अपकारों का विस्मरण
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
महाभारत युद्ध समाप्त होने पर जब कौरव मारे गये और पाण्डवों ने विजय प्राप्त करली तो धृतराष्ट्र और गान्धारी उन्हीं के पास रहने लगे। पाण्डव उनका आदर पिता तुल्य ही करते थे। सारा राज-काज उन्हीं से पूछकर चलाते थे और कितनी ही व्यग्रता रहने पर स्वयं उनकी सेवा सुश्रूषा करते थे ताकि वे पुत्रों के शोक को भूल जायें। कुन्ती और द्रोपदी भी गान्धारी की सेवा में लगी रहती थीं। अन्त में जब धृतराष्ट्र और गान्धारी ने शेष जीव वन में बिताने का निश्चय किया तो कुन्ती भी अपने जेठ जिठानी की सेवा करने के लिए उनके साथ हो गई। वन जाने से पूर्व धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों और संबंधियों का श्राद्ध करने की इच्छा प्रकट की तो पाण्डवों ने इसके लिए खजाने का मुंह खोल दिया। धृतराष्ट्र ने जितना खर्च करना चाहा उन्हें मुक्तहस्त से करने दिया। पाण्डवों ने युद्ध काल से पूर्व की धृतराष्ट्र तथा उनके पुत्रों की दुष्टताओं की चर्चा करना तो दूर, उनको मन में स्थान भी न दिया।
किसी के किये अपकारों को भूल जाना ही सज्जनता है।
किसी के किये अपकारों को भूल जाना ही सज्जनता है।

