जियो और जीने दो (Kavita)
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मानवता है यही जियो तुम स्वयं- दूसरों को जीवन दो!
आज मनुज के अन्तराल में पड़ी क्षोभ की छाया,
काम क्रोध संयुक्त मोह का संग अहर्निश आया,
द्वेष दम्भ की नव विडम्बना मानव की नित सहचर है-
कण-कण में प्रतिभासित होती प्रकृति नटी की माया,
सावधान हो, बढ़ो, कंटकाकीर्ण मार्ग में बिछा सुमन दो। मानवता है यही... रहा नहीं अस्तित्व किसी का इस धरती के तल में,
परिवर्तन होता ही आया है जग के अञ्जल में,
अगणित बल-वैभव-सुकृीर्ति-सम्मान धरा पर छाये-
किन्तु सभी फंस रहे आज हैं स्वयं स्वार्थ दल-दल में,
उस अतीत के जीवन में भी अपने जीवन के मृदु कण दो! मानवता है यही... आज अनुज जा रहा रसातल को,
गिर रहा गगन से, किंचित लाभ नहीं लेता है इस अमूल्य जीवन से,
केवल अमित कामनाएं ही करता रहता मन से,
किन्तु नहीं करता समुचित पुरुषार्थ आलसी तन से,
उठो, आज मुरझाये मानस में तुम-नव सिंचन दो! मानवता है यही...
काम क्रोध संयुक्त मोह का संग अहर्निश आया,
द्वेष दम्भ की नव विडम्बना मानव की नित सहचर है-
कण-कण में प्रतिभासित होती प्रकृति नटी की माया,
सावधान हो, बढ़ो, कंटकाकीर्ण मार्ग में बिछा सुमन दो। मानवता है यही... रहा नहीं अस्तित्व किसी का इस धरती के तल में,
परिवर्तन होता ही आया है जग के अञ्जल में,
अगणित बल-वैभव-सुकृीर्ति-सम्मान धरा पर छाये-
किन्तु सभी फंस रहे आज हैं स्वयं स्वार्थ दल-दल में,
उस अतीत के जीवन में भी अपने जीवन के मृदु कण दो! मानवता है यही... आज अनुज जा रहा रसातल को,
गिर रहा गगन से, किंचित लाभ नहीं लेता है इस अमूल्य जीवन से,
केवल अमित कामनाएं ही करता रहता मन से,
किन्तु नहीं करता समुचित पुरुषार्थ आलसी तन से,
उठो, आज मुरझाये मानस में तुम-नव सिंचन दो! मानवता है यही...

