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Magazine - Year 1957 - Version 2

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सच्चे धर्म की पहचान

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(स्वामी रामतीर्थ)

किसी धर्म को यह समझकर ग्रहण न करो कि यह सबसे प्राचीन है। प्राचीन होना ही सच्चे मार्ग का प्रमाण नहीं है। कभी-कभी प्राचीन घरों को गिरवा देना और प्राचीन कपड़ों को उतार कर फेंक देना पड़ता है। कोई भी नवीन बात यदि बुद्धि गवाही देती हो, तो उतनी ही सुन्दर है, जितना सुन्दर कि गुलाब का एक नया फूल। पर किसी धर्म को इस कारण भी ग्रहण न करो कि यह सबसे नवीन है। नवीन बातें सर्वदा अच्छी नहीं होतीं, क्योंकि उनकी परीक्षा भली प्रकार नहीं हुई है। किसी धर्म को इसलिए स्वीकार न करो कि से बहुत से लोग मानते हैं। बहुत से लोग भूत-प्रेतों के धर्म को मानते हैं, पर कोई समझदार उसके पक्ष में राय नहीं दे सकता। एक समय था जब कि बहुसंख्यक लोग गुलामी (दास-प्रथा) को अच्छा समझते थे, पर इसका यह अर्थ नहीं कि गुलामी एक उत्तम वस्तु है। किसी धर्म को इस कारण स्वीकार न करो कि इसे चुने हुए लोगों ने स्वीकार किया है, किसी समय चुने हुए लोग अंधेरे में ठोकरें खाते हैं। किसी धर्म को इसलिये ग्रहण न करो कि इसे एक बड़े त्यागी, संन्यासी ने जन्म दिया है। बहुत से ऐसे संन्यासी पड़े हैं जिन्होंने त्याग तो सब दिया है किन्तु जानते कुछ नहीं। उन्हें एक प्रकार से पागल समझना चाहिए। किसी धर्म को इस कारण ग्रहण न करो कि इसे राजाओं ने स्वीकार किया है। राजाओं को आत्मिक ज्ञान प्रायः बहुत न्यून होता है। किसी धर्म को इस कारण ग्रहण न करो कि उसे एक उच्च चरित्र वाले मनुष्य ने प्रचलित किया है। उच्चकोटि के मनुष्य प्रायः सच्चाई को मीमाँसा करने में सफल मनोरथ नहीं हुए।

इसलिए किसी भी धर्म या किसी भी बात को उसके गुण देखकर स्वीकार करो। उस पर खूब विचार करो, बार-बार विवेचना करो। किन्तु अपनी स्वतंत्रता बुद्धदेव, ईसामसीह, मोहम्मद अथवा कृष्ण के हाथ न बेचो। अगर बुद्धदेव, ईसामसीह, मुहम्मद साहब ने धर्म के प्रचार में भिन्न-भिन्न साधनों का अवलम्बन किया, तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं, क्योंकि उनके जन्म भिन्न-भिन्न समयों और देशों में हुए थे। उन्होंने अपने सम्मुख उपस्थित समस्याओं को हल कर डाला था और अपनी बुद्धि से काम लिया था। इसी में उनका गौरव था। आप लोग वर्तमान समय में रह रहे हैं। सब बातों की जाँच-पड़ताल आपको स्वयं करनी चाहिए। उठिए, स्वतंत्र बनिये और प्रत्येक बात में स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बुद्धि से काम लीजिए। यदि आपके पूर्वजों ने किसी एक विशेष धर्म का ग्रहण किया था, तो उनका ऐसा करना उचित था, परन्तु आपकी मुक्ति आपके हाथ में है, आपके बाप-दादों के हाथ में नहीं है।

सच्चाई किसी की अपनी सम्पत्ति नहीं है। चाहे ईसा, बुद्ध, मुहम्मद, कृष्ण कोई भी क्यों न हो- केवल एक के नाम से सच्चाई का प्रचार करना ठीक नहीं माना जा सकता। सच्चाई में सबका दावा है। यदि किसी ने पहले सूर्य की धूप ली थी तो तुम भी आज ले सकते हो। यदि कोई सोने का मीठा पानी पीता हो तो तुम भी पी सकते हो। तुम्हारा भाव प्रत्येक धर्म के प्रति इसी प्रकार का होना चाहिए। यदि किसी पुरुष को अपने पड़ोसी का धन मिलता हो तो वह उसे लेने में कुछ भी आनाकानी न करेगा। परन्तु यदि वही पड़ोसी हमें बड़े आग्रह के साथ अपना आध्यात्मिक और धार्मिक कोष सौंप रहा हो, तो हम उसे ग्रहण करने की अपेक्षा उसका खण्डन करने को उद्यत हो जायेंगे। क्या यह आश्चर्यजनक बात नहीं है? इसलिए हम जिन धार्मिक सिद्धान्तों को वेदान्त के रूप में उपस्थित करते हैं, उसका उद्देश्य यह नहीं कि आप अपने को किसी खास धर्म का अनुयायी घोषित करें। हमारा तात्पर्य यही है कि आप उन शिक्षाओं पर ध्यान दें, उनका मनन करें। आप उनको अपना ही बना लें और जिस धर्म को अभी तक मानते आये हैं उसी के नाम से पुकारें। हमको नामों की ज्यादा परवाह नहीं है, क्योंकि हम उस धर्म का समर्थन करते हैं जो प्राचीन धर्म-शास्त्र में पाया जाता है और आधुनिक दार्शनिक तथा वैज्ञानिक ग्रन्थों में भी मिलता है। हमारा मतलब उस धर्म से है जो गली-गली में पाया जाता है, जो पत्तियों में लिखा हुआ है, जिसका गुणानुवाद हवा और झरने करते हैं और जो तुम्हारी रग-रग में जोश मार रहा है। हमारा तात्पर्य उसी धर्म से है जो सचमुच आपका है, जो आपके नित्य प्रति के काम से सम्बन्ध रखता है और जिसके अभ्यास के लिए किसी विशेष मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघर में जाने की आवश्यकता नहीं। उसी धर्म का मुख्य आशय सच्चाई है। उस पर एक हिन्दू का उतना ही अधिकार है जितना कि एक ईसाई या मुसलमान का।

इस वेदान्त धर्म का पहला उसूल है लगातार काम में जुटे रहना, क्योंकि अध्यवसाय ही सफलता की कुँजी है। आलसी मनुष्य का साँसारिक झगड़ों के कारण जीवन भार हो जाता है। वह जीवित रह ही नहीं सकता, अवश्य मर जायेगा। अनेक लोग कहा करते हैं कि “लगातार परिश्रम और निर्मल, निराकार परमात्मा में क्या सम्बन्ध है? क्या वेदान्त, त्याग और शान्ति का उपदेश देकर हमको आलसी नहीं बनाता?” यह ख्याल बिल्कुल गलत है। लोगों ने त्याग के अर्थ को ही नहीं समझा। यही कारण है कि वे ऐसी-ऐसी बिना सिर-पैर की शंकायें किया करते हैं। वेदान्त के अनुसार तो काम करना ही आराम है। उसका कहना है कि लगातार काम के द्वारा आप अपने को भूल जायें, शरीर और मस्तिष्क को साथ-साथ काम में ऐसे लगा दें कि परिश्रम बिलकुल मालूम ही न पड़े।

दूसरा साधन प्रेम है। अपने आस-पास के सब मनुष्यों और अपने में एक ही ब्रह्म समझकर सबको एक निगाह से देखने का नाम प्रेम है। यह संसार एक शरीर की तरह है और तुम्हारी देह उसका एक अंग है। जीवन को सफल करने के लिए आवश्यक है कि तुम अपने शरीर को संसार के दूसरे लोगों से भिन्न न समझो। इसी से सच्चे आनन्द की प्राप्ति हो सकती है। जब तुम एक दूसरे को भिन्न समझने लगते हो तभी तुम्हारा आनन्द नष्ट हो जाता है।

तीसरी आवश्यक बात आत्म-त्याग है। मेरा क्या होगा, मेरे काम का फल मुझे क्या मिलेगा इस बात की चिन्ता छोटे चित्त के लोग ही किया करते हैं। आप काम कीजिए किन्तु निष्काम रूप से। काम करना अपना जीवनोद्देश्य बनाइये। इस शिक्षा पर चलने से आपको दुखदायी वासनाओं से छुट्टी मिल जायेगी। इस बात की कुछ परवाह न कीजिए कि हमारे काम का क्या फल होगा, लोग प्रशंसा करेंगे या नहीं, वे हमारे काम से प्रसन्न होंगे या कड़ी आलोचना करेंगे। तुम इन बातों का ख्याल न करो और यह समझो कि तुम्हें बेचैन करने वाली वासनाओं से पिण्ड छुड़ाना है काम से नहीं। सब प्रकार के कष्टप्रद मनोविकार और प्रलोभनों से बचने के लिए काम ही सबसे बढ़िया और गुणकारी औषधि है।

आत्म-विश्वास भी एक महत्वपूर्ण साधन है। वेदान्त का सिद्धान्त है कि अपने को तुच्छ और निकम्मा मत समझो। वरन् यह विश्वास करो कि स्वयं परब्रह्म हो, तुम से बड़ी भक्ति है। यह बड़ा उत्तम उपदेश है। तुम जैसा सोचोगे। वैसा ही बनोगे। यदि तुम सोचते हो कि हम परमात्मा हैं तो तुम्हारे परमात्मा होने में कुछ सन्देह नहीं है। यदि तुम सोचते हो कि हम स्वतंत्र हैं तो तुम्हारे स्वतंत्र होने में कोई रुकावट नहीं पड़ सकती।

संसार को अपनी आत्मा से अधिक महत्वपूर्ण न समझो। ....न बनो, न घमण्ड करो। डॉक्टर जिस प्रकार रोगी को देखता है, पर उसकी बीमारी का उसके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता उसी प्रकार संसार के काम-काज को तुम भी देखो, घमण्ड और आसक्ति का प्रभाव अपने ऊपर न पड़ने दो। सब प्रलोभनों को छोड़ कर स्वतंत्रतापूर्वक काम करो। इसकी कुछ परवाह न करो कि तुम्हारे काम को कोई देखता है या नहीं और उसका पुरस्कार तुम्हें मिलेगा या नहीं। ऐसा करने से तुम्हें अवश्य सफलता प्राप्त होगी।

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