• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • जियो और जीने दो
    • जियो और जीने दो (Kavita)
    • भारतीय दर्शन और उसकी एकात्मकता
    • सच्चे धर्म की पहचान
    • राष्ट्र का विकास बिना आत्म-बलिदान के नहीं हो सकता
    • रथी सो गया है।
    • अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की जड़
    • वेदों में सामूहिकतावाद की शिक्षा
    • मन को कैसे वश में किया जाय।
    • महानता के बीज
    • विज्ञान के सर्वनाशी प्रभाव का प्रतिकार धर्म से ही हो सकेगा।
    • दूसरों को मान दीजिए।
    • मनुष्य स्वयं अपना भाग्य है।
    • संकट का समय और ग्रहों का प्रभाव
    • ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल कैसे बनाया जाय?
    • गायत्री उपासना के अनुभव
    • देश भर में नवरात्रि में गायत्री-उपासना की धूम
    • वंशी धर दो, शंख उठाओ!
    • वंशी धर दो, शंख उठाओ (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1957 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


महानता के बीज

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 9 11 Last
(डॉक्टर रामचरण महेन्द्र, पी.एच.डी.)

(1)

यूनान देश के थ्रेस प्रान्त में अब्डेरा नगर में एक अनाथ बालक लकड़ियाँ काट कर लाता और बाजार में बेचकर अपना पेट भरता था। दिन भर जीविका- उपार्जन में ही उसका समय व्यतीत हो जाता था।

एक दिन एक भला आदमी लकड़ियों के बाजार से होकर निकला। उसने देखा एक बालक अपने सामने लकड़ियों का एक छोटा गट्ठा रखे हुए बेचने का प्रयत्न कर रहा है। एक बात ने उसे विस्मित कर दिया। उसने देखा कि एक गट्ठर अन्यों की अपेक्षा बड़ी सुन्दरता और कलापूर्ण ढंग से बँधा हुआ था। भला आदमी तनिक ठहर गया और लड़के की बुद्धि-परीक्षा लेने के मन्तव्य से उसे पूछा-

“लड़के! इस गट्ठर को तुमने स्वयं बाँधा है?”

“जी हाँ, मैं लकड़ी स्वयं काटता, स्वयं गट्ठर बाँधता और प्रतिदिन इस बाजार में बेचकर जीविका-उपार्जन करता हूँ।”

“क्या तुम इसे खोलकर फिर इसी कलापूर्ण ढंग से बाँध सकते हो?”

“जी हाँ, यह लीजिए अभी बाँधे देता हूँ”

यह कहते-कहते लड़के ने लकड़ी का गट्ठर खोल डाला। लकड़ियाँ इधर-उधर बिखेर दीं। फिर तत्परता और सावधानी से एक बड़ी लकड़ी को आधार बनाकर उसके इधर-उधर छोटी-छोटी लकड़ियाँ सजाई। अन्त में वैसे ही सुन्दरतापूर्ण ढंग से लकड़ियों का गट्ठर बाँध दिया। यह कार्य वह स्फूर्ति और बड़ी लगन से कर गया। उतनी देर के लिए यह भूल गया कि वह किसी व्यक्ति के सम्मुख खड़ा है और कोई उसकी क्रियाओं और आदतों को सूक्ष्मता से देख रहा है।

भले आदमी पर इस कलापूर्ण ढंग का बहुत प्रभाव पड़ा। उन्होंने देखा कि बालक में छोटे काम को भी पूरी दिलचस्पी और कलापूर्ण ढंग से पूरा करने के दुर्लभ संस्कार थे। ऐसे संस्कारों वाले व्यक्ति ही विकसित होकर संसार के महापुरुष बनते हैं। उन्होंने सोचा, “इस लड़के के चरित्र में जो महानता के बीज हैं, उन्हें विकसित होने का अवसर देना चाहिए। हो सकता है कि यह बालक संसार का कुछ लाभ कर सके। वे बोले- “तुम हमारे साथ चलोगे? हम तुम्हें पढ़ाना चाहते हैं। सम्पूर्ण व्यय, भोजन, निवास आदि का भार हमारे ऊपर रहेगा।”

बालक कुछ देर तक सोचता रहा। उसकी तीव्र इच्छा थी कि वह किसी प्रकार पढ़े-लिखे। उसने कुछ विद्याध्ययन किया भी था। जीविका-उपार्जन से जो समय बचता था, उसमें वह कुछ पढ़ा भी करता था। उसने अपनी स्वीकृति दे दी।

भले आदमी ने उस बालक को अपने साथ ले लिया और उसकी सारी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध स्वयं किया। वह उसकी आदतों पर मुग्ध था। स्वयं उसकी शिक्षा की देख-रेख करते-करते वह बालक विद्वान बन गया। बड़ा होने पर वह यूनान का महान् दार्शनिक पैथागोरस कहलाया और भला आदमी जिसने एक दृष्टि में बालक के अन्दर छिपी हुई महानता को पहचाना था, वह था यूनान का विश्व-विख्यात तत्वज्ञानी-डेमाकीटस!

पैथागोरस के बचपन के जिस गुण पर डेमोकीटस मुग्ध हुआ था, (छोटे कार्यों में भी पूरा दिलचस्पी और कलापूर्ण ढंग से महानता का प्रदर्शन) यह देखने में साधारण-सा था, पर वास्तव में महानता का बीज उसी के अन्दर छिपा हुआ था। जो मनुष्य अपने छोटे-छोटे कार्यों तक को पूरी रुचि और कलापूर्ण ढंग से करता है, वह बड़े कार्यों को और भी सावधानी से पूरा करेगा और प्रशंसनीय होगा। जो छोटे-छोटे कामों में भी अपनी महानता की छाप लगा देता है, दुनिया उसी को महत्व प्रदान करती है।

(2)

महानता के गुणों के प्रदर्शन के लिए यह आवश्यक नहीं कि बड़े पैमाने पर ही आपके पास सामान हो, या नाना प्रकार की कला-सामग्री हो, विपुल विस्तार हो। कलाकार की आत्मा में यदि सच्ची कलात्मकता वर्तमान है, तो वह अल्प साधनों से ही अपनी महानता प्रदर्शित कर सकता है।

महात्मा जी ने एक बार एक लेख लिखा था “झाड़ू देने की कला।” भला झाड़ू देने जैसे तुच्छ कार्य में भी क्या कोई सौंदर्य हो सकता है? उन्होंने दिखाया कि इस साधारण से कार्य में भी सावधानी की आवश्यकता है।

आप अपने कार्यों को देखिए। सुबह से शाम तक किये जाने वाले कार्यों की परख कीजिए और फिर स्वयं ही निर्णय कीजिए कि क्या उनमें आपने अपनी छिपी हुई महानता का परिचय दिया है? क्या उससे आपके चरित्र की कलात्मकता, सुरुचि, सुव्यवस्था और संतुलन प्रकट होता है? क्या आपका कार्य आपके चरित्र के गौरव के अनुकूल है? क्या उससे आपकी असाधारण योग्यता, बुद्धि और सूझ-बूझ प्रकट होती है? क्या उसमें आपके व्यक्तित्व की विशेषताएं भरी हुई हैं?

एक बार एक इन्टरव्यू हो रहा था। इन्टरव्यू करने वाले एक मेज को सामने रखे बैठे थे, सामने उम्मीदवारों के लिए कुर्सियाँ रखी हुई थीं। एक-एक कर उम्मीदवार आते थे और कुर्सी पर बैठकर पूछने वालों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। उम्मीदवार एक से एक सुन्दर और आकर्षक वस्त्र, चमचमाते हुए पालिशदार जूते डाले चले जाते थे। एक उम्मीदवार साधारण कपड़े पहिने हुए था। वह जब कमरे में प्रविष्ट हुआ तो उसने देखा कि सामने मार्ग में एक पुस्तक पड़ी हुई है। उसने उस पुस्तक को उठाया और मेज के एक किनारे पर शिष्टतापूर्वक रख दिया। उसकी यह मनोवृत्ति देखकर इन्टरव्यू करने वाले को उसकी सावधानी पर विश्वास हो गया और वह चुन लिया गया। वह एक साधारण-सा कार्य था, पर इसी से उसके चरित्र की महानता प्रकट होती थी।

इसी प्रकार हमारी अनेक आदतों, कार्यों, वस्त्रों, शिष्टाचार व्यवहार आदि से हमारा व्यक्तित्व प्रकट हुआ करता है। जहाँ हमारी ये आदतें महानता दिखाती हैं, वहीं हमारे आने वाले पतन की भी सूचक हैं।

मान लीजिए, बाजार में बढ़िया केले बिक रहे हैं। हमारी तबियत उन पर चल उठती है, पर जेब खाली। आदत हमारे ऊपर चढ़ बैठती है। दुकानदार हमारी जान पहचान का है। उधार दे देगा। आइये, खरीद लें। हम मनोविकार पर नियंत्रण न कर उससे चार केले उधार ले लेते हैं और देखते-देखते खा डालते हैं। केले वाले के चार आने कितनी कम देर में हमारे सिर चढ़ जाते हैं। अब उधार देते हुए हमें मन ही मन कुछ संकोच सा होता है। जब कभी केले वाले के पास से निकलते हैं, कतरा जाते हैं, बचने की कोशिश करते हैं, उधार देना भूल जाते हैं, पैसे देने का मन नहीं करता। इसी प्रकार छोटी-छोटी चीजें लेने से हमारी उधार की आदत बढ़ती जाती है। यही बढ़कर हमारे घरबार, जमीन, जायदाद, इज्जत आदि को नष्ट कर डालती है। ऋण आपका घातक शत्रु है, जो तनिक सी शिथिलता में आपको ले बैठता है।

इसी प्रकार और भी गन्दी आदतें हैं। आपका मित्र सिगरेट पीता है। आपको भी पेश की जाती है। आप अनचाहे मन से दो कश लगाते हैं। उन्हीं मित्रों के साथ आपको यह आदत लग जाती है। सिगरेट के बाद पान, बीड़ी, मद्य इत्यादि एक के बाद एक गन्दी आदत आपको शिथिल करती जाती है। आप प्रतिमास 15-200 रुपये पान-बीड़ी वाले को दे डालते हैं। फिर व्यभिचार आकर सर्वस्व नष्ट कर देता है।

यही बात और मनोविकारों की भी है। किसी ने हमारा कहना न माना कि हम आवेश में आकर गर्म हो उठे। नाराजी से हम घर भर डालते हैं। सब को खरी-खोटी सुनाते हैं। क्रोध का भूत हमारे साथ है। हम दुकानदार हैं, तो यह दुष्ट हमारी जिह्वा को उछाल कर ग्राहकों को बहका देता है। वे दूर ही से भाग जाते हैं। यदि हम अफसर हैं, तो यह हमारे मातहतों को असंतुष्ट रखता है। यदि हम रेलगाड़ी में सफर कर रहे हैं, तो यह दुष्ट हमें चैन से यात्रा नहीं करने देता। ऐसा अड़ियल, उत्तेजित या शक्की मन यह हमारा शत्रु ही है।

इसी प्रकार हमारे चरित्र की असंख्य छोटी-छोटी भूलें हमें नीचे गिराती रहती हैं। इन पर हम कोई ध्यान नहीं देते, पर वास्तव में ये ही हमारे चरित्र के वारे-न्यारे करती रहती हैं।

महानता हमारे चरित्र और स्वभाव में प्रचुरता से भरी पड़ी है। हमें चाहिये कि इसी पक्ष पर मनन चिंतन कर इसे विकसित करें। तमोगुण हमारे अन्तःकरण में मलीनता उत्पन्न करता है जिससे अशुभ विचार आते हैं। अतः अपने शुद्ध, सत्त, चित्त, आनन्द रूप का ही ध्यान करना चाहिए। चित्त में शान्त, पवित्र और उक्त विचारों को ही दृढ़ता से जमाइये। अपनी महत्ता, अपनी शक्ति, अपने दैवी गुणों का चिन्तन करने से मस्तिष्क बलशाली बनता है और हृदय से प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होने लगता है। अपने सत्वगुण पर विचार करने से आत्म-बल की वृद्धि होती है। आपकी सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि आप कितने अंशों में अपनी महत्ता अनुभव करते हैं, अपने प्रति आपका कितना विश्वास है, आप उसको कितना व्यवहार में प्रत्यक्ष करते हैं।

“उच्च्तिष्ट महते सौभगाय” (अथर्व 2-6-2 )

श्रेष्ठ बनना ही महान् सौभाग्य है। जो महानता खोजने और महापुरुष बनने में प्रयत्नशील है, वही वास्तव में धन्य है।

डॉ. दुर्गाशंकर नागर ने महान् बनने के सूत्र इस प्रकार दिये हैं। एक-एक शब्द ध्यान देने योग्य है :-

“क्या तुम संसार में अपना अमर नाम छोड़ना चाहते हो? यदि ऐसा है तो आज ही से महत्ता की, बड़प्पन की कल्पना अपने मन में स्थापित कर दो और भावना करो कि तुम दिन प्रतिदिन उच्च स्थिति में प्रवेश कर रहे हो..... प्रतिक्षण अपनी कल्पना अधिकाधिक पुष्ट करते रहो और निरन्तर दृढ़ प्रयत्न से अवश्य तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा। प्रत्येक सद् संकल्प में आत्मशक्ति ओत-प्रोत रहती है। हमारे महान् बनने का कारण हमारी आत्मा में ही विद्यमान है। बाहर कहीं खोजने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य की महत्ता का लक्षण आत्म-विश्वास है। महान लक्षों का चिन्ह मन में रखने से कल्पना -शक्ति अधिकाधिक दृढ़ होकर विशाल और बलवान होती है। अपनी आत्मा की विशालता का चिन्तन करो। महानता ही तुम्हारा आदर्श है। अतः अपनी कल्पना का मानसिक चित्र अपने विषय में विशाल, महान् एवं सुन्दर बनाओ और दृढ़ प्रयत्न करो।

अपनी महानता के विचार मन में दृढ़ता से जमा देना मनोभूमि में महानता के बीज बो देना है। यही विचार बीज कालाँतर में अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होते है और आपकी महत्ता की छाप आपके कुटुम्बियों, मित्रों, पड़ोसियों और मिलने-जुलने वालों पर जमा देते हैं। महानता का आन्तरिक विश्वास आपको आगे धकेलने वाली शक्ति है। इसे दृढ़ता से धारण कीजिये। जिस क्षेत्र की महानता इष्ट हो, उसी को सर्वोत्कृष्ट रूप में धारण कीजिए और अपने दैनिक जीवन से प्रत्यक्ष कीजिए।

अपने आपको तुच्छ समझना एक पाप भरा आत्म-पतन है। इसके भागी न बनिये। अपना तिरस्कार करना आत्म-हत्या का ही एक भेद है। खुद को तुच्छ और नीच समझने वाला व्यक्ति खुद चरित्र की सर्वोच्च तथा परमोत्कृष्ट वस्तु की जड़ काट रहा है। आत्म- तिरस्कार सम्बन्धी प्रत्येक विचार व्यक्तित्व की शक्ति एवं उन्नति को नष्ट करने वाला भयानक मानसिक रोग है।

First 9 11 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • जियो और जीने दो
  • जियो और जीने दो (Kavita)
  • भारतीय दर्शन और उसकी एकात्मकता
  • सच्चे धर्म की पहचान
  • राष्ट्र का विकास बिना आत्म-बलिदान के नहीं हो सकता
  • रथी सो गया है।
  • अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की जड़
  • वेदों में सामूहिकतावाद की शिक्षा
  • मन को कैसे वश में किया जाय।
  • महानता के बीज
  • विज्ञान के सर्वनाशी प्रभाव का प्रतिकार धर्म से ही हो सकेगा।
  • दूसरों को मान दीजिए।
  • मनुष्य स्वयं अपना भाग्य है।
  • संकट का समय और ग्रहों का प्रभाव
  • ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल कैसे बनाया जाय?
  • गायत्री उपासना के अनुभव
  • देश भर में नवरात्रि में गायत्री-उपासना की धूम
  • वंशी धर दो, शंख उठाओ!
  • वंशी धर दो, शंख उठाओ (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj