सार्वभौम उपासना का प्रारंभ
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(21 मई 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में सायंकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
प्रातः मामूली-सी बातें हुई थीं। गायत्री उपासना आरम्भ करने की बात बतायी थी, परन्तु साधना के विधि-विधान के न होने से उपासना अधूरी रह जाती है। बिना विधि-विधान के उद्देश्य पूरे नहीं होते। बिना विधि ली हुई औषधि बीमारी को दूर करने में समर्थ नहीं होती। कई ऐसे भी होते हैं, जो दुनियां को विधि बताते हैं, पर स्वयं विधि का प्रयोग कर लाभ नहीं उठाते।
गायत्री मंत्र का बहुत बड़ा महत्व है। इस मंत्र में अपार शक्ति है। महर्षि विश्वामित्र ने इस मंत्र की शक्ति से नयी सृष्टि का निर्माण किया। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण जगत् में गायत्री मंत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं। सभी महापुरुषों ने गायत्री की साधना की। मुझे पुराना इतिहास सुनाने दीजिये और उस पुराने इतिहास में देखेंगे कि उसमें गायत्री मंत्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
इन पिछले दो हजार वर्षों में हमारी स्थिति बिगड़ गयी। हम संकीर्ण बन गये। मेढ़क की तरह अपने तालाब को संसार समझने लग गये। मुसलमान आज से करीब हजार वर्ष पहिले भारतवर्ष में आये थे। जब वे आये तब केवल वे 1500 की संख्या में थे और एक हजार वर्ष तक शासन करते रहे, यह समर्थता मुसलमानों की नहीं थी, यह कमजोरी हमारी मतिभ्रम की थी। हमारी आत्माएं कमजोर हो गयी थीं और यही वजह थी कि यहां जो भी आया शासन करता रहा। कोई भी कौम यहां से खाली हाथ नहीं गयी। जो भी आये, राज्य करते गये। एक देश जापान भी है, वह भी दस वर्ष गुलाम रहा, पर पुनः स्वतंत्र हो गया। जर्मन युद्ध में दो बार पराधीन हुआ, पर साधन सम्पन्न होकर पुनः स्वतंत्र और उन्नत हो गया। दुनियां का इतिहास बताता है कि जीवित कौमों पर विदेशी हुकूमत नहीं कर सकता। हम एक हजार वर्ष तक गुलाम रहे। ऐसा कलंक दुनियां में किसी भी जाति व देश को नहीं लगा। यह कलंक जयचन्द और मीर जाफरों की देन नहीं, यह आरोप उन पर नहीं कि वे दुश्मन के साथ मिल गये जिससे हमारी यह गति हो गयी। मित्रो! यह दोष केवल हमारे मति विभ्रम का है। आज हमारे समाज में आयी निराशा उसी मति विभ्रम का रूप है।
आज हम कहते हैं चीन का हमला क्यों हुआ? यह तो भगवान की इच्छा थी। पाकिस्तान का हमला क्यों हुआ? यह भी भगवान की इच्छा थी। हिन्दुस्तान में गौवध क्यों होता है? यह भी भगवान की इच्छा है, पाकिस्तान का निर्माण किसने करवाया? यह भी भगवान की मर्जी थी। ऐसी गन्दी फिलॉसफी हमें ले डूबी। क्या भगवान ऐसा गन्दा काम कर सकता है? मित्रो! कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं। इस तरह के निराशा के विचार गुलामी आने के सौर वर्ष पहले यहां आये और हम गुलामी में जर्जरित हो गये। हमारे जीवन की क्रान्ति नष्ट हो गयी। मुसलमान आये, उन्होंने सोमनाथ, कृष्ण जन्मभूमि मथुरा, राम जन्मभूमि अयोध्या के मन्दिरों को रौंद डाला। हमारे कमजोर भाइयों को बलात् अपने धर्म में दीक्षित कर लिया और हम भगवान की इच्छा मानकर चुपचाप बैठे रहे। जो कौम अपने विचारों को खो बैठती है, उसका यही हाल होता है। लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे अध्यात्म की एक फिलॉसफी थी, पर एक अभागा समय ऐसा आया कि उसने अनेक सम्प्रदाय दिये, अनेक धर्म दिये, अनेक जातियां दीं फलस्वरूप हम मति विभ्रम हो गये।
मित्रो! मैं पुरानी कथा सुनाता जा रहा हूं। हम पहले क्या थे? कितने महान थे? आज जाति और मजहब के नाम पर हम बंटे बैठे हैं। हम आज एक एकादशी के व्रत का निर्णय नहीं कर सकते, हम आज कृष्ण जन्माष्टमी एक दिन नहीं मना सकते। कोई कहते हैं कि भगवान जिस रात्रि जन्मे उसी दिन जन्माष्टमी, कोई गोकुल पहुंचने वाले दिन को, तो कोई द्वारिका पहुंचने वाले दिन को उनका जन्म मानते हैं। शास्त्रों में जन्माष्टमी मनाने की अलग-अलग बातें लिखी जाती हैं। जैसा मन में आया, वैसा लिख दिया। ऐसी अतार्किक गन्दी परम्परा बनाकर हमें बर्बाद कर दिया।
एक जमाना था, जब एक महान राष्ट्र अपना था, एक महान धर्म अपना था, एक महान संस्कृति अपनी थी। तभी अपना देश जगद्गुरु के सिंहासन पर विराजमान था, एक महान आध्यात्मिक उपासना थी और वह थी—गायत्री उपासना।
गायत्री महामंत्र की उपासना ब्रह्मा से प्रारम्भ हुई। यह मंत्र उन्हें परमात्मा की वाणी से प्राप्त हुआ था। उन्होंने इस मंत्र को दो रूप में बनाया—एक सावित्री के रूप में और दूसरा गायत्री के रूप में। सावित्री को सांसारिक निर्माण के लिए प्रयोग किया और गायत्री को ज्ञान तत्व के रूप में बताया। इस ज्ञान तत्व रूपी गायत्री साधना को ही हमारे ऋषि-महर्षियों ने समझा और उपासना की। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि, दुर्वासा आदि सभी ऋषियों ने गायत्री उपासना की। हर महान व्यक्ति के साथ गायत्री उपासना जुड़ी रही। आप जानते ही हैं कि भगवान राम को महर्षि वशिष्ठ ने गुरु दीक्षा में गायत्री मंत्र दिया। महर्षि संदीपन ने भगवान कृष्ण को गायत्री उपासना करने का निर्देश किया। सारी महिमा गायत्री की ही है। गायत्री उपासना से मानव देवता बन सकता है। पर आप कहेंगे गुरुजी हम को लाभ क्यों नहीं मिला? गुरुजी हमें तीन माह जप करते हो गये, हमारे अन्दर विलक्षण शक्ति क्यों नहीं आती? मित्रो! मैं यही बात बताना चाहता हूं और वह बात यह है कि बिना विधि सफलता प्राप्त नहीं होती। ठीक उसी प्रकार जैसे बिना विधि औषधि स्वास्थ्य लाभ नहीं करती। दवा का अलग विधान है। हर गृहस्थी का अलग विधान है। समाज की सेवा संस्कृति का अलग विधान है। ठीक उसी प्रकार गायत्री उपासना का भी अलग विधान है, उसके अपने तौर-तरीके हैं।
गायत्री उपासना आरम्भ करने के दो विधान हैं। उनमें एक है—कर्मकाण्ड और दूसरा है भावना। कर्मकाण्ड की विधि यह है कि माला किस प्रकार से जपनी चाहिए, आसन कैसा होना चाहिए, मुख किधर रहना चाहिए, माला से कौन-सी उंगली लगनी चाहिए और मन्त्र कैसे बोलना चाहिए। यह कर्मकाण्ड उपासना का कलेवर है, प्राण नहीं। उपासना का प्राण भावना से आता है। वे अधिक सफल होते हैं, जो साधना के साथ भावना रखते हैं। बिना भावना के फल नहीं मिलता, केवल कर्मकाण्ड कुछ नहीं दिला सकता। बेचारे से पण्डित-पंडे सब कुछ कराते हैं, सब कुछ करते हैं, पर स्वयं भूखों मरते हैं। श्रीसूक्त का पाठ करने से सेठ के यहां लक्ष्मी आ जाती है और पण्डित उसके पाठ कर-कर के सेठ को लक्ष्मीपति बना देता है, पर वह स्वयं धनवान बनने के लिए श्रीसूक्त का पाठ नहीं करता। मित्रो! उसकी भावना नहीं है, वह विश्वास रखता तो दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए करता। मित्रो! यह दाल में काला है।
एक मच्छर था। उसने शहद की मक्खियों के छत्ते के पास जाकर कहा— हम आपको संगीत सिखाना चाहते हैं। सभी मधुमक्खियों ने कहा—हम जरूर सीखेंगे संगीत, पर हम अपनी रानी जी से पूछ आयें। मच्छर ने कहा—हां-हां जरूर। वे मक्खियां रानी जी के पास गयीं और रानी से सम्पूर्ण विवरण कहा। रानी ने सोचा, क्या कारण है यह संगीतज्ञ बिना बुलाये हमें संगीत सिखाने आया है तो उसने एक मक्खी को बुला कर कहा—जा मास्टर जी से पूछकर आ, महाराज आप हमें संगीत क्यों सिखाना चाहते हैं? मक्खी ने मच्छर से यही बात पूछी तो उसने उत्तर दिया—ऐ मक्खी तुम अपनी रानी से कह दो हम तुम्हें संगीत सिखायेंगे और तुम हमें शहद खिलाना। रानी ने जब यह सुना तो कहा— कोई संगीत नहीं सीखेगा। इस मास्टर के मस्तिष्क में संगीत के प्रति आस्था कहां? यह तो शहद का भूखा है। मित्रो! ठीक उसी तरह यह पण्डित उस श्रीसूक्त के उपासक नहीं यह तो इनकी दुकानदारी है। एक हजार वर्ष तक निरन्तर उपासना करने वाला भी बिना भावना के कुछ नहीं पा सकता और भावना युक्त होने से एक सेकेंड में सब कुछ पा सकता है।
मैं आप लोगों को कर्मकाण्ड की बात बता रहा था। सही कर्मकाण्ड जानने वाला किसी के दरवाजे पर नहीं जाता। ये कथा कहने वाले सभी के दरवाजे पर जाते हैं, वहां जवाब मिलता है, पण्डितजी जरा तो सोचो अभी छः माह पहले तो कथा हुई थी, हम भी तो गृहस्थ हैं, क्या आप हमें साधु बनाना चाहते हो? मित्रो! बिना भावना के कर्मकाण्ड की यही गति होती है। भावना, साधना और उपासना कथा का प्राण है। एक शबरी नाम की स्त्री थी, जाति की भीलनी, पण्डितों ने उसका बायकाट कर दिया था और वह भीलनी अलग बैठी रहती। जिस तरफ से ऋषि निकलते उस रास्ते को झाड़ू लेकर साफ करती, कहीं ऐसा न हो कि किसी ऋषि के पांव में कोई कांटा चुभ जाय और इस सेवा के साथ राम राम का जप भावना से करती रही। वह शबरी किसी के यहां राम की कथा सुनाने नहीं गयी। वह स्वयं राम की कथा सुनाती रही और सुनती रही। उस शबरी का घर पूछते-पूछते, तलाश करते हुए भगवान राम खुद उसके यहां पधारे। यह होता है भावनाओं का चमत्कार।
कर्मकाण्ड के प्रत्येक तरीके नियमित होने चाहिए। नियमित स्थान और शुद्ध तरीके से साधना करनी चाहिए। प्रातः स्नान करके, शुद्ध कपड़े पहिन, साधना स्थान पर पूर्वाभिमुख हो करके, पालथी मारकर बैठें। संध्या सहित श्रद्धा भावना के साथ साधना करनी चाहिए। यही कर्मकाण्ड पर्याप्त है। ज्यादा कर्मकाण्डों का कोई महत्व नहीं होता। साधारण उपासना का यही तरीका पर्याप्त है। गायत्री पुरश्चरण की विधि अनेक पुस्तकों में वर्णित है, पर कर्मकाण्ड में ज्यादा नहीं उलझना चाहिए। एक विद्वान थे, बड़े विद्वान। उनने साधना की बड़ी विधि बतायी। हम भी उनके पास गये, तो उन्होंने कहा—दुनियां को बताने की विधि और—अपने लिए विधि और। मित्रो! ये दुनियां को बताने की बड़ी-बड़ी विधियां किसी काम ही नहीं। केवल भावना से युक्त साधारण कर्मकाण्ड को लेकर की गयी उपासना भी सफल हो सकती है।
उपासना के लिए विधि और भावना का समावेश मैं आपको बता चुका। इसके बाद की जो बात आपको बताना चाहता हूं वह है—अटूट श्रद्धा। आप में अटूट श्रद्धा नहीं है। तुम भगवान को केवल इस मतलब से पूजते हो कि वह अपना काम कर देगा। आपने भगवान को उल्टा समझा है, कभी उसका महत्व नहीं समझा। जो चीज छोटी होती है वह छोटी ही सबको समझती है। छोटे बच्चे के बर्तन भी छोटे होते हैं। ठीक उसी प्रकार आपने भगवान को भी अपना छोटा-सा नौकर समझ लिया। छोटे जमाने में पैदा हुए तो भावना भी छोटी। एक आने का शालिग्राम खरीद लाये हैं और एक अगरबत्ती और एक हनुमान चालीसा का पाठ पर्याप्त है और भगवान की कृपा की आकांक्षा रखते हैं। आप जैसों का छोटा वर्ग भगवान को भी छोटा करता जाता है। हे भगवान! यह ले पांच पैसे का प्रसाद और हमें पास कर देना। यह गन्दी फिलॉसफी भगवान के महत्व को कम करती है।
आज हमारे गांव में भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी आ जायें तो हम क्या-क्या तैयारियां करते हैं, पूरा गांव साफ हो जाता है, सड़कें बनती हैं, द्वार लगते हैं, इसी प्रकार राजस्थान में उसका मुख्यमंत्री श्री सुखाड़िया और उत्तर प्रदेश में वहां के मुख्यमंत्री चरणसिंह आ जावें तो भी अपना सब कुछ करते हैं। वह इसलिए करते हैं कि हम उनका महत्व जानते हैं कि मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री के सहयोग से हम क्या-क्या कर सकते हैं और उस महत्व के लिए उनके आगमन पर कितनी तैयारियां करते हैं, पर मित्रो! हम भगवान की कीमत नहीं जानते, जिसके एक कृपा शब्द से न मालूम हम क्या बन सकते हैं, ऐसे महान भगवान जो सर्वशक्तिमान हैं उनकी कीमत हम नहीं जानते। पत्नी अपने पति की कीमत जानती है, वह जानती है कि पति का प्यार उसका निर्माण करने वाला होता है, पर आप भगवान की कीमत नहीं समझते, वो महान भगवान जिसकी सत्ता में इस सूर्य के नौ ग्रह चक्कर लगाते हैं, सूर्य कितना बड़ा है, इसकी कल्पना मेरे मन में तब पूरी हुई जब मैंने बम्बई की एक लेबोरेटरी में इसका स्वरूप देखा। मुझे बताया गया कि इस सूर्य के समान कई सूर्य और हैं। इस इतने बड़े ब्रह्माण्ड का विधिवत् संचालन करने वाले सत्ताधारी का प्रेम और आशीर्वाद मिल जाय तो हम क्या से क्या हो सकते हैं? यह भावना अगर मन में आ जाय तो उपासना का तरीका बदल जाता है। ऐसा अटूट श्रद्धा से होता है। लेकिन हम यह सब कुछ भूल जाते हैं। हमारे सामने केवल हमारी कठिनाइयां ही रहती हैं। हम अफसरों की कीमत जानते हैं, पर भगवान की नहीं। लेकिन सच्चा उपासक भगवान की कीमत जानता है। वह सब कुछ कर सकता है, वह ध्रुव बन सकता है। काश आप भी भगवान की शक्ति की कीमत जान पाते। काश आप इसकी महत्ता को जान जाते तो आपकी उपासना का तरीका ही और होता। कदाचित आपके मन की संकीर्णता निकल जाती, तो आज आप कुछ और ही होते। एक हमारे ही गांव में रामनारायण थे। उत्तर प्रदेश के एक स्टेट में पांच रुपये महीने की नौकरी पाते थे और वे लखपति बन गये। जब हमने उनसे पूछा कि आपके लखपति बनने का रहस्य क्या है? वे बोले—मैं बहूजी का समान लाता हूं और बहूजी मुझे जो पैसे देती हैं उनका हिसाब नहीं लेती, यही मेरा रहस्य है। इसी प्रकार भगवान भी जो देता है, उसे वापस नहीं लेता, पर आप भगवान की नौकरी करते करते कहीं बहूजी की सेवा न करने लग जायें। रामनारायण को बहूजी का ज्ञान होने से इतना लाभ हो गया। इसी प्रकार यदि भगवान का ज्ञान हो जाये तो मजा आ जाये।
आज हमारी उपासना निष्प्राण है। आज हम पूछते हैं गुरुजी! गायत्री के तीन ॐ लगाने चाहिए या पांच और इनके लगाने से क्या सिद्धि होती है। पर इससे क्या होता है? आप तत्व तो समझते नहीं। तत्व समझा था महर्षि वाल्मीकि ने, जो मरा-मरा कहने वाला था, पर ऋषि बनकर महान हो गया। भगवान राम उस ऋषि का विश्वास करते थे। दुनियां में असंख्य ऋषि थे, पर भगवान राम ने सीता को महर्षि वाल्मीकि के यहां ही भेजा, क्योंकि वे जानते थे कि वाल्मीकि तत्वज्ञानी हैं और रक्षा करने में समर्थ हैं।
आज हम नकली चेहरे लगाकर नाटक में अभिनय कर रहे हैं। कोई काली बनता है, कोई हनुमान तो कोई और कुछ। नकली देवता बनकर पूजा करवाते हैं। जब उनसे पूजा जाता है तो कहते हैं—यह तो कलियुग है। इसमें महापुरुष पैदा ही नहीं हो सकता। तो मैं पूछता हूं कि भगवान गौतम बुद्ध, गांधी, मीरा, सूरदास, दयानन्द, विवेकानन्द कौन से युग में पैदा हुए थे, तो वे निरुत्तर रह जाते हैं। महापुरुष युग के साथ नहीं चलता, जो पुरुष युग को बदल देता है, वही महापुरुष होता है। महापुरुष की अपनी उपासना होती है। उपासना में भगवान को जीवन्त-जागृत बनाने का एक ही तरीका है और वह है—भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास। जिस व्यक्ति में अटूट श्रद्धा होती है उसका तौर-तरीका, चाल-ढाल का रंग कुछ और ही होता है। वह कभी नहीं सोचता कि मैं चारों ओर से भय से घिरा हुआ हूं। जो यह मानकर चलता है कि भगवान मेरे चारों ओर है, वह यह भी मानकर चलता है कि मुझे कोई मार नहीं सकता। यह विश्वास कबीर को था। उसने कहा—
जाकौ राखै साइयां मार सके ना कोय। बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय॥
जो भगवान को मानता है वह निर्भय हो सकता है। भय दो प्रकार के होते हैं। एक परिस्थितियों का भय और दूसरा मनुष्यों का भय। एक भय प्रकृति द्वारा निर्मित होता है और दूसरा मनुष्यों द्वारा। सच्चा उपासक इन भयों की उपेक्षा करता है लेकिन आप में निर्भयता कहां? आपसे की गयी एक दिन की हंसी उपासना छुड़ा सकती हैं। एक थे एम.ए. के छात्र और मन में साधना करने की ठान ली और छात्रावास में पंच पात्र लेकर बैठ गये संध्या करने। इतने में दो तीन साथी आये और पंचपात्र उठाकर पानी पी गये और कहा— अरे यह कैसा भगवान है तुम्हारा। जो इतने से जल में भी अपनी प्यास बुझा लेता है। अरे मूर्ख! इससे तो मेरी प्यास भी शान्त नहीं हुई तो भगवान की प्यास शान्त कैसे हो सकती है? और वह एक दिन की हंसी में साधना छोड़ बैठा। पर मित्रो! जो भगवान पर अटूट श्रद्धा रखते हैं, वह निर्भय होते हैं, वह किसी की आलोचना एवं हंसी से डरते नहीं। एक थे गणेश शंकर विद्यार्थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ते थे। वहां के छात्रों में नब्बे प्रतिशत अनुपात मुसलमानों का था। शेष दस प्रतिशत अन्य भी मुस्लिम वेशभूषा में आते थे, पर एक था वह विद्यार्थी जो हिन्दुस्तानी पोशाक में आता था। सभी साथी हंसी उड़ाते थे, पर वह कभी नहीं कतराया। भगवान का भक्त इस तरह की ना कुछ बातों से कभी नहीं घबराता। अरे! आप ऐसे लोगों की हंसी से साधना पथ छोड़ देते हैं, जो पिता की मृत्यु पर सुखी होकर दुनियां को पार्टी खिलाते हैं, ऐसे पागलों की प्रशंसा की आप अभिलाषा रखते हैं, नहीं वे कभी प्रशंसा नहीं करेंगे। वे केवल निन्दा ही करेंगे। यही उनका स्वभाव बन चुका है। गुलीवर की कथा सभी जानते हैं। वह इस संसार का मानव एक ऐसे देश में पहुंचा गया था जहां रहने वाले लोगों की लम्बाई एक बालिस्त थी। वह वहां गया तो कोलाहल मच गया, पर वह मस्त शेर की भांति सो गया। वे आदमी आये और उस पर चढ़ गये। कोई कहीं चढ़ा कोई कहीं। बाद में धागे जैसी रस्सी लाकर उसके हाथ-पैर बांध दिये। जब वह अंगड़ाई मारकर उठा तो वह रस्सी टूट गयी और वे बौने इधर-उधर गिरने लगे। जो भगवान के प्रति निष्ठावान होता है वह गुलीवर की तरह अपने आपको पहाड़ की तरह मानता है। वह मानता है कि भगवान मेरे साथ हैं, वह कभी डरता नहीं।
मनुष्य को ऊपरी तौर से देखा जाये तो जानते हैं उसकी कीमत कितनी होती है? उसकी दो कौड़ी की कीमत नहीं। वह ज्यादा से ज्यादा कुछ कर सकता है तो हत्या कर सकता है और हत्या करके क्या कर सकता है, आत्मा को नहीं बदल सकता। शरीर रूपी चोला बदला जा सकता है। क्या मृत्यु रूपी हथौड़े हमारे जीवन को छीन सकते हैं। मित्रो! कभी नहीं। मीरा के पति मर गये थे, परिवार ने बहिष्कार कर दिया था लेकिन वह जानती थी कि परिवार नहीं हुआ तो क्या हुआ। वह भगवान की महान शक्ति से सन्तुष्ट थी और उस पर अटल विश्वास था। वह मीरा अपनी ध्यानावस्था में कृष्ण की बांसुरी सुनती या गोपियों का रास देखती थी। वह परिवार सुख को नगण्य समझकर बांसुरी के सुख को महान समझने लग गयी। यह कथा आत्मा के उस संगीत की है जिसको अगर सुन सकें तो हम सभी मर्यादाओं को पार कर अकेले अध्यात्म के मार्ग पर बढ़ सकते हैं और यही अध्यात्म की फिलॉसफी है।
हम चारों ओर से भय रूपी राक्षस से घिरे हुए हैं। हम अपने व्यावहारिक जीवन में घबराये हुए रहते हैं। हमारा सम्पूर्ण शक्ति संतुलन हमारी तृष्णाओं, आशाओं को न बुझा सका। हमारे मन में केवल एक ही कल्पना रही है कि ‘‘ऐसा हो जायेगा, वैसा हो जायेगा’’ यही विचार मन में स्थान बनाकर मानसिक शान्ति को खा जाते हैं। यह सभी आपदायें तब समाप्त हो सकती हैं, जब भावना का प्रकाश सामने आये, पर हमारी कल्पना छोटी है। आप चौकी चुंगी वाले की तरह छोटी चोरी करते हैं। आप मुकदमें में जीतने के लिए हनुमान जी का सौ रुपये का प्रसाद चढ़ाया करते हैं, क्या भगवान हनुमान उस वकील के ही बराबर है जिसको आपने सौ रुपये फीस के दिये हैं। भगवान बहुत बड़ा है उसके पास आपके जैसे प्रसाद की कमी नहीं।
एक बार विवेकानन्द जी छोटी अवस्था में महर्षि रामकृष्ण परमहंस के यहां गये और कहा—महाराज मेरे पिताजी मर गये हैं, मुझे नौकरी चाहिए। परमहंस ने कहा—जा नौकरी लग जायेगी, पर मां के दर्शन कर आ। विवेकानन्द काली मां के दर्शन करने लगे कि मन में कल्पना आई अरे तुम परमहंस से नौकरी मांग रहे थे। बस इतनी मामूली सी बात, और यही बात काली मां से मांग रहे हो, मन का विचार बदल गया और वह नन्हा बच्चा फिर उसी काली मां का महान भक्त, राष्ट्र पुरुष और हिन्दू धर्म का महान संरक्षक बना। लेकिन आप कहते हैं कि गायत्री से हमें कोई लाभ नहीं, हम तो रोजाना दर्शन करते हैं, पर विवेकानन्द जैसी कल्पना नहीं आती। काश! आज मेरी आंखों से गायत्री को देखा होता तो आज यह नहीं कहते कि मन नहीं लगता। आपने भगवान को समझा ही कहां है। आपने उसको अपने जन्म दिन, शादी के दिन और सांसारिक व्यथाओं को समाप्त करने के लिए आशीर्वाद देने वाला और कथा सुनने वाला समझा है। आपने भगवान को छोटा समझा, पर आपका भगवान बहुत बड़ा है। आपको उसे पाने के लिए बहुत बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। उसको पाने के लिए बहुत बड़े मानसिक संस्थान की आवश्यकता होगी। हीरे की अंगूठी रखने के लिए मखमल की पेटी (डब्बी) रखनी पड़ती है, तो भगवान को प्राप्त करने के लिए आपने मानसिक संस्थान रूपी डब्बी कहां बनायी। आप तो इस गन्दे संस्थान में ही भगवान को पाने वाले थे। आपने भगवान की तलाश में चारों धामों का भ्रमण किया। एक सौ आठ भागवत कथायें घर में कराकर श्रवण कर लिया, सहस्रधारा आदि सब कुछ किया पर भगवान उतना ही दूर होता गया। वह आपको दर्शन देने के लिए कभी नहीं आया। एक बार नये तरीके की बात मेरे दिमाग में आयी। मेरी दाड़ में बार-बार दर्द होता था। एक बार उस असह्य वेदना को में सहन नहीं कर सका। मैं डॉक्टर के पास गया। उस चिकित्सक ने जम्बूर लिया, दांत पकड़ा और खींच लिया। क्या भगवान के लिए भी जम्बूर बनाया जा सकता है, जो भगवान को दांत की तरह से पकड़ कर बाहर निकाल लाये। मित्रो! यही विचार सन्त तुलसीदास के मन में आया था। उन्होंने भगवान की भक्ति में रामचरितमानस का निर्माण करने का संकल्प किया और उन्होंने सर्वप्रथम भवानी-शंकर की पूजा करने का प्रयास किया और थोड़ा लिखकर ही चुप बैठ गये और बाद में लिखा। श्रद्धा और विश्वास ही भगवान शंकर और पार्वती के स्वरूप हैं और यही हैं भगवान को प्राप्त करने के जम्बूर। श्रद्धा और विश्वास रखने वाला कभी घबराता नहीं, वह निर्भय होता है। भगवान हमारा मालिक है, भगवान हमारा सहायक है, यह मानकर गन्तव्य पथ पर अग्रसर होता रहता है। नेपोलियन बोनापार्ट अकेला जा रहा था, भाग रहा था। एक सैनिक साथ में था। उसका पासा पलट चुका था। सम्पूर्ण विश्व पर साम्राज्य स्थापित करने वाला जंगल में अपनी जान बचाने का प्रयास कर रहा था। दुश्मन सैनिक चारों ओर से खोज रहे थे उस बोनापार्ट को कि सैनिक ने कहा—महाराज भाग चलें, दुश्मन बहुत हैं। उसने कहा—मित्र! नेपोलियन को मारने वाली गोली का अभी निर्माण ही नहीं हुआ है। इतना बड़ा विश्वास केवल वही रख सकते हैं, जो ईश्वर पर अटूट विश्वास रखते हैं।
श्रद्धा की बात बताता हूं। श्रद्धा मोहब्बत को कहते हैं। प्यार की सामर्थ्य मनुष्य नहीं जानते। प्यार की महत्ता इतनी होती है कि पत्थर में से भगवान निकल सकता है। यह मूर्तिकार भी पत्थर को भगवान बनाते हैं, पर वह पत्थर फट कर दर्शन नहीं देता, वह दर्शन देता है प्रह्लाद जैसे भक्त को, जो भगवान की इच्छा भावना अपने मन में ले आते हैं। अगर जीवन में भावना की ऋचायें आ जायें तो कल्याण हो जाये। प्यार भावनात्मक जीवन का सर्वस्व है। यह सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों में लागू होता है। अगर संसार से मोह और प्यार छूट जाये, तो संसार नहीं चल सकता। एक घोड़े का सवार था। घोड़े को बड़े प्यार से रखता था। एक दिन वह मर गया तो ठुकरा दिया गया। इसी प्रकार वही घोड़ा आज अपना था और शाम को हमने बेच दिया तो वह प्यारा नहीं लगता। सांसारिक जीवन में प्यारा वही लगता है जो अपना होता है। अपनत्व होते ही प्यार हो जाता है जिससे प्यार का धागा बांध लिया जाता है वह प्रिय लगता है वह प्यार है। अध्यात्मिक जीवन भी प्यार से मिलता है, पर हमारा जीवन तो निष्ठुर है। घृणा, निराशा, बैर, कटुता की बातें हर समय करते रहते हैं। कहां से प्यार आये, हमारी सभी बातें तो निन्दापूर्ण होती हैं। सास बहू की बुराई करती है, बहू सास की, पर वे प्यार को नहीं समझती। अगर मिल कर चलें तो गृहस्थ की गाड़ी अपने आप आगे बढ़े। दुनियां सिर्फ अपनों की प्रशंसा करती है। मित्रो! जो हमारा हो जाता है वही अच्छा होता है, उसकी बुराई कैसे कर सकते हैं? पर यह सभी भावना की माया है। अच्छा-बुरा केवल भावना की एक प्रवृत्ति मात्र है। एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को आदेश दिया कि जाओ और संसार के सबसे बुरे से बुरे व्यक्ति को मरे पास लाओ। इसी प्रकार दुर्योधन से कहा—संसार के सबसे अच्छे से अच्छे व्यक्ति को लाओ। दोनों कुछ दिन घूम कर आ गये। गुरु ने पूछा—ले आये। मित्रो! उस समय युधिष्ठिर ने कहा—महाराज! मुझे संसार में कोई बुरा नहीं लगा, जिसको में यहां ले आता और दुर्योधन ने कहा—महाराज! मुझे संसार में कोई अच्छा नहीं लगा जिसको मैं यहां लाता। मित्रो! यह केवल भावना की बातें हैं। अच्छे-बुरे केवल भावना के होते हैं। तो आज समय कुछ ज्यादा हो गया और मैं आपको बता रहा था मंत्र के विषय में तो मित्रो! मंत्रों की परख नहीं भावना की परख है और भगवान के प्रति रक्खी सच्ची भावना हमें सिखाती है, निर्भय बनना। तो आज की बात यहीं समाप्त। अब मेरे साथ शान्ति पाठ बोलिए।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

