ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल कैसे बनाया जाय?
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
(पं. श्रीराम आचार्य)
गत अंक में निकट भविष्य की सम्भावित आपत्तियों के सम्बन्ध में कुछ प्रकाश डाला गया है। अवश्य आकाश में घुमड़ती हुई इन प्रलयंकर घटाओं को बरस पड़ने का यदि अवसर मिला तो निश्चय ही इसके परिणाम बहुत ही चिन्ताजनक होंगे, पर अभी स्थिति उस सीमा तक नहीं पहुँची है कि मानवी प्रयत्न इन्हें रोक सकने में सर्वथा असमर्थ हों। अभी वह अवसर हाथ से निकल नहीं चुका है जबकि एटम बमों, आग्नेयास्त्रों का मुँह मोड़ देने वाला शान्ति का आध्यात्मिक अस्त्र वरुणास्त्र न बन सकता हो। संसार का भौतिक जीवन एवं भौतिक क्रिया कलाप वस्तुतः सूक्ष्म जगत से उसी प्रकार सम्बन्धित रहता है जिस प्रकार कठपुतली के खिलौने कुछ दृष्टि-गोचर होने वाले तारों के द्वारा मदारी की उंगलियों से जुड़े होते हैं। भौतिक जगत के नेतागण अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने- अपने ढंग से शाँति स्थापन के प्रयत्न करते हैं पर उसमें वास्तविक स्थापना तब तक उत्पन्न नहीं हो सकती जब तक कि कठपुतलियों को हिलाने वाले तारों को चलाने वाली अदृश्य उंगलियाँ गतिशील न हो जायें।
मानव संस्कृति की सुरक्षा एवं विश्व-शान्ति के लिए अनेक दिशाओं में प्रयत्न कर रहे हैं यह भी अच्छी बात है पर यदि आध्यात्मिक मोर्चा आज छोड़ दिया गया, उपेक्षा की गई तो निश्चय ही एक इतनी बड़ी भूल होगी कि उसकी क्षति पूर्ति अन्य मोर्चों पर किये जाने वाले सारे प्रयत्न मिलकर भी न कर सकेंगे। जो लोग आध्यात्म शक्ति का महत्व समझते हैं उनकी जिम्मेदारी है कि ऐसे गाढ़े समय में उनका समुचित उपयोग करने के लिये आगे बढ़ें।
गायत्री-परिवार द्वारा संचालित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान एक ऐसा ही महान आयोजन है। विश्व-शान्ति भरपूर वर्षा कर सकने योग्य शक्ति इस वरुण में मौजूद है। यदि यह सफल होता है तो हम सभी प्राणियों को, विपुल सभ्यता एवं चिर संचित संस्कृति को नष्ट होने से बचा सकते हैं। यदि बचाव किया जा सका तो पाँच हजार वर्ष पूर्व हुए एक महाभारत का आघात लगने से जो मानव संस्कृति अभी तक ठीक प्रकार उठ खड़ी न हो सकी है वह इस आगामी महा प्रहार की ठोकर खाने के बाद कितने समय में उठ खड़ी होने को सक्षम होगी। यह कह सकना बहुत ही कठिन है। ऐसी स्थिति में जिनके अन्दर वस्तुतः कुछ आध्यात्म प्रकाश मौजूद है उनके लिये एक धार्मिक कर्तव्य हो जाता है कि इस गाढ़े समय में जो कुछ उनसे बन पड़े करें।
गायत्री शाँति की देवी है। अशान्ति और उद्वेगों की शाँति के लिए मनुष्यों के कुमार्गगामी विकृत मस्तिष्कों को सुव्यवस्थित करने के लिए गायत्री से बढ़कर और कोई रामबाण प्रयोग नहीं है। आज इसी संजीवनी बूटी के उपयोग का बिल्कुल उपयुक्त समय है। अपने परिवार द्वारा यह प्रयोग सुव्यवस्थित रूप से आरम्भ किया गया है। प्रतिदिन 24 लाख जाप, 24 हजार आहुति, 24 हजार पाठ, 24 हजार मन्त्र लेखन का प्रथम चरण पूर्ण हो चुका है। अब ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का दूसरा चरण चल रहा है जिसके अंतर्गत प्रतिदिन सवा करोड़ गायत्री जप, सवा लाख आहुति, सवा लाख मन्त्र-लेखन का प्रयोग चल रहा है। यह भी कुछ ही दिनों में पूरा होने लगेगा।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का तीसरा चरण काफी बड़ा है। उससे वर्तमान कार्य की अपेक्षा 20 गुना आयोजन है। प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जप, 24 लाख आहुतियाँ, 24 लाख पाठ, 24 लाख मन्त्र- लेखन का विशाल कार्यक्रम इतना बड़ा है कि उसे असंख्य धर्म-प्रेमी मिलकर अपनी सामूहिक शक्ति से ही पूरा कर सकते हैं। यह कार्य धनिकों के बूते का नहीं है। अब तक बड़े यज्ञ केवल चन्द धनिकों के प्रयत्न एवं उन्हीं के लिये जप करने से पूरे होते थे। किसी बड़े नामधारी सन्त-महन्त से प्रभावित कुछ धन-सम्पन्न लोग मिल कर अब तब यज्ञ आदि रचाते रहते हैं और उसमें सौ-पचास बहुपठित पण्डितों को हजार-हजार पाँच- पाँच सौ रुपया दक्षिणा मिलने और दो-चार हजार तथाकथित ब्राह्मणों को पिस्ते और मलाई की मिठाई छकाने की प्रक्रिया चलती थी। सेठजी और महन्तजी का जय-जयकार होकर यज्ञ समाप्त हो जाते थे। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इससे सर्वथा भिन्न प्रकार का यज्ञानुष्ठान है। इसमें धन नहीं, श्रम आधार है। इसकी पूर्ति धन से नहीं, श्रम एवं समय प्राप्त होने से ही हो सकती है। जितने व्यक्ति, जितना सामान, जितना श्रम, जितना स्थान इस कार्य के लिए अपेक्षित है, उसे यदि कुछ धनी लोग अपने पैसे के बल पर करना भी चाहें तो किसी लखपती, करोड़पती की सारी पूँजी एक दिन की व्यवस्था के लिए भी पर्याप्त न होगी।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की पूर्ति में इस समय गायत्री- परिवार की एक हजार शाखाओं के लगभग बीस हजार सदस्य लगे हुए हैं। तब मध्यम चरण की पूर्ति की व्यवस्था बन रही है। तीसरा चरण वर्तमान स्थिति की अपेक्षा बीस गुना बड़ा है। उसका कार्य 20 गुना अधिक होगा। उसकी व्यवस्था जुटाने के लिए अब की अपेक्षा बीस गुनी शक्ति चाहिए। इसे जुटाना ही आज सबसे बड़ी समस्या है। गत अंक में हमने अपने परिजनों से इसी सम्बन्ध की अपील की थी कि अब कुछ समय के लिए धर्म-प्रेमी लोग इस विश्व-शान्ति के महान आयोजन के लिए अपना अधिक से अधिक समय देने का प्रयत्न करें। अपने-अपने क्षेत्रों में अपना तप, जप, हवन, पाठ-लेखन आदि करने के लिए पूरी शक्ति से संलग्न हों। इस प्रकार के कार्य के लिये भ्रमण करने, धर्म-फेरी लगाने आदि, घर-घर जाकर धर्म-प्रेरणा देने का कष्ट उठाना आवश्यक होगा। इस कार्य में झूठी झिझक, संकोचीपन, अभिमानता, अपनी हेठी आदि की मानसिक कमजोरी को लात मारकर दूर करना होगा। परमार्थ के लिए धर्म-प्रेरणा के लिए किसी के यहाँ जाना वस्तुतः एक बहुत बड़ा बड़प्पन है। कोई कहना न माने, सफलता न मिले, उलटी- सीधी सुननी पड़े तो इसे एक युग-प्रभाव, सन्निपात के बीमारों का बकवाद एवं आसुरी प्रतिरोध ही समझना चाहिए। ऐसी बाधाएं हर बार पुरुष के मार्ग में उसकी शक्ति की परीक्षा लेने एवं प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाने के लिए आती ही हैं। सस्ती सफलता, जिसमें जरा भी कठिनाई न आवे, वस्तुतः एक निकम्मी चीज है। चूँकि इस महान अनुष्ठान से आसुरी तत्वों का नाश होता है इसलिए वे इस प्रयत्न को असफल करने का नाना प्रकार से प्रयत्न करते हैं। प्राचीन युगों में असुरों के आक्रमण अस्त्र-शस्त्र द्वारा होते थे। वे स्वयं सामने आकर लड़ते थे, इस युग में वे स्वयं सामने नहीं आते। जिसकी बुद्धि में असुरता के ठहरने लायक अज्ञान देखते हैं उनको अपना वाहन बनाकर ऐसे शुभ आयोजनों में विघ्न उत्पन्न करके उसे असफल बनाने का प्रयत्न करते हैं। कई व्यक्ति भारतीय संस्कृति की माता गायत्री और भारतीय धर्म के आदि पिता यज्ञ जैसे सर्वमान्य सत्कर्मों तक को करने से लोगों को रोकते हैं। कई पण्डित इसमें अपनी स्वार्थ-हानि, अर्थ-हानि, मान-हानि देखते हैं और अपने अज्ञान को “शास्त्र-वचन” मानकर गायत्री उपासना एवं यज्ञ आयोजन के परम पुनीत कार्यों में लगे हुए लोगों को सत्कर्म से हटाने में जी तोड़ कोशिश करते हैं। शास्त्र-शिक्षा सर्वत्र होते हुए जुआ, चोरी, व्याभिचार, असत्य, छल, पाखण्ड, नशा आदि बुराइयों के विरुद्ध जिनकी जीत जीवन भर नहीं खुली वे लोग गायत्री जप और यज्ञानुष्ठान न करने देने में अड़ंगे लगाकर ‘शास्त्र-रक्षा’ की बात करते हैं यह संसार का एक अनोखा आश्चर्य है। असुरता अपना छद्मवेश बनाकर अनेक मंथराओं की जीभ पर जा बैठती है और उनसे मारीच, सुबाहु, ताड़का, खरदूषण आदि यज्ञ-विरोधियों का कार्य अनायास ही करा लेती है।
इन सब बातों से परमार्थ मार्ग के पथिकों को जरा भी विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। अपना प्रत्येक कार्यक्रम महान आध्यात्मिक सिद्धान्तों पर- धर्म-मर्यादाओं पर- अत्यन्त उच्चकोटि की आत्मा की प्रेरणा पर निर्धारित है। इसकी उपयुक्तता में किसी को रत्ती भर भी सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है। सन्देह उत्पन्न करने की आसुरी प्रवृत्ति से हमें सावधान तो रहना है पर उससे परेशान होने की जरा भी आवश्यकता नहीं है। इतने बड़े इस युग के अभूतपूर्व अनुष्ठान में यदि कोई विघ्न न आवे, कोई विरोध न हो, कोई अड़ंगा न पड़े तो समझना चाहिए यह निष्प्राण है। अन्यथा असुरता अपना नाश होते देखकर चुप बैठी रहे यह सम्भव नहीं, उसे मरते-मरते भी आत्म-रक्षा के लिए कुछ न कुछ उपद्रव करने ही चाहिए।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का तीसरा चरण जिसमें प्रतिदिन 24 करोड़ जप, 24 लाख आहुतियाँ, 24 लाख पाठ, 24 लाख मन्त्र- लेखन होना है। एक बहुत बड़ा कार्य है। इसके लिए धर्म-प्रेमियों की पूरी शक्ति लगनी चाहिए। साधु, संन्यासी, विरक्त, वानप्रस्थों के लिए तो अगले 3-4 वर्ष के लिए यही एक मात्र कार्य होना चाहिए, क्योंकि इन दिनों अत्यधिक उत्तेजित क्षुब्ध वातावरण में किसी को भी चित्त की एकाग्रता, समाधि-ऋद्धि-सिद्धि, आत्म-शाँति प्राप्त होनी संभव नहीं। उस सफलता के लिए जिस प्रकार का सूक्ष्म वातावरण चाहिये वह इन दिनों बिलकुल भी नहीं है, इसलिये इन दिनों उस दिशा में असफल प्रयत्न करने की अपेक्षा विश्व-शान्ति के लिए इन परमार्थिक कार्यों में लगना ही सब दृष्टियों से उचित है। अच्छे साधु, जिनकी आजीविका गृहस्थों के दान पर चलती है, उन पण्डित, पुरोहित, पुजारी, गद्दीधारी, महन्त, मठाधीशों का भी कर्तव्य है कि इन 3-4 वर्षों में उस आजीविका को हलाल करने के लिये जन-सेवा में लग जायें। यदि यह लोग अंतर्दृष्टि से सोचें तो इन्हें आज की स्थिति में यही एक मात्र कर्तव्य दृष्टिगोचर होगा कि विश्व-शान्ति के इस महानतम धर्मानुष्ठान गायत्री यज्ञ आयोजनों में लगा जाय।
56 लाख व्यक्ति भिक्षाजीवी इस भारतवर्ष में हैं, यदि यह 40 मन्त्र भी रोज जपें और आधी आहुति भी रोज करें, प्रतिदिन 5 मिनट रोज का समय भी दें तो यह अनुष्ठान बड़ी आसानी से पूर्ण हो सकता है। पर जो मनोवृत्तियाँ, गतिविधियाँ इन लोगों की हैं, उसे देखते हुए उनसे कुछ भी आशा करना व्यर्थ है। इनमें से कुछ को छोड़कर शेष तो समाज के लिए एक अभिशाप मात्र हैं। इनसे कोई बड़ी आशा रखने की बजाय यह कार्य सद्गृहस्थों को करना पड़ेगा। अपने बाल-वृद्धों का पेट पालने एवं गृहस्थ के आवश्यक कर्तव्यों से एक-दो घण्टा रोज समय उन्हें बचाना होगा और उस समय को अपने पास-पड़ोस में, मित्र- कुटुम्बियों में, स्वजन- सम्बन्धियों में, परिचित -अपरिचितों में ब्रह्मानुष्ठान की महत्ता बताने में, गायत्री महामंत्र की शक्ति एवं महत्ता समझाने में, गायत्री साहित्य पढ़ाने में, गायत्री-उपासना के लिये प्रेरणा देने में लगाना होगा।
जो लोग उपरोक्त कार्यक्रम को भोजन, स्नान, नींद, उपार्जन आदि की भाँति अपने दैनिक जीवन में सम्मिलित कर लें उन्हें व्रतधारी कहा जायेगा। जिस प्रकार इलेक्शन में अपने लिए मेम्बर चुने जाने के लिए वोटरों के पास जा-जाकर हर प्रकार की कोशिश से वोट अपने पक्ष में प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है वैसी ही मनोवृत्ति जिसकी बन जाय उन्हें “व्रतधारी” कहना चाहिये। ब्राह्मण अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए ऐसे एक हजार व्रतधारी चाहिएं। यह व्रतधारी नित्य स्वाध्याय द्वारा अपना गायत्री-ज्ञान बढ़ाने के साथ ही नियमित रूप से धर्म-प्रचार के लिये, धर्म-फेरी के लिए कुछ न कुछ समय भी लगाते रहेंगे। इस युग में ऐसे कार्यों की सफलता “भगवान” पर ही निर्भर रहती है।
तीसरी समस्या एक और है वह है साहित्य प्रचार की। इतनी बड़ी संख्या में जनता को पूरी तरह अपने उद्देश्य एवं कार्यक्रम की शिक्षा देने के लिए बड़ी संख्या में साहित्य देना होगा। ऐसा साहित्य बिकेगा तो क्या उसे वितरण ही करना पड़ेगा। इस ज्ञान दान के लिए पैसा चाहिए। गायत्री तपोभूमि इस दृष्टि से दिवालिया है। वहाँ का दैनिक खर्च बड़ी कठिनाई से पूरा हो पाता है। चन्दा संग्रह करने का अपना कोई कार्यक्रम नहीं है। ऐसी दशा में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए और आगे चलकर साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम के अंतर्गत सारे राष्ट्रों को धार्मिकता, नैतिकता एवं मानवता की पुनीत भावनाओं से ओत-प्रोत करने के लिए बड़े परिमाण में सस्ता साहित्य चाहिए। इसका खर्च कहाँ से आये? धर्म-प्रचारकों के हाथों में यह प्रचार-साहित्य ही प्रधान अस्त्र होता है, इसकी आवश्यकता निर्विवाद है। फिर यह प्रस्तुत कैसे हो ?
इस समस्या का एक ही हल अभी सोचा गया है कि व्रतधारी लोग गायत्री माता को भी अपने घर का एक सदस्य मानने और उन्हें झूठ-झूठ का भोग लगाने की अपेक्षा कम से कम एक रोटी खाने को दें। अर्थात् एक रोटी का अनाज या उसकी लागत दो पैसा उठाकर अलग रखते जावें। महीने में इस प्रकार एक रुपया आसानी से हो सकता है। जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही दुर्बल है, एक रोटी रोज भी माता को देने के लिए नहीं बचा सकते वे सप्ताह में एक बार भोजन न किया करें। इस प्रकार महीने में चार बार भोजन न करने में बची हुई चार चपातियों का एक रुपया बचा सकते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति कुछ ठीक है वे मासिक वेतन में से कुछ पैसे ज्ञान-दान के लिए अलग से उठाकर रख दिया करें। किसान अपने खेत-खलिहान में से यदि चाहें तो कुछ ने कुछ अवश्य बचा सकते हैं। धनी-मानी लोगों के लिए तो यह परीक्षा का समय है। अपनी व्यक्तिगत फिजूल-खर्ची में से या व्यर्थ के धर्म आडम्बरों में से पैसे बचाकर जनता को सन्मार्ग का प्रकाश देने वाला साहित्य वितरण कराने का ऐसा बड़ा पुण्य ले सकते हैं जिसकी तुलना में अन्य प्रकार के दान-पुण्य तुच्छ हैं।
गायत्री माता के सच्चे भक्त के लिए यह मूक कसौटी है। माला जपने के अतिरिक्त उसे कुछ महिमा बढ़ाने के लिये उनकी शक्ति से जन साधारण को अधिकाधिक लाभान्वित बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की सफलता के लिए यदि थोड़ा भी-पैसे दो पैसे रोज का भी यदि त्याग न हो सके तो इतनी दुर्बल श्रद्धा वाले लोग दैवी शक्तियों से भी कुछ आशा करने के अधिकारी नहीं हो सकते। देव-शक्तियाँ चापलूसी भरा स्तोत्र पाठ नहीं भावना की गहराई परखती हैं और उसी के अनुसार किसी को प्यार एवं अनुग्रह प्रदान करती हैं। कंजूस, जो सबसे केवल लेना ही चाहते हैं देने को कुछ भी जिनसे नहीं निकलता, वे अन्त तक बहुत बड़े घाटे में रहते हैं। बिना दिये कुछ पाने की आशा करने वालों को बस मूर्ख ही कहना चाहिये।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है। जो विकट परिस्थितियाँ संसार के सामने आने वाली हैं उन्हें टालने के लिए गायत्री माता को कमान पर यज्ञ-पिता का तीर चढ़ा कर चलाया हुआ यह रामबाण निष्फल नहीं जा सकता। गायत्री परिवार ने सामूहिक संकल्प से ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है, अब उसे सफल बनाना या असफल हो जाने देना, यह हम लोगों की भावना को परखने की एक कसौटी बन गई है। गायत्री- परिवार इस कसौटी पर कसा जा चुका है। खरा-खोटा सिद्ध होना हम लोगों के उत्साह पर निर्भर है। इस अवसर पर हमारा अनुत्साह न केवल हमारे लिए वरन् समस्त संसार के लिए निराशाजनक ही सिद्ध होगा।

