्न उल्टी नहीं हो सकती। मैं आपको भगवान का अन्न खिलाने की बात कह रहा था और मैं यह बता रहा था कि यह अन्न हमारे शरीर को जीवित रखने की दवा है। जायका हटाने वाली बात भी एक तपश्चर्या है। जीभ का अन्य इन्द्रियों से अलग महत्व है। वह स्वादेन्द्रिय और वाकेन्द्रिय दोनों हैं। जीभ पर काबू पाने वाला ही सच्चा अध्यात्मवादी कहलाता है। जो आदमी अनेक विकट परिस्थितियों में भी शान्त रहे वही अध्यात्मवाद का प्रारम्भीकरण है और सभी समस्याओं का अन्त भी। उत्तेजना के समय अगर थोड़ा-सा गर्म रुख अपना लिया जाय, तो कई झंझट समाप्त हो सकते हैं। अगर कड़े शब्दों पर कड़ाई से ही सोचा जाय तो बड़ा विनाश हो सकता है। द्रौपदी ने दुर्योधन को कड़े शब्द कह दिये थे, तो महाभारत हो गया। अगर आप की जबान पर काबू हो तो समस्याओं का हल हो जाता है। मैं हर समय लड़ाई की बात सुनता रहता हूं। बड़े अफसरों की छोटों के प्रति शिकायत, छोटे कर्मचारियों को बड़े अफसरों का रुख पसन्द नहीं। वे उनकी निन्दा करते नहीं थकते। पर तुमने बोलना सीखा ही कहां है? केवल कड़ा रहना, केवल कड़ा बोलना ही तो सीखा है। लेकिन आपको मीठा बोलना भी सीखना चाहिए। अगर अपनी वाणी को बदल सकते हो तो तुम स्वयं बदल सकते हो। जीभ की इन्द्रिय को काबू में लाना अध्यात्म की पहली तपश्चर्या है, जीभ का स्वाद और बोलने का ढंग ठीक कर लेता है तो यहीं से आध्यात्मिक शिक्षा प्रारम्भ हो जाती है। जो आदमी ज्यादा बोलता है वह सत्य नहीं बोल सकता। उसे कहीं न कहीं तो झूठ बोलना ही पड़ता है। अतः आवश्यक ही बोलना चाहिए। इसी प्रकार स्वाद और वाणी रूपी जीवन पर काबू पाना गायत्री उपासना का प्रथम चरण है।
जप करने के साथ सूक्ष्म शरीर का समावेश करना पड़ता है। सूक्ष्म शरीर मस्तिष्क को कहते हैं। ध्यान के द्वारा सूक्ष्म शरीर का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ध्यानावस्था सूक्ष्म शरीर की उपासना है। जप के साथ-साथ अपने ध्यान की बातें बार-बार दोहरायी जायें, उसे ध्यान कहते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं। पहला अपने सम्बन्ध में और दूसरा भगवान के स्वरूप के सम्बन्ध में। पहले अपने को बताना पड़ता है। हम उपासना करते हैं तो कल्पना के द्वारा मथुरा में बैठे-बैठे कैलाश का आनन्द लेते हैं। वैसे कहां कैलाश और मथुरा, पर ध्यान के द्वारा यह आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। लोग कहते हैं भगवान इतनी दूर हों तो यह कैसे समझा जा सकता है। लाइन कैसे मिले उनसे बात करने की। पर उपासना का शाब्दिक अर्थ होता है पास में बैठना। जैसे ताश खेलने वाले पास में बैठ-बैठकर ताश का मजा ले सकते हैं, उसी प्रकार भगवान के पास बैठकर, आ मेरे भगवान, आ बातचीत करें, अपने दुःख की बात सुनाऊं और तुम्हारी बात सुनूं। आ अपन प्यार-प्यार की बातें करेंगे। अपनी पूरी कहानी सुनाते जायेंगे, अपन दोनों आपसी शिकायत सुनकर समझौता कर लेंगे। पति-पत्नी में शिकायतें होती रहती हैं, पर जब वे आपस में मिलते हैं तो कहते हैं जो कुछ हुआ आज तक हुआ वह यहीं पर समाप्त, अब आगे से प्रेम से रहेंगे। इसी प्रकार उपासना करते समय अपने भगवान को बुला लीजिये। अंगीठी पास में न आने से सर्दी दूर नहीं हो सकती। उसी प्रकार भगवान के पास आये बिना शान्ति सम्भव नहीं हो सकती। मैंने पहले क्षीरसागर में भगवान की बात बतायी थी। देवी आपके चारों ओर रहती है। पास में बैठी हुई देवी की कल्पना करनी चाहिए। मित्र जैसे पास में बैठा हुआ परामर्श दे रहा हो वैसे ही भगवान को पास में बैठा कर आनन्द की भावना करनी चाहिए। भगवान की समीपता को तरीके से अनुभव किया कीजिये।
लेकिन भगवान का स्तर भी होना चाहिए। इसके पूर्व यह है कि अपना स्वयं का कलेवर ठीक करना चाहिए। आचमन, पवित्रीकरण, प्राणायाम, न्यास करना उपासना के प्रारम्भ में आवश्यक है। उन सबका उद्देश्य शरीर को शुद्ध करके गायत्री मंत्र का उच्चारण करना होता है। गन्दे मन से कभी भी उपासना नहीं करनी चाहिए। अपना ध्यान बालक के रूप में करना चाहिए। जैसे माता की गोद में बालक बैठकर वात्सल्य का आनन्द प्राप्त किया करता है, उसी प्रकार कल्पना ध्यान करना चाहिए और अपने सभी झंझटों को भूल जाना चाहिए। जिस प्रकार बच्चों का मन कितना निर्मल, चिन्ता रहित होता है उसी प्रकार मन रखना चाहिए। उपासना के आरम्भ में वासना को हटाना पड़ता है। भीम को अपना रूप दिखाने के लिए कीचक को मार भगाना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार वासना रूपी कीचक को हटाने से ही उपासना चमत्कृत लाभ देने में समर्थ होती है। यह ह्रीं श्रीं क्लीं का बीज तुम में से कोई साधक अपनी साधना में न लगाये। अगर आप लगायेंगे तो आप कामना की उपासना करते हैं भगवान की नहीं। भगवान के लिए अपना मन निर्मल करना पड़ता है। जिस प्रकार बच्चे को मां देखने की इच्छा होती है उसी प्रकार (अनिच्छा) की उपासना होनी चाहिए। वेश्या भी प्रेम करती है और पत्नी भी प्रेम करती है, पर वेश्या का प्रेम सिर्फ पैसे से प्रेम होता है और पत्नी का प्रेम मन से। उपासना में ध्यान कामना का नहीं भगवान का करना चाहिए। हम अपने आप में पूर्ण हैं। हम अपनी आत्मा से ही पूर्ण हो सकते हैं। हम दूसरे व्यक्ति से सेवा की आकांक्षा कर सफल नहीं हो सकते। अगर आप जरा उपनिषदों का ज्ञान ढंग से सीखो तो उसमें स्पष्ट है कि अरे मनुष्यों! अपने को जानो, समझो और देखो। अभी पिछले दिनों मैंने एक पुस्तक पढ़ी ‘‘क्या खायें क्या न खायें?’’ उसमें लिखा था कि सामान्य खाद्यों से गर्मी पैदा होती है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। शरीर स्वयं एक पूर्ण इकाई है। इसमें कोई और पूर्ति नहीं हो सकती। मांस खाने से भी वही प्राप्त होता है। व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है। वह अपने आप में आप्त है और जो कुछ खायेगा उसके अपने आप वही रस बनेंगे चाहे विभिन्न वस्तुओं का रसास्वादन किया हो। मैं आपको उपासना पर भावना और ध्यान की बात बता रहा था और भगवान का ध्यान करने की बात बता रहा था और यह भी कह रहा था कि मस्तिष्क से सैकड़ों धारायें निकलती हैं। यह सभी किरणें सूर्य की किरणों और एक्स-रे की किरणों के समान होती हैं। इनका अगर केन्द्रीयकरण कर लिया जाय तो जिस तरह एक आतिशी शीशे से एक बिन्दु पर प्रकाश केन्द्रित करने से आग लग जाती है, वैसे ही प्रकाश की किरणें उत्पन्न हो जाती हैं। धूप में चूल्हे का कार्य मैंने देखा था, बड़ा अच्छा था। हमारे अन्दर भी सूर्य है, परन्तु उसकी धाराओं का केन्द्रीयकरण करना पड़ेगा। चित्त की वृत्तियों को एकाग्र करके जिधर भी लगा देंगे चमत्कार होगा। ध्यान की एकाग्रता साधारण प्रणाली नहीं बल्कि पूर्णतः वैज्ञानिक प्रणाली है। अतः इस ध्यान को गायत्री साधना में लाना चाहिए। फौलाद की जैसी सीमा बांधकर उसके यन्त्र, शास्त्र बना लिए जाते हैं या अन्य उपयोगी वस्तु बना ली जाती हैं। उसे साकार क्रियात्मक ज्ञान कहते हैं। इसी प्रकार एक स्वरूप की सीमा बांधकर साधना की जाती है तो उसे साकार साधना कहते हैं।
किसी भी वस्तु को ध्यान से देखने के लिए घूर कर देखा जाता है। घूर कर देखना मैस्मरेजम का पहला चरण है। प्रत्येक देवता की मूर्ति को घूर कर देखना चाहिए। ध्यान से देखिए, बहुत गौर से देखिए। इससे स्वतः चित्त का डोलना बन्द हो जायेगा। किसी भी वस्तु की बारीकी से देखने से भी मन का भागना बन्द हो जाता है। अतः एक-एक चीज पर तन्मय होते चले जाइये। उन्हें खूब बारीकी से घूरते चले जाइये, उसकी अन्दर तक उसकी तह तक पहुंचिये स्वतः ध्यान केन्द्रित होता रहता है।
दूसरी उपासना का विवरण निराकार शब्द से होता है। इसमें एक बिन्दु की साधना करनी पड़ती है। इसे वृन्द योग भी कहते हैं। इसमें प्रकाश का भी ध्यान किया जाता है। प्रातःकालीन सूर्य इस ध्यान के लिए सर्वोपरि है। एक सेकेंड उसी ओर देखें, आंखें बन्द कर लें और ध्यान करें कि प्रकाश की किरणें मेरे में समाविष्ट हो रही हैं। लाल सूर्य को देखते-देखते ध्यान लगाते रहना चाहिए। लेकिन यह साकार और निराकार दो अलग-अलग विधान नहीं हैं। मित्रो! यह केवल एक ही विधान है। साकार मन को भागने से रोकता है और निराकार ध्यान को एक केन्द्र बिन्दु पर टिकाता है और यही ध्यान टिकने पर परकाया प्रवेश हो सकता है। एक निगेटिव से हजारों पॉजिटिव बन सकते हैं।
मैंने आज प्रातः उपासना की तीन भूमिकायें बतायी थीं और वह थीं स्थूल शरीर के द्वारा जप, सूक्ष्म शरीर के द्वारा ध्यान और तीसरा शरीर कारण शरीर बच जाता है और उसे लिए होती है—भावना। जब तीनों मिल जाती हैं, साधना पूर्ण हो जाती है। दो चीजों के मिलने से भाव उत्पन्न होते हैं, इसे प्रेम या भावावेश ही तो कहते हैं। बिछड़े हुए भाई-भाई या पति-पत्नी इकट्ठे होते हैं तो उनमें नयी भावनायें उत्पन्न होती हैं। उनकी आंखों में जो आंसुओं की झड़ी रहती है उसका आनन्द कुछ और ही होता है। गाय के पास बछड़ा छोड़ने से वह भावातुर होकर दूध देने लग जाती है। निगेटिव और पॉजिटिव या धन एवं ऋण मिलने से एक शक्ति प्राप्त हो जाती है। जप और ध्यान की समीपता से भावना पैदा होती है। बाप और बेटा दोनों समुद्र द्वारा कहीं जा रहे हों और रास्ते में समुद्र में ज्वार-भाटा आ जाये तो एक-दूसरे पर न्यौछावर होने पर उतारू हो जाते हैं, यह भावावेश ही तो होता है। अगर जप, ध्यान का सामंजस्य हो जाता है तो भावना रूपी ब्रह्मानन्द प्राप्त हो जाता है। ब्रह्मानन्द कैसा होता है? क्या इसकी तुलना विषयानन्द से की जा सकती है? यह गन्दा-फूहड़ दो आदमियों के मिलन का बेकार उदाहरण भी मैंने यहां दे दिया, पर यह सत्य ही है। पहले हमने बताया है कि दीपक और पतंगा के माध्यम से ध्यान शुरू किया जा सकता है क्योंकि उसमें शमा भी जलती है परवाने की तरह और परवाना जलता है शमा की तरह। सभी जलते हैं अपनों के लिए। ध्यान की यही सर्वोत्तम सीढ़ी है। भगवान भी जलता है और भक्त भी। दोनों अपनी-अपनी सत्ता को समाप्त कर आपस में जब मिलते हैं, तो एक असाधारण सुख की अनुभूति होती है।
एक ध्यान का तरीका और बताया था कि गायत्री मां है और हम छोटे बच्चे उसकी गोद में बैठे हैं। यह ध्यान भी बड़ा प्रभावशाली होता है। ध्यान में भगवान को बड़ा नहीं मानना चाहिए, उसको अपने बराबर का साथी मानना चाहिए। नहीं तो बड़े के सामने मन की बात नहीं कही जा सकती। मीरा के ध्यान को देखिये, उसने पत्थर को प्रीतम बना लिया था। यह केवल कल्पना मात्र ही तो थी। परन्तु यह भी सिद्धान्त था वेदान्त के आधार पर। रामदास गौड़ की एक पुस्तक है— वैज्ञानिक अद्वैतवाद। उसमें लिखा है कि यह सारी दुनियां भावना पर जिन्दा है। भावना के बिना कुछ नहीं। जिसको भावना से अच्छा मान लिया वह अच्छा और जिसको बुरा मन लिया वह बुरा। सभी कल्पनायें ही तो मान्यतायें हैं और सम्पूर्ण दुनियां भावनाओं पर ही जिन्दा है। भावनाओं का वैज्ञानिक महत्व है और यही अध्यात्मवाद की सही स्थिति है। तो मैंने आज आपको जितनी बात बतायी उसमें यह कहा था कि जप, ध्यान और भावना उपासना की सिद्धि का रहस्य है और भगवान को हमेशा अपने समीप रखना चाहिए। अच्छा अब मेरे साथ शान्ति पाठ बोलिए।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

