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Magazine - Year 1957 - Version 2

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संकट का समय और ग्रहों का प्रभाव

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(श्री ‘भारतीय योगी’)

वर्तमान समय में राजनीतिज्ञ और भविष्यवेत्ता दोनों एक स्वर से भावी संकट की सूचना देते रहते हैं । संसार में संघर्ष के कारण दिन पर दिन बढ़ते जाते हैं। कुछ वर्ष पहले कोरिया को लेकर अमरीका और चीन का संघर्ष हुआ था। यह किसी तरह मिटाया गया, तो उसके बाद इण्डोचीन में युद्ध की आग भड़क उठी थी। उसके उत्तरी भाग में साम्यवादी शासन स्थापित होने पर शाँत हो सकी। गत वर्ष मिस्र पर आक्रमण हुआ और महायुद्ध की सम्भावना उत्पन्न हो गई। भारत तथा अन्य शाँतिप्रिय देशों के उद्योग से वह संकट भी किसी प्रकार टाला गया। अब एक महीने से सीरिया के ऊपर आक्रमण की धमकी दी जा रही है। इस प्रकार ये घटनायें स्पष्ट बतला रही हैं कि विश्वव्यापारी संघर्ष की व्याधि निश्चित रूप से जड़ पकड़ चुकी है और एक जगह दबाई जाती है तो कुछ समय बाद दूसरे स्थान पर उमड़ आती है। जहाँ आग पहले भड़की थी, वहाँ भी जो शाँति हुई है, वह अस्थायी ही है। कोरिया, फारमोसा, इण्डो-चीन, ईरान, अल्जीरिया, मिस्र, सीरिया सब देशों में अशाँति की अग्नि ऊपर से भले दब गयी हो, पर भीतर ही भीतर सुलग रही है। इस प्रकार इस समय संसार नाशकारी संग्राम की ओर बराबर बढ़ता जा रहा है और अब उसे रोक सकना मनुष्य की शक्ति से बाहर दिखलाई पड़ता है। परमात्मा की शक्ति कोई उपाय निकाले तो दूसरी बात है।

इस विकट परिस्थिति को देखकर संसार के शाँति-प्रेमी बड़े चिन्तित हो रहे हैं और समय-समय पर अपनी इस भावना को व्यक्त करते रहते हैं। कुछ महीने पूर्व कलकत्ते में देशों के प्रतिनिधियों की एक विशाल सभा हुई थी। उसमें बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों ने प्रस्ताव पास किया कि “संयुक्त-राष्ट्रसंघ” सब प्रकार के अणु-आयुधों का पूर्ण निषेध करने का कदम तुरन्त उठाये, क्योंकि इससे मानव-सभ्यता के विनाश होने की सम्भावना पैदा हो गई है। विभिन्न राष्ट्रों द्वारा अणु-आयुधों के जो भण्डार तैयार किये जा रहे हैं, यह बड़ी चिन्ता का विषय है और इन हथियारों का निर्माण तथा परीक्षण बिना विलम्ब रोका जाना चाहिए। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न देश जो राजनीतिक गुटबन्दी कर रहे हैं वह भी विश्व शाँति के लिए गम्भीर खतरा है। इस प्रकार जो ‘नाटो’-’सीटो’- ‘वारसा’-’बगदाद’ के नाम से सैनिक संधियाँ की गई हैं ये सब भी युद्ध के वातावरण को बढ़ाने वाली हैं और शीघ्र ही समाप्त की जानी चाहिए।”

नेहरू जी बार-बार कह रहे हैं कि “आज बड़े राष्ट्र युद्ध के निकट हैं। पश्चिमी एशिया में तेल के लिये संघर्ष हो रहा है, पर मैं पूछता हूँ कि क्या तेल मानव-जीवन से अधिक मूल्यवान है? इस समय अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति बहुत असन्तोषजनक हो रही है। मुझे उम्मीद है कि पूर्व व पश्चिम की बड़ी शक्तियाँ स्थिरता पर गम्भीरतापूर्वक विचार करेंगी और यह अनुभव करेंगी कि शाँति का मार्ग फौजी गठबन्धन नहीं है। इन गठबन्धनों से भय बढ़ता है और हथियार बढ़ाने की दौड़ बढ़ती है। बड़े राष्ट्र यह समझ लें कि वे हथियारों के बल से छोटे राष्ट्रों पर अपनी इच्छा नहीं लाद सकते।”

इस प्रकार के अनेक कथन और घटनायें आजकल आये दिन अखबारों के पृष्ठों पर दिखाई दिया करते हैं। पर जो देश शक्ति-संचय में लगे हैं, वे उनकी ओर कुछ ध्यान न देकर अपनी कार्यवाहियों में संलग्न हैं। दिन प्रतिदिन नाश के भयंकर से भयंकर साधन तलाश किये जा रहे हैं और एक से बढ़कर एक अणु-आयुध का परीक्षण किया जा रहा है। अमरीका हाइड्रोजन बम का अठारहवाँ या उन्नीसवाँ परीक्षण कर चुका है और रूस दूर-मारक यन्त्र (राकेट) में निश्चित रूप से सफलता पा चुका है। जब से रूस की इस सफलता का समाचार प्रकट हुआ है अमरीका में तहलका मच गया है और वह भी जी-जान से वैसा ही राकेट बनाने में जुटा है जिससे आवश्यकता हो कर संसार के किसी भी भाग तक अपने देश में बैठ कर ही बम वर्षा की जा सके। इंग्लैंड भी अपनी शक्ति के अनुसार इन दोनों देशों की नकल करने की चेष्टा कर रहा है।

इस प्रकार ये तीन देश संसार में अशाँति उत्पन्न करने का कारण बने हुए हैं और ऐसी नाशकारी शक्तियों को जन्म दे रहे हैं जो किसी भी दिन संसार में प्रलय-काल उपस्थित कर सकती हैं। इनमें से अमरीका की तैयारी अपने देश में ही नहीं हो रही है वरन् उसने संसार भर में सर्वत्र अपने अड्डे कायम कर रखे हैं, जैसे जापान, फारमोसा, कोरिया, स्याम, पाकिस्तान, ईरान, जोर्डन, टर्की, पश्चिमी जर्मनी आदि इन सब देशों में उसने अपने भयंकर हथियार और सैनिक- विशेषज्ञ जमा कर रखें हैं, जो निरन्तर इन देशों की आँतरिक व्यवस्था पर प्रभाव डाल कर संसार को सर्वनाश की तरफ खींचते रहते हैं।

जब हम इन घटनाओं पर ज्योतिष-विद्या के जानकारों की सम्मतियों का अवलोकन करते हैं तो ज्ञात होता है कि वर्तमान समय में आकाश में स्थित ग्रहों में ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं कि जिनके फल से निःसन्देह दुनिया की कायापलट हो जायेगी। वे हमको बतलाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में दो अत्यन्त शक्तिशाली ग्रहों- शनि और नेपच्यून की युति तीन बार हो चुकी है जिनका फल संसार को सन् 1989 तक सहन करना पड़ेगा। इसी प्रकार ‘हर्षल-नेपच्यून महाकेन्द्र योग‘ भी सन् 1856 में हुआ है जिसके फल से शासक लोग राजनीति के विरुद्ध कार्य करके प्रजा में अशाँति उत्पन्न करते हैं और सामान्य जनता अपने स्तत्वों और अधिकारों के लिये माँग करती है। ऐसी स्थिति में गम्भीर राजनीतिज्ञों के बजाय झगड़े-फसाद पैदा करने वालों का प्रभाव बढ़ जाता है और वे हिंसापूर्ण कार्यवाहियों तथा प्रदर्शन करने के लिये जनता को भड़काते हैं। इससे संसार के अनेक देशों में विप्लव और क्रान्तिकारियों के होने की पूर्ण सम्भावना है।

ता. 24 सितम्बर 1958 के दिन बृहस्पति और नेपच्यून की प्रभावशाली युक्ति होने वाली है। यह युति संसार की राजनीतिक परिस्थिति पर बड़ा प्रभाव डालती है और पिछले समय में जब-जब यह हुई है इसने अनेक देशों के नक्शे को बदल दिया है। यह युति तीसरे महायुद्ध का बीज बोने वाली है यद्यपि उसका फल कुछ समय बाद प्रकट होगा। सूर्य के दक्षिण गोल प्रवेश की कुण्डली में सह युति सातवें स्थान पर है। इसलिये भावी युद्ध में भारत की तटस्थता कायम न रह सकेगी और उसे भी राजनीतिक गुटबन्दी में पड़कर युद्ध के मार्ग पर चलना पड़ेगा। इस विषय में भारत का प्रतिद्वन्दी पाकिस्तान है जो किसी न किसी बहाने उसके विरुद्ध कार्यवाही किया करता है और इंग्लैण्ड, अमरीका को भी भड़काने की चेष्टा में लगा रहता है। यद्यपि ऐसी कार्यवाहियों से अधिक हानि पाकिस्तान को ही उठानी पड़ी है, पर इस प्रकार वह भारत की शाँतिपूर्ण प्रगति में बाधा डाल देता है। तीसरे महायुद्ध के साथ, जिसकी तिथि सन् 1962 में बतलाई गई है, पाकिस्तान की विद्वेष भावना और धूर्तता के कारण भारत वर्ष को भी युद्ध का कोई परिणाम सहन करना पड़ेगा इसमें सन्देह नहीं है।

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