भूलोक में सेवा-धर्म
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महापराक्रमी और पुण्यात्मा विद्रुध समयानुसार दिवंगत हुए और अपने सत्कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग लोक में सुखोपभोग करने लगे।
सुख साधन बहुत और परमार्थ का अवसर तनिक भी नहीं, ऐसे स्वर्ग में उनका दम घुटने लगा। आत्मा को सुख से नहीं, पुण्य से शान्ति मिलती है। जहां सुख तो रहे पर पुण्य का सन्तोष लाभ न मिले वहां रह कर मैं क्या करूं? इस चिन्ता में वे निरन्तर खिन्न रहने लगे।
देवराज इन्द्र ने एक दिन उनकी खिन्नता का कारण पूछा तो उनने अपने मन की व्यथा कह सुनाई। उन्हें सुख नहीं शान्ति चाहिये। वे विलास में नहीं परमार्थ में सन्तोष अनुभव करेंगे। देवराज की कृपा हो जाय तो मेरी सेवा का अवसर प्राप्त करने की कामना पूर्ण होती है।
सुरगुरु बृहस्पतिजी ने विद्रुध को देव सभा में बहुत सराहा और कहा—सुख सुविधा से भरे हुए स्वर्ग की अपेक्षा तपस्वियों का तप लोक अधिक श्रेष्ठ है। विद्रुध देवताओं से अधिक श्रेष्ठ हैं, इसलिए इन्हें वहां भेजा जाय जहां पुण्य परमार्थ और सेवा साधना के अधिक अवसर होते हैं। ऐसे तप लोक ही ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं के लिए अधिक उपयुक्त है।
एक अनजान देवता ने पूछा—तप लोक से आपका प्रयोजन किस पुण्य क्षेत्र से है? देवगुरु ने कहा—मनुष्य लोक ही तप लोक है। उच्च कोटि के देवता वहां निवास करते हैं। सेवा और संयम से प्राप्त होने वाला सन्तोष इस बेचारे स्वर्ग में कहां? वह अवसर केवल भूलोक के निवासी मानव प्राणियों में ही उपलब्ध है।
विद्रुध की महानता के आगे देवताओं के मस्तक झुक गये। उन्हें पुण्य परमार्थ का सन्तोष लाभ करने के लिए पुनः भूलोक में भेज दिया गया। लौटने पर उन्होंने पश्चाताप का नहीं, प्रसन्नता का ही अनुभव किया।
सुख साधन बहुत और परमार्थ का अवसर तनिक भी नहीं, ऐसे स्वर्ग में उनका दम घुटने लगा। आत्मा को सुख से नहीं, पुण्य से शान्ति मिलती है। जहां सुख तो रहे पर पुण्य का सन्तोष लाभ न मिले वहां रह कर मैं क्या करूं? इस चिन्ता में वे निरन्तर खिन्न रहने लगे।
देवराज इन्द्र ने एक दिन उनकी खिन्नता का कारण पूछा तो उनने अपने मन की व्यथा कह सुनाई। उन्हें सुख नहीं शान्ति चाहिये। वे विलास में नहीं परमार्थ में सन्तोष अनुभव करेंगे। देवराज की कृपा हो जाय तो मेरी सेवा का अवसर प्राप्त करने की कामना पूर्ण होती है।
सुरगुरु बृहस्पतिजी ने विद्रुध को देव सभा में बहुत सराहा और कहा—सुख सुविधा से भरे हुए स्वर्ग की अपेक्षा तपस्वियों का तप लोक अधिक श्रेष्ठ है। विद्रुध देवताओं से अधिक श्रेष्ठ हैं, इसलिए इन्हें वहां भेजा जाय जहां पुण्य परमार्थ और सेवा साधना के अधिक अवसर होते हैं। ऐसे तप लोक ही ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं के लिए अधिक उपयुक्त है।
एक अनजान देवता ने पूछा—तप लोक से आपका प्रयोजन किस पुण्य क्षेत्र से है? देवगुरु ने कहा—मनुष्य लोक ही तप लोक है। उच्च कोटि के देवता वहां निवास करते हैं। सेवा और संयम से प्राप्त होने वाला सन्तोष इस बेचारे स्वर्ग में कहां? वह अवसर केवल भूलोक के निवासी मानव प्राणियों में ही उपलब्ध है।
विद्रुध की महानता के आगे देवताओं के मस्तक झुक गये। उन्हें पुण्य परमार्थ का सन्तोष लाभ करने के लिए पुनः भूलोक में भेज दिया गया। लौटने पर उन्होंने पश्चाताप का नहीं, प्रसन्नता का ही अनुभव किया।

