मन को कैसे वश में किया जाय।
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(स्वामी शिवानन्दजी)
साधारण मनुष्यों के मन में साँसारिक विषयों के संकल्प सदैव उठा करते हैं, पर आध्यात्मिक विचारों को ग्रहण करने को वह शीघ्र प्रस्तुत नहीं हो सकता। इसका कारण यही है कि हमारा मन विकारों से भरा रहता है। उसे शुद्ध करना आसान काम नहीं है। निष्काम कर्म, जप, प्राणायाम आदि जैसे साधनों द्वारा उसे विकारों से मुक्त करना पड़ता है तब उसकी प्रवृत्ति स्वभावतः आध्यात्म की ओर जाती है।
मन दर्पण के समान है। यदि दर्पण गन्दा हो तो आप अपना मुँह साफ नहीं देख सकते। जब मन मलीन हो तो उसमें ईश्वर को साफ नहीं देखा जा सकता। जब आध्यात्मिक प्रयत्नों द्वारा उसे शुद्ध बना लिया जाता है तो ईश्वर का साक्षात्कार अवश्य होता है। यदि शुद्ध होकर मनुष्य का मन शास्त्रों के अध्ययन, ज्ञानियों के सत्संग और ध्यान के अभ्यास में निरन्तर लगे तो ज्ञान की वृद्धि होगी और दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जायगी जिससे परब्रह्म का सत्य ज्ञान होना सम्भव होगा। यज्ञ, दान, दया, वेदाध्ययन, सत्यभाषण- ये पांचों मन को शुद्ध करने वाले हैं, छठी तपस्या है। तीर्थ-यात्रा भी मन को शुद्ध करती है इसके द्वारा महात्माओं का सत्संग प्राप्त होता है। जप, निष्काम कर्म, अग्निहोत्र, ब्रह्मचर्य, सन्ध्या, तीर्थ-यात्रा शम, दम, यम, नियम, स्वाध्याय, तप, व्रत, साधु-सेवा ये सभी मन को शुद्ध करने के साधन हैं। निश्चय ही ऐसे शुद्ध हुए मन में पूर्ण आनन्द रहेगा। मन्त्र भी मन को शुद्ध करता है, पर तोते की तरह मंत्र को केवल रटने से बहुत कम फल होता है। मन्त्र को भाव के साथ कहने से उसका आश्चर्यजनक फल होता है। तब तक मंत्र में अपने ही मन की पूर्ण इच्छा-शक्ति नहीं भरी जायेगी तब तक उसका बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं हो सकता। सत्य भाषण और दया का अभ्यास मन को बहुत शुद्ध करने वाले व्यवहार हैं।
हमारी आँखें केवल देख सकती हैं। कान केवल सुन सकते हैं। जीभ केवल स्वाद ले सकती है। त्वचा केवल स्पर्श कर सकती है। नाक केवल सूँघ सकती है। परन्तु मन देख सकता है, सुन सकता है, स्वाद भी ले सकता है, स्पर्श कर सकता है, सूँघ भी सकता है। सब इन्द्रियों की शक्तियाँ मन में निहित हैं। योगाभ्यास से आप मन के द्वारा देख और सुन सकते हैं। मन और इन्द्रियाँ एक हैं। मन का विकास इन्द्रिय है। मन इन्द्रियों का समूह है। मन में खाने की वासना से जिह्वा, दाँत और उदर की प्रवृत्ति होती है। यदि मन को वश में कर लिया जाय तो इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं। जो इन्द्रियों को वश में करता है वह मन को पहले ही वश में कर चुका होता है।
पंच महाभूतों के प्रभाव से उत्पन्न पाँचों इन्द्रियों का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। नासिका और गुदा की उत्पत्ति पृथ्वी तत्व से है। नाक सात्विक भाग से और गुदा राजसिक भाग से। ये दोनों आपस में सम्बन्धित इन्द्रियाँ हैं। ये दोनों सब से कम दुःख देती हैं और इनका संयम भी जल्दी हो जाता है। जिह्वा और उपस्थ (लिंगेन्द्रिय) जल-तत्व से बनी हैं। पहली सात्विक भाग से और दूसरी राजसिक भाग से। इनमें भी आपस में सम्बन्ध है। भोजन से जननेन्द्रिय को शक्ति मिलती है। यदि जिह्वा को वश में कर लिया जाय तो अन्य इन्द्रियाँ सहज ही वश में आ जाती हैं। सबसे ज्यादा चंचल और दुःखदायी जननेन्द्रिय है, उससे कम जिह्वा, उससे कम यावयेन्द्रिय (बोलना), फिर कान और आँख। आँखें तथा पैर अग्नि तत्व से हैं। आँखें सात्विक भाग से और पैर राजसिक भाग से। आँखें देखना पसन्द करती हैं और पैर उसे वहाँ ले जाने को तैयार रहते हैं। त्वचा और हाथ वायु तत्व से बने हैं। वावयेन्द्रिय और कान दोनों आकाश तत्व से हैं।
जिस प्रकार समुद्र नदियों से भरा जाता है, बिना नदियों के समुद्र की स्थिति नहीं है। इसी प्रकार मन इन्द्रियों द्वारा पूर्ण होता है, बिना इंद्रियों के मन का अस्तित्व नहीं रह सकता। आँख, कान और जिह्वा- ये तीनों इन्द्रियाँ मन को बहिर्मुखी कर देती हैं और मनुष्य को साँसारिक विषयों में फँसा देती हैं। इसलिये किसी भी आध्यात्मिक साधना में इन तीनों इंद्रियों को वश में करके ही मन को अन्तर्मुखी बनाया जा सकता है। मन की शान्ति के लिए शम और दम जरूरी है। इन्द्रियाँ यदि प्रबल हों तो अच्छे-अच्छे साधकों के मन भी इस तरह उड़ा ले जाती हैं जैसे तूफान नाव को उड़ा ले जाता है। सब इन्द्रियों का भड़काने वाला मन है। इन्द्रियों और मन के द्वारा माया भी अपना मोह-जाल फैलाती है। इसलिए साधक को हमेशा सचेत रहना चाहिए। वैराग्य और वासना के द्वारा दम का अभ्यास करें। उदाहरणार्थ मिठाई के बाजार में खूब पैसा लेकर जाओ। तरह-तरह की मिठाइयों को खूब ललचाई निगाह से देखो। पर कोई चीज खरीदो मत और घर को वापिस आ जाओ। उस दिन घर पर यदि उत्तम भोजन भी दिये जावें तो उन्हें ग्रहण मत करो। सादा भोजन करो। ऐसा करने से जिह्वा वश में आ सकेगी और आपकी इच्छा शक्ति भी बढ़ेगी। यदि आप चाय छोड़ने का संकल्प कर लें तो आपने जिह्वा को कुछ अंश तक वश में कर लिया। सारे बढ़िया भोजन छोड़ दो और इन्द्रियों के उपभोग के सारे पदार्थ त्याग दो। तीव्र तप का अभ्यास करो। तप से इन्द्रियाँ दुर्बल हो जाती हैं और मन वश में हो जाता है।
कुछ समय तक मौन रहने से वाक् इन्द्रिय का संयम होता है। इससे मन के चंचल रहने का एक बड़ा कारण दूर हो जायेगा और आपको शान्ति का अनुभव होगा। अब दृढ़ निश्चय के साथ ब्रह्म का ध्यान करो। बोलने से पहले अपने शब्दों के चुनने में सतर्क रहो। बोलने से पहले दो-तीन बार सोच लो। विचार करो कि आपके शब्द दूसरे पर क्या असर डालेंगे। धीरे-धीरे मौन का समय बढ़ाते रहो यहाँ तक कि महीनों तक बिना बोले तुम्हारा काम चल जाय। मन का अनुमान सदा बात को बढ़ाया करता है। इससे बचना चाहिये। मन का मौन वाणी के मौन से भी उत्तम है। जबर्दस्ती वाणी का मौन करने से मन के साथ बड़ा झगड़ना पड़ता है, प्रयत्न करना पड़ता है। इसलिये ऐसा अभ्यास करना चाहिये कि मौन स्वाभाविक हो जाय। वह अपने आप भीतर से उत्पन्न होना चाहिये तब ही पूर्ण शान्ति मिल सकती है।
एक प्रसिद्ध कहावत है कि ‘मन जीता तो जगत जीता।’ एक और प्रकृति है दूसरी ओर ब्रह्म है। मन इन दोनों के बीच में पुल का काम करता है। पुल पार करके आप ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इच्छाओं, संकल्पों और अहंकार के नाश का तात्पर्य मन को पूर्णतः वशीभूत कर लेने से ही है। किले में से निकलते सिपाहियों को एक-एक करके मार दो तो आप किले पर कब्जा कर लोगे। ऐसे ही ज्यों-ज्यों विचार उठते जायें एक-एक करके उनका नाश कर दो। आखिर को मन का भी नाश हो जायेगा। बराबर परमात्मा का विचार करते रहो आप बड़ी सुन्दरता से मन को जीत सकोगे।
जैसे श्वेत वस्त्र पर गुलाबी रंग अच्छा फैलता है इसी प्रकार जब मन शान्त होवे, सारे लोगों की तरफ से उदासीन होवे, सारी इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी हो जायें और मन के अज्ञान का नाश हो गया हो, तभी सद्गुरु के उपदेश शिष्य के मन में प्रवेश करके प्रभाव दिखायेंगे। मन का पूर्ण संयम केवल ब्रह्म-विचार द्वारा ही हो सकता है। दूसरे साधन तो सहायक हैं।
यदि मन वश में रहे तो इसमें कुछ भी भेद नहीं होता कि आप महल में रहें या पहाड़ की गुफा में। मन का संयम होने से शरीर का भी संयम हो जाता है। शरीर तो मन की छाया है। मनोनिरोध में कोई वृत्ति या विचार नहीं रहता, परन्तु शून्य वृत्ति रहती है। संस्कारों का नाश नहीं होता। जिसने मन को जीत लिया है वही सदा विजयी और महाराजा है। जिसने इच्छाओं और मन को वश में कर लिया है वही महावीर है।

