माता उर्वशी
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एक बार अर्जुन कहीं वन में थे। अप्सरा उर्वशी उस पर मोहित होकर अर्जुन के रास्ते में बड़ी दुखी मुद्रा बना कर बैठ गई। एक नारी को इस प्रकार दुखी देखकर अर्जुन ने इसका कारण पूछा।उसने कहा—मुझे एक बड़ा मानसिक कष्ट है उसे आप चाहें तो आसानी से दूर कर सकते हैं। अर्जुन ने कहा—देवि! मैं आपकी जो सहायता कर सकता हूंगा अवश्य करूंगा। आप निस्संकोच कहिए। उर्वशी ने काम प्रस्ताव करते हुए कहा—मैं आपके द्वारा आप जैसा ही एक पुत्र चाहती हूं। मेरी इच्छा पूरी कीजिए।
अर्जुन सन्न रह गये। उनने उत्तर दिया देवि! एक तो मैं ‘पत्नीव्रती’ हूं। दूसरी नारी को माता समान मानता हूं। दूसरे काम प्रस्ताव स्वीकार करने पर भी यह निश्चय नहीं कि पुत्र ही हो और कन्या न हो। फिर पुत्र भी हो तो यह भी आवश्यक नहीं कि उसमें मेरे जैसे ही गुण हों। फिर उसे पेट में रखने और पालन करने में तथा मेरे समान होने तक प्रतीक्षा करने में बहुत कष्ट होगा। इसलिए एक सबसे उत्तम उपाय यह है कि आप मुझे आज ही अपना पुत्र मान लें। इससे आपको मुझ जैसा पुत्र प्राप्ति का लाभ तुरन्त ही मिल जावेगा। मैं भी सदा आपको कुन्ती के समान माता ही मानता रहूंगा।’’
पर-नारी को मातृबुद्धि से देखना यही भारतीय आदर्श रहा है।
अर्जुन सन्न रह गये। उनने उत्तर दिया देवि! एक तो मैं ‘पत्नीव्रती’ हूं। दूसरी नारी को माता समान मानता हूं। दूसरे काम प्रस्ताव स्वीकार करने पर भी यह निश्चय नहीं कि पुत्र ही हो और कन्या न हो। फिर पुत्र भी हो तो यह भी आवश्यक नहीं कि उसमें मेरे जैसे ही गुण हों। फिर उसे पेट में रखने और पालन करने में तथा मेरे समान होने तक प्रतीक्षा करने में बहुत कष्ट होगा। इसलिए एक सबसे उत्तम उपाय यह है कि आप मुझे आज ही अपना पुत्र मान लें। इससे आपको मुझ जैसा पुत्र प्राप्ति का लाभ तुरन्त ही मिल जावेगा। मैं भी सदा आपको कुन्ती के समान माता ही मानता रहूंगा।’’
पर-नारी को मातृबुद्धि से देखना यही भारतीय आदर्श रहा है।

