ब्रह्मचर्य की शक्ति
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ब्रह्मचारी भीष्म पितामह युद्ध में बुरी तरह घायल हुए, उनका सारा शरीर तीरोंब्रह्मचारी भीष्म पितामह युद्ध में बुरी तरह घायल हुए, उनका सारा शरीर तीरों से विधा हुआ था। उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। वे उत्तरायण सूर्य में देह त्यागना चाहते थे। इसलिए अभीष्ट समय आने की प्रतीक्षा में उनने अपने प्राणों को रोक लिया। शरीर की दृष्टि से वे उतने घायल थे कि तुरन्त ही प्राण निकल जाना चाहिए था पर वे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर तब तक शरीर धारण किये रहे जब तक कि उत्तरायण सूर्य का शुभ मुहूर्त न आ गया।
ब्रह्मचर्य व्रत सब प्रकार की लौकिक और पार-लौकिक सफलताओं का मूल है। यदि उसका सच्चे अर्थों में पालन किया जाय तो मनुष्य मृत्यु का भी मुकाबला कर सकता है।
ब्रह्मचारी का शरीर मन और प्राण उसके वश में रहते हैं और वह अपने संकल्पबल से असंभव समझे जाने वाले कार्यों को भी संभव कर सकता है। से विधा हुआ था। उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। वे उत्तरायण सूर्य में देह त्यागना चाहते थे। इसलिए अभीष्ट समय आने की प्रतीक्षा में उनने अपने प्राणों को रोक लिया। शरीर की दृष्टि से वे उतने घायल थे कि तुरन्त ही प्राण निकल जाना चाहिए था पर वे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर तब तक शरीर धारण किये रहे जब तक कि उत्तरायण सूर्य का शुभ मुहूर्त न आ गया।
ब्रह्मचर्य व्रत सब प्रकार की लौकिक और पार-लौकिक सफलताओं का मूल है। यदि उसका सच्चे अर्थों में पालन किया जाय तो मनुष्य मृत्यु का भी मुकाबला कर सकता है। ब्रह्मचारी का शरीर मन और प्राण उसके वश में रहते हैं और वह अपने संकल्पबल से असंभव समझे जाने वाले कार्यों को भी संभव कर सकता है।
ब्रह्मचारी का शरीर मन और प्राण उसके वश में रहते हैं और वह अपने संकल्पबल से असंभव समझे जाने वाले कार्यों को भी संभव कर सकता है। से विधा हुआ था। उस समय सूर्य दक्षिणायन थे। वे उत्तरायण सूर्य में देह त्यागना चाहते थे। इसलिए अभीष्ट समय आने की प्रतीक्षा में उनने अपने प्राणों को रोक लिया। शरीर की दृष्टि से वे उतने घायल थे कि तुरन्त ही प्राण निकल जाना चाहिए था पर वे अपनी इच्छा शक्ति के बल पर तब तक शरीर धारण किये रहे जब तक कि उत्तरायण सूर्य का शुभ मुहूर्त न आ गया।
ब्रह्मचर्य व्रत सब प्रकार की लौकिक और पार-लौकिक सफलताओं का मूल है। यदि उसका सच्चे अर्थों में पालन किया जाय तो मनुष्य मृत्यु का भी मुकाबला कर सकता है। ब्रह्मचारी का शरीर मन और प्राण उसके वश में रहते हैं और वह अपने संकल्पबल से असंभव समझे जाने वाले कार्यों को भी संभव कर सकता है।

