क्षमा और पश्चाताप
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शरद पूर्णिमा की रात्रि को प्रकाशवान चन्द्रमा को देख कर महर्षि वशिष्ठ ने अपनी पत्नी अरुन्धती से कहा—प्रिये, आज का चन्द्रमा वैसा ही दीप्तिमान हो रहा है—जैसा विश्वामित्र का तप।
विश्वामित्र की प्रशंसा वशिष्ठ के मुंह से सुन कर अरुन्धती खिन्न हुई। अपने सौ पुत्रों को निर्ममता पूर्वक मार डालने वाले की ऐसी प्रशंसा वे सुन न सकीं और व्यंग से कहा—यदि ऐसा ही है तो आप उन्हें ब्रह्मर्षि क्यों नहीं कहते और उनके रोष को शान्त क्यों नहीं करते?
वशिष्ठ गंभीर हो गये। उन्होंने कहा—भद्रे, सद्गुणों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करना हमारा कर्तव्य है। उनमें दोष एक ही है और वह है—अहंकार। अहंकार से ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और विक्षोभ उत्पन्न होता है और उसी से प्रेरित होकर मनुष्य दुष्कर्म करने लगता है। विश्वामित्र की धवल तपश्चर्या यदि अहंकार से रहित हुई होती तो वे आज संसार के एक महान पुरुष ही हुए होते।
विश्वामित्र उस कुटिया के पीछे ही छिपे हुए थे। वशिष्ठ को अपना शत्रु समझते थे और उन्हें मारने आये थे। वे चाहते थे कि या तो वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित करें या वे उन्हें मार देंगे। अपने दोषों का नहीं गुणों का ही उन्हें ध्यान था। अहंकार उन्हें ब्रह्मर्षि बनने की लालसा में उद्विग्न बनाये हुए था।
अरुन्धती और वशिष्ठ का पारस्परिक संभाषण सुनने के बाद विश्वामित्र ने जाना कि द्वेष से नहीं न्यास से प्रेरित होकर ही वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित नहीं करते। जब तक दुर्भावना के साथ सोचा गया था तब तक वशिष्ठ उन्हें अपने निंदक और शत्रु दीख रहे थे पर जब उन्होंने तात्विक दृष्टि से सोचा तो वास्तविकता समझने में देर न लगी। अवि विश्वामित्र की दृष्टि में वशिष्ठ एक न्याय दृष्टि रखने वाले कर्तव्यनिष्ठ, सज्जन, मित्र बन गये। सोचने का तरीका ठीक होते ही सब कुछ ठीक हो गया।
आत्म निरीक्षण करते ही अहंकार गला। जहां अहंकार हटा वहां न द्वेष रहता है और न क्रोध। विश्वामित्र को लगा कि अनुचित मांग को ठुकराने वाले वशिष्ठ उनके शत्रु नहीं, सच्चे मित्र हैं। वे देर तक छिपे न रह सके। कुटिया के पिछवाड़े से हट कर सामने आये और महर्षि के चरणों पर गिर कर क्षमा मांगने लगे।
वशिष्ठ ने ‘ब्रह्मर्षि’ कह कर उन्हें छाती से लगा लिया। अहंकार गलित हो जाने के बाद निकृष्टता का स्तर कहां रहा? मन बदला तो सब कुछ बदल जाता है। विश्वामित्र जब भीतर से बदले तो उनका बाहरी स्तर बदलने में क्यों कठिनाई होती? दर्प और द्वेष से जो चाहते थे वह उन्हें नहीं मिला पर हृदय परिवर्तन होते ही सारी बाधाएं दब गईं। वशिष्ठ द्वारा घोषित विश्वामित्र सर्वत्र ब्रह्मर्षि के नाम से पुकारे जाने लगे।
विश्वामित्र की प्रशंसा वशिष्ठ के मुंह से सुन कर अरुन्धती खिन्न हुई। अपने सौ पुत्रों को निर्ममता पूर्वक मार डालने वाले की ऐसी प्रशंसा वे सुन न सकीं और व्यंग से कहा—यदि ऐसा ही है तो आप उन्हें ब्रह्मर्षि क्यों नहीं कहते और उनके रोष को शान्त क्यों नहीं करते?
वशिष्ठ गंभीर हो गये। उन्होंने कहा—भद्रे, सद्गुणों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करना हमारा कर्तव्य है। उनमें दोष एक ही है और वह है—अहंकार। अहंकार से ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और विक्षोभ उत्पन्न होता है और उसी से प्रेरित होकर मनुष्य दुष्कर्म करने लगता है। विश्वामित्र की धवल तपश्चर्या यदि अहंकार से रहित हुई होती तो वे आज संसार के एक महान पुरुष ही हुए होते।
विश्वामित्र उस कुटिया के पीछे ही छिपे हुए थे। वशिष्ठ को अपना शत्रु समझते थे और उन्हें मारने आये थे। वे चाहते थे कि या तो वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित करें या वे उन्हें मार देंगे। अपने दोषों का नहीं गुणों का ही उन्हें ध्यान था। अहंकार उन्हें ब्रह्मर्षि बनने की लालसा में उद्विग्न बनाये हुए था।
अरुन्धती और वशिष्ठ का पारस्परिक संभाषण सुनने के बाद विश्वामित्र ने जाना कि द्वेष से नहीं न्यास से प्रेरित होकर ही वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित नहीं करते। जब तक दुर्भावना के साथ सोचा गया था तब तक वशिष्ठ उन्हें अपने निंदक और शत्रु दीख रहे थे पर जब उन्होंने तात्विक दृष्टि से सोचा तो वास्तविकता समझने में देर न लगी। अवि विश्वामित्र की दृष्टि में वशिष्ठ एक न्याय दृष्टि रखने वाले कर्तव्यनिष्ठ, सज्जन, मित्र बन गये। सोचने का तरीका ठीक होते ही सब कुछ ठीक हो गया।
आत्म निरीक्षण करते ही अहंकार गला। जहां अहंकार हटा वहां न द्वेष रहता है और न क्रोध। विश्वामित्र को लगा कि अनुचित मांग को ठुकराने वाले वशिष्ठ उनके शत्रु नहीं, सच्चे मित्र हैं। वे देर तक छिपे न रह सके। कुटिया के पिछवाड़े से हट कर सामने आये और महर्षि के चरणों पर गिर कर क्षमा मांगने लगे।
वशिष्ठ ने ‘ब्रह्मर्षि’ कह कर उन्हें छाती से लगा लिया। अहंकार गलित हो जाने के बाद निकृष्टता का स्तर कहां रहा? मन बदला तो सब कुछ बदल जाता है। विश्वामित्र जब भीतर से बदले तो उनका बाहरी स्तर बदलने में क्यों कठिनाई होती? दर्प और द्वेष से जो चाहते थे वह उन्हें नहीं मिला पर हृदय परिवर्तन होते ही सारी बाधाएं दब गईं। वशिष्ठ द्वारा घोषित विश्वामित्र सर्वत्र ब्रह्मर्षि के नाम से पुकारे जाने लगे।

