थोड़ा भला पर भावभरा
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(1 जून 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में प्रातःकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
कल से आपको अध्यात्म की मूल्यवान बातें समझाता चला आ रहा हूं। अध्यात्म तीन खण्डों में है। जिस प्रकार राकेट में पहले बारूद होती है फिर उसके बाद कैप्सूल और बाद में अग्रिम भाग होता है। और इसी से यह कृत्रिम राकेट अंतरिक्ष में चला जाता है। अध्यात्म एक यंत्र नहीं है। उसमें भी तीन अंग हैं। भोजन में भी तीन अंग हैं। अग्नि, जल और अन्न। इन तीनों के साम्राज्य से ही रोटी बन सकती है। इनमें से एक-दूसरे की कमी में जिस प्रकार रोटी बनाना असम्भव है, उसी प्रकार अध्यात्म की प्रगति की तीन धारायें जाने बिना ज्ञान अपर्याप्त है। इन तीनों का सम्मिलित होना आवश्यक है। मैंने ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग के वैदिक साहित्य के विषय में कहा था। यह सम्पूर्ण ज्ञान अध्यात्म के लिए विनिर्मित किया गया है। मैंने सर्कस के झूले का उदाहरण भी एक बार दिया था, पर उस ज्ञान के लिए एक-आध खास व्यक्ति होते हैं। इसी प्रकार हर झूला सर्वसाधारण के लिए होता है, किन्तु सर्कस वाले पर सब नहीं झूल सकते। इसीलिए हठयोग, नादयोग, ब्रह्म कुण्डलिनी, प्राण विज्ञान आदि योग विशिष्ट व्यक्तियों के लिए हैं। सर्वसाधारण के लिए योग के तीन साधन होते हैं। भक्तियोग जिसके विषय में कह चुका, कर्म योग पर भी चर्चा कर चुका। मैंने तीन शरीरों का वर्णन किया था और कहा था मन इसलिए भागता है कि आप एकांगी उपासना करते हैं। इसमें भावना का सम्मिश्रण नहीं होता। आत्मविश्वास के बिना मन नहीं लगने से कोई लाभ नहीं होता। मैंने जो प्रयोग कल बताये थे, उन्हें भूलेंगे नहीं। संक्षेप में दुहरा दूं कि आप गम्भीर एवं संजीदा स्थिति में जप एवं भजन करें, साथ में ध्यान को न छोड़ें। ध्यान के लिए रूप होना चाहिए। रूप इष्ट देव के रूप में। स्त्री रूप गायत्री माता के रूप में लेना चाहिए। अपने मस्तिष्क में एक रूप घूर-घूर कर तन्मय होकर देखा कीजिये। ध्यान अवश्य कीजिये। भावना का समावेश किया कीजिये। मन वहां भागता है जहां भावना होती है। जब किसी नौजवान की शादी का समय आता है तो वह शादी की तिथि को कलैण्डर में नियमित देखता है। उसके लिए तो एक माह का समय बीत जाना भी मुश्किल हो जाता है। उसके मन में बार बार आता है, धर्म पत्नी आयेगी, कैसे होगी, कैसे आनन्द रहेंगे। ये बातें जब भावना से मन में आ जाती हैं तो नींद उचट जाती है। यदि यही भावना भगवान पर उसके दिव्य रूप के प्रति आ जाती है तो भक्त प्रह्लाद के समान खम्भे से उसे प्रकट कर देता है। आपका अधूरा जप, अधूरा ध्यान केवल लकीर पीटने के समान है। लकीर को मारने में कोई सार नहीं। आपको सांप खोज कर मारना पड़ेगा। परन्तु आपने तो सस्ते नुस्खे पढ़े हैं और बताये हैं। मैं इसका दोष मध्य कालीन पण्डितों को देता हूं कि उन्होंने भीड़ इकट्ठी करने के लिए संयम, सदाचार, परोपकार की भावना से लोग भाग न जायें इसके लिए किया और भीड़ इकट्ठी करके उसे बेवकूफ बनाने का प्रयास किया। इसी प्रकार अध्यात्म का स्वरूप बताने का प्रयास भी किया, पर वे सफल नहीं हो सके। फिर भी उन्होंने एक रुपया खर्च करवाकर सत्यनारायण की कथा में यह कह कर कि बच्चे न होने वाले की सन्तान हो जायेंगी और लिखा की नाव का डूबा हुआ पैसा सत्यनारायण के व्रत से वापस आ जायेगा आदि आदि। इस तरह लोगों को सपनों के सब्ज बाग दिखाए पर ऐसा सभी सोच सकते हैं कि ऐसा हो सकता है क्या? पण्डित घर-घर न्यौता देता फिरता है, पर कोई कथा नहीं करवाता। सस्ता अध्यात्म हमने बनाया था, पर यह काम में नहीं आया। यदि सही बनाते तो हमारा स्वरूप ही दूसरा होता। हम गन्दे निर्मोही इन्सान, आशाओं के दीपक खोये पुरुषों के गल में यह फूहड़ अध्यात्म बंध हुआ है। तीन देशों ने इसे फेंक दिया है। हम हारे हुए इन्सान जिनके पास प्रकाश नहीं है, उनके गलें में आज तक यह मुर्दा अध्यात्म बंधा हुआ है। मैं जिन्दों का अध्यात्म बताता हूं। चरणों में पड़ा हूं ले लो मुझे उठा लो, मैं उस भगवान की बात नहीं कहता। मैं उनकी बात कहता हूं जो चुनकर आते हैं और जिनके पास ही भगवान आते हैं। जो भगवान को चाहता है उसी को भगवान चाहते हैं। ईख गयी भगवान के पास और कहा—मेरे पर अत्याचार होते हैं। कभी जानवर खा जाते हैं तो कभी आदमी खा जाते हैं। भगवान ने कहा—तुम मुकाबला नहीं कर सकतीं। तो ईख ने कहा—भगवान में असमर्थ हूं क्योंकि मेरे में रस है, तो भगवान ने कहा—भाग जा! जल्दी से भाग तुम्हारा रस पीने को मेरा भी जी चाहता है। इसी प्रकार कमजोर आदमी कभी भी भगवान को प्यारे नहीं हो सकते। आपको अपनी आन्तरिक स्थिति बदलनी पड़ेगी। यह हीरा एक हजार रुपये में खरीदा जाता है। मित्रो! मैं इसे मुफ्त में ही कैसे दिला दूं? एक दिन मैंने जौहरी को कहा था, पर वह नहीं माना उसने इकन्नी वाला हीरा भी बताया। केमिकल हीरे की बात भी कही। पर मैं मित्रो एक हजार वाला हीरा ही बेचता हूं। सस्ता, सस्ता कैसे दे दूं? मैं सभी को देना चाहता हूं। मेरा दिल था कि मैं सांई बाबा बनकर और दर्शन से सभी की मनोकामना पूर्ण कर दूं, पर मैं मजबूर हूं। भगवान की व्यवस्था को तोड़ा नहीं जा सकता। अगर दर्शन से मनोकामना पूर्ण हो जाती तो पुरुषार्थ की व्यवस्था समाप्त हो जाती है। आत्म निर्माण, परिश्रम, तपश्चर्या का बखेड़ा क्यों रहता? बस केवल दर्शन से सब कुछ होता है वाली बात रही होती।
पर मित्रो! मैं कैसे भुला दूं कि मैंने तपश्चर्या से भरा-पूरा जीवन देखा है। उसका आनन्द ही और है, पर आपका अध्यात्म मरने जा रहा है। यह स्कूल के बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं। जिस वस्तु को विचारशील लोग ठुकरा देते हैं, वह जीवित नहीं रह सकती। अध्यात्म की उपेक्षा अगर विचारशील लोग करते हैं तो यह अवश्य नष्ट हो जायेगा। अतः मैं महत्वपूर्ण बात बता दूं। मैंने भगवान को आपके साथ रहने की बात, न्याय प्रिय एवं समदर्शी रूप की बात आप सब को बतायी थी। अगर सभी स्थानों पर भगवान के रहने की बात आप सभी के मस्तिष्क में है, तो आपकी सभी व्यवस्थायें झूंठी हो जायेंगी। पर आपका यह प्रशंसा अभिलाषी भगवान दो कौड़ी का है, जो रिश्वत लेकर आपके अनुचित काम करता है। यह देवी बलि लेकर आपका काम करती है। यही सब बातें अध्यात्म को नष्ट कर देती हैं। ऐसा अगर सही है तो व्यक्तित्व निर्माण के उद्देश्यों का क्या होना चाहिए। फिर हर कसाई देवी के यहां जावेगा और खुल कर देवी के यहां खाना बनायेगा। बूचड़खाना, कसाईखाना ही देवियों के अड्डे हो जायेंगे। क्या आप सभी इन बातों को चाहेंगे? इसलिए मित्रो! मैं आपको मूल सिद्धान्त की ओर ले जाना चाहता हूं। ऋषियों ने मूल्यवान कथन के रूप में अध्यात्म को बताया था। जगी हुई शक्तियां ही भगवान होती हैं। भाव जिसका सो गया वह इन्सान है और जो जाग गया वह भगवान है। अगर सही रास्ते पर चलता रहे तो इन्सान भगवान हो जाता है। भगवान भी इन्सान के तरीके से जन्मा है और मरा है। भगवान इन्सान हुआ है और इन्सान भगवान हुआ है।
अतः मैंने अध्यात्म की तत्वज्ञान की बात बतायी थी। कर्म के द्वारा बाह्य जीवन के पापों को धोइये। आप वह हैं, जो आपको पिता था। जिस दिन आप कषाय और कर्कशता को उठा कर फेंक देंगे उसी दिन महान हो जायेंगे। बद्रीनारायण की यात्रा के लिए ठण्डक खानी ही पड़ेगी, मैं चाहता हूं कि बद्रीनाथ को यहां ले आऊं, पर वह आना नहीं चाहता और ठण्ड में जाने के लिए तैयार नहीं। इसी प्रकार अध्यात्म की सही फिलॉसफी को भुला बैठे हैं और बाह्य कर्मकाण्ड को ही अध्यात्म समझने लगे हैं।
दशरथ ने तीन शादियां कीं। तीन शादियों के पश्चात् भी उनके यहां कोई सन्तान नहीं हुई। एक दिन झल्लाकर गुरु वशिष्ठ से कहा और वशिष्ठ ने पुत्रेष्टि यज्ञ की बात बतायी। दशरथ ने कहा—महाराज मुझे अभी मुहूर्त और सामान बता दीजिये। तो वशिष्ठ बोले—राजा! सामान और मंत्रों से कुछ नहीं होता इसके लिए एक तेजस्वी पुरुष की आवश्यकता होगी। यह संस्कृत पढ़े-लिखे लोभी कुछ नहीं कर सकते। तो दशरथ बोले—आप ही मेरे लिए तेजस्वी हैं तो वशिष्ठ बोले—राजा मैं गृहस्थ का उपभोग कर चुका हूं। इसलिए इस यज्ञ के काबिल नहीं, फिर भी मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा। यह सम्पूर्ण कार्य श्रृंगी ऋषि करवा सकते हैं। दशरथ हंसे और कहा—वह बीस वर्ष का छोकरा। तो वशिष्ठ जी ने कहा—राजा! मैं जो कुछ कहता हूं वह सही है। मंत्र और उच्चारण पर्याप्त नहीं हैं, मूल चीज है मंत्र में शक्ति रखने वाला। बन्दूक की कोई कीमत नहीं है। बारूद की कीमत है, पर सबसे अधिक कीमत उस बारूद को चलाने वाले की है। बारूद डेढ़ रुपये का भी नहीं पर चलाने वाला तीन हजार रुपये में भी नहीं खरीदा जा सकता। वशिष्ठ की बात दशरथ की समझ में नहीं आयी। तो वशिष्ठ बोले—दशरथ! श्रृंगी की विशेषता यह है कि उसने स्वप्न में भी नारी की कल्पना नहीं की है। अतः उसका तप दूसरे ढंग का है। दशरथ ने फिर शंका की महाराज यह कैसे माना जा सकता है? वशिष्ठ जी ने उन्हें प्रत्यक्ष दिखाने की ठानी और दशरथ जी को पांच अप्सराओं सहित साथ लेकर और श्रृंगी के पास अप्सराओं को भेजा और कहा—ब्रह्मचारी नमस्कार। श्रृंगी ने कहा—मैंने पहचाना नहीं। तो वे बोलीं कि हम तो बचपन से ही इसी आश्रम की विद्यार्थी हैं। तो श्रृंगी बोले कि आपमें तो विलक्षणता है। मेरी और आपकी उम्र समान ही है, पर मेरे तो दाढ़ी मूंछ आदि सभी निकल आयी हैं, पर आपके क्यों नहीं निकलीं। उन्होंने कहा हमारा देश ठण्डा है और उसमें दाढ़ी मूंछ नहीं निकलतीं। श्रृंगी बोले—मेरा सीना तो बराबर है, पर आपका उभरा हुआ क्यों और इस टोकरी में क्या लाये हैं? तो अप्सरायें बोलीं हम प्राणायाम अधिक करते हैं जिससे सीने में उभार है और इस टोकरी में फल लाये हैं। हमारे यहां सभी रसदार फल होते हैं। श्रृंगी ने जलेबी, रसगुल्ला आदि देखकर बहुत अचंभा किया और जब उनके पिता आये तो उनसे कहा—पिताजी सुदूर से कोई विलक्षण ब्रह्मचारी आये हैं। जिनको तो आपने भी नहीं देखा होगा और सारे स्वरूप की बात समझायी। लोमश समझ गये और वह बाहर आ ही रहे थे कि वशिष्ठ बोले—राजन्! जल्दी चलो कहीं लोमश शाप न दे दें और वे दोनों लोमश के यहां गये। लोमश और श्रृंगी ने वशिष्ठ से नमस्कार किया और वशिष्ठ ने दशरथ के समाधान की बात बतायी। तो मित्रो! मैं यही बात कहता हूं कि जो जितना संयमशील है, वह उतना ही आध्यात्मिक बातें पूरी करता है। श्रृंगी के द्वारा सम्पन्न हुए पुत्रेष्टि यज्ञ में दशरथ के यहां चार बालक पैदा हुए। कर्मकाण्ड का विधान उत्कृष्ट व्यक्तित्व है, पर है उसी प्रकार कि धनुष है, तीर है, चाप भी लगी हुई है, पर चाप घिसी हुई लगी है और थोड़ी-सी कमान खींचने से वह टूट जायेगी। अगर आपको तीर चलाना है तो कमान को मजबूत करना पड़ेगा।
कर्मकाण्ड की सफलता के लिए व्यक्तित्व को मजबूत करना पड़ेगा। मैं महालक्ष्मी और दुर्गा के मन्दिरों में जाता हूं तो देखता हूं कि सभी खाली हाथ, खाली हाथ। रुद्री के पाठ करने वाले से मैंने एक दिन पूछा तो उसने कहा कि मुझे पैंतीस वर्ष हो गए रुद्री पढ़ते हुए। एक पाठ का एक रुपया मिलता है। मैंने कहा—वो शंकर भोला भण्डारी जो सबको वरदान देता है, वह तुमको पांच पाठों के पांच रुपये दिलवाता है। यह रुद्री क्या काम की जो तुम्हारी गरीबी को न मिटा सकी। वह तुम्हारी दमे की शिकायत को दूर नहीं कर सकी तो मैं कहूंगा कि रुद्री फायदा करती है? मैं इसीलिए कहता हूं कि मंत्र से कोई लाभ नहीं, भावना से लाभ है। कर्मकाण्ड का कोई महत्व नहीं व्यक्तित्व का महत्व है। अध्यात्म कोई पुस्तक नहीं कोई विद्या नहीं। व्यक्तित्व का निर्माण ही अध्यात्मवाद है। जीवन को परिष्कृत करने के लिए हर दिन नया जन्म और हर रात नयी मौत। रात को सोता हूं तो राग द्वेष हटाकर सोता रहता हूं और सोचता हूं कि मैं आज इस भगवान के बगीचे में सो रहा हूं प्रातः जब पांचजन्य बजता है तो गांडीव चलाने के समान काम करता रहता हूं। दूसरे लोग जो अधिक भजन करते हैं, वह पूर्ण ज्ञान के बिना कोई लाभ नहीं उठा सकते और जप नष्ट हो जाते हैं। इसीलिए मैंने पहला उदाहरण अन्न का दिया था।
दो वस्तुयें में सिखा चुका। उपासना की विधि और संघर्ष जीवन के लिए। आपके शारीरिक जीवन में अनेकों बुराइयां है। इनसे लड़ना शुरू कर दीजिये, आप भीतर से आज्ञायें दीजिये और दुर्गुणों को हटाते रहिये, निकालते रहिये और यह देखते रहिये कि कहीं आपके शरीर रूपी घर में छछूंदर रूपी बुरी आदतों और भावों के बच्चे तो नहीं बैठ गये हैं। उनको निकालते रहिये। हर घड़ी अपने आप को तपाते रहिये तो आप भी महात्मा हो जाते हैं। नंगे पांव फिरने वाले महात्मा हों या नहीं हों, पर यह सही है कि आप की मनोभूमि का सम्बन्ध भगवान से है।
आज का पाठ उदारता का पाठ पढ़ाना है। उदार मनुष्य ही भगवान की शक्ति का अधिकारी होता है। संकीर्णता भगवान से उतनी ही दूर रहती है जितनी कि उसकी मात्रा होती है। मित्रो! एक जगह गंगा नदी और एक तालाब पास-पास थे। एक दिन तालाब बोला—नदी तुम बेवकूफ हो, चाहे जहां चली जाती हो और इन इन्सानों को पानी दे-दे कर सम्पत्तिवान बनाती रहती हो। क्यों देती हो अपनी सम्पत्ति तुम इन्हें? तुम्हें मेरी तरह से संचित करके पानी रखना चाहिए। मैं कितना अक्ल वाला हूं, जो सबको इकट्ठा करके रखता हूं भीतर जमा कर लेता हूं। तो नदी बोली—तालाब तुम बेवकूफ हो और सब कुछ भीतर संचित कर लेते हो, तभी तो सड़ते हो और मैं बहती-बहती दुनियां को सींचती-सींचती धन-धान्य देती हुई अपने मार्ग पर चलती रहती हूं। नदी चलती गयी, अनन्त सम्पत्ति देती हुई चलती गयी। उसने जितना पानी खर्च किया। उससे हजार गुना पानी अधिक लेकर आयी और आगे जाकर अथाह समुद्र में मिली। समुद्र ने कहा—कोई बात नहीं खर्च कर दिया तो क्या बात है मेरे पास तो बहुत पानी है। हिमालय ने कहा—मेरी बेटी का हाथ रुक न जाये। कहीं लोग यह न कहने लग जायें कि हिमालय बेटी आज सूख गयी है और जनता का कल्याण नहीं करती। वह अपनी बेटी के लिए स्वयं पिघलता गया और बेटी को यह कहता रहा कि तू देती जा, देती जा जब तक मैं मौजूद हूं। कहीं ऐसा न हो जाये कि हिमालय से निकली बीच में ही सूख जाये। लाखों वर्ष बीत गये, पर वह नहीं सूखी क्योंकि हिमालय की इज्जत का सवाल था और साथ में समुद्र की भी इज्जत का सवाल था। स्वयं ऊपर उठ-उठकर वर्षा कर नदी को पानी देता रहा और नदी जब उसमें आकर के मिली तो गले से लगा लिया और नदी समुद्र में परिणत हो गयी। आप पाने के लिए भगवान से चाहते हैं। भगवान के पास देने के अतिरिक्त है ही क्या? पर वह उस गन्दे तालाब को क्या दे? उस दुर्गन्ध युक्त सूखे तालाब को क्या दे? तालाब की फिलॉसफी गलत साबित हो गयी। वह उपकार के बदले में विश्वास नहीं करता था। अक्लमन्द तालाब का पानी सूख गया और परमार्थ करने वाली नदी बहती चली गयी, लोगों को मुक्ति देती रही। जीवन की गतिविधियां हमने नहीं सीखी थीं, पर नदी हमें सिखाती हैं— परमार्थ, परमार्थ, परमार्थ और हम कहें कि हे मां! तेरे जीवन का सन्देश हमें देना, देना, देना। मिल जाय तभी चलें गांव—नदी के किनारे और सीख लें नदी की फिलॉसफी।
मानव जीवन की फिलॉसफी की उदारता में आपको महान बनना पड़ेगा। महानता कोठियों और मोटरों में नहीं। महानता का अर्थ कुछ और ही होता है। खाली हुए बिना पात्र में कुछ नहीं मिलता, पर अगर थोड़ा-सा खाली होता है, पूरा खाली नहीं होता तो उसमें रोग भरता है।
मित्रो! मैंने उदार बनने की बात कही है। उदारता को ही ज्ञान योग कहते हैं। अज्ञान योग यह है कि मैं स्वामी हूं, मैं मालिक हूं इसका लाभ मिलना चाहिए। ज्ञान की व्याख्या यह है कि यह सब कुछ भगवान का है। मैं माली हूं, मेरा कुछ नहीं। ज्ञानी वह है जिसका स्वार्थ, संग्रह कामना, तृष्णा, वासना क्षीण हो गयी है। वह ज्ञानवान है। संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी की विद्वत्ता छांटने वाला पढ़ा-लिखा ज्ञानवान नहीं होता। बिना पढ़ा-लिखा भी ज्ञानी हो सकता है। पण्डित और ज्ञानी की परिभाषा कबीर ने दी और कहा—
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पण्डित हुआ न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय॥
आप भी प्रेम करने लगें तो पण्डित बन सकते हैं। आपने कहा कि यह प्रेम करना तो हमारा पहले से सीखा हुआ है। हम अपने पत्नी और बच्चों से कितना प्रेम करते हैं। देखो आचार्य जी मेरा बच्चा ऐसा है कि क्या कहें और मेरी बीबी से तो इतना प्रेम है कि मैं हर माह एक नयी साड़ी लाता हूं। हम क्या प्रेम नहीं करते। धन को सम्भाल कर रखते हैं क्या उसके प्रति हमारा प्रेम नहीं। हम सौन्दर्य को प्रेम करते हैं। उसके प्रति आकर्षण रखते हैं, यह क्या उसके प्रति प्रेम नहीं करते। लेकिन मित्रो! प्रेम की परिभाषा अलग है। आज के लड़के गन्दे गाने गाते-गाते लड़कियों के पास जाते हैं और उसको प्रेम कहते हैं, पर यह प्रेम नहीं हिंसा है। यह तो लकड़बग्घे का प्रेम है। लकड़बग्घा जानते हो छोटे-छोटे बच्चों को उठाकर ले जाता है और उसकी छोटी-छोटी हड्डी चबाने में उसे मजा आता है। तुम्हारा भी प्रेम ऐसा ही है कि मुझे तो चौदह वर्ष की लड़की से प्यार है, बुढ़िया से प्रेम में मजा नहीं आता। बाजार में जाते हो तो पकौड़ी को देखते ही प्रेम आ जाता है, रसगुल्ले को देखकर पानी आ जाता है। यह आपका प्यार है और थोड़े से नाश्ते में ही आप साढ़े तीन रुपयों का खून कर देते हैं। ऐसा प्यार मित्रो गन्दे सिद्धान्तों का होता है। ज्ञान योग का प्रेम यह नहीं होता। वह प्यार सच्चा प्यार होता है। प्यार उसे कहते हैं जिसमें देना, देना, देना होता है। देने की इच्छा से प्यार होता है, इसे क्या दे दूं, हड्डी, मांस अपना सब कुछ दे दूं और इसे सुखी बना दूं। मां बेटे से प्रेम रखती है, वह लेने के लिए नहीं रखती, देने के लिए रखती है। जीवन में हर्ष आनन्द की सीमा जोड़ने वाला प्रेम से संभव हो सका है और वह प्रेम देने से होता है।
मैं आपको लैला-मजनू की बात बता दूं। लैला के वालिद ने कहा—तुम्हारी शादी इस फकीर के साथ नहीं हो सकती। फिर भी लैला और मजनू की जिद कायम रही। इसी प्रकार फरिहाद के पिता ने कहा—प्रेमी अगर तुम शीरी से शादी करना चाहते हो तो इस सूखे प्रदेश में अस्सी मील लम्बी नहर खोदकर आओ। शीरी को पाने के लिए उसने अपनी बलि देकर के भी नहर खोदी। इसी प्रकार मजनू भूखा फिरता था और लैला ने दुकानदारों से कह दिया था कि यह मजनू जो कुछ मांगे दे दिया करो। पैसों का बिल मेरे यहां से ले लिया करना। वह मजनू खाता-पीता रहा। एक दिन वह हलवाई की दुकान पर खा रहा था तो एक भिखारी आया उसने कहा—मजनू कैसा खाता है यहां खाना। उसने कहा—लैला खिला देती है। उसने दुकानदार से कहा—तुमने इसे ही मजनू कैसे समझ लिया, हमें भी मजनू समझो। दुकानदार विस्मय में पड़ गया कि असली मजनू कौन तो फिर वह उसको भी खाना खिलाने लग गया। देखते-देखते सैकड़ों मजनू बन गये और जब माह का बिल भेजा गया तो दो हजार रुपये का हिसाब पहुंचा। बिल देखकर लैला भी चकरायी उसने अपनी सहेली को दुकानदार की स्थिति सुनकर निरुत्तर हो वापस आयी और लैला और सहेली ने एक युक्ति निकाली और लैला की सहेली एक कटोरा लेकर बाहर आयी और सामने खड़े असंख्य मजनुओं से कहा— ओ मजनुओं लैला सख्त बीमार है, उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं तो सभी मजनू रोने लगे, हाय मेरी लैला अब क्या होगा तो सहेली बोली उसके बचने का एक उपाय है और वह यह कि अपने कलेजे में से एक कटोरा खून निकाल कर अगर कोई दे तो वह बच सकती है। मजनुओं की हवा निकल गयी यह सुनते ही। उनमें से सब अलग-अलग बहाना बनाकर चलते बने, पर मजनू वहां खड़ा था। वह सहेली से बोला—मेरी लैला बीमार है और मैं यहां जिन्दा खड़ा हूं। ला यह खंजर और दे दे मुझे कटोरा और उसने छीन कर खंजर दे मारा अपने कलेजे के पास और कहा—जा ले जा यह कटोरा भर खून और जल्दी आना दूसरा कटोरा और भर दूंगा। असली मजनू की पहचान हो गयी। लैला हो चाह है खून देने वाले मजनुओं की। आप भगवान से प्रेम करना चाहते हैं और उसे कुछ देना नहीं चाहते। क्या आपने अपने धन का टुकड़ा उन आदमियों को दिया, जो आपको हसरत भरी निगाहों से देख रहे थे। आप पढ़े-लिखे हैं, सामर्थ्यवान हैं, पहलवान हैं, सब कुछ हैं, पर आपने कभी राह चलते राहगीर को सीधी नजर से देखा भी है क्या? एक गरीब का बच्चा स्कूल जा रहा था और फीस के बिना उसकी पढ़ाई बन्द हो रही थी और आपका बच्चा मोटर में स्कूल जा रहा था। क्या आपने कभी सोचा कि यह क्या हो रहा है? ईश्वरचन्द्र विद्यासागर पांच सौ रुपये महीने पाते थे और साढ़े चार सौ रुपये महीने गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति देते थे। अपने लिए सिर्फ पचास रुपये महीने खर्च करते थे। यह दो रुपये की मिठाई जो आप हर रोज खा जाते हैं, वह एक अनाथ बच्चे की जिन्दगी बना सकते हैं।
मित्रो! भगवान जब मनुष्य में आता है तो उदारता-करुणा के रूप में आता है। भगवान मानव की शक्ल और भावना के द्वारा मानव जीवन में आता है। आपके सामने के स्वरूप बन कर निकल जाता है वह जड़ भगवान है। यह ध्यान की पराकाष्ठा मात्र है। आप कहते हैं कि आज हमने रामचन्द्र जी को देखा, पर मुझे नहीं दिखा सकते। असली रामचन्द्र शरीरों में नहीं घूमता। वह हनुमान के रूप में आता था। वह सीता की खोज में गया था और राम के आत्म विश्वास से लंका में आग लगाई थी और उसने कहा था यह शरीर तो सीताराम का शरीर है, मर जायेगा तो क्या होगा? उसने इसी विश्वास पर समुद्र पर से छलांग लगा दी। क्या आज तक किसी ने छलांग मारी है। लेकिन उसने संस्कृति की सीता की खोज करने के लिए छलांग मारी थी। क्या मानव शरीर का इससे बड़ा उपयोग हो सकता है? क्या ये सभी भावनायें थीं जिनके द्वारा राम का हनुमान के शरीर में प्रवेश हुआ था। दूसरे लोगों का भगवान मन्दिर में रहता है। भगवान तलाश करता रहता है आपकी उदार भावना की और आप मन्दिरों में दिखाने के लिए बैठे रहते हैं।
संत एकनाथ रामेश्वरम् चले जा रहे थे। कंधे पर गंगा जल की कांवर थी और नंगे पांव भावना युक्त चले जा रहे थे। उन्होंने रास्ते में देखा कि प्यास से व्याकुल एक गधा पैर पीट रहा है। उनको ऐसा लगा कि यह प्यास से चन्द मिनटों में मर जायेगा। उसकी जीभ बाहर निकल आयी थी और एकनाथ को यह अनुभव हो रहा था कि यह कह रहा है कि मैं प्यासा मर रहा हूं। सन्त की करुणा—गंगा फूट पड़ी और बोला—गधे तेरे अन्दर भी वही भगवान है जो मेरे अन्दर है। उन्होंने कांवर को एक तरफ रख दिया और एक घड़ा गंगा जल उसे पिला दिया। देखा कि गधा छटपटाकर बैठा तो हो गया पर उससे खड़ा नहीं हुआ गया तो सन्त ने दूसरा घड़ा भी उसके मुंह में उड़ेल दिया और वापस कांवर लाने के लिए चल दिया, तो गधे ने कहा—जानता है मैं कौन हूं। तो सन्त बोला—जानता हूं तुम गधे हो, जिसको मैंने अभी पानी पिलाया है। तो वह बोला मैं साक्षात रामेश्वरम् हूं और सन्तों के दर्शन करने के लिए मारा-मारा फिरता हूं। सन्त बहुत आते रहते हैं, कांवर का पानी डालते रहते हैं, लेकिन मैं पानी का प्यासा नहीं हूं। मेरे चारों ओर समुद्र है। एकनाथ मैं दया, करुणा और इन्सानियत का प्यासा हूं। बहुत से सन्त इस रास्ते पर से गुजर गये, पर किसी ने मुझे नहीं देखा और अपने स्वार्थ के लिए रामेश्वरम् की ओर बढ़ते रहे। एक तुम थे जिसने मेरे पर उदारता की। मैं उदारता का प्यासा हूं, चेतना देखता रहता हूं। तुमने जो मुझे दर्शन दे दिया है, इससे मैं रामेश्वरम् धन्य हो गया। उधर सन्त रो रहे हैं, इधर भगवान रो रहे हैं, दोनों गले मिलते रहे और अपूर्व आनन्द में आंसुओं का स्नान करते रहे।
अध्यात्म से सेवा की भावना, परमार्थ की भावना आती है। भगवान भी वहां दौड़ा-दौड़ा जाता है। शबरी के यहां इसीलिए तो गया था वह, गुह निषाद के पास भी गया था, मीरा के यहां गया था, विदुर की धर्म पत्नी के यहां गया था, जहां छिलके कृष्ण खाता रहा और केले के गूदे बाहर फेंकते रहे तो विदुर आये तो कहा—मूर्ख स्त्री तुम भगवान को क्या खिला रही हो। भगवान बोले—विदुर मैं खाता नहीं हूं, मैं तो केवल प्रेम खाता हूं जिसे प्रेमी खिलाता है। मैं छिलके नहीं खा रहा था प्रेम खा रहा था। भगवान की आत्म-शान्ति के लिए लैला के कटोरा खून वाली आवश्यकता है, पर क्या आप यह खून दे सकेंगे? नहीं लेकिन वह उसी प्रकार की दया, करुणा की चाह करता है। आपका खून देश के लिए, राष्ट्र के लिए, धर्म के लिए होना चाहिए। आपकी महाशक्ति है, पर यह महाशक्ति उसी से शादी करती है जो कहता है यो मां जयति संग्रामे। मजनू से लैला जो राजकुमारी थी शादी को तैयार थी, इसीलिए कि उसका जीवन स्तर ऊंचा था। आपका जीवन ऊंचा-आदर्श होना चाहिए और ऊंची प्रेरणा होनी चाहिए।
आज का समाज अभावों से ग्रस्त है। वह आपको देख रहा है। यह युग जल रहा है। सभ्यता, संस्कृति, मानवीय आदर्श, परिवार सभी जल रहे हैं। इतना खतरनाक आदमी किसी युग में भी नहीं था। इसमें सभ्यता का अन्त हो गया है। हमने कपड़े, विद्या की शिक्षा प्रचुर ली है, पर हमारे व्यवहार खराब हैं। हमारी कुण्ठाओं ने नारी को दुर्भावपूर्ण स्थिति में समझ लिया है। क्या इससे पहले इतनी गन्दी कल्पनायें थीं। यह ऐसी कुण्ठापूर्ण स्थिति राहु, केतु की तरह मानव रूपी सूर्य पर लग रही है। आज पत्नी को पति पर शक है, पति को पत्नी पर। पति बाहर मजदूरी करता है और पत्नी घर में बैठी-बैठी उस मजदूरी से फिजूलखर्ची करती है। आज का मानव बर्बर हो चुका है। वह इन्सान को इन्सान से कटवाना चाहता है। आज अलग-अलग बिरादरियों से संगठन बन-बनकर देश की नींव हिला रहे हैं। मानव से यह ऊंच-नीच की भावना भर-भरकर इन अंग्रेजों ने हमारे देश को अभागा बना दिया। आज एक नया संगठन पढ़े-लिखों का बन रहा है जो बिना पढ़े-लिखों को पतित की श्रेणी में गिनता है, इनसे बात करने में घृणा अनुभव करता है। ये हत्यारी मान्यतायें यदि कायम रहीं तो इन्सानियत कायम नहीं रह सकती। लिंग भेद, अर्थ भेद मिटना है। या तो ये भेद रहेंगे या यह जिन्दगी रहेगी। सभी धन्धे एक साथ नहीं चल सकते। यह जमाना नहीं चल सकता, जिसमें सौ महल बनाने के लिए 10 हजार झोंपड़ियों को रौंदा जाता है। यह वर्ग भेद, वर्ण भेद, लिंग भेद आज इस फूहड़ अध्यात्म की देन है, आप दूसरों की बात करते हैं, स्वयं की ओर कभी नहीं सोचते, अपने पड़ोसी के सुख से आपको ईर्ष्या है पर उसके दुःख पर आपको सहानुभूति नहीं, यह सामाजिकता नहीं है, संस्कृति नहीं है। इतना तगड़ा स्वार्थी इन्सान आदम युग में रहा होगा या नहीं, मैं नहीं जानता, पर आज है, यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। आपके विचार और जीवन की दिशा में सामंजस्य नहीं है। आपके मन को भरत-राम का आदर्श नहीं भाता, आपको रावण का सीता चुराना अच्छा लगता है। अतः आपकी इस रामायण से भी क्या लाभ, जिसे पढ़कर भी आप अच्छी राह न सीख सकें।
गीता के सात सौ श्लोकों को कण्ठस्थ याद कर लिया और आप की कर्मयोग की तरफ प्रेरणा भी न हुई तो इससे कोई लाभ नहीं। आपके भीतर जमा हुआ स्वार्थ अगर बाहर नहीं निकला तो कुछ नहीं। आपको उस स्वार्थ को हटाने के लिए मोर्चा लेना पड़ेगा। वह मोर्चा कर्मकाण्ड के आवरण से नहीं लिया जा सकता यह तो ऐसे ही छाया हुआ है। जागरूकता के लिए आपको आत्मा का परिष्कार करना पड़ेगा और आत्मा का परिष्कार ही अध्यात्मवाद है। जो कर्मकाण्ड को अध्यात्म समझ बैठे हैं उनको मैं चेतावनी देना चाहता हूं कि यह नयी पीढ़ी के छोकरे इस अध्यात्म को समाप्त कर देंगे। असली अध्यात्म का प्रेम मनुष्य को देवता बनाता है। मनुष्य को दयावान बनाता है, पुरुषार्थी बनाता है। मैं दर्शन के आधार पर अध्यात्म बताता हूं, पौरुष के अध्यात्म को सही बताता हूं।
असली आध्यात्मिकता वाले पुरुष के संसर्ग में आने मात्र से संस्कारित मानव में परिवर्तन हो जाता है। महात्मा गांधी के संसर्ग में आने से पं. जवाहरलाल नेहरू हमारा प्रिय नेता, सम्माननीय प्रधानमंत्री हो गया। सरदार पटेल और राजेन्द्रबाबू गांधी के साथ आकर क्या से क्या हो गये, पर उनको आध्यात्मिक प्रेरणा मिली थी। उन्होंने दर्शन नहीं किया दर्शनशास्त्र को सीखा था। दर्शन करने से कुछ नहीं होता, आशीर्वाद देने से कुछ नहीं होता, काम करने की लगन और पुरुषार्थ से सब कुछ होता है। यही कर्म योग है। अगर दर्शन से ही होता तो आज सांई बाबा के चेले ही दर्शन कर करके सब कुछ प्राप्त कर लेते। तो आज की बात यही है कि दर्शन सफलता नहीं दिलाते, सिद्धान्त सफलता की ओर ले जाते हैं। तो सब मेरे साथ शान्ति पाठ बोलिए।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

