भीष्म की पितृ-भक्ति
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राजा शान्तनु एक रूपवती निषाद कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहते थे। उनने निषाद के आने पर प्रस्ताव रखा तो उसने उत्तर दिया कि यदि मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न बालक को ही आप राज आदि देने का वचन दें तो मैं यह प्रस्ताव स्वीकार कर सकता हूं। शान्तनु असमंजस में पड़े। क्योंकि उनकी पहली रानी गंगा का पुत्र भीष्म मौजूद था और वही राज्याधिकारी भी था।शान्तनु लौट आये पर वे मन ही मन दुःखी रहने लगे।
भीष्म को जब यह पता चला तो उनने पिता को संतुष्ट करना अपना कर्तव्य समझा और निषाद के सामने जाकर प्रतिज्ञा की मैं अपना राज्याधिकार छोड़ता हूं। सत्यवती का पुत्र ही राज्याधिकारी होगा। इतना ही नहीं मैं आजीवन अविवाहित भी रहूंगा ताकि मेरी सन्तान कहीं उस गद्दी पर अपना अधिकार न जमाने लगे। इस प्रतिज्ञा से निषाद संतुष्ट हुआ और उसने अपनी कन्या का विवाह शान्तनु के साथ कर दिया।
पिता के दोष को न देख कर उनकी प्रसन्नता के लिए स्वयं बड़ा त्याग करना भीष्म की आदर्श पितृभक्ति है।
भीष्म को जब यह पता चला तो उनने पिता को संतुष्ट करना अपना कर्तव्य समझा और निषाद के सामने जाकर प्रतिज्ञा की मैं अपना राज्याधिकार छोड़ता हूं। सत्यवती का पुत्र ही राज्याधिकारी होगा। इतना ही नहीं मैं आजीवन अविवाहित भी रहूंगा ताकि मेरी सन्तान कहीं उस गद्दी पर अपना अधिकार न जमाने लगे। इस प्रतिज्ञा से निषाद संतुष्ट हुआ और उसने अपनी कन्या का विवाह शान्तनु के साथ कर दिया।
पिता के दोष को न देख कर उनकी प्रसन्नता के लिए स्वयं बड़ा त्याग करना भीष्म की आदर्श पितृभक्ति है।

