गायत्री साधना का ज्ञान विज्ञान
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(30 मई 1968 की गायत्री तपोभूमि मथुरा के साधना शिविर में सायंकाल दिया गया प्रवचन)
हमारे साथ मंत्र बोलें,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो और भाइयो,
गायत्री महामंत्र अध्यात्म की अमूल्य निधि है। यह वैसा छोटा-सा चौबीस अक्षरों का मंत्र है, पर यह उस वट वृक्ष के बीज के समान है जो उग आने से विशाल वृक्ष हो जाता है। उसके पत्र और शाखायें जिस प्रकार से पल्लवित होती हैं उसी प्रकार यह संस्कृति का मूल गायत्री मंत्र बहुत शक्तिशाली महान मंत्र है। इस गायत्री मंत्र की दो शाखायें हैं जिनमें एक है विज्ञान शाखा और दूसरी है ज्ञान शाखा।
भौतिक जीवन में कठिनाइयों का शमन करने वाली शाखा विज्ञान शाखा होती है तथा आन्तरिक-आत्मा के संस्थानों को जागृति की ओर ले जाने वाली शाखा को ज्ञान शाखा कहते हैं। हमें सदाचार रूपी यह शिक्षायें हमारे छोटे से जीवन बनाने की ओर ले जाती हैं। महानता का प्रकाश गायत्री के रूप में आत्मा के भीतर आता है। महानता जागृत करने की विधि इस गायत्री मंत्र के प्रत्येक अक्षर में भरी पड़ी है।
मैंने गायत्री के दो स्वरूप सावित्री और गायत्री बताये थे। सावित्री उसे कहते हैं जो विज्ञान की भूमिका है, जो जीवन के अभावों को समाप्त कर सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। जो ज्ञान के रूप में शरीर में प्रविष्ट हो उसे गायत्री कहते हैं। पौराणिक अलंकार के अनुसार गायत्री और सावित्री ब्रह्माजी की दो पत्नियां थीं।
प्रथम ऐसा बताया जाता है कि भगवान् के उदर में से निकले कमल पुष्प में ब्रह्मा का जन्म हुआ और वे प्रेरणा पाकर तप करने लगे। तप करने पर उन्हें आकाशवाणी द्वारा आदेश मिला कि गायत्री का जप करो। गायत्री के जप का नाम ही तप है। तप उसे कहते हैं जिसमें तपा-तपा कर उसका सत्व निकाल लिया जाता है। अभ्रक जिसे मोडस कहते हैं को तपा-तपाकर वैद्य लोग अभ्रक भस्म बना लेते हैं और असंख्य रोगों में इसका प्रयोग करते हैं।
तप से मानव अपनी कच्ची मनोवृत्ति को तपा-तपाकर परिपूर्ण हो जाता है। मैं बात ब्रह्मा, सावित्री और गायत्री की कर रहा था, बीच में ही प्रकरण बदल गया। सृष्टि बनाने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता ब्रह्मा को थी वह सावित्री से प्राप्त हुई और ज्ञान की शक्ति गायत्री से। एक ही शक्ति के दो नाम रखे गये। ठीक उसी प्रकार किसी रमेश नाम के व्यक्ति को जब वह डाक बांटता है तो पोस्टमैन कहते हैं और वैसे रमेश। काम के साथ नाम बदल जाते हैं। इसी प्रकार सावित्री और गायत्री एक ही देवी के दो स्वरूप हैं।
यहां पर आपको गायत्री की तपस्या करने बुलाया था। जिस प्रकार शरीर को पुष्ट करने के लिए अनेक पुरुषार्थ जिनमें व्यायाम, नींद, सेवा आदि सम्मिलित रहते हैं करते रहते हैं। इसमें हम स्वस्थता प्राप्त करते हैं। हमें शरीर बल के साथ बुद्धि बल भी बढ़ाना पड़ता है। बुद्धि बल के बिना हम कुछ नहीं कर सकते। अतः बुद्धि बढ़ाते हैं और बुद्धि द्वारा मिले कामों की पूर्ति हेतु धन की आवश्यकता पड़ती है। स्वास्थ्य, बुद्धि, धन के रूप में तीन वस्तुओं की हमें निरन्तर आवश्यकता रहती है और उसी प्रकार हमारे प्राचीन ऋषियों ने इसी आधार पर तीन देवियों का वर्णन बताया। बुद्धि बढ़ाने वाली सरस्वती, धन देने वाली लक्ष्मी और स्वास्थ्य तथा बल देने वाली काली। पूरे भारत वर्ष में इन देवियों की पूजा की जाती है। यह प्रत्येक मानव मात्र के लिए पूज्य हैं। गायत्री इन तीनों देवियों में सर्वोपरि है और यह तीनों उसकी शाखायें हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो समता नहीं रखते। कोई ऐसे होते हैं। जो बैठकर तप करते हैं, तो कोई खड़े होकर। कई ऐसे भी होते हैं, जिनको मैंने देखा है कि भोजन पात्र में नहीं करते कमण्डलु आदि स्वर्ण चांदी के रखते हैं। इससे कोई लाभ नहीं। हमारे हिन्दू शास्त्रों में जैसा कि मैं अभी-अभी कह रहा था कि तीन देवियां मानी गयी हैं। लोग कहते हैं कि लक्ष्मी खराब होती है, पर मित्रो! ऐसी बात नहीं है उनकी कृपा का अनुचित प्रयोग करना बुरा है। हम एक दूसरे से सहानुभूति नहीं रखते तो हम भी समाज से कटकर अलग हो जायेंगे। इसी प्रकार अगर हम काली और सरस्वती की उपासना करें तो कैसे मेल बैठेगा? हमारी भारतीय संस्कृति बड़ी व्यवस्थित है और हम उसके अनुयायी। हमें तीनों को ही मानकर चलना पड़ेगा। पर मित्रो! जैसा कि मैंने बताया कि इन सबसे बड़ी एक देवी और है जिसका नाम है— गायत्री। इसी के अन्तर्गत तीनों देवियां आती हैं। वह शक्ति यहां तीन खण्डों में विभक्त है और समय-समय पर सामूहिक या अलग से जीवन में प्रवेश करती रहती हैं।
गायत्री के रहस्य को अगर जीवन में प्रवेश कराया जा सकता है तो हम इसी जन्म में भगवान बन सकते हैं। देवियों की तीन श्रेणियों की तरह मानवों की भी तीन श्रेणियां होती हैं, जिनको मानव, दानव और देवता के रूप में जाना जा सकता है। राक्षस के विषय में लोग कहते हैं कि उनके बड़े-बड़े बैलों जैसे सींग और दांत होते हैं, हाथ में एक खप्पर रखते हैं। आप जैसा स्वरूप कलेंडरों में रखते हैं, राक्षस वास्तव मैं वैसा नहीं होता, यह तो अलंकार है। यहां एक आदमी आ रहा है और यह आदमी रास्ता चलते एक आदमी में बेंत मार देता है। लोग उसे पकड़ लेते हैं, तो कारण कुछ नहीं बताता, आप ही बताइये कि वह राक्षस नहीं तो क्या है? आप कहेंगे राक्षस का पेट बहुत मोटा होता है। मित्रो! मोटे पेट वाले राक्षस नहीं होते शिकारी होते हैं। बड़ी निर्दयता से पक्षी को मार देते हैं और पेट की भूख मिटाते हैं। पेट की भूख के लिए भी दूसरों को मारने वाला राक्षस ही होता है। राक्षस रूपी मानव को यह मालूम नहीं होता कि हमें क्या करना है? मानव जैसी ही देवता की शक्ल होती है, पर वे कलेंडरों में कुरूप नहीं होते। उनके सुन्दर जीवन, सुन्दर वाणी, सुन्दर स्वभाव का सर्वत्र वर्णन होता है। देवता कभी बूढ़े नहीं होते। वह हर समय नौजवान जैसे रहते हैं। उनके दाढ़ी-मूंछ भी नहीं आती। देवियों के भी दाढ़ी-मूंछ नहीं आतीं। देवी और देवता एक ही बात है। सम्पूर्ण जीवन में नारी को महत्व दिया गया है। गायत्री शास्त्र में नारी के रूप में मानी गयी है। हम मां को नमस्कार कहते हैं। अतः देवता कहते हैं बूढ़ा हो जाना बुरी बात है। जिसकी आंखों में अंधेरा आ जाता है, जिसमें जीवन के अन्तराल की गन्दी भावनायें आती रहती हैं। जो हमेशा पुरानी बात कहता रहता है। देवता कभी भूत काल की बात पर विचार नहीं करता, वह भविष्य देखता है। वे मानव अच्छे नहीं होते जो बात-बात पर कहते हैं कि अजी हमारे पिताजी तो नम्बरदार थे। पर भाई तुम क्या हो? अजी साहब क्या बताऊं, पिताजी तो नम्बरदार थे, जो आदमी जवान होते हैं उनकी उमंगें भी बड़ी होती हैं। अवस्था से कोई मनुष्य बड़ा थोड़े ही होता है। साठ साल की अवस्था में भी बूढ़ा नहीं हो सकता। आप पण्डित सातवलेकरजी को देखिये उनकी उम्र 102 साल की है और उनका उत्साह देखिये जैसे नौजवान हों। अभी उनका दिल्ली में नागरिक अभिनन्दन किया गया। पचास हजार का चैक उन्हें वेदों पर शोध करने के लिए दिया गया। वे एक साधारण से फोटोग्राफर और ड्रॉइंग के टीचर थे। 55 वर्ष की अवस्था में रिटायर हो गये तो उनने संस्कृत पढ़ना शुरू किया और वे वेद के भाष्य कर्त्ता बने। यह होती है जीवन जीने की कला। जो आदमी कभी भी निराश नहीं होता वह जीता रहता है, जो हिम्मत रखता है वह आगे बढ़ता रहता है। गायत्री की शक्ति वैसे बड़ी बताई गयी है। यह महान शक्ति देती है। उनमें से सबसे बड़ी शक्ति का नाम है—आत्म बल। शरीर बल भी बहुत बड़ा है, धन बल, बाहु बल भी बहुत बड़े होते हैं, पर सबसे बड़ा है आत्म बल। आज के लोग आत्म बल को नहीं जानते केवल अन्य बल चाहते हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य की गद्दी पर बैठने वाले शंकराचार्य भी सोने के सिंहासन पर बैठते हैं। उनको ही क्यों इस मथुरा— वृन्दावन में हजारों मन्दिर हैं, पर दर्शक रंग जी के मन्दिर ही जाते हैं। क्योंकि वहां सोने की लाट है। अगर आप महत्ता को ध्यान में रखते तो पहले उस मन्दिर में जाते जहां भगवान कृष्ण ने तुलसी दास को राम के स्वरूप में दर्शन दिया है, पर आपको तो दिखावा चाहिए। मैं आपको बता रहा था—बुद्धिबल बहुत बड़ा होता है। एक साधारण सा विचार राष्ट्र में उथल-पुथल मचा देता है। जिन्ना के मन में छोटा-सा विचार आया और उसने हिन्दुस्तान के टुकड़े-टुकड़े करा डाले। एक आदमी का दिमाग बड़ा कीमती होता है। इस बुद्धिबल और आत्म बल से हिन्दुस्तान और उसका शास्त्र आगे बढ़ा था। रामायण, गीता, भागवत सभी में आत्मबल की ही तो महिमा है। आत्मबल से मिले अध्यात्म से मानव महान हो गया। वह छोटा-सा पांच वर्षीय बालक ध्रुव आत्मबल पाकर अमर हो गया। प्रह्लाद आत्म बल पाकर अमर हो गया। उसके आत्म बल ने उसे बचाया और होलिका को जला दिया। हिरण्यकश्यप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका। श्रृंगी ऋषि छोटा-सा बालक था और वह खेल रहा था कि राजा परीक्षित ने मजाक में मरा सांप उसके पिता लोमश ऋषि जो तपस्या कर रहे थे के गले में डाल दिया और यह मजाक उस बच्चे को बुरा लगा। उसने तत्काल शाप दे दिया कि जा राजा आज के सात दिन बाद यही सर्प जिन्दा होकर तेरे को डंसेगा और वह इह लोक छोड़ दोगे। मित्रो! श्रृंगी ऋषि का शाप सभी प्रयत्नों के बाद भी फलीभूत हुआ, ऐसी है आत्म बल की महिमा। आत्म बल की महिमा इससे भी बहुत बड़ी है। मेरे को अगर सम्पूर्ण शास्त्र सुनाने पड़ें तो भी सम्पूर्ण पुराणों और शास्त्रों का उद्देश्य आत्मबल का महत्व बताना ही है। भौतिक तरीके से भी आत्म बल बहुत प्रभावित रहता है, पर मैं उन आत्मबलि मानवों की कथा यहां सुनाना नहीं चाहता। पुराणों की सभी कथायें यह बताती हैं कि अमुक मानव तपस्या के बल पर इन्द्र का आसन डगमगा रहा है और फिर वही मानव देवता बन जाता है। इसीलिए मैं आपसे निवेदन कर रहा था कि लोगों को आत्मबल हेतु अग्रसर करने हेतु यह बातें लिखी गयी थी।
शरीर और आत्मा के सम्मिश्रण से हम बने हुए हैं। जबान से जो बोला जाता है, अगर इसी जबान को तपा लिया जाय तो वह वशिष्ठ बन जाता है। शरीर के भीतर का महत्व बदलने से ही तो शरीर का मूल्य बढ़ता है। थोड़े दिन पहले वैज्ञानिक हारमोन्स ने शरीर के छोटे-छोटे कणों में रस की बात बतायी थी, जिसके अनुसार कुछ व्यक्तियों की अनायास ही लम्बाई बढ़ जाती है। किसी आदमी को कुछ आवश्यकता होती है तो वह रस उसकी पूर्ति करता है। किसी आदमी की यह रस प्रपत्यकायें जागृत हो जाती हैं तो वह अज्ञानी भी ज्ञानवान हो जाता है। हारमोन्स का यह रहस्य जो डाक्टरों द्वारा बताया गया है यह जादू के समान है। तीन दिन मस्तिष्क को तोड़ने के बाद यह अन्दाजा नहीं लगा सकते कि इसमें क्या है? उसमें मिलती है छोटी सी आंख जिसे हम तीसरी आंख कहते हैं। यह आंख एक्स-रे के समान है। एक्स-रे में प्लेट उल्टी रहती है, पर इसकी प्लेट हमेशा इसके साथ ही सुल्टी रहती है। यह एक्स-रे की किताब हमारे मस्तिष्क में है। यह विषय षट्चक्रों का नहीं। सभी बढ़िया वस्तुयें हमारे पेट में भरी हुई हैं। सभी धातुयें हम अन्दर रखे हुए हैं। इसी प्रकार शरीर में एक बिजलीघर है जो आध्यात्मिक मानस के नाम से पुकारा जाता है। एक बहुत बड़ा अणु बिजलीघर हमारे शरीर में विद्यमान है। वह किससे चलता है, वह एक बैटरी से चलता है। मनुष्य के शरीर में सम्पूर्ण सामर्थ्यवान बिजली है, जिसको कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं।
मानसिक संस्थान जिसका थोड़ा-सा भी जागृत हो जाता है वह सब कुछ जान सकता है। वह आकाश से लेकर जीवन तक सब कुछ पहचान सकता है। अब्राहम लिंकन की पत्नी ने कहा— मुझे स्वप्न हुआ है अमेरिका के राष्ट्रपति तुम एक सप्ताह बाद मारे जाओगे। जिस चीज की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी वह हुई और ठीक एक सप्ताह बाद अमेरिका के उस राष्ट्रपति को गोली मार दी गयी। इस संस्थान की जागृति से मानव भूत, भविष्य व वर्तमान सभी का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसे जागृत करने की एक विशेष विधि है। जिसे तपाना कहते हैं। अगर दूध से घी निकालना होता है तो पहले दूध को तपाते हैं। तपाने से ही शरीर में छिपी अभिनव वस्तु ऊपर आ जाती है। दैवी तत्व ही सामने आ जाता है। सभी वस्तुयें तपस्या से प्राप्त की जा सकती है।
आज तपस्या का मैं विज्ञान भाग ही लेकर चलूंगा। मैं शरीर और आत्मा का प्रकाश बता रहा था और यह भी कह रहा था कि आत्मा पर किसी का असर नहीं होता। शरीर के भीतर कई चीजों का संग्रह है, पर हम शरीर मूल नहीं, परन्तु हम समझते ही नहीं। मैं आपको मोटे तौर पर समझाने का प्रयत्न करता हूं। मान लो आपके पास एक व्यक्ति आता है और कहता है कि अपनी एक आंख दे दीजिये और बदले में पांच हजार रुपये ले लीजिये। तो आप देते हैं क्या? कभी नहीं देते। अगर छोटे से छोटे अंग को भी आपसे मांगा जाये तो आप देने में आना-कानी कर जाते हैं। फिर आप कैसे कहते हैं कि आपका शरीर मूल्यवान नहीं है। आपका शरीर जितना मूल्यवान है किसी का नहीं। पैसे से कुछ भी नहीं किया जा सकता। हमारे एक मित्र थे श्री क्षेत्रपाल शर्मा और सुख संचारक कम्पनी के मालिक जो कि करोड़पति थे, एक दिन हम बैठे-बैठे चर्चा कर रहे थे कि उनकी भैंस चराने वाला एक मजदूर युवक आया। वह हृष्ट-पुष्ट युवक जिसका बदन संजीदा था। क्षेत्रपाल जी कहने लगे, आचार्य जी अगर इसका शरीर मेरा हो जाय तो मैं एक लाख रुपया खर्च कर दूं। पर कभी ऐसा हो सकता है क्या? मित्रो! अपना शरीर बड़ा कीमती है, पर आपने इसे समझा कहां?
इस शरीर के मन रूपी रिसीवर के सामने इन वैज्ञानिकों का रिसीवर टिक सकता है। अगर मनुष्य के पास ब्रेन न होता तो आज का यह विज्ञान कहां होता? इस विज्ञान का अन्तःस्थल और मूल मानव का ब्रेन ही तो है। लाखों-करोड़ों की कीमत वाला मनुष्य तपाने पर बहुत काम कर सकता है। अभी अमेरिका में नकली मनुष्य बनाये गये। वे बिजली के बटनों पर काम करने लगे। एक दिन ऐसा हुआ कि बिजली खराब हो गयी और वे नकली मनुष्य उस निर्माता वैज्ञानिक के शिर पर मारने लगे और वह वैज्ञानिक चन्द मिनट में ही मर गया। ऐसा इसलिए हुआ कि उनके पास मानसिक संस्थान नहीं था। मानव के मानसिक संस्थान के मुकाबले में और कोई संस्थान नहीं। इसके भीतर न जाने कितने तत्व छिपे पड़े हैं। उनको बाहर प्रकाश में लाने के लिए तपश्चर्या करनी पड़ती है। आप कुछ दिन तपस्या करके ऊब जाते हैं तो किसी पर एहसान नहीं करते। केवल अपनी ही आन्तरिक चेतना को जगाने का प्रयास करते हैं। रोज की प्रार्थनाओं का वैसा कोई उद्देश्य नहीं है, पर रोजाना सत् संकल्प दोहराने से हृदय में सद्विचार उत्पन्न कर परिपक्वता लाते हैं और यही प्रार्थना का उद्देश्य है। साधना का नाम ही तपश्चर्या है। साधना के बल पर ही गुरु नानक ने अपने पंजे से समाज को बचाया था और आज भी उसी का प्रतीक नानक पंजा है। पर आप वास्तविकता समझते नहीं कि दुनियां का कोई ऐसा देवता नहीं जो खुशामद से खुश हो सकता है फिर भी आप खुशामद किये जा रहे हैं और उस महान भगवान को रिश्वत देकर अपना काम निकालना चाहते हैं। जरा यह तो सोचते कि कभी दुकानदार भी रिश्वत ले सकता है। अगर देवी को बलि चढ़ाने से ही आदमी का काम सफल हो जाये तो यह डाकू लो ग्यारह रुपये की बकरी देवी को चढ़ा कर उसका बल प्राप्त करके दुनियां में तबाही मचा दें। पर मित्रो! यह पूजा लाभदायक नहीं, में तो यह कहता हूं कि अगर देवी रोज पशुबलि लेती है तो वह देवी नहीं राक्षसनी है। यह सब बेकार की बातें हैं। यह अभागों का अध्यात्म हमें मस्तिष्क से निकालना पड़ेगा।
भगवान नैतिक हैं, अनैतिक नहीं। भगवान खुशामद-रिश्वत से खुश नहीं हो सकता। भगवान को खुश रखने के लिए नैतिक साधनों और तपश्चर्या की आवश्यकता होती है। मैं यज्ञों में जाता हूं तो अनेक कथायें सुनाता हूं पर यहां नहीं सुनाता। यहां केवल इतनी सी बात बताना चाहता हूं कि बाजीगर अपनी झोली में से कबूतर ही कबूतर निकाल सकता है तो आप अपनी इतनी बड़ी झोली में से निकालना चाहें तो न मालूम क्या-क्या निकाल सकते हो। गायत्री उपासना का बहुत बड़ा महत्व है। मैं आपकी साधना को डगमगाने वाली बात नहीं करता। भगवान और आप बहुत बड़े हैं, पर आपको छोटी कल्पना के लिए उपासना नहीं करनी चाहिए। आपके और मेरे भीतर अनेक कण हैं पर मेरा जीवन व्यवस्थित है इसलिए मैं चाहता हूं कि जीते जी मेरे पन्ने न खोले जायें। मैंने वेदों का अनुवाद किया, गीता का इतना बड़ा भाष्य लिख दिया जो आज तक नहीं लिखा गया। मैं कार्यों से घिरा मानव कितना काम करता हूं। यह आप सब को आश्चर्य है, पर मुझे नहीं। गायत्री साधना का इससे भी हजार गुना अधिक फल होता है। गायत्री साधना बड़ी शक्तिप्रद होती है। मैं आपको गायत्री साधना की विधि बता रहा था और बता रहा था कि इसके तीन स्तर हैं, तीन परिधान हैं। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के रूप में। हर पोशाक अपना अलग महत्व मानती है। अतः गायत्री उपासना समझाते हुए मुझे तीन स्तरों की बात बतानी पड़ेगी। सभी बातें बताये बिना काम नहीं चलता, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार खाये बिना काम नहीं चलता। नींद भी आवश्यक है, सफाई भी जिन्दगी के लिए आवश्यक है। इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन के लिए तीनों शरीरों की साधना करनी पड़ती है। स्थूल शरीर का मतलब हमारे शरीर से है। सूक्ष्म शरीर का मतलब हमारे अन्दर के शरीर से है ओर कारण शरीर का मतलब अन्दर आत्मा में विद्यमान है। कारण शरीर में निष्ठायें बंधी हुई हैं। निष्ठायें सभी में बड़ी है। निष्ठा पर व्यक्ति मर सकता है। निष्ठा और भावना आस्था प्रकट करती हैं। निष्ठा जिस पर नहीं होती वह कुछ नहीं कर सकता। गुरु गोविन्द सिंह के दो निर्दोष बच्चों की धर्म की निष्ठा ने ही तो दीवार में चुने जाने का साहस प्रदान किया। फादर हैरीमन थे। वे रोम में कैथोलिक थे और धर्म परिवर्तन कर गये। फिर पुनः कैथोलिक बन गये तो उनकी व्यवस्था दी गयी और जज ने उन्हें जिन्दा जलाने की सजा दी और उन्होंने अपने दाहिने हाथ को जलाने की सजा चाही। उन्होंने कहा— इस अभागे हाथ को दण्ड दीजिये जिसने धर्म बदलने हेतु हस्ताक्षर किया। अतः इसको दण्ड दिलवाना चाहता हूं।
आज की बात अधूरी रह गयी वो कल बताऊंगा। कल बात बहुत महत्वपूर्ण होगी। बुद्धि द्वारा ध्यान बताये जाते हैं। ध्यान का बहुत बड़ा महत्व है। ध्यान बहुत बड़ी शक्ति है। ये सभी बातें कल होंगी। अभी तो मेरे साथ शान्ति पाठ बोलिए।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! सर्वारिष्टा सुशान्तिर्भवतु॥

