प्रतिहिंसा का अन्त नहीं
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युधिष्ठिर ने ‘नरोवा कुञ्जरोवा’ का भ्रमपूर्ण वक्तव्य देकर द्रोणाचार्य को शोक संतप्त कर दिया और उस खिन्न अवस्था से लाभ उठा कर जब उनको मारा गया तो इस अनीतिपूर्ण कार्य से द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध आया। वह प्रतिशोध लेने के लिए क्रोधान्ध होकर कुछ भी करने के लिए उतारू हो गया।
उसने द्रौपदी के सोते हुए पांचों पुत्रों की हत्या कर डाली और उत्तरा के गर्भ पर भी आक्रमण किया ताकि पाण्डवों का वंश नाश ही हो जाय। यह प्रतिहिंसा यहीं समाप्त नहीं हुई। पाण्डवों को अपने पुत्रों मरने का दुःख हुआ और उनने भी अश्वत्थामा से बदला लेने की ठानी। युद्ध में जीतकर अर्जुन ने उसे बांधकर द्रौपदी के सामने उपस्थित किया ताकि उसकी इच्छानुसार दण्ड दिया जा सके।
द्रौपदी ने दूरदर्शिता और उदारता से काम लिया। हिंसा और प्रतिहिंसा का कुचक्र तोड़े बिना काम नहीं चलता। इससे तो आगे भी सर्वनाश ही होता चलता हैद्रौपदी ने अर्जुन से कहा—छोड़दो छोड़दो, यह ब्राह्मण हमसे श्रेष्ठ हैं।
जिन गुरु द्रोणाचार्य ने तुम्हें धनुर्विद्या सिखाई, यह उन्हीं का पुत्र है। उनके उपकारों को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करो और इसे छोड़ दो। ब्राह्मण पूजा के योग्य हैं वध के योग्य नहीं। मैं अपने पुत्रों की मृत्यु से दुःखी होकर जिस प्रकार रो रही हूं उसी प्रकार इसकी माता गौतमी को भी मेरे समान ही न रोना पड़े, इसलिए इसे छोड़ देना ही उचित है।
उसने द्रौपदी के सोते हुए पांचों पुत्रों की हत्या कर डाली और उत्तरा के गर्भ पर भी आक्रमण किया ताकि पाण्डवों का वंश नाश ही हो जाय। यह प्रतिहिंसा यहीं समाप्त नहीं हुई। पाण्डवों को अपने पुत्रों मरने का दुःख हुआ और उनने भी अश्वत्थामा से बदला लेने की ठानी। युद्ध में जीतकर अर्जुन ने उसे बांधकर द्रौपदी के सामने उपस्थित किया ताकि उसकी इच्छानुसार दण्ड दिया जा सके।
द्रौपदी ने दूरदर्शिता और उदारता से काम लिया। हिंसा और प्रतिहिंसा का कुचक्र तोड़े बिना काम नहीं चलता। इससे तो आगे भी सर्वनाश ही होता चलता हैद्रौपदी ने अर्जुन से कहा—छोड़दो छोड़दो, यह ब्राह्मण हमसे श्रेष्ठ हैं।
जिन गुरु द्रोणाचार्य ने तुम्हें धनुर्विद्या सिखाई, यह उन्हीं का पुत्र है। उनके उपकारों को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करो और इसे छोड़ दो। ब्राह्मण पूजा के योग्य हैं वध के योग्य नहीं। मैं अपने पुत्रों की मृत्यु से दुःखी होकर जिस प्रकार रो रही हूं उसी प्रकार इसकी माता गौतमी को भी मेरे समान ही न रोना पड़े, इसलिए इसे छोड़ देना ही उचित है।

