• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • जियो और जीने दो
    • जियो और जीने दो (Kavita)
    • भारतीय दर्शन और उसकी एकात्मकता
    • सच्चे धर्म की पहचान
    • राष्ट्र का विकास बिना आत्म-बलिदान के नहीं हो सकता
    • रथी सो गया है।
    • अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की जड़
    • वेदों में सामूहिकतावाद की शिक्षा
    • मन को कैसे वश में किया जाय।
    • महानता के बीज
    • विज्ञान के सर्वनाशी प्रभाव का प्रतिकार धर्म से ही हो सकेगा।
    • दूसरों को मान दीजिए।
    • मनुष्य स्वयं अपना भाग्य है।
    • संकट का समय और ग्रहों का प्रभाव
    • ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल कैसे बनाया जाय?
    • गायत्री उपासना के अनुभव
    • देश भर में नवरात्रि में गायत्री-उपासना की धूम
    • वंशी धर दो, शंख उठाओ!
    • वंशी धर दो, शंख उठाओ (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1957 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT SCAN


अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की जड़

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 6 8 Last
(श्री कृष्णदास जाजू)

एक मशहूर कहावत है कि केवल चोर को मारने से क्या होगा? चोर की नानी को मार दें तो चोर का जन्म ही न होगा। यहाँ स्वभावतः यह प्रश्न उठता है कि अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की नानी कौन है और उसे कैसे मारा जाय? इन प्रश्नों का उत्तर देना बहुत कठिन है। शायद अपनी-अपनी समझ के अनुसार इसके लिए अलग-अलग उत्तर हों। यहाँ हम दो-तीन खास बातों का ही विचार करेंगे। उनमें भी व्यवहारिक पहलू पर ही जोर देना उचित होगा।

अगर मनुष्य स्वभाव में ही ऐसी कोई चीज है कि जिससे अशुद्धि का रहना अवश्यम्भावी है तो उसका सम्पूर्ण नाश करना असम्भव है। अशुद्धि या असत्य व्यवहार की व्यापकता को देखते हुए यह स्वीकार करना होगा कि मनुष्य -स्वभाव में ऐसा कुछ अंश जरूर है, जो अशुद्धि को जन्म देता है। परन्तु चूँकि मनुष्य शुद्धि की ओर भी बढ़ता है, इसलिए यह भी मानना पड़ेगा कि शुद्धि का बीज भी उसमें है।

मनुष्य अपूर्णता में से पूर्णता की ओर जाने का प्रयत्न कर रहा है। पूर्णता के विरुद्ध जो दोष या बाधायें सामने आती हैं, उन्हें भी दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। उसमें स्वार्थ वृत्ति की प्रबलता है, पर परमार्थ की वृत्ति भी मौजूद है। उसे समाज में रहना पड़ता है और समाज से ही उसे भरण-पोषण, विद्या, कला, ज्ञान आदि मिलते हैं। अनेक लोगों से उसके अनेक सम्बन्ध आते हैं। अगर वह उन सम्बन्धों में सच्चाई-शुद्धि से व्यवहार नहीं करता तो स्वयं उसको भी दूसरे मनुष्यों द्वारा वैसा ही असत्य व्यवहार सहन करना पड़ेगा। इस प्रकार मनुष्य के लिए शुद्धि और अशुद्धि दोनों तरफ झुकने के कारण मौजूद हैं। इसके अलावा मनुष्य को जिस समाज में रहना पड़ता है, उसमें अगर ऐसी व्यवस्था हो कि भलाई को प्रोत्साहन मिले और बुराई निन्दनीय मानी जाय तो उसके आचरण के सुधारने में काफी मदद मिल सकती है। इस प्रकार व्यक्तिगत और सामुदायिक प्रयास से अशुद्ध व्यवहार में काफी कमी आ सकती है।

हमारी परम्परा में सामुदायिक हित के बजाय व्यक्तिगत लाभ पर अधिक जोर रहा है। हमारे व्यावसायिक और सामाजिक विचारों में ही नहीं धार्मिक विचारों में भी व्यक्तिगत दृष्टि से अधिक विचार किया जाता है। पुरुषार्थ और तपस्या का लक्ष्य भी व्यक्तिगत मोक्ष माना गया है। सम्भव है इन कारणों से सामुदायिक उत्कर्ष के लिए जिन गुणों की विशेष जरूरत है, वे उचित मात्रा में नहीं बढ़ पाये हैं। इसलिये हमारे यहाँ व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध की विचारधारा में परिवर्तन होने की आवश्यकता है। व्यक्ति समाज का अंग है और समाज की भलाई में ही उसकी भलाई है। अगर सारे समाज को कष्ट भोगने का कोई अवसर आ गया तो व्यक्ति भी कष्ट से नहीं बच सकता। इस प्रकार की भावनायें हममें बढ़नी चाहिएं।

धन का लोभ

यह तो स्पष्ट है कि अशुद्ध व्यवहार का मूल कारण धन का लोभ होता है परन्तु धन का लोभ इतना क्यों बढ़ा? आप हर क्षेत्र में यह दृश्य देख सकते हैं कि जब किसी संकट से करोड़ों आदमी कष्ट भोगते रहते हैं, सम्पन्न व्यक्ति और चतुर व्यापारी उसी संकट में से अपना स्वार्थ साधने में नहीं हिचकिचाते। सन् 1943 में बंगाल में जो अकाल पड़ा था उसकी घटनायें बड़ी हृदय-विदारक हैं। उसकी जाँच करने के लिए जो कमेटी नियुक्त की गई थी, उसने लिखा था कि ग्राहक, व्यापारी, किसान जो समर्थ थे और जिनको मौका मिला उन्होंने अनाज का खूब संग्रह कर लिया। इससे अनाज के भाव इतने बढ़ गये कि गरीब जनता में अनाज खरीदने की शक्ति ही नहीं रही। उस अकाल में बतलाया जाता है कि तीस लाख व्यक्ति मरे थे और मुनाफाखोरों ने तीस करोड़ की रकम पैदा की थी। अर्थात् हर भूखा मरने वाले व्यक्ति के पीछे व्यापारी को एक हजार रुपया मुनाफा मिला था। कैसा वीभत्स व्यापार है यह। खाने को न मिलने के कारण रोज-रोज यातना भुगतते हुए प्राण कैसे जाते होंगे, इसकी कल्पना, जिनको खाने को मिलता है, वे कर ही नहीं सकते। सप्ताह, दो सप्ताह बिलकुल निराहार रहने वाला थोड़ी कल्पना कर सकता है। वैसे तो देश भर में हर साल किसी न किसी सूबे में कुछ अंशों में अकाल रहता है। अब तो सरकार प्रयत्न करके यथासम्भव अनाज उपलब्ध करा देती है। फिर भी इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि ऐसे संकटकाल में धनिक लोग चीजों के भाव बढ़ाकर मुनाफा कमाने में संकोच नहीं करते। कुछ दानी लोग मदद के लिए जरूर आगे बढ़ते हैं परन्तु इसका महत्व भी इस कारण अधिक नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे संकट में से मुनाफा कमाकर उसी में से थोड़ा सा दान कर देते हैं।

धन के लोभ के लिए हमारी प्रचलित आर्थिक व्यवस्था भी जिम्मेदार है। अंग्रेजी राज्य-काल में यहाँ पश्चिमी अर्थशास्त्र और सभ्यता का बोलबाला रहा है। अंग्रेजी को इंग्लैण्ड के हित में भारत से धन ढोकर अपने देश में ले जाना था। जब वे स्वयं इतना लाभ उठाना चाहते थे, तो भारत में भी यहाँ के कुछ लोगों को लाभ उठाने देना जरूरी था। देश के कुछ लोगों को मध्यस्थ (बिचौलिया) बनाये बिना परदेश वाले अपना उद्देश्य सिद्ध नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप देश में आर्थिक विषमता बढ़ने लगी। इससे बहुसंख्य लोग गरीब की होने लगे। इंग्लैण्ड में भी पूँजीवादी अनुचित मार्ग से धन कमाने का उपाय करते हैं पर वहाँ की सरकार गरीबों को कई तरह से मदद देकर हालत को संभाले रहती है। पर भारत के गरीबों की परवाह अंग्रेजी सरकार क्यों करने लगी, उनको अपने भाग्य के भरोसे ही छोड़ दिया गया। इसके फलस्वरूप आर्थिक विषमता ने गम्भीर रूप धारण कर लिया। दुर्भाग्यवश तब भी हमारा ध्यान उधर आकर्षित नहीं हुआ, भाग्यवादी होने के कारण इस दुर्दशा के वास्तविक कारणों को खोजने के बजाय हम उसे दैव प्रदत्त कर्मफल मानकर सन्तोष किये रहे।

आर्थिक विषमता में जब थोड़े से लोग मालदार बनकर मजे उड़ाने लगते हैं, तब दूसरों का दिल भी वैसा ही करने को चाहता है। पर अधिक धन बिना अशुद्धि या बेईमानी के प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिये यह भी बढ़ने लगती है। अगर धन का लोभ घटाना है तो आर्थिक विषमता कम करनी होगी। समाज और राजसभा दोनों मिलकर यह कर सकते हैं। अब गरीब जनता आर्थिक विषमता घटाने की बात कर रही है और वह कुछ आतुरता भी प्रकट कर रही है। परन्तु उसमें भी दोष यह है कि वह भी शुद्ध व्यवहार करने वाली नहीं है। राज-सत्ता भी विषमता घटाने की कुछ बात कर रही है। परन्तु वर्तमान खर्चीला शासन चलाने के लिए उसे जो धन चाहिए, वह धनिकों को कायम रखकर उनके टैक्सों द्वारा ही प्राप्त कर सकती है। इसलिए वह आर्थिक विषमता को कहाँ तक घटा सकती है, यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। फिर समता जमाने की माँग है और उसे टाला नहीं जा सकेगा। उसमें आवश्यक सफलता मिलने तक समाज को भी पैसे की महिमा घटाने का उपाय करते रहना चाहिये।

यदि हमें भ्रष्टाचार मिटाना है तो समाज की रचना में बुनियादी परिवर्तन करना होगा। इसके लिए कुछ लोग हिंसा का या कानून का सहारा लेकर पूँजीवादी अर्थ-व्यवस्था के स्थान पर साम्यवादी अर्थ- व्यवस्था लोन का प्रस्ताव किया करते हैं। पर हम इसे इस कारण नहीं मान सकते, क्योंकि केवल भौतिक परिवर्तन होने से लोगों की अशुद्ध मनोवृत्ति नहीं बदल सकती। जीवन की शुद्धि के बिना व्यवहार की शुद्धि नहीं हो सकती। इसलिए हमको केवल कानूनी परिवर्तनों का आश्रय छोड़कर अन्तःकरण की शुद्धि का प्रयत्न करना चाहिए। यही अशुद्ध व्यवहार की जड़ को काटने का वास्तविक मार्ग है।

यह मनोवृत्ति जब सर्वत्र फैल जायेगी, तब ज्यादा से ज्यादा लोग, एक सीमा पर पहुँचकर पैसा पैदा करना छोड़ देंगे। साथ ही अगर हम सामान्य और पूजनीय व्यक्ति का एक नया आदर्श खड़ा करें- जैसे समाज- सेवक, साधु साधारण किसान, मजदूर- तो एक बहुत बड़ा काम हम करेंगे। इससे एक नई जीवन-दृष्टि का विकास होगा और हमारे देश में एक आदर्श गौरवशाली प्रजा का आविर्भाव होगा।

First 6 8 Last


Other Version of this book



Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...

Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • जियो और जीने दो
  • जियो और जीने दो (Kavita)
  • भारतीय दर्शन और उसकी एकात्मकता
  • सच्चे धर्म की पहचान
  • राष्ट्र का विकास बिना आत्म-बलिदान के नहीं हो सकता
  • रथी सो गया है।
  • अशुद्ध (असत्य) व्यवहार की जड़
  • वेदों में सामूहिकतावाद की शिक्षा
  • मन को कैसे वश में किया जाय।
  • महानता के बीज
  • विज्ञान के सर्वनाशी प्रभाव का प्रतिकार धर्म से ही हो सकेगा।
  • दूसरों को मान दीजिए।
  • मनुष्य स्वयं अपना भाग्य है।
  • संकट का समय और ग्रहों का प्रभाव
  • ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल कैसे बनाया जाय?
  • गायत्री उपासना के अनुभव
  • देश भर में नवरात्रि में गायत्री-उपासना की धूम
  • वंशी धर दो, शंख उठाओ!
  • वंशी धर दो, शंख उठाओ (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj