दानी रन्तिदेव
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राजा रन्तिदेव की कथा प्रसिद्ध है। वे अपने दरवाजे पर आये हुए किसी सत्पात्र अतिथि को खाली हाथ नहीं जाने देते थे।दान करते-करते जब राज्य कोष खाली हो गया तो वे जंगल में जाकर तप करने लगे। वहां जो कुछ कन्दमूल फल मिल जाते उसी पर गुजारा करते।अतिथि वहां भी पहुंचने लगे। एकबार दुर्भिक्ष पड़ने से वन में भी खाद्य पदार्थों का अभाव हो गया। बहुत दिन सूखे रहने के बाद एक दिन जब रन्तिदेव को कुछ आहार प्राप्त हुआ तो वे पहले अतिथि को ढूंढ़ने लगे। इतने में एक ब्राह्मण, एक चाण्डाल तथा कई कुत्ते भूख से पीड़ित सामने आ गये। रन्तिदेव ने अपना तथा अपने स्त्री बच्चों का भोजन इन अतिथियों को देकर स्वयं फिर भूखा रह जाना स्वीकार किया।
दानशीलता उनके लिये उच्चकोटि की तप-साधना बनी और इसी के आधार पर रन्तिदेव ने जीवन लक्ष्य प्राप्त किया। दान स्वयं एक महान तप है।
दानशीलता उनके लिये उच्चकोटि की तप-साधना बनी और इसी के आधार पर रन्तिदेव ने जीवन लक्ष्य प्राप्त किया। दान स्वयं एक महान तप है।

