विज्ञान के सर्वनाशी प्रभाव का प्रतिकार धर्म से ही हो सकेगा।
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(श्री राजेश्वर प्रसाद जी)
संसार में मनुष्य का जीवन प्रायः अभावपूर्ण होता है और उससे बचने के लिए वह तरह-तरह के प्रयत्न करता रहता है। ये अभाव दो प्रकार के होते हैं- शारीरिक और मानसिक। शारीरिक कष्टों और अभावों के लिए धार्मिक और दार्शनिक विचारों की वृद्धि की गयी। विज्ञान प्रकृति के क्षेत्र में खोज करता है और दर्शन अन्तःकरण के विषय में चिन्तन करता है। व्यावहारिक जीवन में धर्म और विज्ञान का विशेष है। धर्म का आधार विश्वास है और उसकी प्रवृत्ति हृदय से होती है। विज्ञान का सम्बन्ध मस्तिष्क से है और उसके आधार तर्क और विचार है।
शास्त्रों में धर्म की परिभाषा यह बतलाई गई है कि जो अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति कराये, वही धर्म है, अर्थात् मनुष्य के कर्तव्य और अकर्तव्य और पुण्य- शुभ और अशुभ कर्म का सम्बन्ध धर्म से है पाप और पुण्य की स्पष्ट व्याख्या कर सकना अथवा इन दोनों की ठीक-ठीक सीमा बतला सकना बड़ा कठिन कार्य है, क्योंकि इसका निर्णय करने के लिए देश व काल का विचार करना भी परमावश्यक है। ऐसी ये बातें हैं जो हमारे देश में पाप मानी जाती हैं, योरोप और अमरीका के अनेक देशों में उनको नहीं माना जाता और न उनका कोई कुपरिणाम देश में आता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए इसके दो रूप मान लिये गये हैं-
एक प्रमाण धर्म व दूसरा व्यवहार धर्म। समय के प्रभाव से इससे हमारे व्यवहार धर्म का स्वरूप बड़ा विवादास्पद हो गया है। मत-मतान्तर, बाह्य आडम्बर आदि की उसमें अधिकता हो गई है। इसी कारण विज्ञान तर्क के इस युग में रहने वाला सामाजिक प्राणी धर्म के विषय में उदासीन होता जाता है। इतना ही नहीं, वह धर्म पर तरह- तरह का आक्षेप भी करने लगा है। लोग कहा करते हैं कि - “पाप-पुण्य क्या है? धर्म तो सदा बदलता रहता है। अपनी -अपनी सुविधा और लाभ की दृष्टि से ही लोग धर्म को मानते हैं, इसलिये कौन धर्म है और कौन अधर्म, इसका निर्णय कोई नहीं कर सकता” आदि। पर ऐसे व्यक्तियों को जानना चाहिए कि धर्म अखण्ड और एक रस है तथा उसकी परीक्षा का एक मात्र उपाय, जो ऋषियों ने बतलाया है, वह यही है कि “आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्” अर्थात् “जो बात अपने को बुरी लगती हो वह दूसरे के प्रति मत करो।” इसी के आधार पर गोस्वामी जी ने पाप-पुण्य का यह लक्षण बतलाया है-
पर-हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर-पीड़ा सम नहिं अधिकाई॥
वैज्ञानिकों का स्वभाव होता है कि हर बात में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ का प्रश्न करना। इसका नतीजा यह हुआ कि मनुष्य के हृदय से श्रद्धा अथवा विश्वास का भाव घटता जाता है और वह हर एक बात को शंका की दृष्टि से देखने लगा है। वह हर एक वस्तु का विश्लेषण करके उसकी बनावट तथा मूल तथ्यों को जानना अपना परम कर्तव्य समझता है। इसलिये यह मनुष्य शरीर को किसी महान अथवा पवित्र शक्ति का निवास- स्थान न मानकर कैल्शियम, फास्फोरस आदि दावों से बना हुआ एक चलता- फिरता पुतला मात्र मानने लगा है। वह हर बात में अंकों की दुहाई देता है और उनके द्वारा अनेक बार स्वयं ही धोखा खा जाता है। इस सब का आशय यही है कि वर्तमान समय में हृदय की भावनाओं की उपेक्षा करके बुद्धि तथा तर्क को ही सबसे बड़ा और सत्य मानने लगे हैं और हर एक बात को विवाद द्वारा ही तय करना चाहते हैं। इस विवाद का कहीं अन्त नहीं होता और इस कारण हम कभी एक अटल सिद्धान्त पर नहीं पहुँच पाते।
आधुनिक विज्ञान का आरम्भ अरब देश से ‘ऐलकैमी’ के रूप में हुआ। योरोप में उसने कैमिस्ट्री का रूप धारण किया। यहीं से वह भारतवर्ष में भी आया। पर इस विज्ञान के कारण न तो अरब निवासियों ने अपनी मस्जिदों का विरोध किया और न योरोप वालों ने अपने गिरजा घरों को गिरा दिया। पर भारत वर्ष में ऐसे अनेक व्यक्ति मिलते हैं जो ‘विज्ञान’ का अर्थ यही समझ बैठे हैं कि धर्म का विरोध और खण्डन किया जाय। इसका एक मुख्य कारण हमारी सैकड़ों धर्मों की दासता है, जिसने हमें भुलावे में डाल दिया है। अन्यथा धर्म का विचार करने से ही हम यह जानने का उद्योग करते हैं कि इस जीवन के परे भी कुछ है, संसार का प्रत्येक पदार्थ अपने उत्पत्ति स्थान की ओर चला जा रहा है और हमको भी अपने उद्गम की खोज करनी चाहिये।
वैज्ञानिक युग के तीन खास लक्षण माने गये हैं-क- प्रकृति पर विजय, ख- यन्त्रों की अत्यधिक उत्पत्ति और प्रचार, ग- तर्कवाद की प्रबलता। इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक आदमी किसी के मत को न मानकर अपनी ही राय और सम्मति को प्रधानता देता है और उसके लिए हर तरह के तर्क-वितर्क करता है जिस देखकर गोस्वामीजी का यह कथन याद आता है :-
मारग सोई जा कहं जो भावा।
पंडित सोई जो गाल बजावा॥
पर यदि इतिहास पर निगाह डाली जाय तो इसमें विशेष आश्चर्य की कोई बात न जान पड़ेगी। रावण का ही उदाहरण ले लीजिये। उसने वायु, जल, अग्नि आदि पाँचों तत्वों पर अधिकार कर लिया था और मृत्यु तक को पराजित किया था। दूसरे शब्दों में उसने प्रकृति पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी और वह वैज्ञानिक आविष्कारों से इच्छानुसार कार्य ले सकता था। पर उसकी बुद्धि पर कुतर्क का ऐसा पर्दा पड़ा कि वह धर्म का कट्टर विरोधी बन गया और सब कुछ देख-सुनकर भी वह भगवान पर विश्वास न कर सका। ऐसी ही दशा आज हो रही है। द्वितीय महासमर में ही महानाशकारी अस्त्र-शस्त्र काम में लाये गये। फिर एटम बम निकाला गया। उसके बाद हाइड्रोजन बम तैयार किया गया। इस प्रकार संसार सर्वनाश के निकट पहुँचता जाता है, पर लोगों की आँखें नहीं खुलतीं और वे यह विश्वास करने को तैयार नहीं होते कि इस विश्व का संचालन करने वाली कोई महान शक्ति है और उसके बिना कोरा तर्क और विज्ञान मनुष्य का कल्याण कदापि नहीं कर सकता।
विज्ञान के इस युग में यह एक फैशन-सा बन गया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि को बहुत विशाल और युक्तियुक्त समझता है। इसका परिणाम भी स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है कि आज विनय और शील के दर्शन दुर्लभ हो गये हैं। वहाँ तो पहले जमाने में सुकरात जैसे ज्ञानी यह कहा करते थे कि “मुझे मालूम है कि मैं कुछ भी नहीं जानता।” नैतिक आचरण की श्रेष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने में लघुत्व का अनुभव करें और इस प्रकार विश्व की संचालक महान शक्ति की ओर अग्रसर होने का प्रयास करें। इस प्रकार की भावना, विश्वास के आधार पर ही उत्पन्न हो सकती है, तर्क-बुद्धि के द्वारा ऐसा होना सम्भव नहीं। भगवान कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था कि “तू अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पण कर, क्योंकि संसार के प्रत्येक पदार्थ और कार्य में मैं उपस्थित हूँ। तू चिन्ता मत कर, मैं समस्त कठिनाइयों से तेरा उद्धार कर दूँगा।”
हमारे शरीर में मस्तिष्क और हृदय दोनों की ही आवश्यकता है। बुद्धि के बिना विश्वास अंधा है और विश्वास के बिना बुद्धि भी लँगड़ी है। इन दोनों का ठीक ढंग से सामंजस्य होने से ही जीवन सफल और सुखी बन सकता है। हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि वर्तमान विज्ञान और उसके सर्वनाशी आविष्कारों से मनुष्य जाति का कल्याण कदापि नहीं हो सकता, वरन् हम दिन पर दिन मृत्यु के मुँह में अग्रसर होते चले जायेंगे। इससे बचने का एक मात्र उपाय यही है कि मनुष्य भगवान में विश्वास करके अपनी रक्षा की प्रार्थना करे। जब तक ऐसा न किया जायेगा तब तक न तो सुवर्ण भण्डारों से सद्भावना की स्थापना होगी और न अणु बम से शत्रुता का भाव दूर हो सकेगा। इसके लिए हमें विश्व- बन्धुत्व की भावना का उदय करना होगा और वह भावना तभी उत्पन्न हो सकेगी। जब हम परमात्मा को अपना माता-पिता मान सब मनुष्यों को उसी की सन्तान और अपना भाई समझने लगें।

