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Magazine - Year 1957 - Version 2

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गायत्री उपासना के अनुभव

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भयंकर बीमारी से छुटकारा

श्री इन्द्रचन्द्र भोजक (अमदला वालरा) से लिखते हैं कि मेरी बहिन बीमार हो गई थी और उसका रोग डाक्टरों की समझ में नहीं आता था। मैंने उसके लिए 24 हजार का पुरश्चरण शुरू किया और उससे भी एक माला रोज जपने को कहा। - दिन में वह बिलकुल स्वस्थ हो गई। इसी प्रकार मेरी स्त्री का आपरेशन हुआ। अस्पताल से घर आने पर उसकी तबियत एकाएक ऐसी बिगड़ गयी कि जीने की तनिक भी आशा न रही। मैंने गायत्री माता का स्मरण किया और थोड़ी देर बाद उसकी हालत सुधरने लग गई।

ट्रक के नीचे दबकर भी बच गया

शाहबरा (देहली) से श्री राधेश्याम गुप्ता लिखते हैं कि “अभी दो मास पहले मैं हनुमानजी के दर्शन करके वापिस आ रहा था कि ट्रक से मेरी साइकिल की टक्कर हो गयी। ट्रक का पहिया मेरे पैर पर से उतर गया। साइकिल टूट गई पर मुझको कतई चोट नहीं आयी। यह गायत्री उपासना का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसी प्रकार मेरे दस वर्ष से सन्तान नहीं होती थी। अब माता की उपासना और प्रार्थना करने से पुत्र उत्पन्न हुआ। गायत्री जप द्वारा मैंने कितने ही लोगों के बुरे व्यसन छुड़ा दिए।”

श्वास का रोग अच्छा हो गया

श्री भगवती प्रसाद वर्मा, केन कामदार- प्रा विजुआ (खीरी) से लिखते हैं कि “मेरे पिताजी को श्वास का रोग हो गया था, डॉक्टर ने 500/ रुपये का नुस्खा बतलाया और फिर भी यह कहा कि यह रोग जड़ से कभी ठीक नहीं हो सकता। पिताजी ने मालूम क्या-क्या दवायें इस रोग की खा ली थीं अब डाक्टरों के सुझाव से निराश होकर उन्होंने दवा खाना छोड़ दिया और चिन्ता व्याप गई। मैंने और मेरी बहन ने गायत्री माता की शरण ली। धन्य माताजी को कि मेरे पिता बिना दवा खाये ही अच्छे हो गये।”

मोटर दुर्घटना का स्वप्न में संकेत

श्री शिवशंकर मिश्रा, कामठी नागपुर से लिखते हैं कि “कुछ समय पहले की बात है कि मेरे मामा सख्त बीमार हो गये और कई महीने रुग्णावस्था में रहकर स्वर्गवासी हुये। मृत्यु होने के करीब 20 दिन पहिले डॉक्टर ने उनको नागपुर ले जाकर परीक्षण कराने की राय दी। इसके लिए अस्पताल की बीमार ले जाने वाली मोटर का प्रबन्ध एक दिन पहले ही कर लिया गया। मामा ने मुझे बुलाकर कहा कि तुम्हें मेरे साथ चलना है सो देर न लगाना, मोटर सुबह ठीक सात बजे आ जायेगी। मैं चलने को कह कर घर आकर सो गया। मुझे स्वप्न में यह महसूस कि कल मोटर दुर्घटना होगी। परन्तु उस पर ज्यादा ध्यान न देकर मैंने यह समझा कि कहीं से दुर्घटना का समाचार सुनने में आयेगा। मैं सुबह यथासंभव जल्दी उठा और नित्य नियम के अनुसार गायत्री-जप व हवन करने लगा। इतने में मोटर नागपुर से आ गई। दो बार मामा का लड़का बुलाने आया कि मामा और ड्राइवर जल्दी कर रहे हैं। घर के लोग भी नाराज हो रहे थे कि इस समय पूजा लेकर बैठ गये, जाते नहीं। पर मैंने निश्चय किया कि नित्य नियम पूरा करके जाऊँगा। इस कारण मैं कुछ देर में पहुँचा और मामा को मोटर में लिटाकर नागपुर आया और वहाँ उनकी जाँच कराई। लौटते समय अस्पताल से कुछ दूरी पर फल लेने को उतरा। फिर मैं जब बैठने लगा कि मोटर चल दी और मैं धड़ाम से जमीन पर गिरा। यह ऐसी जगह थी कि जहाँ बड़ी तेज चढ़ाई थी। अगर मोटर जरा भी पीछे को सरकती तो मेरी हड्डियाँ चूर-चूर कर देती और अगर आगे निकल जाती तो ऊपर से आते हुए सैकड़ों रिक्शों और ताँगे, मोटर आदि से दबकर मैं चटनी बन जाता। गिरने से मुझे चोट तो काफी लगी, पर लोगों ने उठाकर मोटर में लिटा दिया। घर पहुँच कर भी मुझ से स्वयं चला नहीं गया और लोगों ने ही घर में भीतर पहुँचाया। पन्द्रह-बीस दिन बाद मैं कुछ चलने-फिरने लायक हुआ। गायत्री माता ने मुझे पहले से ही दुर्घटना की सूचना देकर सावधान किया और मेरे असावधानी करने पर भी मेरी प्राण-रक्षा की। यह उनकी अपार कृपा का प्रमाण है।”

चोर घर में न घुस सके

श्री बालमुकुन्द नारायण शर्मा गुजर्रा (जिला धार म.प्र.) से लिखते हैं कि अभी एक दिन हम सब लोग अपने मकान के पीछे के सब दरवाजे बन्द करके, सामने वाले चबूतरे पर सो रहे थे। मकान के पीछे सुनसान जंगल था। रात में कुछ चोर पीछे की तरफ बने कोट में घुसे और यहाँ से ऊपर चढ़कर चौक में कूद पड़े। चौक में जिन कमरों के दरवाजे थे उनमें भीतर से साँकल लगी थी। चोरों ने दरवाजे को खोलना शुरू किया और बहुत-सी ईंटें निकाल डालीं, पर वे दरवाजे को न निकाल सके। इस प्रकार माता गायत्री ने हमारे सर्वस्व की रक्षा की।

शेर के आक्रमण से बच गया

श्री. शेरसिंह जी प्रधानाध्यापक बेसिक स्कूल,

कानारूपजड़ी (अजमेर) से लिखते हैं कि “ता. 16-5-55 को मैं अजमेर रोड पर दो मोटरों के बीच साइकिल समेत दब गया था, पर गायत्री माता की कृपा से मेरी प्राण-रक्षा हो गई। यह घटना मुझे और मेरे अफसरों को अब भी याद है। इसी प्राकर ता. 9-12-56 को एक शेर ने दो अन्य आदमियों को चीर डाला। मैं भी बन्दूक लेकर वहाँ गया, शेर को घायल कर दिया, पर वह जख्मी होकर भी मेरे ऊपर टूट पड़ा। शेर के दोनों अगले पंजे मेरे कन्धों पर थे और मुँह गले पर। मैं जख्मी तो हो गया और मेरा और मेरा गर्म कोट शेर के पंजे से फट गया, पर गायत्री माता ने मेरी प्राण-रक्षा की। मेरे पीछे दो आदमी और खड़े थे वे भी उस समय भाग गये। उस समय का दृश्य सचमुच ही एक चमत्कार था।”

अलौकिक शाँति की प्रगति

श्री सूर्यशरण गुप्त नवाबगंज (गोंडा) से लिखते हैं कि “4 वर्ष पूर्व श्रद्धेय आचार्य जी ने सहस्राँशु यज्ञ का अनुष्ठान प्रारम्भ किया था। सौभाग्यवश मैं भी उसमें सम्मिलित हो सका। उस समय पत्र द्वारा आचार्यजी ने सूचित किया था कि इससे आपको परम शाँति मिलेगी। वास्तव में उस अलौकिक शाँति का अनुभव कुछ ही दिन बाद अपने पिता की मृत्यु के अवसर पर हुआ। मेरे जैसे अनुभव शून्य व्यक्ति के लिये पिता की मृत्यु किस प्रकार दुःखद हो सकती है यह समझ सकना कठिन नहीं है। पर गायत्री माता के प्रभाव से उस घटना का कुछ भी कुप्रभाव मेरे ऊपर नहीं पड़ा और मैं पूर्ण शाँत बना रहा। तत्पश्चात् पत्नी की गर्भावस्था के लिए आचार्यजी ने ‘गर्भ-पोषक रसायन’ दी थी। उसके प्रभाव से मेरी पत्नी के बच्चा 3 घंटे की प्रसव- वेदना के बाद ही हो गया, जो पहले 12 घंटे की वेदना के बाद होता था।”

पाँडु रोग से छुटकारा मिला

वैद्य जयप्रकाश जी गौतम इंचार्ज डि. बोर्ड डिस्पेंसरी खरखौदा (मेरठ) से लिखते हैं कि “मैं बहुत बड़े रोग से ग्रसित था, जब मैं मथुरा पूर्णाहुति करने गया तब भी यह महान पाँडु रोग शरीर में घर किये था। पर बाद में जब मेरी मनोभावना जप करते- करते पूर्ण शुद्ध को गई तब यह भयंकर रोग स्वयं अच्छा हो गया। अन्यथा इसके पहिले 300-400 रु. की डाक्टरी दवा तथा अपनी वैद्यक दवाओं के प्रयोग से भी यह अच्छा न हो सका था।”

मेरे भाई की बीमारी से रक्षा हुई

गाँव लसूलाडिया अमरा (पो. तराना जिला उज्जैन) से श्री सेवादास वैष्णव लिखते हैं कि “मेरा भाई रतनदास तथा उसकी धर्म-पत्नी यहाँ से 18 कोस दूर भड़का गाँव में बीमार हो गये। उनके पास कोई पानी देने वाला भी न था, न वे स्वयं उठ सकते थे। जब मेरे पास यह समाचार आया तो मैंने अपनी उपासना की पूँजी में से दस हजार गायत्री जप का संकल्प करके माता से प्रार्थना की कि मेरे भाई की रक्षा करो। साथ ही अपनी धर्म-पत्नी को भड़का गाँव के लिए रवाना कर दिया। जब वह दूसरे दिन वहाँ पहुँची तो मेरे भाई व उसकी स्त्री को बिलकुल स्वस्थ पाया। माता अपने भक्त की पुकार सब तरह सुनती हैं।”

परीक्षा में पास हो गया

श्री विष्णु प्रसाद तिवारी गाजगीर (बिलासपुर) लिखते हैं कि “इस साल मेरी पढ़ाई बहुत कम हुई थी, परन्तु माता के ऊपर मेरा पूर्ण विश्वास था कि मैं अवश्य पास हो जाऊंगा। मैंने प्रतिज्ञा की कि पास होने पर दस हजार गायत्री- जप व नवान्ह रामायण-पाठ करूंगा। माताजी की कृपा से में सारी कक्षा में प्रथम उत्तीर्ण हुआ।”

चोरों से कैसे बचे

श्री हरगोविन्द त्रिपाठी बीसापुर (सुल्तानपुर) से लिखते हैं कि “मैं लगातार 3 वर्ष से माता की उपासना कर रहा हूँ। बैसाख सुदी पंचमी सं. 2014 को माताजी का दिन था। हवन के बाद रात्रि में चालीस का पाठ व रामचरित मानस पर प्रवचन हुआ। घर के सभी व्यक्ति हवन-स्थल में ही थे कि घर में चोरों ने सेंध लगाना शुरू किया। हवन से आकर हम सब लोग सो गये और इधर चोरों ने सेंध पूरी करके भीतर घुसने की तैयारी की। उसी समय मेरी माताजी की नींद टूट गयी और चोर भाग गये। यह सब गायत्री माता के प्रभाव से ही हो सका यह हम सबका विश्वास है।”

सन्तानोत्पत्ति का सौभाग्य प्राप्त हुआ

श्री. भुवनेश्वर प्रसाद पोद्दार, मोहदीन नगर (भागलपुर) से लिखते हैं “मैं तो एकलव्य की तरह आपको गुरु मानकर नित्य पूजा करता हूँ। मेरी अवस्था 44 वर्ष की हो चुकी थी, इसलिये सन्तान उत्पन्न होने की आशा जाती रही थी। पर माता की कृपा से अनहोनी बात हो गई और ता. 12 मई को मेरे यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ। अब वह बच्चा चिरंजीव और निरोग रहे, साथ ही माता के चरणों का अनन्य भक्त हो, ऐसा आशीर्वाद आप दें।”

नाग देवता भी हवन देखने आये

सवाई माधोपुर (राजस्थान) से श्री. रामनारायण जी लिखते हैं कि “यहाँ से कुछ ही दूर पर पहाड़ी में ‘महादेवजी की खोह’ नामक रमणीक स्थान है। वहाँ सदैव पानी की छोटी सी धारा शिवजी पर गिरती रहती है। ता. 14 जुलाई को सभी गायत्री सदस्य टीलों और जंगलों को पार करके इसी स्थल में पहुँचे और गायत्री- यज्ञ करने लगे। इतने में दिखाई दिया कि एक नागदेवता पास ही फन फैलाये खड़े हैं। जब तक यज्ञ होता रहा वे वहाँ से जरा भी न हटे। माता की आरती के बाद वे वहीं गायब हो गये।”

प्रत्यक्ष मौत का पैगाम

जवानमल शर्मा जौबला (म.भा.) से लिखते हैं कि “मेरी तन्द्रावस्था में कभी-कभी वायु गोले का दर्द ऐसे भीषण वेग से उठता है कि उससे कष्ट का वर्णन लिखकर नहीं किया जा सकता। कभी तो वह गर्दन को एक तरफ मोड़ देता है और कभी मस्तिष्क तक पहुँचकर वहाँ वायुयान सा चलाने लगता है। इसका कोई नियत समय नहीं, कभी दो-चार दिन में ही और कभी दो-चार महीने में इसका दौरा होता है। ऐसे भयंकर और मरणान्तकारी कष्ट में मैं गायत्री माता की शरण जाता हूँ और वही अब तक मेरी रक्षा करती आई हैं।”

नशे की आदत छूट गई

श्री चतुर्भुज संशा, बिगौड़ा (टीकमगढ़) से लिखते हैं कि “मैंने अपने जीवन को तम्बाकू, गाँजा, भाँग आदि नशीली वस्तुओं में बहुत बर्बाद किया था। पर जब से गायत्री माता का आश्रय लिया है तब से सब बुरी आदतें स्वयमेव छूट गई। एक दिन मेरे बच्चे को गाय ने सींगों पर उठाकर फेंक दिया। मैंने गायत्री आराधना की जिससे यह होश में आकर स्वस्थ हो गया।”

आठ दिन में शादी हो गयी

पला कसेर (बुलन्दशहर) से श्री यादराम शर्मा लिखते हैं कि “यहाँ की गायत्री शाखा की मंत्री श्री श्याम बिहारी शर्मा के विवाह का प्रयत्न कई वर्ष से चल रहा था परन्तु कोई न कोई विघ्न उपस्थित हो जाता था। दस बार ज्येष्ठ के अन्त में यहाँ गायत्री-यज्ञ सम्पन्न हुआ और केवल 8 दिन बाद मंत्री जी की शादी बहुत अच्छे ढंग से हो गई। मेरा यह अनुभव है कि यह गायत्री माता का ही प्रभाव है कि इतनी शीघ्र साधना-फल प्रदान किया।”

पुत्र का विवाह हो गया

श्री गोविन्द दास भार्गव, दिगौड़ा (टीकमगढ़) से लिखते हैं “जब से मैंने गायत्री माता का शरण ली है तब से मेरी कितनी ही मनोकामनाएं पूरी होती जाती हैं। मैंने दिन में सोचा कि पुत्र की शादी इस वर्ष में हो जानी चाहिये सो माता की कृपा से निर्विघ्न पूरी हो गई।”

ओलों से फसल की रक्षा हुई’

श्री ब्रजबल्लभजी, दिगौड़ा से लिखते हैं कि “इस बार जब हमारे गाँव की फसल तैयार हो चुकी थी ऐसे काले बादल उठे कि हम सब का हृदय काँप उठा। क्योंकि ऐसे समय ओला पड़ने की पूरी आशंका रहती है। उस समय हम सब सत्संग में बैठे थे। हमने वहीं माता से प्रार्थना की कि ‘रक्षा करो’। माता ने प्रार्थना सुन ली और थोड़ा सा पानी जरा सा ओले गिरकर आकाश खुल गया। माता कृपा न करती तो सैकड़ों किसानों का सर्वनाश हो जाता।”

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