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होली का संदेश (होली विशेषांक— 2)
अनावश्यक और हानिकार वस्तुओं को हटा देने और मिटा देने को हिंदू धर्म में बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा गया है। और इस दृष्टिकोण को क्रियात्मक रूप देने के लिए होली का त्यौहार बनाया गया है। रास्तों में फैले हुए काँटे, शूल, झाड़-झंखाड़ मनुष्य समाज की कठिनाइयों को बढ़ाते हैं; रास्ते चलने वालों को कष्ट देते हैं। ऐसे तत्त्वों को ज्यों-का-त्यों नहीं पड़ा रहने दिया जा सकता। उनकी ओर से न आँख बचाई जा सकती है और न उपेक्षा की जा सकती है। इसलिए हर वर्ष होली पर लोग मिल-जुलकर रास्तों में पड़े हुए कँटीले अनावश्यक झाड़ों को बटोरते हैं और उन्हें जलाते हुए उत्सव का आनन्द मनाते हैं। इसी प्रकार नाली, गड्ढे, कीचड़, धूलि कचरा आदि की सफाई करके जमी हुई गंदगी को हटाते हैं। गली-मुहल्लों के कोने-कोने को छान डाला जाता है कि कह...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हर गाँव को एक तीर्थ रूप में विकसित करने के लिए तीर्थयात्रा टोलियाँ निकालने की योजना है। पदयात्रा को साइकिल यात्रा के रूप में मान्यता दी है। चार साइकिल सवारों का एक जत्था पीले वस्त्रधारण किए, गले में पीला झोला लटकाए, साइकिलों पर पीले रंग के कमंडलु टाँगे प्रवास-चक्र पर निकलेगा। यह प्रवास न्यूनतम एक सप्ताह के, दस दिन के, पंद्रह दिन के अथवा अधिक-से-अधिक एक महीने के होंगे। जिनका निर्धारण पहले ही हो चुका होगा। यात्रा जहाँ से आरंभ होगी, एक गोलचक्र पूरा करती हुई वहीं समाप्त होगी। प्रातःकाल जलपान करके टोली निकलेगी। रास्ते के सहारे वाली दीवारों पर आदर्शवाक्य लिखती चलेगी। छोटी बालटियों में रंग घुला होगा। सुंदर अक्षर लिखने का अभ्यास पहले से ही कर लिया गया होगा।1. हम बदलेंगे— युग बदलेगा। 2. हम सुधरेंगे— ...
हमारी होली (होली विशेषांक— 1)
मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनाएँ और साथ ही यह भी चिंतन करें कि जिसकी यह छाया है, उस अखंड आनंद को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ, जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ?
आइए, उस अखंड आनंद को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अंतरों में जल उठे, जिसकी लपटें आकाश तक पहुँचें। अंतर के कपाट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़-झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस, ...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 149): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञापरिजन उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जनसमुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखती भी नहीं है। उन्हें देवालय की प्रतिष्ठा दी जाएगी। बिहार के हजारी किसान ने हजार आम्र-उद्यान निज के बलबूते खड़े करा दिए थे, तो कोई कारण नहीं कि एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का उद्देश्य पूरा न हो सके। इनकी पौध शान्तिकुञ्ज से देने का भी निश्चय किया गया है और हर प्रज्ञापुत्र को कहा गया है कि वह अशोक-वाटिका लगाने-लगवाने में किसी प्रकार की कमी न रहने दें। उसके द्वारा वायुशोधन का होने वाला कार्य शाश्वत शास्त्रसम्मत यज्ञ के समतुल्य ही समझें। अग्निहोत्र तो थोड़े समय ही कार्य करता है, पर यह पुनीत वृक्ष उसी कार्य क...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 148): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
जीवन की बहुमुखी समस्याओं का समाधान, प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के रहस्य भरे तत्त्वज्ञान के अतिरिक्त इसी अवधि में भाषण, कला, सुगम संगीत, जड़ी-बूटी उपचार, पौरोहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह-उद्योगों का सूत्र-संचालन भी सम्मिलित रखा गया है, ताकि उससे परोक्ष और प्रत्यक्ष लाभ अपने तथा दूसरों के लिए उपलब्ध किया जा सके।
अनुमान है कि अगले 14 वर्षों में एक लाख छात्रों के उपरोक्त प्रशिक्षण पर भारी व्यय होगा। प्रायः एक करोड़ भोजन-व्यय में ही चला जाएगा। इमारत की नई रद्दोबदल, फर्नीचर, बिजली आदि के जो नए खरच बढ़ेंगे, वे भी इससे कम न होंगे। आशा की गई है कि बिना याचना किए भारी खरच को वहनकर अब तक निभा व्रत आगे भी निभता रहेगा और यह संकल्प भी पूरा होकर रहेगा। 25 लाख का इस उच्चस्तरीय शिक्षण में सम्मिलित होना तनिक भी क...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 147): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
युगसंधि सन् 2000 तक है। अभी उसमें प्रायः 14 वर्ष हैं। हर साल इतने जन्मदिन भी मनाए जाते रहें, तो 1 लाख कार्यकर्त्ताओं के जन्मदिन 1 लाख यज्ञों में होते रहेंगे। देखा-देखी इसका विस्तार होता चले, तो हर वर्ष कई लाख यज्ञ और कई करोड़ आहुतियाँ हो सकती हैं। इससे वायुमंडल और वातावरण दोनों का ही संशोधन होगा, साथ ही जनमानस का परिष्कार करने वाली अनेक सत्प्रवृत्तियाँ इन अवसरों पर लिए गए अंशदान-समयदान संकल्प के आधार पर सुविकसित होती चलेंगी।
2. एक लाख को संजीवनी-विद्या का प्रशिक्षण— शान्तिकुञ्ज की नई व्यवस्था इस प्रकार की जानी है, जिसमें 500 आसानी से और 1000 ठूँस-ठूँसकर नियमित रूप से शिक्षार्थियों का प्रशिक्षण होता रह सकता है। इस प्रशिक्षण में व्यक्ति का निखार, प्रतिभा का उभार, परिवार सुसंस्कारिता, समाज में स...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 146): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक-एक लाख की पाँच शृंखलाएँ सँजोने का संकेत हुआ। उसका तात्पर्य है— कली से कमल बनने की तरह खिल पड़ना। अब हमें इस जन्म की पूर्णाहुति में पाँच हव्य सम्मिलित करने पड़ेंगे। वे इस प्रकार हैं—
1. एक लाख कुंडों का गायत्री यज्ञ।
2. एक लाख युगसृजेताओं को उभारना तथा शक्तिशाली प्रशिक्षण करना।
3. एक लाख अशोक वृक्षों का आरोपण।
4. एक लाख ग्रामतीर्थों की स्थापना।
5. एक लाख वर्ष का समयदान-संचय।
यों पाँचों कार्य एक-से-एक कठिन प्रतीत होते हैं और सामान्य मनुष्य की शक्ति से बाहर, किंतु वस्तुतः ऐसा है नहीं। वे संभव भी हैं और सरल भी। आश्चर्य इतना भर है कि देखने वाले उसे अद्भुत और अनुपम कहने लगे।
1. एक लाख गायत्री यज्ञ— वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों में से प्रत्येक को अपना जन्मदिवसोत्सव अपने आँगन में मनाना होगा। उसमें एक छोटी...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हमारे निजी जीवन में भगवत्कृपा निरंतर उतरती रही है। चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने का अत्यंत कठोर साधनाक्रम उन्हीं दिनों से लाद दिया गया जब दुधमुँही किशोरावस्था भी पूरी नहीं हो पाई थी। इसके बाद संगठन, साहित्य, जेल, परमार्थ के एक-से-एक बढ़कर कठिन काम सौंपे गए। साथ ही यह भी जाँचा जाता रहा कि जो किया गया, वह स्तर के अनुरूप बन पड़ा या नहीं। बड़ी प्रवंचना के सहारे संसारी ख्याति अर्जित करने की विडंबना तो नहीं रचाई गई। आद्यशक्ति गायत्री को युगशक्ति के रूप में विकसित और विस्तृत करने के दायित्व को सौंपकर वह जान लिया गया कि एक बीज ने अपने को गलाकर नये 24 लाख सहयोगी-समर्थक किस प्रकार बना लिए? उनके द्वारा 2400 प्रज्ञापीठें विनिर्मित कराने से लेकर सतयुगी वातावरण बनाने और प्रयोग-परीक्षणों की शृंखला अद्भ...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
बड़ी और कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही किसी की महिमा और गरिमा का पता चलता है। प्रतिस्पर्द्धाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पदाधिकारी बना जाता है। खेलों में बाजी मारने वाले ही पुरस्कार पाते हैं। खरे सोने की पहचान अग्नि में तपाने और कसौटी पर कसने से ही होती है। हीरा इसीलिए कीमती माना जाता है कि वह साधारण आरी या रेती से कटता नहीं है। मोर्चे फतह करके लौटने वाले सेनापति ही सम्मान पाते और विजय श्री का वरण करते हैं।
चुनौतियाँ स्वीकार करने वाले ही साहसी कहलाते हैं। उन्हें अपनी वरिष्ठता भयानक कठिनाइयों को पार करके ही सिद्ध करनी पड़ती है। योगी, तपस्वी जान-बूझकर कष्टसाध्य-प्रक्रिया अपनाते हैं। कृष्ण की गरिमा को जिनने जाना, वे दुर्दांत उन्हें बरबाद करने के लिए आरंभ से ही अपनी आक्रामकता का प्रदर्शन करते र...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
वर्तमान समस्याएँ एकदूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ संबंध है। चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव; बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुलझा लिया जाए और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता। समाधान एक मुश्त खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है, तो उनके हल निकलकर ही रहेंगे।
शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्रबल-धनबल। दूसरा बुद्धिबल-संगठनबल। पिछले बहुत समय से शस्त्रबल और धनबल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया और जो मन में आया सो कराया जाता रहा है। यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवीशक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठनबल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह द...

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