राष्ट्र का विकास बिना आत्म-बलिदान के नहीं हो सकता
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(अरविन्द घोष)
आत्म बलिदान का भाव सब राष्ट्रों और सभी व्यक्तियों में साधारण रूप में नहीं पाया जाता। यह भाव बड़ा दुर्लभ और उच्चकोटि का है। वह मनुष्य जाति की नैतिक उन्नति का पुष्पित रूप है अथवा स्वार्थयुक्त पशु-भाव से स्वार्थ रहित देव-भाव की ओर अग्रसर होना है। जिस मनुष्य में आत्म-बलिदान का सामर्थ्य है उसने पशुत्व को अपने से दूर हटा दिया है, चाहे उसमें अन्य प्रकार के पाप कितने भी क्यों न हों। उसमें भावी और उच्चतर मानवता के निर्माण की सामग्री है। जो राष्ट्र राष्ट्रीय तौर पर आत्म-बलिदान करने का सामर्थ्य रखता है उसका भविष्य सुरक्षित है।
आत्म-बलिदान चाहे इच्छा रहित हो और चाहे स्वार्थयुक्त हो वह हमारे जीवन की एक आवश्यक शर्त है। मानवता में इसकी वृद्धि क्रमशः हुई है। प्रथम बलिदान सदा ही स्वार्थमय होते हैं- उनमें अपनी उन्नति के लिए दूसरों का बलिदान समाविष्ट रहता है। एक माता में, जो अपने बच्चे के लिये अपना जीवन बलिदान करने को तैयार है, पाशविक प्रेम की सहज-प्रवृत्ति पहला कदम आगे बढ़ा लेती है। उसी प्रकार एक पुरुष में जो अपनी स्त्री के लिए अपने जीवन को बलि देने को तैयार है, रक्षा की सहज- प्रवृत्ति पहला कदम आगे बढ़ा लेती है। यह प्रवृत्ति इस बात का सबूत है कि आत्मा के सम्बन्ध में हमारा मानसिक विचार विस्तृत हो गया है। जब तक मनुष्य अपने शरीर और उसकी इच्छाओं को ही अपना ‘मैं’ करके जानता है तब तक जीव की अवस्था पाशविक ही समझनी चाहिये। जब यह ‘मैं’ की परिधि विस्तृत हो कर स्त्री-पुरुष को अपने अंतर्गत कर लेती है, तभी प्रगति संभव हो पाती है। यह मनुष्यता की सबसे पहली अवस्था है। किन्तु इसमें भी पशुत्व की कुछ मात्रा बची रहती है, क्योंकि इसमें स्त्री और बच्चों के सम्बन्ध में कुछ इस प्रकार का विचार रहता है कि ये मनुष्य के लिए अपने सुख, बल, शान, आराम के साधन और सम्पत्ति रूप हैं। पर इस दृष्टि से देखे जाने पर भी परिवार सभ्यता का आधार बनता है, क्योंकि इसी से सामाजिक जीवन सम्भव बनता है। परन्तु मनुष्य में देवत्व का आविर्भाव उसी समय आरम्भ माना जा सकता है जब वह अपने शरीर का ध्यान छोड़कर परिवार के लिए अपने आराम तथा जीवन तक का उत्सर्ग करने को तैयार हो जाय। जब मनुष्य स्त्री के सम्मान अथवा घर को सुरक्षा के लिए जीवन उत्सर्ग करने को तैयार हो जाता है, तो निःसन्देह यह एक ऊँचे दर्जे का काम समझा जायेगा। पर इससे बहुत ऊँचा वह तब उठता है जब वे अपने समाज या संग के हित के लिए आत्म-बलिदान करने को प्रस्तुत हो जाता है। इस बात को भली प्रकार समझ लेना कि मनुष्य पर परिवार के दावे के अपेक्षा समाज या जन-समुदाय का दावा अधिक बड़ा है, सामाजिक प्रगति की प्रथम और अनिवार्य शर्त है।
इससे अगला कदम है राष्ट्रगत आत्मा की अनुभूति और उसके लिए आत्म - बलिदान। राष्ट्र का विकास एक ऐसी प्रगति है जो आधुनिक अवस्था में मानवता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। संसार की वर्तमान स्थिति में मनुष्य को व्यक्तिगत स्वार्थ को, परिवार के स्वार्थ को, जाति या समाज के स्वार्थ को, विशालतर राष्ट्रीय स्वार्थ में विलुप्त कर देना अवश्य सीखना होगा। इसी से मानव-जाति में भगवान का क्रम विकास होगा। इसलिए राष्ट्रवाद इस युग का धर्म है और भारतमाता ही हमारे लिये भगवान का प्रतीक है।
इससे भी अधिक ऊँची एक पूर्णता है, जिसके लिए कुछ व्यक्तियों ने ही अपने को तैयार दिखलाया है। वह है आत्मा का इतना अधिक विस्तार कि जिसमें सारी मानवता का समावेश हो जाय। मानवता के आदर्शों पर अभी तक कुछ व्यक्तियों में निजी स्वार्थ की बलि बढ़ा दी है और इससे इस दिशा में एक कदम बढ़ाया जा चुका है। पर मानवता के हित के नाम पर राष्ट्र के हितों का बलिदान कर देना एक ऐसा कार्य है जिसके लिए मानवता अभी समष्टि रूप से तैयार व समर्थ नहीं हुई है। परमेश्वर तैयारी करता है पर यह फल को उसकी ऋतु से पहले पकाने की जल्दी नहीं करता। एक समय आवेगा जब यह भी सम्भव होगा, परन्तु वह समय अभी नहीं है और न यह बात मानवता के लिए कल्याणकारी है, क्योंकि नीचे की सीढ़ी पर पैर रखना गलत काम है और इसका नतीजा यह होगा कि हम फिर नीचे लुढ़क पड़ेंगे। इसलिये जब तब राष्ट्रीयता का भली प्रकार अभ्यास न हो जाय और उसके निमित्त स्वार्थ त्याग करना हम न सीख लें तब तक मानवता के लिए आत्म-बलिदान की चर्चा निरर्थक ही है।
राष्ट्रहित का यह भी अर्थ हो सकता है कि वह एक प्रकार की सामूहिक स्वार्थपरता ही है। हम देश के लिए धन-दौलत और आराम का बलिदान करने को इसलिए भी तैयार हो सकते हैं, क्योंकि राष्ट्र के शक्तिशाली और समर्थ रहने से ही हमारा घर-बार तथा परिवार सुरक्षित रह सकता है। हम राष्ट्र के लिए इस कारण भी बलिदान कर सकते हैं, क्योंकि उसकी महत्ता, वैभव, ऐश्वर्य का अर्थ होता है हमारे वर्ग या हमारे श्रद्धा के वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि। अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी, हम अपने राष्ट्र के बलशाली, मात्राव्यशाली देखने के लिए भी अपनी सभी चीजों का बलिदान करने को तैयार हो सकते हैं। ये सब स्वार्थ के ही रूप हैं, जो मनुष्य का इस विशालतर जीवन में पीछा करते हैं, जिसका उद्देश्य उसे स्वार्थ से मुक्त करना होना चाहिए। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद प्रकृति जो महारोग आधुनिक राष्ट्रों को पीड़ित कर रहे हैं, उनका मूल यह दृढ़ स्वार्थपरता ही है। इसी स्वार्थपरता के कारण बड़े राष्ट्रों में अभिमान, मद और अन्याय की भावना उत्पन्न होती है, जिसके वशीभूत होकर वे अन्य राष्ट्रों की सत्ता पर आघात करते हैं। इसके फल से क्रोधावेश होता है और क्रोध से अन्ध-सम्मोह-जो दोषी राष्ट्रों के संहार के लिए ईश्वर का साधन अथवा विधान है। इस बुराई से बचने का एक यही उपाय है कि राष्ट्र को सर्व समाज मानवता की एक आवश्यक इकाई समझा जाय, दूसरों से महान या श्रेष्ठ होने की कल्पना न की जाय।
इस प्रकार व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए आत्म-बलिदान का भाव ही मानवता का सबसे बड़ा आदर्श है और इसी के आधार पर वे साधारण मनुष्यों से उच्चतर या विशालतर स्थिति प्राप्त कर सकते हैं। जब यह बलिदान का भाव निःस्वार्थ रूप ग्रहण कर लेता है तो वह मानवत्व से उठकर देवत्व की श्रेणी में पहुँच जाता है।

