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Magazine - Year 1957 - Version 2

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वेदों में सामूहिकतावाद की शिक्षा

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(श्री नारायण स्वामी)

हमारे देश के बहुसंख्यक शिक्षित व्यक्तियों का यह विचार है कि समाजवाद अथवा सामूहिकतावाद आदि सिद्धान्तों का आविर्भाव पिछले सौ-दो सौ वर्ष के भीतर योरोप में ही हुआ है। उसके पहले संसार में व्यक्तिवाद का ही बोलबाला था और प्रत्येक मनुष्य केवल निजी भलाई अथवा अपने कल्याण पर ही दृष्टि रखता था। उस समय यदि लोगों में कुछ सामाजिक भावना थी भी तो उसका रूप बहुत संकुचित था। प्रायः वह एक छोटे भूखण्ड या राज्य या किसी जाति विशेष में ही सीमित रहती थी। उस दायरे के बाहर के सभी मनुष्य गैर माने जाते थे, जिनके साथ कैसा भी स्वार्थयुक्त या अन्याय का व्यवहार किया जा सकता था।

हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि उपर्युक्त कथन किसी हद तक सत्य है। पिछले हजार-दो हजार वर्षों का युग अंधकार युग की तरह रहा है और उसमें मनुष्यों की संघर्ष-भावना बहुत बढ़ गयी थी। संसार के मनुष्य देश, जाति और धर्म के नाम पर हजारों हिस्सों में बँट गये थे और एक दूसरे को शत्रु-भाव से देखते थे। पर यह दशा सदा से ऐसी ही नहीं चली आई थी। संसार के सबसे प्राचीन समाज का चित्र वेदों में ही मिलता है और उसके वर्णन तथा उपदेशों से सामूहिकता अथवा समाजवाद की ध्वनि स्पष्ट निकलती है। समाजवाद का वास्तविक तात्पर्य यही है कि समाज में फैली हुई वे हानिकारक विषमताएं, जिनके कारण मनुष्यों में अनुचित प्रतिस्पर्धा तथा संघर्ष की उत्पत्ति होती है, दूर की जानी चाहिएं तथा प्रत्येक मनुष्य को उन्नति करने तथा जीविका-उपार्जन करने का समान रूप से अवसर मिलना चाहिए। इस संबंध में वेदों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है-

“अज्येष्ठासो अकनिष्ठासो एते सभ्रातरो वावृधुः सौभागाय। युवा पिता त्वया रुद्र एषाँ सुदुधा पृथ्वी सुदिना रुदभ्यः॥’

[ऋग्वेद 7।8।7]

अर्थात् “सब मनुष्य (रंग, जाति और नस्ल के भेद के बिना) भाई-भाई हैं, उनमें कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं। वे सब मिलकर सौभाग्य की वृद्धि के लिए उन्नतिशील हों। शक्ति-सम्पन्न, सर्व-रक्षक और सबको मर्यादा में रखने वाला परमेश्वर उनका पिता है और अनेक प्रकार के धन-धान्य देने वाली पृथ्वी उनकी माता है।” इससे प्रकट होता है कि वेदों के आदेशानुसार समस्त पृथ्वी- निवासी एक विशाल परिवार के रूप में हैं, जिनमें न कोई छोटा है और न कोई बड़ा, सब भाई-भाई हैं। इस भ्रातृ-भाव को स्थिर रखने के लिए आवश्यक है कि वे समझें कि हम एक माता और एक पिता के पुत्र हैं। मनुष्यों में समतायुक्त प्रेम का भाव स्थापित करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण विचार है कि सब मनुष्य अपने को एक पिता की सन्तान समझें। वेदों में यह उच्च भावना जगह-जगह मिलती है। एक और जगह कहा गया है-

करशफस्य विशफस्य द्यौः पिता पृथिवी माता। यथाभिचक्र देषाँस्तथायकणुता पुनः॥

[अथर्व 5।-।4]

अर्थात् “करशफ (निर्बल) और विशफ (प्रबल) दोनों का पिता प्रकाश पुञ्ज (परमात्मा) है। ऐसा समझते हुए विद्वानों ने जैसा चक्र चलाया है, उसे फिर-फिर काम में लाओ।” फिर एक जगह पारस्परिक प्रेम की स्थापना के लिए लिखा है :-

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥

(यजुर्वेद 60।8)

अब पाठक समझ सकते हैं कि वेदों ने अब से अनगिनत वर्ष पहले ही समाज में समता, सामूहिकता, भ्रातृभाव, प्रेम- व्यवहार के लिए कितना सच्चा और प्रभावशाली रास्ता बतला दिया था। जब मनुष्य अपने प्यारे पिता को समस्त प्राणियों में व्यापक देखता है तब प्रत्येक प्राणी का शरीर उसके लिए परमात्मा के मन्दिर के सदृश्य पवित्र और पूज्य होता है। फिर ऐसा मूर्ख कौन होगा कि अपने प्रिय और श्रद्धा के स्थान को नष्ट करे या किसी प्रकार की क्षति पहुँचाये। इससे मनुष्यों को स्पष्ट रूप से यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी प्राणी को कष्ट देना परमात्मा का विरोध करना है- महा पाप करना है। इस उद्देश्य और भावना के स्थान पर आजकल की दुनिया ने कितना गलत सिद्धान्त अपनाया है इस पर विचार करते हुए कुछ वर्ष पहले एक अमरीकन विद्वान ने लिखा था-

“आजकल सबसे बड़ी चर्चा यही है कि किस प्रकार शत्रु को कुचल दिया जाय- किस प्रकार बर्लिन (जर्मनी) और टोकियो (जापान) से बिना शर्त आत्म-समर्पण करा लिया जाय। कोई भी सभी पर दया और क्षमा की बात नहीं करता। हम पश्चिम निवासियों में इसका सर्वथा अभाव है। बल, हिंसा बदला लेने की इच्छा, अहंमन्यता, घमण्ड और अधिकार- इन सबसे हम खूब परिचित हैं और हमने इनको रोग की तरह दूसरों में भी फैलाया है। परन्तु दया, अनुकम्पा, प्रेम, नम्रता, आत्मत्याग और शान्ति- इन्हें हम बहुत थोड़ा जानते हैं। सन्तोष की बात है कि अब तराजू का पलड़ा पश्चिम से पूर्व की ओर झुक रहा है। पश्चिमी राष्ट्र अपने पापों, अपनी स्वार्थपरता से नष्ट होंगे और चीन तथा हिन्दुस्तान जैसे देश मनुष्य जाति को उसके वास्तविक लक्ष्य तक पहुँचाने का भार संभालेंगे।”

इसी तरह के उद्गार और भी अनेक विद्वानों ने प्रकट किये हैं। पश्चिम के लोग समाजवाद अथवा सामाजिक न्याय का नाम लेते हुए भी सब मनुष्यों में आन्तरिक एकता के भाव का अनुभव नहीं करते। वहाँ के विचारक इस कमी को समझ रहे हैं और भारतवर्ष की तरफ देख रहे हैं जिसने प्राचीनकाल में इस समस्या को हल करके एक आदर्श समाज की स्थापना की थी। भारतीय ऋषियों ने इसके लिए योरोप के समाजवाद की तरह केवल ऊपरी समानता के सिद्धान्त को नहीं अपनाया, वरन् उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कि एक बड़े समाज में अनेक प्रकार के मतभेद और रुचि-भेद होना अनिवार्य है, आत्मिक दृष्टि से सबको एक ही विराट का अंश बतलाया और सबको प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया-

“जनं बिभ्र्रती बहुधा विनाचसे नाना धर्माण पृथिवी यथौ कसम्। सहस्रं धारा द्रविणास्य ये दुहाँ ध्रुवेष धेनुरन यस्फुरन्ती।”

(अथर्ववेद 35।3।64)

अर्थात् “पृथ्वी तभी मनुष्यों की रक्षा करती है जब वे अनेक धर्मों और अनेक भाषाओं के होने पर भी इस प्रकार से मिलकर रहा करते हैं जैसे एक घर में घर वाले मिलकर रहा करते हैं। उस समय पृथ्वी धारा की सहस्रों धारा उसी प्रकार दिया करती है, जैसे गाय निश्चित रीति से दूध की अनेक धारायें दिया करती है।”

इस प्रकार वैदिक ऋषियों ने समाज के कल्याणार्थ जो सिद्धान्त स्थिर किये हैं वे आधुनिक साम्यवाद अथवा समाजवाद से कुछ बातों में भिन्न होते हुए भी सब मनुष्यों की भलाई करने वाले हैं और उनके द्वारा समाज को निश्चित रूप से सुख-शान्ति की उपलब्धि होती है। इसका कारण यही है कि आधुनिक समाजवाद में सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए भी जिन साधनों का आश्रय लिया गया है वे ईर्ष्या-द्वेष से युक्त हैं और उनके कारण समाज में अशाँति तथा हिंसा की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार समाज में उथल-पुथल, हलचल तो अवश्य पैदा हो जाती है, पर सुख किसी भी एक दल या समुह को नहीं मिला पाता। कभी एक को दबना पड़ता है और कभी दूसरे को। एक को दूसरे पर जरा भी विश्वास नहीं होता और दोनों अपने-अपने मौके की ताक में लगे रहते हैं। इसके विपरीत भारतीय संस्कृति में सबकी अलग-अलग मर्यादा और अधिकार निश्चित कर देने पर भी सबमें एक आत्मीयता का भाव अनुभव करने का आदेश दिया गया था और

जो जितना बड़ा बनाया गया उस पर उतना ही अधिक उत्तरदायित्व भी रखा गया था। इसलिए उस समय बिना किसी कानून या बाहरी दबाव के मनुष्य अपना कर्तव्य समझते थे कि समाज में एक भी व्यक्ति भूखा-नंगा न रहे और सबको अपनी योग्यता अनुसार उचित जीवन-निर्वाह की सामग्री प्राप्त होती रहे। उस समय कोई विशेष परिस्थिति- जैसे अकाल आदि उपस्थित होने पर राजा और बड़े आदमी स्वयं अपने भण्डारों को खोल देते थे और अभावग्रस्त लोगों की हर तरह से रक्षा करते थे। हमारी सम्मति में समाजवाद या सामूहिकतावाद का यह स्वरूप वर्तमान समय के रूप से कहीं अधिक कल्याणकारी है।

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