MATA JI
कृपा-कथा : एक शिष्य की कलम से परम वंदनीया माता जी जगन्माता माँ जगदंबा हैं
परम वंदनीया माता जी मेरे लिए केवल एक श्रद्धेय व्यक्तित्व नहीं, बल्कि साक्षात् जगन्नमाता—मां जगदंबा की अवतारी चेतना हैं। यह मेरा अटूट, अडिग और जीवनानुभव से उपजा विश्वास है। हमारा विराट गायत्री परिवार परम वंदनीया माता जी की ममत्वमयी गोद और वात्सल्यपूर्ण छाया में ही पला-बढ़ा है। उन्हीं के करुणामय प्रेम के कारण आज लगभग पंद्रह करोड़ साधक, संसार के कोने-कोने में रहते हुए भी, प्रेम और आत्मीयता की एक अदृश्य डोर से बंधे हुए हैं। यह कोई भावनात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्य है, जिसे असंख्य जीवनों ने अनुभूत किया है।
यह प्रसंग मेरे जीवन के उस कालखंड का है, जब मैं स्नातक के अंतिम वर्ष में अध्ययन कर रहा था। मेरा परिवार पहले से ही गायत्री परिवार से जुड़ा हुआ था। घर के लोग श्रद्धा और निष्ठा के साथ ...
कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से चिकित्सा विज्ञान नतमस्तक हुआ माता जी की कृपया के आगे
वर्ष 1994 के आरंभ का समय था। शांतिकुंज के कैंटीन के समीप स्थित खुले मैदान में समयदानी भाई पूरे उत्साह से कबड्डी खेल रहे थे। वातावरण में युवापन, ऊर्जा और आत्मीयता घुली हुई थी। उन्हें खेलते देख मेरा मन भी उमंग से भर उठा और मैं भी सहज भाव से खेल में सम्मिलित हो गया। प्रारंभ में खेल आनंदपूर्वक चलता रहा, किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
एक रेड के दौरान विपक्षी टीम ने मुझे घेर लिया। उसी संघर्षपूर्ण क्षण में किसी का पैर मेरे पैर पर आ पड़ा। अगले ही पल हड्डी टूटने की तीक्ष्ण और भयावह आवाज़ गूँज उठी। असहनीय पीड़ा के साथ मैं भूमि पर गिर पड़ा। अगले दिन BHEL अस्पताल में एक्स-रे कराया गया। चिकित्सक ने गंभीरता से बताया कि पैर की टिबिया और फिबुला—दोनों हड्डियाँ टूट चुकी हैं, और केवल टूटी ही नहीं, बल्कि ...

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