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Magazine - Year 1957 - Version 2

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रथी सो गया है।

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(श्री रामनाथ ‘सुमन’)

उपनिषद् के ऋषि ने आत्मा को रथी कहा है। शरीर रथ है। आत्मा रथी है। रथी ही रथ हाँकता है। आत्मा शरीर का स्वतः पालन करती है। यदि रथी शिथिल है, सुषुप्त है, निद्राग्रस्त है तो रथ ठीक तरह से चल नहीं सकता। ठीक तरह से क्या उसका चलना ही संशयास्पद है। हमारे दर्शन में, धर्म में बार-बार यह सत्य दोहराया गया है।

किन्तु इसके साथ व्यवहार -शास्त्रों में एक और बात भी कही गयी है । रथी जागरुक हो किन्तु युगों की लीक पर चलते-चलते जीर्ण हो गया हो, पहिये घिस गये हों, तीलियाँ टूट गई हों- धुरी विश्रृंखल हो, या फिर मार्ग ही कुछ ऊबड़-खाबड़, वक्र, टूटा, गड्ढों एवं अवरोधों से भरा हो तो भी जीवन के रथ का स्वर पथ को मुखरित करने से रह जायेगा। चल कर भी न चलेगा, रथी होकर भी जैसे संचालन न हो पाये, अपने से उलझा, गतिहीन।

आज के भारत की दशा भी कुछ ऐसी ही है कि जीवन का रथ जीर्ण पड़ गया है। कहीं कील निकली है, कहीं चूल ढीली है, कहीं पथ संकीर्ण या उखड़ा- उखड़ा है, कहीं मार्गावरोध है। रथ स्वस्थ, गतिशील हो, मार्ग-जीवन संकुल हो- प्रशस्त हो, अवरोध मिटे, गति में स्वाभाविकता, सरलता आये, आवश्यक साधन उपलब्ध हों- यही हमारी पंचवर्षीय योजनायें हैं। इन योजनाओं की सफलता में जो बाह्यावरोध आ गये हैं वे मिटेंगे, पथ प्रशस्त होगा, उचित साधनों के अभाव दूर होंगे, रथ सहज ही अचर से चर हो जायेगा। मतलब रथ का पथ सरल हो जायेगा।

रथ तो हुआ। रथ का मार्ग भी बन जायेगा। पर रथ को चलाने वाले का क्या होगा, इस सम्बन्ध में योजना प्रायः मौन है। सम्भव है, यह बात उसकी परिधि में न आती हो। पर यह सत्य कि रथी आज सो गया है। उसके जागे बिना रथ उपलब्ध होकर भी नहीं चल पायेगा। बिनोवा, कदाचित यही कह रहे हैं। राष्ट्र का रथ चलाने के लिए रथी को जगाना होगा। सरकार मार्ग बना रही है, रथ ठीक कर रही है। बिनोवा की वाणी रथी को जगा रही है।

गाँधी जी का नाम तो हम प्रायः लेते हैं पर उनकी दीक्षा का जो विराट रूप है उसे समझने-देखने की शक्ति बहुत कम लोगों में है। पूर्ण दर्शन की तैयारी तो हम में से कदाचित् ही किसी में हो। जिस विराट रूप दर्शन की पुनः पुनः अर्जुन ने माँग की, वही जब सामने आया तो वह सहन नहीं कर सका। विराट का दर्शन ऐसा ही भयंकर होता है। मनुष्य भी विचलित हो जाते हैं। हमारी भी कुछ ऐसी दशा है। गाँधी जी ने भारतीय समाज के पुनः निर्माण का जो विराट स्वप्न देखा था उसमें हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे धर्म, हमारी जातीय परम्परा सबको एक साथ अभिव्यक्ति प्राप्त हुई थी। उन्होंने पहली बार हृदयंगम किया था कि राष्ट्र की आत्मा हमारे गाँवों में है। भारत ग्रामों में है। (कवि के शब्दों में ‘भारतमाता प्राणवासिनी’।) भारत को अपने नियुक्त जीवन-पथ पर चलने के लिए गाँवों को समझना होगा, देखना होगा, उठाना होगा, चलाना होगा। कैसे चलेंगे ये गाँव। चलेंगे, जब उनका सोया मन उठेगा, जब उनमें आत्मानुभूति जागेगी, तब उनमें यह गहरी निष्ठा आयेगी कि हम हैं भारत के हृदय। शरीर सोये, पर हमें तो निद्रा में भी चलना ही है, हमारा सोना राष्ट्र की मृत्यु है। हृदय छुट्टी नहीं लेता, विश्राम नहीं करता, बातें भी नहीं करता केवल चलता है और चलता है और चूँकि चलता है इसलिए चलाता है। हमारा शरीर -यन्त्र, सम्पूर्ण जीवन -रथ उसी से चलाया जा रहा है।

हमें यह समझना होगा कि गाँवों का हृदय कहाँ है? फिर कहाँ है उस हृदय का स्पन्दन, कहाँ है उसके स्पन्दन के विविध स्रोत, कहाँ हैं उसकी शक्तिमयी वाणी जो चुप रहकर भी बोलती है तो जीवन ही बोलता है। कठिनाई यह है कि गाँवों में काम तो हो रहा है, पर उसकी बागडोर आज भी शहरों के हाथ है। ग्राम की योजनायें गाँव में नहीं बनती, शहर में बनती हैं। इसे जानते हैं, हमारी विवशता है। ग्रामों का हृदय मानो नगरों में बसा है, कुछ हमारी अनुभूति है। नगर द्वारा ग्राम चलाये जा रहे हैं। गाँधीजी की कल्पना उलटी थी कि ग्राम से नगर नियोजित हों। हमारी सभ्यता, समाज- संगठन, राजनीति सबका केन्द्र ग्राम हो, क्योंकि उन्हीं के उठने से राष्ट्र उठेगा, उन्हीं के चलाने से चलेगा।

काम जो हो रहा है, आवश्यक है। बहुत आवश्यक है। अच्छा काम हो रहा है पर मुख्यतः भौतिक स्तर पर शरीर की संवृद्धि के लिए हो रहा है। यह उपयोगी है। यह जीवन की प्रथम आवश्यकता है। रोटी, कपड़ा एवं आवास सबके पास होना ही चाहिए, काम सब के लिए होना ही चाहिये। शिक्षण, जीविका और शरीर- संवृद्धि की सुविधाएं सबके लिए होनी ही चाहिएं पर जीवन में यह सब जिस देवता की पूजा के लिए है उसकी और भी तो ध्यान देना ही है। हमारे जीवन का देवता हमें पुकारते-पुकारते थक कर कपाटों के अन्दर सो गया है। उसकी इन्द्रियाँ सुषुप्त हैं, उसकी वाणी अवरुद्ध है। उसे जगाना होगा।

समस्त योजनायें जिसके लिए और जिसको लेकर हैं वह किसान, वह ग्राम का प्राण, वह ग्राम-देवता, वह मानव आज भी जैसे संशयग्रस्त है, एक मूर्छा सी है, उसके ऊपर। वह देवता तो है कि उसे लिए सब दौड़ रहे हैं, पर देखकर भी बात जैसे अन्तर में समाती नहीं है, प्रतिध्वनि मानो जीवन की बाहरी दीवारों से ही टकराकर लौट आती है।

समाज के स्वप्नदर्शी युवकों को, चिन्तनशील विद्वत्जनों को, वाणी के आराधकों को, सेवाभावी कार्यकर्ताओं को पहिले यही करना होगा जिसके लिए और जिसको लेकर सारी सामाजिक एवं आर्थिक योजनाएं हैं वह भारत का हृदय, यह मानव बहुत करके अब भी मानो अछूता ही रह गया है, शोरगुल में। उसे स्पर्श करना होगा, उसके अन्तर में बैठना होगा, उसे झकझोर कर जगाना होगा कि हे ग्राम-देवता, हे ग्राम- लक्ष्मी जागो। भारत की कोटि-कोटि मानवता के जीवन-स्रोत अँगड़ाई लेकर उठो। रथ तुम्हें पुकार रहा है, पथ तुम्हें पुकार रहा है, आज की संतति का भविष्य तुम्हें पुकार रहा है, आगे आने वाली अनुत्पन्न पीढ़ियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, जीवन की अगणित चुनौतियाँ तुम्हें पुकार रही हैं, उनका उत्तर देने के लिए उठो। राष्ट्र का और मानवता का रथ आगे बढ़ाओ।

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