AI की क्षमता जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से उसके नैतिक और मानवीय उपयोग पर वैश्विक विमर्श भी आवश्यक है।
डॉ. चिन्मय पाण्ड्या जी
प्रति-कुलपति, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, भारत
पोप लियो XIV का यह आह्वान निश्चित रूप से विश्वभर के धर्मगुरुओं द्वारा साझा की जाने वाली चिंता को प्रतिबिंबित करता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अब भविष्य की कोई काल्पनिक या संभावित तकनीक नहीं रह गई है; यह हमारे वर्तमान को आकार देने वाली प्रमुख शक्तियों में से एक बन चुकी है। स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय प्रणालियों से लेकर शासन, शिक्षा और यहाँ तक कि युद्ध तक, AI मानव सभ्यता के महत्वपूर्ण आधारभूत ढाँचों में निरंतर गहराई से समाहित होती जा रही है। जैसे-जैसे इसकी क्षमताओं का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी बढ़ रही है कि यह अपार शक्ति मानवीय मूल्यों, मानव गरिमा, करुणा, सामाजिक स्थिरता तथा हमारे ग्रह के कल्याण के अनुरूप बनी रहे।
यद्यपि हमारी परंपराएँ इसके लिए अलग-अलग शब्दावली का प्रयोग कर सकती हैं, लेकिन विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच एक साझा नैतिक विश्वास विद्यमान है—जीवन, मृत्यु, मानव स्वतंत्रता और नैतिक उत्तरदायित्व से जुड़े निर्णयों को कभी भी पूरी तरह मशीनों के हवाले नहीं किया जाना चाहिए। हम ऐसे समय से गुजर रहे हैं, जब तकनीक हमारे सामाजिक, नैतिक और यहाँ तक कि धार्मिक संस्थानों की अनुकूलन क्षमता की तुलना में कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ रही है। यह केवल तकनीकी परिवर्तन का दौर नहीं है; बल्कि यह एक गहरा प्रतिमान परिवर्तन है, जो एक ओर अभूतपूर्व अवसर प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर एक गंभीर खतरा भी उत्पन्न करता है—मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा।
यह चिंता केवल धर्मगुरुओं द्वारा ही व्यक्त नहीं की गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र के विश्व के कुछ अग्रणी विशेषज्ञों ने भी इसे स्पष्ट रूप से सामने रखा है। ट्यूरिंग पुरस्कार से सम्मानित और व्यापक रूप से “AI के गॉडफादर” के रूप में माने जाने वाले ज्यॉफ्री हिंटन ने Google से इस्तीफा इस उद्देश्य से दिया कि वे तेजी से विकसित हो रही AI के संभावित खतरों के बारे में खुलकर बोल सकें। उन्होंने अनियंत्रित AI विकास को मानवता के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बताया है। उनके इस चेतावनी के पीछे अनेक कारण हैं, लेकिन मैं उनमें से दो पर विशेष रूप से प्रकाश डालना चाहूँगा।
पहला है हेरफेर की अभूतपूर्व शक्ति। AI में केवल सूचनाओं को संसाधित करने की क्षमता ही नहीं है, बल्कि यह लोगों की धारणाओं को आकार देने, उनके व्यवहार को प्रभावित करने और अंततः यह निर्धारित करने की क्षमता भी रखती है कि समाज किस प्रकार सोचता और निर्णय लेता है। प्रभाव की यह एकाग्रता गहरी नैतिक चिंताएँ उत्पन्न करती है।
हालाँकि, इन तकनीकी चुनौतियों से परे एक और भी गहरा आध्यात्मिक प्रश्न मौजूद है। संस्कृत की ज्ञान-परंपरा हमें सिखाती है कि जब जीवन किसी उद्देश्य से निर्देशित होता है, तब वह उत्सव बन जाता है; और उद्देश्य के अभाव में हम अपनी दिशा को लेकर अनिश्चित होकर केवल भटकते रहते हैं। मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि बढ़ते स्वचालन के इस युग में मानवता अपने इसी उद्देश्य-बोध को खोने का जोखिम उठा रही है। इतिहास में पहली बार मनुष्य स्वयं अपनी ही क्रांति से बाहर हो जाने के खतरे में है और धीरे-धीरे सहभागी के बजाय केवल दर्शक बनता जा रहा है। जैसे-जैसे AI आधारित प्रणालियाँ अधिक से अधिक जिम्मेदारियाँ संभालेंगी, वैसे-वैसे हम ऐसी सामाजिक व्यवस्था के निर्माण का जोखिम उठाएँगे, जहाँ व्यक्ति स्वयं से यह प्रश्न पूछने लगेंगे कि क्या उनके जीवन का अब भी कोई अर्थ और उद्देश्य है। यदि मैं मानवता की यात्रा में सार्थक योगदान देने में सक्षम नहीं रहूँ, तो फिर मेरे अस्तित्व का उद्देश्य क्या रह जाएगा?
इसीलिए AI को केवल एक तकनीकी विषय के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह मूलतः सभ्यता से जुड़ा विषय है। यह हमें मानव की पहचान, जीवन के उद्देश्य, चेतना, उत्तरदायित्व और उस भविष्य को लेकर गहन प्रश्नों का सामना करने के लिए विवश करता है, जिसे हम सब मिलकर निर्मित करना चाहते हैं।
मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि मैंने परम पावन पोप फ्रांसिस के नेतृत्व में संचालित वेटिकन की AI Ethics पहल तथा Hiroshima AI Call for Ethics—दोनों में सहभागिता की है। इन वैश्विक अंतरधार्मिक प्रयासों में एक साझा विचार यह है कि तकनीक हमें बताती है कि हम क्या कर सकते हैं, जबकि आध्यात्मिकता हमें यह समझने में सहायता करती है कि हमें क्या करना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य इन दोनों के समन्वय से निर्देशित होना चाहिए।
अतः जब पोप लियो XIV विश्व से “AI को निरस्त्र करने” का आह्वान करते हैं, तो वे किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित चिंता को अभिव्यक्त नहीं कर रहे हैं। यह विश्वभर के धार्मिक नेताओं द्वारा साझा की जाने वाली चिंता है। उनका विश्वास है कि तकनीकी प्रगति सदैव मानवता की सेवा में होनी चाहिए; ऐसा नहीं कि मानवता स्वयं तकनीक के अधीन हो जाए।
लिंक पर पढ़ने के लिए : https://strategicforesight.com/can-wisdom-triumph-over-artificial-intelligence/
