वंशी धर दो, शंख उठाओ (Kavita)
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तोड़ रहा है साँस सबेरा, घोट रहा है कण्ठ अँधेरा,
ओ प्रकाश के पहरेदारों, वंशी धर दो, शंख उठाओ।
तम की परछाँई पर साधें, डगर-डगर पर डोल रही हैं,
परवशता सर्पिणी प्राण में, जहर घुटन को घोल रही है,
सदा-सदा के लिए कहीं आलोक नहीं बिक जाय, देखना-
रात हथेली पर धर दिनकर के मोती को तोल रही है!
यह कुन्दन है बीहड़पन का, चहल-पहल का शोर नहीं है,
और नाम चाहे जो दे लो, दोस्त, मगर यह भोर नहीं है।
धूप तनिक उंगलियाँ छुआ दे और अचानक वह खुल जाए
द्वार कुहासे का फौलादी इतना तो कमजोर नहीं है!
खुल कर खिलें किरण-पंखड़ियाँ, चमक उठें शबनम की लड़ियाँ,
नए प्रात के श्वेत कमल से, लिपट रहा जो पंक हटाओ!
सौ-सौ आवरणों के पीछे, छिपा सबेरे का चेहरा है,
चमक ज्योति की बुझी-बुझी-सी तम का रंग बहुत गहरा है।
बोलो फिर जंजीर काट दे, कौन दिवाकर के चरणों की?
यहाँ दबाव विवशता का है वहाँ अनिच्छा का पहरा है
जिसके पास खड़ग, वह आगे आने को तैयार नहीं है!
जो आगे आया है- उसके हाथों में तलवार नहीं है,
जो समर्थ है, कर सकता विद्रोह-गुलामी का हामी है,
गीत बगावत का गाता जो, उसके पास सितार नहीं है!
यद्यपि वन्दी हाथ तुम्हारे, पर युग-स्वर है साथ तुम्हारे,
तुम विरुद्ध हर कारा के आवाज दोस्त निश्शंक उठाओ!
बहुत बड़ा षड़यन्त्र रचा है रजनी के पहरेदारों ने,
साजिश कर ली है विनाश की जहर-बुझाई तलवारों ने
इधर टूटते सृजन-सितारे, उधर अमन का चाँद डूबता,
फूल-फूल को घेर लिया है, आज सुलगते अंगारों ने!
वक्त नहीं लोरियाँ सुनाने का अब दोस्त, प्रभाती गाओ,
तार तोड़ डालो सितार के नई क्राँति का बिगुल बजाओ,
तुम श्रम के विश्वास नया इतिहास लिखो सृजन-प्रयास का,
ओ धरती के राजदुलारों, सूरज को आवाज लगाओ!
सपनों की दीवार तोड़ दो, कुँठा की तलवार मोड़ दो,
नींद छोड़ कर उठो जागरण के विहंगों से पंख सटाओ!
*समाप्त*
(श्री बालस्वरूप ‘राही’)
(श्री बालस्वरूप ‘राही’)

