दूसरों को मान दीजिए।
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(श्री दौलतराम कटरहा, दमोह)
किसी भक्त ने कहा है-
परमेश्वर के भक्त की प्रथम यहै पहिचान।
आपु अमानी ह्व रहै, देय और को मान॥
अर्थात् भक्ति वही है जो मान प्राप्त करने की स्वयं कोई इच्छा न रखते हुए दूसरों को मान देवे। जो ऐसा करेगा, निश्चय ही उसका अभिमान गल जायेगा। प्रायः अपनी भौतिक स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए ही मनुष्य मान की इच्छा रखता है, किन्तु जहाँ भौतिक स्थिति को भी सुरक्षित रखने की इच्छा गई और करने की इच्छा आई, वहाँ मान प्राप्त करने की इच्छा भी यद्यपि निःशेष नहीं होती पर पर्याप्त मात्रा में घट जाती है- पर दूसरे को मान देने से तो ‘अहं’ का लोप ही हो जाता है। अगर मैं अपने लूटने वाले को अपनी फजीहत या बेइज्जती करने की इच्छा रखने वाले को भी मन से आदर दे सकूँ तो फिर मेरा ‘अहं’ रहेगा ही कहाँ। धन, धरणी, पद, सम्पदा, प्रिय वस्तु, प्राण, मान और सन्तान पर भी चोट करने वाले के प्रति यदि मेरे मन में विकार न आये, उसके लिए भी मेरे हृदय में आदर का भाव और जबान पर आदरसूचक शब्द हो, उसे भी अगर मैं बड़प्पन का आदर दें सकूँ तो फिर मेरा अहं भाव शेष रहेगा ही कहाँ और फिर अहंकार के गलते ही विश्वात्मा से एकात्मता का अनुभव करने में देर ही क्या लगेगी? अतएव इन्द्र को तो अपना अभिमान मिटाने हेतु औरों को सदैव बड़प्पन ही प्रदान करना चाहिए।
महात्मा तुलसीदासजी ने अपने राम-चरित मानस में अनेक स्थानों पर रामचन्द्र जी से उपदेश करवाया है। उनमें लक्ष्मण, भरत और नारद के प्रति किया गया उपदेश जिसका उल्लेख अरण्यकाण्ड में है, लंका काँड में विभीषण के प्रति किया गया उपदेश तथा उत्तरकाण्ड में वर्णित भरत तथा पुरवासियों के प्रति किया गया भगवान राम का उपदेश ज्ञान की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट प्रतीत होता है इन उपदेशों में भगवान राम ने मानप्रद होना भक्ति का लक्षण बताया है। भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि ज्ञान होने पर मान आदि की बिल्कुल इच्छा नहीं रहती-
ज्ञान मान जहं एकउ नाहीं।
देख ब्रह्म सम्मान जग माहीं॥
नवधा भक्ति का वर्णन करते समय उन्होंने शबरी के प्रति भी यही कहा है कि अमानित्व होना ही तीसरी प्रकार की भक्ति है-
गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
नारद जी के प्रति रामचन्द्रजी सन्तों के गुणों का वर्णन करते हैं तो कहते हैं कि सन्त सदैव अप्रमत्त रहते हैं तथा स्वयं मानहीन रहते हुए दूसरों को मान दिया करते हैं-
सावधान मानद मद हीना।
धीर धर्म गति परम प्रवीना॥
भरत जी से तो भगवान कहते हैं कि हे भरतजी, वे प्राणी तो मेरे लिये प्राणों के समान प्रिय हैं जो दूसरों को मान तो देते हैं, पर स्वयं मान नहीं चाहते-
सबहिं मानप्रद आपु अमानी।
भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥
इस प्रकार स्थान-स्थान पर अमानित्व के साथ “मान-
“प्रदता” इस गुण की भी प्रशंसा की गई है। अमानित्व की अपेक्षा में “मान-प्रदता” में अधिक हृदय को पवित्र करने की क्षमता है।
महाकवि शूद्रक ने मृच्छकटिक में आर्य चारुदत्त के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ विशेषणों का प्रयोग करते हुए कहा है कि वे सबका सत्कार करने वाले थे और उन्होंने किसी का अपमान नहीं किया- “सत्कर्त्ता बमन्ता पुरुष गुणनिधिर्दक्षिणोदार सत्त्वः” (प्रथम अंक 48 वाँ श्लोक)। अतएव अमानित्व की अपेक्षा मान-प्रदता में अधिक विशेषताएं हैं, ऐसी मेरी मान्यता है।
चैतन्यदेव एक श्लोक में बतलाते हैं कि अपने को तिनके जैसा छोटा समझते हुए और वृक्ष जैसे सहनशील रहते हुए जो काटने पर भी लकड़ी और फल ही देता है तथा मान की अभिलाषा न रख दूसरों को सदा मान देते हुए सदा भगवान का स्मरण करना चाहिए :-
तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुनाः।
अमानिना मानदेव कीर्तनीयो सदा हरिः॥
हिन्दू अपने समस्त अवतारों में राम को परम शीलवंत मानते हैं, पर शील का अर्थ क्या? रामचन्द्रजी नम्रता की मूर्ति हैं और गाँधी जी के शब्दों में कहें तो वे नम्रता के सम्राट हैं, वे सबको मान देते हैं, सबसे प्रिय बोलते हैं, पहिले बोलते हैं और पुरुष वचनों का भी उत्तर प्रिय देते हैं। महर्षि बाल्मीकि ने इसी कारण रामचन्द्रजी को स्थान-स्थान पर “स्मित पूर्वाभिभाषी” (2-2-42) “पूर्वभाषी प्रियंवद” (2-1-13) “पूर्वाभिभाषी मधुरः” (2-48-300) आदि कहकर सम्बोधित किया है। भगवान राम के इन पवित्र गुणों का वर्णन हमें बाल्मीकीय रामायण के प्रारम्भ में ही बालकाँड प्रथम सर्ग में तथा अयोध्याकाँड के प्रथम और द्वितीय सर्ग में विस्तारपूर्वक मिलता है, भक्तों के लिए तो यह आनंद का खजाना है, स्थित प्रज्ञत्व की कामना रखने वालों के लिए कदाचित गीता से भी बड़ा अमृतसागर है, और निरन्त आत्म- शोधन करने वालों के लिए अद्वितीय या बेजोड़ रत्न-संग्रह है। सम्भवतः मानवों के लिए उपादेय गुणों का इतने संक्षेप में संग्रह संसार की किसी भी अन्य पुस्तक में नहीं है। राम निरभिमानी हैं, अपने श्रेष्ठ गुणों का उन्हें अभिमान नहीं है, अपने पराक्रम से वे विस्मित नहीं हैं, सदैव दूसरों का वे सत्कार करने वाले हैं। भगवान के ये गुण हमें प्रभावशाली होते हुए भी निर्मंद, वैभवशाली होते हुए भी प्रियवंद, प्रभुत्व सम्पन्न होते हुए भी क्षमाशील और वीर्यशाली होते हुए भी जितेन्द्रिय बनावें।

