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Magazine - Year 1957 - Version 2

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भारतीय दर्शन और उसकी एकात्मकता

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(सर्वपल्ली राधाकृष्णन)

भारतीय दर्शन-शास्त्र को एक विशेष गौरव प्राप्त है और वह यह है कि उसमें सदा से इस संसार से परे एक सूक्ष्म संसार (सच्चे आत्म-लोक) की कल्पना जागृत रही है। जीवन के रहस्य को समझने और पशुता से ऊपर उठकर नैतिक तथा आध्यात्मिक शिखर पर चढ़ने का मनुष्य जिस प्रकार निरन्तर प्रयत्न करता रहा है, उसका सबसे सुन्दर उदाहरण हमको भारतवर्ष में ही मिलता है। इस देश में चार हजार अथवा छः हजार वर्ष से होते आये इस प्रयास का निरीक्षण भली प्रकार किया जा सकता है।

एक समय था जबकि सीधा सादा मनुष्य यह विश्वास करता था कि सूर्य तथा आकाश में बैठे अन्य देवगण संसार का शासन करते हैं और मनुष्यों के कर्मों को देखते रहते हैं। इसके बाद यह विचार उत्पन्न हुआ कि ये सब देवता एक ही ब्रह्म के नाना रूप हैं और यज्ञ के द्वारा उनसे अपनी मनोकामनायें पूर्ण करायी जा सकती हैं। आगे चलकर वे इस तथ्य पर पहुँचे कि निर्विकार तथा नित्य शुद्ध परमात्मा और मनुष्य के हृदय में स्थित जीवात्मा एक ही है। इसके बाद जड़वाद नास्तिक-दर्शन, भाग्यवाद आदि का प्रादुर्भाव हुआ और इसके बाद जैन तथा बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार हुआ, जिनमें बतलाया गया कि चाहे ईश्वर की सत्ता को मानो या न मानो, केवल मनसा-वाचा-कर्मणा शुद्ध रह कर मोक्ष लाभ किया जा सकता है। श्रीमद्भागवत गीता में बतलाया है कि सब प्रकार का ज्ञान तथा पूर्ण नैतिकता ब्रह्म का लक्षण है। इसके बाद न्याय, वैशेषिक, साम्य, योग, मीमाँसा आदि दर्शनकारों और शंकर, रामानुज, माधव, निम्बार्क, वल्लभ आदि-आदि आचार्यों ने सृष्टि रचना तथा परमात्मा और जीवात्मा के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार से विवेचनायें की। ये सब मनुष्य के दार्शनिक विचारों के विकास की उत्कृष्ट सामग्री है। एक मत के बाद दूसरा मत-एक सम्प्रदाय के बाद दूसरा सम्प्रदाय स्वाभाविक रूप से आता गया। भारतीय जीवन निरन्तर गतिशील (चलता हुआ) रहा है। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया वह परिस्थितियों के अनुसार बराबर बदलता गया। आरम्भ में इस क्षेत्र में जो कुछ विचार किया गया वह भारतवासियों का सर्वथा मौलिक प्रयास था, क्योंकि उसके पहले संसार के किसी अन्य देश वालों ने इन समस्याओं पर विचार ही नहीं किया था। इससे शुरू में भारतीय विचारकों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो आज हमारे सामने नहीं हैं।

संसार के अन्य दर्शनों की तरह भारतीय दर्शन की आलोचना करने में हमको मालूम होता है कि मनुष्य ने विश्व की रहस्यमयता और अनन्तता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए कितना प्रयत्न किया है। बहुसंख्यक तत्वदर्शी पण्डितों ने मानव-ज्ञान- मन्दिर के थोड़े या बहुत भाग का निर्माण किया है। यह सत्य है कि इतनी दार्शनिक विवेचना होने पर भी अपने लक्ष्य से हम अभी भी उतने ही दूर हैं जितने युगों पहले थे। फिर भी दार्शनिक मीमाँसा को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता। उसकी सहायता से हम अपने बंधनों को महसूस कर सकते हैं, बाँधने वाली जंजीरों की झनकार सुन सकते हैं। उसमें हमें मनुष्य की दुर्बलताओं का बड़ा स्पष्ट ज्ञान हो जाता है और इस नश्वर जीवन की अपूर्णता हर तरह से स्पष्ट हो जाती है। फिर अगर हम संसार के विषय में उतना सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके जितना कि हम चाहते हैं तो इसमें भेद अथवा आश्चर्य की बात ही क्या है? दार्शनिक व्यक्ति ज्ञान का प्रेमी होता है, उसका स्वामी नहीं होता। जब हम यात्रा करने को निकलते हैं तो यात्रा के अन्त का विशेष महत्व नहीं है, यात्रा ही महत्व की चीज है। भ्रमण करने में जो आनन्द है वह सब समाप्त हो जाने पर कहाँ मिल सकता है?

अब आज यह जिज्ञासा कर सकते हैं कि क्या इतिहास के ज्ञान से यह मालूम हो सकता है कि हम विकास-उन्नति की ओर जा रहे हैं अथवा इसके विपरीत पीछे की ओर लौट रहे हैं। इस दृष्टि से भारतवर्ष तो विकास में ही विश्वास रखता है, क्योंकि जैसे पीछे बतलाया जा चुका है- हमारे भिन्न-भिन्न युगों में एक नैसर्गिक सम्बन्ध पाया जाता है। इन युगों में जो एक सूत्र चला आ रहा है, वह कभी टूटा नहीं है। जो महान क्राँतियाँ भूतकाल का नाश करने वाली जान पड़ती हैं, वे भी उसमें फिर से नये प्राणों का संचार करती हैं। जिन्हें हम अवनति के युग कहते हैं, ये वास्तव में पुराने जीवन से नवीन जीवन की ओर आने के परिवर्तन-काल हैं। अवनति तथा उन्नति की दोनों धारायें एक ही में मिल जाती हैं। कभी तो उन्नति की ओर ले जाने वाली शक्तियाँ बड़े वेग के साथ आगे बढ़ती नजर आती हैं, कभी हमारी गति अनिश्चित दिशा में रुकी जान पड़ती है और कभी परावर्तन (पीछे को लौटने वाली) शक्तियाँ विकास की शक्तियों को पराजित करके पीछे की ओर जाती दिखाई पड़ती हैं। पर सब मिलाकर देखने से प्रतीत होता है कि गति आगे की ओर ही हुई है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरीके से काम होने में बहुत सा अंश बर्बाद हो जाता है। पर भूतकाल का इतिहास जिस मार्ग पर चला है, अब उस पर शोक करने या बुरा-भला कहने से बढ़कर मूर्खता की बात और नहीं हो सकती। अधिक महत्व की वस्तु तो भविष्य है। हम अपने पूर्वजों से ज्यादा दूर तक देख सकते हैं, क्योंकि हम उनके कन्धों पर चढ़ सकते हैं। पिछले जमाने में जो श्रेष्ठ नींव डाल दी गयी है उसी से हमें संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, वरन् हमें तो उस पर एक सुन्दर महल खड़ा करना चाहिए।

परम्परा की भक्ति और सत्य-प्रेम भारतीय जिनके अब तब के प्रयत्नों में निरन्तर पाये जाते हैं। प्रत्येक दार्शनिक यह समझता है कि उसके पूर्वजों के सिद्धान्त ही, वह सामग्री हैं, जिनसे हमारा आध्यात्मिकता का भवन बनाया गया है, उनकी निन्दा अपनी ही संस्कृति की निन्दा है। कोई भी उन्नतिशील जाति जिसकी संस्कृति भरी पूरी है, उस संस्कृति की उपेक्षा कभी नहीं कर सकती, चाहे उस संस्कृति के कुछ अंग प्रशंसनीय न समझे जाएं। ये दार्शनिक बड़े परिश्रम से प्राचीन सम्प्रदाय को समझने और समझाने का प्रयत्न करते हैं, उसमें लाक्षणिकता खोज निकालते हैं, परिवर्तित तथा संशोधित भी करते हैं, क्योंकि वह भावनाओं का केन्द्र बन चुकी है। बाद में होने वाले भारतीय आचार्यों ने सदैव पहले हो चुके दार्शनिक के सिद्धान्तों का समर्थन ही किया है और उनको भिन्न-भिन्न भाषाओं में सत्य का प्रकट करने वाला बताया है। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि विभिन्न मतों के सम्प्रदायों के सिद्धान्त मनमाने और असम्बद्ध ढंग से निश्चित कर लिये गये हैं। इसके बजाय वे उन सबको उसी एक मस्तिष्क से निकले हुए मानते हैं, जिन्होंने इस महान मन्दिर का निर्माण किया है, यद्यपि इस मन्दिर में अनेक दीवारें और अनेक देहलियाँ, अनेक मार्ग और खम्भे हैं।

आज भारतीय दर्शन के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न आ गया है। उसे यह निश्चय करना है कि भारतीय दर्शन को एक सीमित विस्तार, जीवन की परिस्थितियों से अलग, एक छोटा-सा सम्प्रदाय बना दिया जाय अथवा उसे वास्तविक जीवन से सम्पन्न कर दिया जाय जिससे वह अपने सच्चे स्वरूप को प्राप्त कर सके, भारत के प्राचीन आदर्शों में आधुनिक विश्व का समावेश करके उसे मानव-प्रगति का एक महत्वपूर्ण साधन बना दे। लक्षणों से तो यही प्रतीत होता है कि भविष्य में दूसरा मार्ग ही स्वीकृत होगा।

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