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Magazine - Year 1957 - Version 2

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मनुष्य स्वयं अपना भाग्य है।

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(श्री सविता रस्तोगी एम.ए. (प्रीवि.) पिलानी)

मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। भीषण झंझावातों और तूफानों का निर्भयतापूर्वक सामना करने वाले पुरुषार्थी एवं साहसी व्यक्तियों के समक्ष विपरीत परिस्थितियाँ और विपदायें हार मान जाती हैं और उसका प्रशस्त पथ निर्विघ्न हो जाता है, सफलता उनके चरण चूमती है, भाग्य उन पर मुस्कराता है, यश, मान एवं समृद्धि उनके अनुगामी होकर चलते हैं। स्पष्ट है कि ऐसे पुरुषार्थी मनुष्य स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं। संकट उन्हें निर्दिष्ट पथ से डिगा नहीं सकते, असफलताएं उन्हें झुका नहीं सकतीं, वह एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आँधी, तूफानों और बवंडरों को पछाड़ते हुए आगे बढ़ते हैं और हर मंजिल एवं आने वाली सफलता उनकी आशा को द्विगुणित करती जाती है। निश्चय ही ऐसे व्यक्ति जीवन में आनन्द, सफलता और विजय के भागी होते हैं।

दूसरी प्रकार के मनुष्य भाग्यवादी होते है और जरा सी असफलता को भाग्य की क्रूरता एवं दैव की विडम्बना कहकर अपने को भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं। एक ओर पुरुषार्थवादी मनुष्य हैं जो अपने भविष्य का निर्माण अपने बाहुबल और सतत परिश्रम के द्वारा करते हैं। किंतु जिस व्यक्ति को स्वयं पर भरोसा नहीं, जिसका मन उत्साहपूरित नहीं, निराशा ही जिसकी सहचरी है, ऐसे अकर्मण्य व्यक्ति जीवित ही निष्प्राण के समान जीवन का बोझ ढोते रहते हैं। दैत्य उन्हें जकड़ लेता है और भविष्य उन्हें अन्धकारमय एवं अनिश्चित प्रतीत होता है। निराशा जीवन का मरघट है। भाग्यवादिता और पराजय दोनों सहगामी हैं। भाग्य के विषय में भविष्यवाणी करने वाले पेशेवर ज्योतिषियों के कहने में आने वाले अपने को भाग्यहीन समझकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। निराधार एवं अनिश्चित बातों को अमिट भाग्यरेखा मानकर चलने वालों का आत्मविश्वास डगमगा उठता है और ऐसी स्थिति में वह अपनी धर्मनिष्ठा में विश्वास खो देते हैं। जीवन की प्रगति रुक जाती है। जीवन नीरस एवं निष्प्राण हो जाता है।

एक देश एवं राष्ट्र भी तभी तक उन्नति एवं समृद्धि के शिखर पर आरुढ़ है जब तक उसके कर्मवीर पुत्र जी-जान की बाजी लगाकर अथक लगन एवं परिश्रम से अपने ध्येय-पूर्ति में जुट पड़ते हैं। हमारा भविष्य सुनहरा तभी बन सकता है जब हम आत्मविश्वास की रक्षा करते हुए निरन्तर प्रयास में लगे रहे, गंतव्य की ओर हमारा ध्यान हो और काँटों के पथ पर चलते हुए अपना अभीष्ट प्राप्त करें।

संघर्षों एवं कष्टों में निखर कर ही मनुष्य बनता है किन्तु संघर्षों एवं द्वंद्वों से घबराने वाले दुर्बल होकर भाग्याश्रित हो जाते हैं। पुरुषार्थी मनुष्य अपने मार्ग का स्वयं संधान करता है, एक लगन के साथ उत्तरोत्तर बढ़ते हुए वह प्रतिक्षण नवीन प्राणों का अनुभव करता है।

मनुष्य का व्यक्तित्व और बाह्य जगत एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जैसा व्यक्तित्व होता है, उसी प्रकार का जगत एवं वातावरण भी बन जाता है। हमारा व्यक्तित्व हमारे विचारों का ही प्रतिबिम्ब है। कर्मठ व्यक्ति अपने चारों ओर आशा, उत्साह एवं सौहार्द का वातावरण बना लेते हैं और परस्पर आशा एवं प्रगति का संदेश देते हैं, वे अपने साथ-साथ दूसरों को भी नवीन ज्योति देते हैं और सच्चे अर्थों में जीवन के पारखी होते हैं। मनुष्य के विचार उसके जीवन-निर्माण में बहुत महत्व रखते हैं। किन्तु निराशावादी स्वयं ही नैराश्य में डूबे रहते हैं, दूसरों को भी वे निरुत्साह एवं गिरी हुई बातें कहकर भाग्य को दोष देते हैं। कार्य करने के पहले ही उसके फलाफल की कल्पना करने वाले, साहस और धैर्य को तिलाञ्जलि दे जीवनपर्यन्त निराशा के सागर में गोते लगाते हैं। आप आशावादी व्यक्ति से मिलिये, उसकी मुस्कराहट में जीवन होता है, उसकी प्रसन्नता की किरणें वातावरण को भी सजीव एवं मुखरित कर देती हैं, जीवन का हर क्षण उनके लिये नया स्पन्दन एवं संदेश लाता है। अखण्ड प्रसन्नता प्रभु का प्रसाद है और इससे अन्तर और बाहर दोनों प्रफुल्लित रहते हैं। जीवन का हर दिन उमंग और आशा का संदेश लिये आता है, प्रकृति उनको मदमाती जान पड़ती है, पवन का हर झोंका सौरभ की सृष्टि करता है। ऐसे व्यक्तियों से मिलकर आप भी नई स्फुरण और उत्साह अनुभव करते हैं और जीवन आपको सुन्दर, सरस और स्वप्निल लगता है।

साधारणतः साँसारिक वैभव एवं ऐश्वर्य को भाग्य का द्योतक समझा जाता है, किन्तु वस्तुतः ऐसे व्यक्ति अभागे ही हैं क्योंकि सभी आवश्यकताओं और इच्छाओं की सरलतापूर्वक पूर्ति हो जाने से उन्हें अपने निर्माण और आत्म-ज्ञान का अवसर ही नहीं मिल पाता। वस्तु जगत की ठोस मान्यताओं से दूर रहने वाले संघर्ष का आनन्द क्या जानें। वास्तव में भाग्यवान वे हैं जो परिस्थितियों का डटकर सामना करने में आनन्द और गौरव का अनुभव करते हैं- वे अपने भाग्य की रेखा को बदल देते हैं। संसार के समस्त वैभव उनके चरणों में लोटते हैं।

कठिन परिश्रम से मनुष्य प्रकृति के सम्पूर्ण रहस्य एवं सृष्टि के समस्त भण्डार प्राप्त कर लेता है। मनुष्य की प्रकृति विजय की कहानी इसी पुरुषार्थ एवं प्रयत्न की कुञ्जी में निहित है। दृढ़ आत्म-विश्वास की तीखी जल-धारा के सम्मुख बाधाओं की चट्टानें टूट-टूट कर बिखर जाती हैं और विजयश्री स्वयं वरण करती है। आज फिर आवश्यकता है कि हम अपनी क्षमता को पहचानें, अपनी भुजाओं के बल को नापें, सारे स्वर्ग का सुख हमें पृथ्वी पर ही मिल जायेगा, संसार हमसे प्रेरणा लेगा और उस प्रकाश में समस्त मानवता त्राण पा सकेगी। गीता में तो स्वयं भगवान कर्तव्य करने को प्रेरित करते हैं । कर्म पर आरुढ़ रहो, उसका फल मत सोचो। जीवन में इसी कर्मशीलता के समावेश से जीवन का चिरन्तन सत्य पा सकोगे, महान बनने का मार्ग कठिन एवं कंटकाकीर्ण होता है, जो उस पर हँसता हुआ, कष्टों को पथ पर झेलता हुआ बढ़ चलता है उसका मार्ग स्वयं खुल जाता है, प्रकाश की किरणें पथ को आलोकित करती हैं, जीवन में आशा के स्रोत फूटते हैं।

अपने जीवन-दीप को क्षुद्र दीपक की भाँति मत जलाओ, जो किंचित वायु-आन्दोलन से कम्पित हो उठे वरन् अपने जीवन-दीप की लौ इतनी दृढ़ कर लो जो भीषण से भीषण प्रलय की आँधी में भी अखण्ड जलती रहे। किन्तु वह दीपमयी ज्योति आपके अन्तःकरण से निकलनी चाहिये, बस आपका भाग्य आपकी मुट्ठी में है, चाहे आप उसको जिधर मोड़ दें।

हमारी महान् संस्कृति निरन्तर कर्म करने का संदेश देती है। हमारे धर्म-ग्रन्थ,उपनिषद्, महान धर्म-प्रणेता बनो, प्रमाद, आलस्य, दुराचार, भोग को त्याग दो, तुम्हारा जीवन प्रतिक्षण लौ की भाँति जलता रहेगा। गीता का केन्द्र-बिन्दु ही कर्मयोग है। जीवन-युद्ध में संग्राम करते हुए विजय प्राप्त करना ही गीता सिखाती है। जो इस संसाररूपी कर्मक्षेत्र के विराट युद्ध में जीत गया वही महाशक्तिशाली है।

निरन्तर कर्तव्यों का पालन करते हुए सफलता के शिखर पर पहुँचना ही जीवन की लक्ष्य-सिद्धि है। सिकन्दर और नैपोलियन जैसे विश्वविजेता असंभव शब्द ही को विश्व-शब्दकोष में से निकालना चाहते थे। निश्चय ही कर्मठ व्यक्तियों के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। बिना प्रयास ही अलाउद्दीन के चिराग की कल्पना करना अकर्मण्यता का द्योतक है। कर्म करते चलो, फल की चिन्ता मत करो, फल अच्छा या बुरा, उसको सहज स्वीकार करो, विचलित मत होओ। परिश्रमी व्यक्तियों की तो प्रभु स्वयं सहायता करते हैं? निरन्तर इस प्रकार बढ़ते रहो- प्रभु स्वयं पथ निर्देश करेंगे। गीता में भगवान स्वयं कहते हैं-जो अनन्य भाव से मुझ में आस्था रखता हुआ कर्म-करता है मैं स्वयं उसका योग क्षेत्र वहन करता हूँ। सौंप दो अपने को उस जगतनियन्ता के अंक में, वह अपने आप हमारी और आपकी रक्षा करेंगे। बस किसी भी लक्ष्य-प्राप्ति के लिए सजग हो, एकनिष्ठ हो, कर्म करने के लिए कटिबद्ध हो जाओ। भाग्य-सूर्य स्वयं मुस्करा उठेगा, जीवन सुन्दर एवं महान बनेगा।

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